Tuesday, February 24, 2009

मारियो और मासिमो

पहले कविता पढ़ने में आई। गीत चतुर्वेदी की। उन्हीं की भेजी गई कविताओं की फाइल में, पोस्टमैन शीर्षक से। नेरुदा अजाने नहीं थे। पर पोस्टमैन न सिर्फ़ अजाना था, बल्कि कविता और उसके फ़ुटनोट को पढ़कर उसकी ट्रैजिक लाइफ के बारे में जो जानकारी मिली उससे मन गहरे भिद गया।

अपने निर्वासित दिनों में नेरुदा स्पेन के एक छोटे से द्वीप में कुछ समय व्यतीत करते हैं। वहां भी उनके नाम दुनिया भर से डाक आती है। इतनी कि डाक विभाग को एक विशेष डाकिया नेरुदा तक उनकी चिट्ठियां पहुंचाने के लिए अलग से नियुक्त करना पड़ता है। डाकिये का नाम मारियो है। मारियो बहुत साधारण सा दिखनेवाला नौजवान है, जिसे एक खूबसूरत सी लड़की से प्यार हो जाता है। पर वह अपने प्रेम में इतना विश्वत नहीं कि उससे जाकर यह कह सके। इसमें स्वयं मातील्दा के प्रेम में डूबे कवि नेरुदा उसकी मदद करते हैं और वह न सिर्फ़ उस लड़की को इम्प्रेस कर उससे विवाह करता है, बल्कि नेरुदा की संगति कर कविताएं भी करने लगता है।

नेरुदा के उस द्वीप से जाने के बाद मारियो के पास उनकी बेशुमार यादें और वह सरोसामान रह जाता है जिसे वे अपने पीछे छोड़ गए थे। मारियो नेरुदा को हरचंद ख़त लिखकर अपनी याद दिलाता है, पर महाकवि की तरफ से उन खतों का कोई जवाब नहीं आता। मारियों के नाम अरसा बाद एक ख़त नेरुदा के सचिव का आता है, जिसमें नेरुदा के सरोसामान को भेजने की ठंडी गुजारिश होती है। मारियो इससे दुखी होता है। घरवाले ख़ुद को नेरुदा का मित्र कहनेवाले मारियो का उपहास करते हैं। हालाँकि कवि के रूप में स्थानीय स्तर पर प्रसिद्द हो चले मारियो की बाहर पूछ बढ़ती है और उसे माद्रित से कविता पाठ का बुलावा भी आता है। पर वहां उसके मंच तक जाते-जाते भगदड़ मच जाती है और मारियो की ज़िन्दगी भगदड़ की भेंट चढ़ जाती है। कुछ वर्ष बाद जब नेरुदा उस द्वीप पर वापिस लौटते हैं तो अपने अज़ीज़ मारियो का न होना उन्हें खलता है।

गीत ने अपने नेरुदा प्रेम के बावजूद कविता में मारियो के दुःख का वितान कुछ इस संवेदनशीलता से रचा है कि महाकवि एक अदने डाकिये के सामने ऊने दिखते हैं। गीत से ही मुझे यह मालूम हुआ कि इस कथानक पर इल पोस्तिनो नाम की एक फ़िल्म भी बन चुकी है। यह स्वीकार करना चाहिए कि फ़िल्म देखने के बाद मेरे लिए मारियो का मर्म कुछ और मायनों में भी उजागर हुआ।

मारियो की कहानी इतालवी हास्य कलाकार मासिमो त्रोइसी को जब मालूम चली तो उन्हें इस पर फ़िल्म बनाने की प्रेरणा हुई। इसमें उनका सहयोग निर्देशक माइकल रेडफोर्ड ने किया। आप यकीन करेंगे रेडफोर्ड का जन्म आज ही के दिन दिल्ली में हुआ था। बहरहाल। शूटिंग शुरू हुई। नेरुदा की भूमिका मशहूर फ्रेंच कलाकार फिलिप नूरे को दी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी। पर यह मारियो बने मासिमो थे, जिन्होंने फ़िल्म और अभिनय-कर्म को एक ऐसी ऊंचाई दी जहाँ पहुंचना किसी भी संवेदनासंपन्न कलाकार का स्वप्न होगा।

मासिमो बहुत पहले से हृदय-रोग से पीड़ित थे। अभी फ़िल्म की एक हफ्ते की शूटिंग ही हो पाई थी कि उन्हें सीवियर हार्ट अटैक आया। डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी। बीमार मासिमो ने रेडफोर्ड से पूछा, '' मैं मारियो के रूप में कैसा काम निकाल रहा हूँ। '' रेडफोर्ड ने कहा, ''फेंटास्टिक''। बस, मासिमो ने सर्जरी के लिए मना कर दिया और फ़िल्म की शूटिंग जारी रखी। मारियो में कायांतरित हो चुके मासिमो को एक-एक शॉट देने में शारीरिक तौर पर दिक्कत पेश आ रही थी। फिर भी उन्होंने कैमरे के आगे, मारियो को जीवंत बनाए रखा। उन्हें ज़्यादा तकलीफ न हो इसके लिए रेडफोर्ड ने कई सीन में उनके डबल का भी इस्तेमाल किया। सचेत दर्शकों ने लॉन्ग शॉट और शरीर के पिछले हिस्से से मारियो के फिल्मांकन में इसे मार्क किया होगा।

अपनी तमाम असहायता बोध और व्याधि को जीतकर आखिरकार मासिमो ने फ़िल्म में मारियो का किरदार पूरा किया। नियति की विडंबना देखिए, फ़िल्म में मौत के १२ घंटे बाद असल ज़िन्दगी में भी उनकी मृत्यु हो गई ! सर्जरी न कराने का फ़ैसला उनके लिए फेटल साबित हुआ। मारियो को अमर कर मासिमो कहीं पार्श्व में चले गए। मरणोपरांत उन्हें इस भूमिका के लिए ऑस्कर में बेस्ट ऐक्टर की कटेगरी में नामांकन मिला। ऑस्कर नहीं मिल सका। एक तरह से यह भी ठीक हुआ, क्योंकि जीतेजी हसोड़ समझकर दरकिनार किए गए इस कलाकार को मरणोपरांत ऑस्कर देकर अकादमी पुण्य-लाभ ही करती। ऑस्कर क्या किसी कलाकार की प्रतिबद्धता से बढ़कर है ?

