सबद

आलोचना का पक्ष : १ : वागीश शुक्ल


साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है


पढ़ना एक ऋण का स्वीकार है, लिखना उस ऋण की अदायगी।
लिखने के बाद मरने का हक मिलता है।

साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है।
इसमें साहित्य पढ़ना और रचना दोनों शामिल है।

जैसे
रेशम का कीड़ा अपने चारों ओर एक कीमती चीज़ बुनता है और मौत को बुलावा देता है (वैसे ही) मौत अपने चारों ओर कहानी बुनती है, जिसका नाम ज़िन्दगी है।

साहित्य
शब्द और अर्थ के शराब हो जाने का भाव है। यदि यह पढ़ने में बुरा लगता हो तो 'शराब' की जगह 'मधु' पढ़ लें, इससे वाक्य का तात्पर्य नहीं बदलेगा। जिन चीजों से शराब बनती है, वे अलग-अलग शराब नहीं हैं, नशा उनमें नहीं, (उनके) संधान में है। शब्द और अर्थ में अलग-अलग साहित्य नहीं है, उनके मिलाप में है। (इस तरह) शब्द और अर्थ को चुआ कर बनाई गई शराब ही साहित्य है।

कवि
एक भट्ठी लगाता है, शब्द और अर्थ की आग में, अर्थ को शब्द की आग में चुआते हुए कविता की मदिरा तैयार करने के लिए। शब्द और अर्थ दोनों को भाड़ में झोंकते हुए वह दोनों लुकाठियों से घर फूंकता हुआ उनके धुएँ में बदलने का तमाशा देखता है।

आलोचना का काम है कि यदि कविता का सिंगार कवि के खून से हुआ है तो उस पर इतने आंसू टपकाती रहे कि वह खून सूखने न पाए।

उजड़ी अयोध्या कैसे आबाद होती है ? रामायण कहती है, '' रामायण पढ़ने से''। पाठक रामायण पढ़ता है और पाता है कि इस उजड़ी हुई अयोध्या का रास्ता इतना उबड़खाबड़ है कि वह बिना रथ से उतरे, बिना इसको भूले कि वह किस देशकाल में है, उसका अपना समाज और उसका अपना मन क्या है, उसमें नहीं जा सकता। और ऐसा करते ही वह पाता है कि वह ख़ुद ही तो उस उजड़ी हुई अयोध्या में बिखरा हुआ था और यही उस अयोध्या का आबाद होना है।

जब
प्रौद्योगिकी धर्म गढ़ती है तो वह एक किताब को स्वीकार करती है जिसमें सारे जवाब हैं। ज़ाहिर है कि यह किताब मनुष्य को दो हिस्सों में बांटती है और जब भी एक किताब का दूसरी किताब से सामना होता है, एक किताब को माननेवाले दूसरी किताब को अफीम बत्ताते हैं।

कला
का हर काम एक खोज है। उसे कोई जवाब नहीं मालूम होता।

कला
को 'पेगन' कहते हैं, विश्वास और अन्धविश्वास में फर्क न कर पाती हुई, अंधेरे में डूबी रोशनी से कतराती हुई, जिसने किताब को नहीं पहचाना।
उसके पास किताब नहीं होती, किताबें होती हैं और हर किताब अपने समझे जाने को एक दूसरी किताब में बताती है।
****

( वागीश शुक्ल हिन्दी आलोचना में एक अपवाद हैं। उनकी आलोचना में भारतीय काव्यशास्त्र से लेकर उत्तरआधुनिक विमर्शों के लिए जगह के साथ-साथ संस्कृत तथा उर्दू की समृद्ध काव्य-परम्परा की प्रखर स्मृति और बसाव भी है। निराला की कालजयी कविता ''राम की शक्तिपूजा'' की अद्वितीय टीका लिखने के अलावा आलोचना की दो और पुस्तकें भी उनके नाम हैं। ''याज्ञवल्क्योपाख्यान'' नामक वृहदाकार उपन्यास पर वे वर्षों से काम कर रहे हैं जिसके कुछ अंश सुधि पाठकों ने विभिन्न पत्रिकाओं में पढ़ा होगा। यहाँ वागीशाजी के आलोचनात्मक लेखन से कुछ पंक्तियाँ चुन कर दी गई हैं। सबद में आगे भी आलोचना का पक्ष, बजरिये आलोचक, इसी लघु कलेवर में दिया जाएगा। वागीश शुक्ल का रेखांकन जितेन्द्र व्यास ने बनाया है। )

3 comments:

मनोहर श्याम जोशी के शब्दों में 'मौलाना पंडित' वागीश शुक्ल को सबद पर देखना बेहद, बेहद सुखद है. वागीश जी को लेकर हिन्दी मुख्यधारा में एक ही व्यवहार है (जो वैसे भी एक आजमाई हुई प्रभावी युक्ति है): उन पर बात ही नहीं करना. ऐसे जताना मानो वे है ही नहीं. वागीश जी कापी लेफ्ट के समर्थक हैं जब हमने 'याज्ञवल्क्योपाख्यान' का एक अध्याय प्रकाशित किया तो उनकी चिंता यही थी कि क्या हम शुद्ध छाप पाएंगे?. वे सारा काम लिनक्स में करते हैं. अगर कोई मित्र मेरी मदद करे तो मैं उनका सारा काम इंटरनेट पर लाना चाहता हूँ.


Waah ! Kitni sundar aur satya...baat kahi gayi hai..

Prastut karne hetu aabhaar.


शुक्ल जी को पढना आधुनिक , मध्य तथा प्राचीन भारत को गहराई से समझ पाना है। यहां कोई भी उपेक्षित नहीं है। सबके साथ एक साथ न्याय कर पाना इन्हीं के बस की बात है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास में ऐसी जहान्बीनी कितनी दुर्लभ है.....


सबद पुस्तिका : 9

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