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पोथी पढ़ि पढ़ि : १ : फरनांदो पैसोआ



एक बेचैन के रोजनामचे से कुछ वाक्य...


किसी चीज़ को अभिव्यक्त करने का मतलब है उसके गुण को संरक्षित रखना, उसके आतंक को निकाल देना।

मैंने ज़िन्दगी में बहुत कम चाहा, पर उस रंचमात्र से भी मुझे वंचित रखा गया। ...इस ज्ञान से कि मेरा अस्तित्व है, बहुत ज़्यादा न सताया जाऊँ, दूसरों से किसी चीज़ को चाहूँ नहीं, और न दूसरे मुझसे कोई चीज़ मांगे ...यह सब मुझे इनकार किया गया, वैसे ही जैसे कोई सद्भावना के अभाव के कारण आश्रय देने से इनकार नहीं करता, बल्कि इसलिए इनकार करता है कि उसे अपने कोट के बटन न खोलने पड़ें।

दुखी मन से मैं अपने शांत कमरे में लिखता हूँ, अकेला, जैसा कि मैं सदा से रहा, अकेला, जैसा मैं सदा रहूँगा। और मैं अचरज करता हूँ कि क्या मेरी साफ़-साफ़ कामजोर आवाज़ हजारों आवाजों के सार को साकार नहीं कर सकती, हजारों जिंदगियों की आत्माभिव्यक्ति की लालसा, हजारों आत्माओं का धैर्य, जो मेरी तरह निरर्थक सपने देखने और रोजाना की इस किस्मत में बेपता आशा के हवाले हो गई हैं...

मुझमें कुछ ऐसा है जो सदा करुणा की याचना करता है और जो अपने आप पर ऐसे रोता है जैसे किसी मृत देवता पर, जिसने उस समय अपने सारे पूजन-स्थल खो दिए...

किसी भी व्यक्ति के लिए ईमानदारी से यह स्वीकार करने के लिए बौद्धिक साहस की ज़रूरत है कि वह एक मानवीय क्षुद्र तत्व से अधिक नहीं है, कि वह एक ऐसा गर्भपात है जो होने से बच गया...

मैंने हमेशा चाहा कि लोग मुझे समझें नहीं। लोगों द्वारा समझे जाने का अर्थ स्वयं को वेश्या बनाना है।

प्रेम करने का अर्थ है अकेले रहने की थकावट, इसलिए वह अपने आप से एक कायरता, एक विश्वासघात है।

मैं जैसा होना चाहता था, बिल्कुल वैसा ही होना चाहता हूँ, पर मैं वैसा नहीं हूँ।...मैं एक कलात्मक कृति होना चाहता हूँ, कम से कम अपनी आत्मा में, क्योंकि मैं अपने शरीर में तो ऐसा नहीं हो सकता।

प्रत्येक विजय एक अश्लीलता है। विजेता अनिवार्यतः अपनी निराशा के सारे गुण खो बैठता है, जिसने उसे संघर्ष की ओर प्रवृत्त किया और विजय दिलाई।

मैंने तय किया है कि अब मैं कुछ नहीं लिखूंगा, न सोचूंगा, इसके बदले में कुछ कहने का ताप मुझे सुला दे और मैं जो कुछ भी कह सकता था, उसे अपनी आँखें बंद कर थपथपाऊँ, चपत लगाऊँ, जैसे वह कोई बिल्ली हो।
****

( ऊपर पुर्तगाल के महान कवि-लेखक फरनांदो पैसोआ की गद्य पुस्तक ''द बुक ऑफ़ डिस्क्वाएटयुड'' से कुछ अंश दिए गए हैं। इस पुस्तक को मैंने शरद चंद्रा के अनुवाद में पहली दफा पढ़ा था। यह चयन चंद्रा के अनुवाद से ही है। पैसोआ का गद्य कविता के तनाव और संक्षिप्ति के अलावा गहन दार्शनिक आभा से युक्त है। उसके प्रभाव में अवश खिंच जाना अचरज नहीं। )

Comments

महेन said…
अनुराग यह किताब बहुत काम की लग रही है. धन्यवाद... ढूंढ़ना शुरू करता हूँ.
ravindra vyas said…
आपने मार्मिक पंक्तियां चुनीं। मैं पेसोअा का अशोक पांडे द्वारा किया अनुवाद पढ़ चुका हूं। यह भी ढूंढ़ कर पढ़ता हूं।
अच्छी पोस्ट है।

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