मैं मारियो का दुःख गीत की कविता पढ़कर जान सका था, मासिमो को रेडफोर्ड के फ़िल्म के ज़रिये जाना। अब दोनों मेरी यादों के हिस्से हैं। उतने ही जितने अपनी उदास गरिमा में नेरुदा।
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Friday, February 20, 2009

कोठार से बीज : ६ : मलयज



कि वह बीज सुरक्षित रह जाए,उसे कीड़े न खा जाएं...

चाहता हूँ मैं खूब डटकर काम करूँ, खूब जमकर काम करूँ ( मैं कर सकता हूँ ), काम में सब कुछ भूल जाऊँ...अपनी शिकस्त और कुंठाएं ...मैं चाहता हूँ मुझे काम करने दें, वे सब जो चाहते तो हैं कि मैं काम करूँ ( क्योंकि उस काम के फल में वे शरीक होंगे) पर जो मुझे करने नहीं देते, मैं चाहता हूँ, मुझे काम करने दिया जाए, मुझे ठेला जाए, धक्का दिया जाए, मुझे तोड़ा-फोड़ा जाए, मुझे चोट पहुंचाई जाए...वहीं तक जहाँ कि मेरे हाथ से कलम न छूट जाए...मैं चाहता हूँ, मेरे हाथ में वह मेरी कलम मुझे दे दी जाए जो कभी तो कहीं और कभी तो कहीं नहीं छुपा दी जाती है, मेरे होशोहवास में, मेरी आंखों के सामने...और मैं अनकिये कामों के बोझ के नीचे दबा यह सब होने देता हूँ, क्योंकि नहीं चाहता कि वह ज़रा-सी हार्मनी, वह ज़रा-सा नाज़ुक संतुलन टूट जाए जिसके तहत मेरी ज़िन्दगी एक कामचलाऊ दहब से चलती जाती है। मैं चाहता यह ढब टूट जाए...मैं जो आधी अरक्षा में जीता हुआ सुरक्षा के आधे टुकड़े की तलाश में अपनी उम्र पर व्यर्थ के दिनों की मैली परतें चढ़ाता जाता हूँ...पूरी तरह अरक्षित हो जाऊँ...मेरे खून-पसीने में मेरी कलम डूबी हुई हो...
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हफ्ते में केवल कुछ समय को, मुझे अंकुरित होने की मोहलत मिलती है। बाकी समय मैं एक सख्त सूखे बीज की तरह पड़ा रहता हूँ। बीज के अंकुरण के लिए जो मुनासिब अँधेरा, ज़मीन के नीचे की गहराई और एकांत ज़रूरी है, वह मेरे लिए दुर्लभ है। मैं अपने आपको छूता हूँ--पीठ पर एक कर्री परत जो ताप में और भी कड़ी हो जाती है। मेरा संघर्ष -- कि वह बीज सुरक्षित रह जाए, उसे कीड़े खा जाएं। वह नष्ट न हो जाए।
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मैं दूसरों के रचे हुए को अपनी संवेदना की उंगुलियों से छूने की कोशिश करता हूँ : एक किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। मैं अपने को दिलासा देता हूँ कि मैं एक रचना के नशे में खो रहा हूँ, सिंच रहा हूँ, तप रहा हूँ। पर कहीं पर एक शक का कीड़ा छुपा रहता है जो किताब की हर पंक्ति, हर शब्द के पीछे ठठाकर हंस रहा होता है। मैं कीड़े को मसल कर मार नहीं सकता, वह एक सुरियलिस्टिक कीड़े की तरह खेल कर बड़ा होकर मुझे लील लेता है-- मैं एकाएक उचाट हो जाता हूँ, किताब एक तरफ़ रख देता हूँ...
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पद्य को पढ़ना उस केंद्र का फोड़ना है --उसे तलाश करना, उस तक पहुंचना--जिससे वह पद्य उपजा है, और इसलिए पद्य को पढ़ना गद्य को पढ़ने के बनिस्पत एक मुश्किल काम है। ख़राब से ख़राब कविता को एक नज़र में रद्द नहीं किया जा सकता, अगर आप करते हैं तो इसका मतलब है आप उस केंद्र तक जाने की दिक्कत से बचना चाहते हैं, उस केंद्र को तलाश कर और पाए बिना उसके न होने को स्वीकार कर लेते हैं। संक्षेप में किसी मानसिक झंझट में पड़ना नहीं चाहते। अक्सर 'ख़राब कविता' इस झंझट से बचने की कोशिश का शिकार होकर ही ख़राब मान ली जाती है।

