Tuesday, February 10, 2009

निधन : सुदीप बैनर्जी

सुंदर (चंद ठाकुर) जब आज का काम ख़त्म करने के ठीक पहले यह बताने आए कि सुदीपजी का निधन हो गया है, तो सहसा यकीन नहीं हुआ। यह अप्रत्याशित था। ख़बर बनाते हुए भी बड़ा अजीब लग रहा था। हिन्दी के एक कवि होने के अलावा उनके बारे में एक अल्पज्ञात तथ्य यह भी है कि वे एक उच्चपदस्थ सरकारी मुलाजिम थे और ऐसा होने के बावजूद समाज की परिवर्तनकामी शक्तियों के साथ थे। कविता में ऐसी संगत बहुत से कवियों ने की है। पर कविता के बाहर भी ऐसा करने का माद्दा और अपने द्वारा ऐसा किए जाने को परोक्ष रखने का संयम बहुत कम लोगों में है। इस लिहाज से वे बहुत अच्छे कवि होने के साथ-साथ बहुत उम्दा इंसान भी थे। उनकी काव्य-भाषा में उर्दू-हिन्दी की मेलजोल शमशेर जितनी ही पक्की है, और अपने समय को दर्ज करने का उनका अलहदा तरीका उन्हें आठवें दशक के कवियों में महत्वपूर्ण बनाता है। सबद सुदीपजी और उनके परिवार के प्रति अपनी शोक-संवेदना प्रकट करता है।

कुछ कविताएं

इतना औसत समय

इतना औसत समय
इतनी गहरी व्यथा
इतना विचलित मन
गाफ़िल अपने ही शोर में


कोई रह-रहकर पुकार उठता
जगाता खौफनाक हसरतों को
पीछे मुड़कर देखने पर
कोई कहीं भी तो नहीं


सधती नहीं यह भाषा
इतना भरा भरा मन
इतने गुज़र गए लोग।
****

नदियाँ मेरे काम आईं

जहाँ भी गया मैं
नदियाँ मेरे काम आईं

भटका इतने देस-परदेस
देर-सबेर परास्त हुआ पड़ोस में
इसी बीच चमकी कोई आबेहयात
मनहूस मोहल्ला भी दरियागंज हुआ


पैरों के पास से सरकती लकीर
समेटती रही दीं और दुनिया
काबिज़ हुई मैदानों बियाबानों में
ज़माने की मददगार
किनारे तोड़कर घर-घर में घुसती रही


सिरहाने को फोड़ती सुर सरिता
दुखांशों से देशान्तरों को
महासागर तक अपने अंत में
पुकारती हुई


मलेनी नेवज डंकनी शंखनी
इन्द्रावती गोदावरी नर्मदा शिप्रा
चम्बल बीहड़ों को पार करती
कोई न कोई काम आई पुण्य सलिला


जैसे ही मैं शिकार हुआ
अब सब मरहले तय करके
व्यतीत व्यसनों में विलीन
दाखिल हुआ इस दिल्ली में उदास


इसका भी भला हो
सुनता हूँ यहाँ भी एक यमुना है
वह भी एक दिन काम ज़रूर आएगी।

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धीरे-धीरे दरकिनार होते

धीरे-धीरे दरकिनार होते हुए
मैं देख रहा हूँ एक निरर्थक नदी पर
वेगवान है, मेरे हमउम्र
तमाम दोस्तों की दिनचरयाएं
वे सब किनारे लगेंगे अगली सदी में


अगली सहस्त्राब्दि में
अपने नाती पोतों के नाती पोतों के
नाती पोतों के ज़माने तक
हरकत में रहने का दमख़म है उनमें

अपनी इनसानियत में ईश्वर के प्रतिस्पर्धी
उसको पराजित कर भी माफ़ कर देने की
विनम्र शक्ति उनकी जिजीविषा में


मैं और ज़माने का बाशिंदा
अपने दादों-परदादों के दादों-परदादों
के दादों-परदादों के पहले से प्रेतों का हमसाया


धीरे-धीरे लौटते हुए
माँ की कोख से होते हुए
अज़ल की ओर मुखातिब


वे वयस्क होंगे युगान्तरों के बाद
मैं कब का बुज़ुर्ग हुआ
आदमज़ाद के शाया होने से थोड़ा अव्वल।
****


( ये कविताएं कवि की मेधा प्रकाशन से आए प्रतिनिधि चयन से साभार। )

6 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

सुदीप जी के बारे में तुमने जो कुछ भी लिखा, सौ फीसदी सही है अनुराग.
मेरी और अनुनाद की श्रद्धांजलि.

vijay gaur/विजय गौड़ said...

खबर ही ऎसी है मित्र कि जि पर यकीन करना आसान नहीं। सुदीपबैनर्जी की कविताएं मुझे बेहद पसंद है। प्रिय कवि को विनम्र श्रद्धांजलि।

सुभाष नीरव said...

Vinamr Shradhajali !

Anonymous said...

thanks for posting the good poems...
by the way i was searching for the Hindi typing tool and found 'quillpad'. do u use the same..?

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

सर-अवनत मौन श्रद्धांजलि!

Ratnesh said...

Sandeepji ko shradhajali! Kavitayen achhi lagi.