किसी रचना को पढ़ना अपने को पाने का अनुभव करना भी है। पद्य में उसके केंद्र में जाकर यह अनुभव होता है और गद्य में उस केंद्र के वृत्त में।
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मैं चाहता हूँ की कविता कुछ करे, बस निस्पंद खूबसूरत पड़ी न रहे : यह इच्छा कितनी तीव्र है ! पर शायद, शायद कविता कुछ नहीं कर सकती। पर मेरी तीव्र इच्छा, जो अपने वेग के कारण 'रिबाउंड' होती है-- एक अदृश्य शीशे की दीवार से टकराकर मेरे पास लौट आती है-- और मेरे दुःख को मेरी असहायता को मेरे अकर्म को, गहराती है, दुहराती है।
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( मलयज हिन्दी के उन मूर्धन्य लेखकों में हैं जिनका न होना सालता है। अपने निधन के पूर्व उन्होंने जितनी जिम्मेदारी और लगाव से लेखन किया वह आज भी अत्यंत मूल्यवान और प्रासंगिक है। उनकी आलोचनाएँ, कविता और डायरी हमारी भाषा की निधि है। इस बार कोठार से बीज में उन्हीं की डायरियों से कुछ अंश। )

Thursday, February 19, 2009

पहली किताब

गोरखपुर में कोई फ़िल्म फेस्टिवल होता है, यह बात तो सुनने में आई थी, पर उस फ़िल्म फेस्टिवल से निकलकर कुछ अनूठा मेरे हाथ भी लग जाएगा, यह सोचा न था। डाक से जब अपने जैसी दुबली-पतली काया की विश्व के महानतम दस फिल्मकारों पर एकाग्र पुस्तक, 'पहली किताब' हाथ लगी, तो इन दिनों इनमें से ज्यादातर की फिल्में जुनूनी ढंग से देखने के अपने निजी शगल को परे कर इसे फौरन घोखने बैठा, कुछ-कुछ इस भाव और उत्तेजना से भी कि यारा जो देखते हो, वह कितना पल्ले पड़ता है, जानो तो सही!

हालाँकि हिन्दी में इससे पहले विनोद भारद्वाज की फिल्मों पर भीमकाय पुस्तक (जो कल आज और कल नाम से छपी है) को पढ़ने के सदमे से मैं अभी भी नहीं उबर पाया हूँ। फिल्मों का कथासार बतानेवाली पुनरुक्तियों से भरी इस पुस्तक को पढ़ने के पहले मेरे लिए कुंवर नारायणजी के सिनेमा पर छिटपुट लेखन से गुजरना जितना प्रीतिकर अनुभव था, उतना ही विष्णु खरे की लगभग अचर्चित पुस्तक, 'सिनेमा पढ़ने के तरीके' को गुनना शिक्षाप्रद। बहुत सी फिल्मों के बारे में फिल्मकार और लेखक के. बिक्रम सिंह की संगत और लेखन से जानकारी मिली। कहना चाहिए कि पहली किताब को पढ़ना भी पठन के इसी समृद्ध अनुभव की एक और कड़ी साबित हुई।

किताब में जिन दस फिल्मकारों का चयन किया गया है, उस पर कुछ नुक्ताचीनी किए बिना आगे की बात इसलिए होनी चाहिए क्योंकि यह प्रकाशन, जैसा कि इसके संपादक योगेन्द्र आहूजा बता रहे थे, कई खंडों में होना है। बहुत संभव है इसमें त्रुफो, गोदार, फेलीनी और अपनी पसंद से कहूँ तो तारकोवस्की, केस्लोव्सकी और वांग कर वाई उन्हीं आगामी चयनों का हिस्सा बनें। बहरहाल, इस पहली किताब में इल्माज़ गुने और जोल्तान फाबरी सरीखे फिल्मकारों पर सर्वथा नए ढंग से शुरू किया गया विमर्श है, तो अपने सत्यजीत और विमल राय की याद भी। बाकी कुरासोवा हैं, बर्गमैन हैं, चैप्लिन और वेल्स के साथ डी सिका और कियारोस्तमी भी।

फाबरी पर लिखते हुए कवि असद जैदी ने उनके कृतित्व को नज़रंदाज़ करने के निहितार्थों को भी उजागर किया है। यह लेख इन मायनों में माध्यम के रूप में फिल्म के प्रतिरोधी कला गुण की क्षमता का भी परिचायक है, जिसे हमारे यहाँ के करोड़ों कमा लेने वाले मुम्बईया फिल्मकार शायद ही हासिल कर पाएं। कुरासोवा के समग्र अवदान पर विष्णु खरे ने गहरे पैठ कर लिखा है तो योगेन्द्र आहूजा ने अर्सन वेल्स की कीर्ति का आधार रहे सिटिज़न केन के बहाने उनकी विलक्षण प्रतिभा पर रोशनी डाली है।

ईरानी फिल्मकार अब्बास कियारोस्तमी पर लिखा गया अजय कुमार का लेख कुछ रिवायती किस्म का हो चला है और इस लिहाज से वह दोनों राय पर लिखे गए सामान्य लेखों की ही श्रेणी में आता है। लगभग गैरसिनेमाई ढंग से अपनी शर्तों पर फिल्म बनानेवाले कियारोस्तमी के बारे में बहुत कुछ अनएक्सप्लोर्ड रह जाता है। यों, किसी एक लेख से ऐसी मांग ज्यादती ही कही जाएगी, पर इसके बेहतरीन नमूने भी इसी पहली किताब में हैं। इल्माज़ गुने, चैप्लिन और डी सिका पर लिखे गए विदेशी समीक्षकों के लेख, जिसे पुस्तक में अनूदित कर दिया गया है, को आगामी चयन का मानक भी माना जा सकता है।

अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में योगेन्द्र आहूजा ने लिखा है : यह किताब हम इस उद्देश्य और उम्मीद से प्रकाशित कर रहे हैं कि 'वास्तविक' सिनेमा के संबंध में, जो व्यावसायिक, छद्म सिनेमा से अलग है, जानकारी और रूचि का प्रसार होगा,...जिसका विशेषकर हिन्दी प्रदेशों में घोर अभाव है। इस लिहाज से यह प्रकाशन अपनी कतिपय सीमाओं के बावजूद प्रशंसनीय है।

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Tuesday, February 17, 2009

ज़बां उर्दू : ३ : ग़ालिब : पूरा ख़त और आधी ग़ज़ल

  • ख़त

    रखियो
    ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई में मुआफ़
    आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है

बंदा परवर,
पहले तुमको यह लिखा जाता है कि मेरे दोस्त क़दीम मीर मुकर्रम हुसैन साहिब की खिदमत में मेरा सलाम कहना और यह कहना कि अब तक जीता हूँ और इससे ज़्यादा मेरा हाल मुझको भी मालूम नहीं। मिर्ज़ा हातिम अली साहिब मेहर की जानिब में मेरा सलाम कहना...

तुम्हारे पहले ख़त का जवाब भेज चुका था, कि उसके दो दिन या तीन दिन के बाद दूसरा ख़त पहुँचा। सोनो साहिब, जिस शख्स को जिस शग्ल का ज़ौक हो और वह इसमें बेतकल्लुफ़ उम्र बसर करे, इसका नाम ऐश है। और भाई, यह जो तुम्हारी सुख़न-गुस्तरी है, इसकी शोहरत में मेरी भी तो नामवरी है। मेरा हाल इस फन में अब यह है कि शेर कहने की रविश और अगले कहे हुए अशआर सब भूल गया। मगर हाँ, अपने हिन्दी कलाम में से डेढ़ शेर, यानी एक मक्ता और एक मिसरा याद रह गया है। सो गाह-गाह जब, दिल उलटने लगता है, तब दस-पाँच बार यह मक्ता ज़बान पर आ जाता है -

ज़िन्दगी अपनी इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब'
हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे

फिर जब सख्त घबराता हूँ और तंग आता हूँ, तो यह मिसरा पढ़कर चुप हो जाता हूँ -

ऐ मर्गेनागहाँ ! तुझे क्या इंतजार है ?

यह कोई न समझे कि मैं अपनी बेरौनकी और तबाही के ग़म में मरता हूँ। जो दुःख मुझको है उसका बयान तो मालूम, मगर उस बयान की तरफ़ इशारा करता हूँ। अंग्रेज़ की कौम से जो इन रूसियाह कालों के हाथ से कत्ल हुए, उसमें कोई मेरा उम्मीदगाह था और कोई मेरा शागिर्द। हिंदुस्तानिओं में कुछ अज़ीज़, कुछ दोस्त, कुछ शागिर्द, कुछ माशूक, सो वे सबके सब ख़ाक में मिल गए। एक अज़ीज़ का मातम कितना सख्त होता है ! जो इतने अज़ीज़ों का मातमदार हो, उसको ज़ीस्त क्योंकर न दुश्वार हो। हाय, इतने यार मरे कि जो अब मैं मरूँगा तो मेरा कोई रोने वाला भी न होगा।

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  • ग़ज़ल

ज़ुल्मतकदे में मेरे, शबे गम का जोश है
इक शमा है दलीले सहर, सो खमोश है

ने मुश्दयेविसाल, ना नज़ाराये जमाल
मुद्दत हुई कि आश्तिए चश्मओ गोश है

दागे फिराके सोह्बते शब की जली हुई
इक शमा रह गई है, सो वो भी खामोश है

आते हैं गैब से ये मजामी ख्याल में
ग़ालिब सरीरे खामा, नवाये सरोश है

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( शब्दार्थ : ज़ुल्मतकदे = अँधेरा घर, दलीले सहर = सुबह का प्रमाण, ने मुश्दयेविसाल = प्रिय मिलन का शुभ संदेश, आश्तिए चश्मओ गोश = आंखों और कानों के बीच की संधि, दागे फिराके सोह्बते शब = रात की महफ़िल के विरह का दाग, गैब = आकाश, सरीरे खामा = कलम की आवाज़ )

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( १८५८ में अपने शागिर्द मुंशी हरगोपाल तफ्ता के नाम लिखी चिट्ठी में ग़ालिब ने ग़दर का हाल बयान किया है। दी गई ग़ज़ल में भी उस वक्त ग़ालिब की निराश मनःस्थिति का ही वर्णन है। कहना व्यर्थ है कि ग़ालिब ने शायरी में क्या मुकाम हासिल किया और इतने बरस बीत जाने के बाद भी वे हमारे कितने करीब हैं। हाँ, उनके नस्र यानी गद्य, जो खतों और डायरी के रूप में ही सामने है, हमारी दोआबा भाषा में अपनी ठाट का पहला और इंतजार हुसैन के शब्दों में कहें तो गहन औपन्यासिक है। ख़त अर्श मलसियानी के अनुवाद में और ग़ज़ल गुलज़ार की मिर्ज़ा ग़ालिब नामक पुस्तक से। इससे पहले इस स्तम्भ में आप फिराक गोरखपुरी और सफिया अख्तर को पढ़ चुके हैं। कई जगह टाइपिंग के अज्ञान- के कारण नुक्ता नहीं लगा सका, विज्ञ बन्धु क्षमा करेंगे। )

Saturday, February 14, 2009

क्या वे उन्हें भूल सकती हैं ?


मुझे सहसा लगा, यह लड़का अपनी अनिश्चितता में, अपनी नर्वसनेस में -- इस लड़की को खो रहा है। मुझे तब अपने बहुत-से मित्र याद हो आए जो महज़ अपनी ज़िद, अपनी अकड़, अपनी हिंस्र आक्रामकता में, अपने उन्मत्त पैशन में कितनी आसानी से लड़कियों को पा लेते हैं और उन्हें एक क्षण भी संकोच नहीं होता कि वे उन लड़कियों को अपने उन मित्रों से छीन ले रहे हैं, जो पराजित हो जाते हैं, पीछे हट जाते हैं, इसलिए नहीं कि वे कम 'पोटेंट' हैं, कम मर्द हैं, कम प्रेम करना जानते हैं, बल्कि इसलिए कि वे 'नर्वस' हैं, अनिश्चित हैं, शंकाकुल हैं, इस बात में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, कि उनमें इतना सामर्थ्य है कि किसी लड़की को सुखी बना सकें ( 'मैं तुमसे प्रेम करती हूँ, लेकिन सुनो, मैं तुम्हारे संग सेक्योर महसूस नहीं करती )

इसलिए जब दूसरे आदमी आते हैं, मज़बूत और मुखर, और अपनी धुन के पक्के -- तो अनायास वे लड़कियां उनके साथ चली जाती हैं, उनसे विवाह करके अपनी गृहस्थी बसा लेती हैं, बच्चे जनती हैं, सबकुछ पा लेती हैं, जो कभी चाहती थीं...

लेकिन कभी-कभी मैं सोचता हूँ, कि किसी सूनी दुपहर में जब उनका पति अपने कोर्ट, फ़र्म या दफ्तर में होता है और बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं -- ये लड़कियां अवश्य खिड़की से बाहर झांकते हुए, या पलंग पर ऊंघते हुए या कोई पुराना गुरुदत्त की फ़िल्म का गाना सुनते हुए ( जो कहीं दूर ढाबे के रेडियो से उनके कमरे में चला आता है ) सोचती होंगी उन लड़कों के बारे में जो काफी कच्चे थे, काफी अनिश्चित और चुप्पे-से, दुर्भाग्यवश आत्मग्रस्त, जिन्हें कभी शादी से पहले उन्होंने किसी शाम के झिलमिले में चूमा था -- जल्दी, घबराए-से होंठ चेहरे पर आए नए उदास रोयों पर, और आँखें और साँसें और आँखें...

वे सो जाती हैं। खिड़की बंद करके लौट आती हैं।

क्या वे उन्हें भूल सकती हैं ?

( निर्मल वर्मा की डायरी धुंध से उठती धुन से साभार। चित्र कृति हेनरी मातीस की। )
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Thursday, February 12, 2009

तुम दरअसल कहीं नहीं थीं : मंगलेश डबराल


1
तुम्हें कहीं खोजना असंभव था
तुम्हारा कहीं मिलना असंभव था
तुम दरअसल कहीं नहीं थीं
न घर के अंधेरे में
न किसी रास्ते पर जाती हुईं
तुम न गीत में थीं
न उस आवाज़ में जो उसे गाती है
न उन आंखों में
जो सिर्फ़ किन्हीं दूसरी आंखों का प्रतिबिंब हैं
तुम उन देहों में नहीं थीं
जो कपड़ों से लदी होती हैं
और निर्वस्त्र होकर डरावनी दिखती हैं
तुम उस बारिश में भी नहीं थीं
जो खिड़की के बहार दिखाई देती है
निरंतर गिरती हुई।

2
मैंने देखे दो या तीन रंग
मैंने देखी हल्की-सी रोशनी
जो लगातार
पैदा होती थी
मैंने देखी एक आत्मा
जो कांपती सांस लेती थी
मैंने देखा तुम आती थीं
मेरे ही स्पर्शों में से निकलकर

इस तरह मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि दुःख से उबरने के लिए
प्रार्थनाएं न करनी पड़ें
मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि नींद के लिए
अँधेरे की कामना न करनी पड़े

मैंने तुम्हारी कल्पना की
ताकि तुम्हें देखने के लिए
फिर से कल्पना न करनी पड़े।

3
रात में खुलता है पहाड़ का दरवाज़ा
रात में खुलती है पहाड़ की खिड़की
वहां से प्रवेश करता है प्रेम
दिखते हैं कुछ और दरवाज़े
दरवाज़ों के आगे
दिखती हैं कुछ और खिड़कियाँ
खिड़कियों के आगे।

4
तुम्हारे लिए आता हूँ मैं
मेरे रास्ते में हैं तुम्हारे खेत
मेरे खेत में उगी है तुम्हारी हरियाली
मेरी हरियाली पर उगे हैं तुम्हारे फूल
मेरे फूलों पर मंडराती हैं तुम्हारी आँखें
मेरी आँखों में ठहरी हुईं तुम।

5
तुम्हारे चेहरे पर
एक पेड़ की छाया है
तुम्हारे चेहरे पर
एक पहाड़ की छाया है
तुम्हारे चेहरे पर
एक चंद्रमा की छाया है
तुम्हारे चेहरे पर
छाया है एक आसमान की।

6
प्रेम होगा तो हम कहेंगे कुछ मत कहो
प्रेम होगा तो हम कुछ नहीं कहेंगे
प्रेम होगा तो चुप होंगे हम
प्रेम होगा तो हम शब्दों को छोड़ आएंगे
रास्ते में पेड़ के नीचे
नदी में बहा देंगे
पहाड़ पर रख आएंगे।

7
पत्थरों के भीतर
छोड़ दो हमारे सिहरते शरीर
आत्मा अपने आप जन्म लेगी
जैसे वह आग
जिसे हमने पैदा किया था
जब वहां दो पत्थर थे।

8
आंधी में लगातार आते हैं
तिनके
धीरे-धीरे एक घोंसला बनता है

तुम्हारी देह में उड़ती दो चिड़ियाँ
सो जाती हैं चुपचाप।

9
चुंबन एक दिन
तुम्हारे सामने काग़ज़ पर
एक कविता बनेंगे

कविता एक दिन
चुंबन बन जाएगी
काग़ज़ से उठकर।

10
कोहरे क्या तुम छंटोगे
ताकि मुझे दिख सके
तुमसे ढंका हुआ मेरा पहाड़

पहाड़ क्या तुम झुकोगे
ताकि मुझे दिख सके
तुम्हारी ओट में छिपा हुआ मेरा प्रेम।

11
रात रात रात
किसी किनारे से नदी के
बहने की आवाज़ आती है
अकेला मैं उठता हूँ
एक गिलास पानी पीकर सो जाता हूँ।

12
मैं सोचता रहा
और दूर चला आया
मैं दूर चला आया
और सोचता रहा

तुम सोचती रहीं और दूर चली गईं
तुम दूर चली गईं
और सोचती रहीं

इस तरह हमने तय की दूरियां।

13
जब बर्फ़ गिरेगी और सन्नाटा होगा
हम कहेंगे यह प्रेम है

जब बर्फ़ पिघलना शुरू होगी
जंगल में
हम कहेंगे इतनी ही थी उसकी उम्र।

14
चार बार हमें भूख लगेगी
पांचवीं बार
हम कुछ खा लेंगे

चार बार प्यास लगेगी
पांचवीं बार
हम पानी पी लेंगे

चार बार हम जागते रहेंगे
पांचवीं बार
आ जाएगी नींद।

15
आधा पहाड़ दौड़ता है
आधा दौड़ता है हमारा बोझ
आधा प्रेम दौड़ता है
आधा दौड़ता है सपना

दौड़ते हैं हम।

16
बाहर एक बांसुरी बजती है
एक और बांसुरी है
जो तुम्हारे भीतर बजती है
और सुनाई नहीं देती

एक दिन वह चुप हो जाती है
तब सुनाई देता है उसका विलाप
उसके छेदों से गिरती है राख।
****

( प्रेम पर लिखी गईं कुछ बहुत अच्छी कविताओं में से एक मंगलेश जी की पुनर्रचनाएं शीर्षक इस लम्बी कविता को हम उनकी अनुमति से यहाँ दे रहे हैं। यह उनके पुरस्कृत संग्रह ''हम जो देखते हैं'' में संकलित है। उनके शब्दों में इस कविता की प्रेरणा भूमि पहाड़ के दूर-दराज़ के क्षेत्रों के लोक गीत रहे हैं। प्रेम की जितनी सघन और करुण स्मृति इस कविता में दर्ज हुई है, वह हिंदी कविताओं में दुर्लभ है। चित्र वियतनामी फिल्म सेंट ऑफ़ ग्रीन पपाया से। )

Tuesday, February 10, 2009

निधन : सुदीप बैनर्जी

सुंदर (चंद ठाकुर) जब आज का काम ख़त्म करने के ठीक पहले यह बताने आए कि सुदीपजी का निधन हो गया है, तो सहसा यकीन नहीं हुआ। यह अप्रत्याशित था। ख़बर बनाते हुए भी बड़ा अजीब लग रहा था। हिन्दी के एक कवि होने के अलावा उनके बारे में एक अल्पज्ञात तथ्य यह भी है कि वे एक उच्चपदस्थ सरकारी मुलाजिम थे और ऐसा होने के बावजूद समाज की परिवर्तनकामी शक्तियों के साथ थे। कविता में ऐसी संगत बहुत से कवियों ने की है। पर कविता के बाहर भी ऐसा करने का माद्दा और अपने द्वारा ऐसा किए जाने को परोक्ष रखने का संयम बहुत कम लोगों में है। इस लिहाज से वे बहुत अच्छे कवि होने के साथ-साथ बहुत उम्दा इंसान भी थे। उनकी काव्य-भाषा में उर्दू-हिन्दी की मेलजोल शमशेर जितनी ही पक्की है, और अपने समय को दर्ज करने का उनका अलहदा तरीका उन्हें आठवें दशक के कवियों में महत्वपूर्ण बनाता है। सबद सुदीपजी और उनके परिवार के प्रति अपनी शोक-संवेदना प्रकट करता है।

कुछ कविताएं

इतना औसत समय

इतना औसत समय
इतनी गहरी व्यथा
इतना विचलित मन
गाफ़िल अपने ही शोर में


कोई रह-रहकर पुकार उठता
जगाता खौफनाक हसरतों को
पीछे मुड़कर देखने पर
कोई कहीं भी तो नहीं


सधती नहीं यह भाषा
इतना भरा भरा मन
इतने गुज़र गए लोग।
****

नदियाँ मेरे काम आईं

जहाँ भी गया मैं
नदियाँ मेरे काम आईं

भटका इतने देस-परदेस
देर-सबेर परास्त हुआ पड़ोस में
इसी बीच चमकी कोई आबेहयात
मनहूस मोहल्ला भी दरियागंज हुआ


पैरों के पास से सरकती लकीर
समेटती रही दीं और दुनिया
काबिज़ हुई मैदानों बियाबानों में
ज़माने की मददगार
किनारे तोड़कर घर-घर में घुसती रही


सिरहाने को फोड़ती सुर सरिता
दुखांशों से देशान्तरों को
महासागर तक अपने अंत में
पुकारती हुई


मलेनी नेवज डंकनी शंखनी
इन्द्रावती गोदावरी नर्मदा शिप्रा
चम्बल बीहड़ों को पार करती
कोई न कोई काम आई पुण्य सलिला


जैसे ही मैं शिकार हुआ
अब सब मरहले तय करके
व्यतीत व्यसनों में विलीन
दाखिल हुआ इस दिल्ली में उदास


इसका भी भला हो
सुनता हूँ यहाँ भी एक यमुना है
वह भी एक दिन काम ज़रूर आएगी।

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धीरे-धीरे दरकिनार होते

धीरे-धीरे दरकिनार होते हुए
मैं देख रहा हूँ एक निरर्थक नदी पर
वेगवान है, मेरे हमउम्र
तमाम दोस्तों की दिनचरयाएं
वे सब किनारे लगेंगे अगली सदी में


अगली सहस्त्राब्दि में
अपने नाती पोतों के नाती पोतों के
नाती पोतों के ज़माने तक
हरकत में रहने का दमख़म है उनमें

अपनी इनसानियत में ईश्वर के प्रतिस्पर्धी
उसको पराजित कर भी माफ़ कर देने की
विनम्र शक्ति उनकी जिजीविषा में


मैं और ज़माने का बाशिंदा
अपने दादों-परदादों के दादों-परदादों
के दादों-परदादों के पहले से प्रेतों का हमसाया


धीरे-धीरे लौटते हुए
माँ की कोख से होते हुए
अज़ल की ओर मुखातिब


वे वयस्क होंगे युगान्तरों के बाद
मैं कब का बुज़ुर्ग हुआ
आदमज़ाद के शाया होने से थोड़ा अव्वल।
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( ये कविताएं कवि की मेधा प्रकाशन से आए प्रतिनिधि चयन से साभार। )

Saturday, February 07, 2009

व्योमेश शुक्ल की नई कविता


तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो


तुम शब्बर चाचा के घर की बग़ल में भी रह सकती थी
तुम गुलिस्ताँ प्राइमरी स्कूल में पढ़ भी सकती थी
तुम्हारे अब्बू शहनाई भी बजा सकते थे

लेकिन बासठ की उमर में तुम उठती हो और वर्सोवा पुलिस थाने जाकर अपने इकहत्तर
साल के पति नेताजी सालंके के खिलाफ उत्पीड़न का मुकद्दमा लिखा देती हो

तुम्हारे साथ बदसलूकी हुई है
तुम्हें थोड़ा आराम कर लेना चाहिए
तुम जो कर सकती थी कर आई हो
और ये दुबली-पतली खबर देश में फैल भी गई है
फ्लैट का दरवाजा भीतर से बंद कर लो

थोड़ी देर में आएगा दिनेश ठाकुर हाथ में रजनीगंधा के फूल लिए
या अमोल पालेकर भी आ सकता है या मैं भी आ सकता हूँ
कोई न कोई आएगा
उसके दरवाजा खटखटाते ही फिल्म शुरू होती है
साठ के अंत की फिल्म सत्तर के शुरू की फिल्म
शहर आने की फिल्म
जेल जाने की फिल्म
बहुत ज्यादा लोगों से कम लोगों की फिल्म
पब्लिक ट्रांसपोर्ट की फिल्म
या पब्लिक सेक्टर की फिल्म शुरू होती है एक फ्लैट का दरवाजा खटखटाने से

लेकिन मेरे और तुम्हारे बीच
सिर्फ दरवाजे भर की दूरी नहीं है

बहुत से जमाने हैं बहुत से लोग
विद्याचरण शुक्ल हैं और बी आर चोपड़ा हैं और प्रकाश मेहरा हैं और मनमोहन देसाई हैं
और आनंद बख्शी हैं और ठाँय-ठाँय और ढिशुम-ढिशुम और ढाँ... है और घटिया फिल्में हैं
और अत्यन्त घटिया राजनीति है और आपातकाल है
दरअसल गिरावट के अन्तहीन मुकाबले चल रहे हैं मेरे और तुम्हारे बीच
और तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो

मैं जानना चाहता हूँ कि इस समय तुम क्या कर रही होगी क्या हो रही होगी तुम कुछेक
हिन्दी फिल्मों की एक गुमनाम और मीडियाकर अभिनेत्री तुम परवीन बाबी या जीनत अमान
भी तो हो सकती थी तुम मणि कॉल की सिद्धेश्‍वरी में विद्याधरी भी बन सकती थी
तुम मेरी नानी भी हो सकती थी बेटी हो सकती थी तुम वह बहन हो सकती थी जिसकी शादी
तुम्हारे अस्तित्व की तरह ढहा दी गई थी एक दिन मेरी बीबी हो सकती थी तुम

मेरी माँ साठ साल की हैं और तुम बासठ की
मेरी माँ हो सकती थी तुम
मेरी माँ हो सकती हो तुम
अम्मा...............।

यहीं बनता है एक मानवीय सम्बन्ध
मैं इसे दर्ज करता हूँ
और अपने पिता से तुम्हारी बात पक्की करता हूँ
अगर तुम्हें पसंद हो यह सब तभी

लेकिन तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो

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( व्योमेश शुक्ल अभी हिन्दी में समर्थ गद्य और कविताएं लिखनेवाले चंद युवाओं में से न सिर्फ़ अलग से लक्षित करने योग्य हैं, बल्कि आनेवाले वक्त में हम उनके लेखन से वैसी उम्मीद भी लगा सकते हैं जो मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय के लेखन से कुछ हद तक पूरी होती है। जिन्हें यह कथन अतियुक्ति जान पड़ता हो वे व्योमेश के लेखन से कुछ नजदीकियां बढ़ा लें। सबद उनकी रचनाओं को पहले भी पहलेपहल छाप चुका है। अब उनकी यह नई कविता भी यहीं। )

पोथी पढ़ि पढ़ि : १ : फरनांदो पैसोआ



एक बेचैन के रोजनामचे से कुछ वाक्य...


किसी चीज़ को अभिव्यक्त करने का मतलब है उसके गुण को संरक्षित रखना, उसके आतंक को निकाल देना।

मैंने ज़िन्दगी में बहुत कम चाहा, पर उस रंचमात्र से भी मुझे वंचित रखा गया। ...इस ज्ञान से कि मेरा अस्तित्व है, बहुत ज़्यादा न सताया जाऊँ, दूसरों से किसी चीज़ को चाहूँ नहीं, और न दूसरे मुझसे कोई चीज़ मांगे ...यह सब मुझे इनकार किया गया, वैसे ही जैसे कोई सद्भावना के अभाव के कारण आश्रय देने से इनकार नहीं करता, बल्कि इसलिए इनकार करता है कि उसे अपने कोट के बटन न खोलने पड़ें।

दुखी मन से मैं अपने शांत कमरे में लिखता हूँ, अकेला, जैसा कि मैं सदा से रहा, अकेला, जैसा मैं सदा रहूँगा। और मैं अचरज करता हूँ कि क्या मेरी साफ़-साफ़ कामजोर आवाज़ हजारों आवाजों के सार को साकार नहीं कर सकती, हजारों जिंदगियों की आत्माभिव्यक्ति की लालसा, हजारों आत्माओं का धैर्य, जो मेरी तरह निरर्थक सपने देखने और रोजाना की इस किस्मत में बेपता आशा के हवाले हो गई हैं...

मुझमें कुछ ऐसा है जो सदा करुणा की याचना करता है और जो अपने आप पर ऐसे रोता है जैसे किसी मृत देवता पर, जिसने उस समय अपने सारे पूजन-स्थल खो दिए...

किसी भी व्यक्ति के लिए ईमानदारी से यह स्वीकार करने के लिए बौद्धिक साहस की ज़रूरत है कि वह एक मानवीय क्षुद्र तत्व से अधिक नहीं है, कि वह एक ऐसा गर्भपात है जो होने से बच गया...

मैंने हमेशा चाहा कि लोग मुझे समझें नहीं। लोगों द्वारा समझे जाने का अर्थ स्वयं को वेश्या बनाना है।

प्रेम करने का अर्थ है अकेले रहने की थकावट, इसलिए वह अपने आप से एक कायरता, एक विश्वासघात है।

मैं जैसा होना चाहता था, बिल्कुल वैसा ही होना चाहता हूँ, पर मैं वैसा नहीं हूँ।...मैं एक कलात्मक कृति होना चाहता हूँ, कम से कम अपनी आत्मा में, क्योंकि मैं अपने शरीर में तो ऐसा नहीं हो सकता।

प्रत्येक विजय एक अश्लीलता है। विजेता अनिवार्यतः अपनी निराशा के सारे गुण खो बैठता है, जिसने उसे संघर्ष की ओर प्रवृत्त किया और विजय दिलाई।

मैंने तय किया है कि अब मैं कुछ नहीं लिखूंगा, न सोचूंगा, इसके बदले में कुछ कहने का ताप मुझे सुला दे और मैं जो कुछ भी कह सकता था, उसे अपनी आँखें बंद कर थपथपाऊँ, चपत लगाऊँ, जैसे वह कोई बिल्ली हो।
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( ऊपर पुर्तगाल के महान कवि-लेखक फरनांदो पैसोआ की गद्य पुस्तक ''द बुक ऑफ़ डिस्क्वाएटयुड'' से कुछ अंश दिए गए हैं। इस पुस्तक को मैंने शरद चंद्रा के अनुवाद में पहली दफा पढ़ा था। यह चयन चंद्रा के अनुवाद से ही है। पैसोआ का गद्य कविता के तनाव और संक्षिप्ति के अलावा गहन दार्शनिक आभा से युक्त है। उसके प्रभाव में अवश खिंच जाना अचरज नहीं। )

Thursday, February 05, 2009

आलोचना का पक्ष : १ : वागीश शुक्ल


साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है


पढ़ना एक ऋण का स्वीकार है, लिखना उस ऋण की अदायगी।
लिखने के बाद मरने का हक मिलता है।

साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है।
इसमें साहित्य पढ़ना और रचना दोनों शामिल है।

जैसे
रेशम का कीड़ा अपने चारों ओर एक कीमती चीज़ बुनता है और मौत को बुलावा देता है (वैसे ही) मौत अपने चारों ओर कहानी बुनती है, जिसका नाम ज़िन्दगी है।

साहित्य
शब्द और अर्थ के शराब हो जाने का भाव है। यदि यह पढ़ने में बुरा लगता हो तो 'शराब' की जगह 'मधु' पढ़ लें, इससे वाक्य का तात्पर्य नहीं बदलेगा। जिन चीजों से शराब बनती है, वे अलग-अलग शराब नहीं हैं, नशा उनमें नहीं, (उनके) संधान में है। शब्द और अर्थ में अलग-अलग साहित्य नहीं है, उनके मिलाप में है। (इस तरह) शब्द और अर्थ को चुआ कर बनाई गई शराब ही साहित्य है।

कवि
एक भट्ठी लगाता है, शब्द और अर्थ की आग में, अर्थ को शब्द की आग में चुआते हुए कविता की मदिरा तैयार करने के लिए। शब्द और अर्थ दोनों को भाड़ में झोंकते हुए वह दोनों लुकाठियों से घर फूंकता हुआ उनके धुएँ में बदलने का तमाशा देखता है।

आलोचना का काम है कि यदि कविता का सिंगार कवि के खून से हुआ है तो उस पर इतने आंसू टपकाती रहे कि वह खून सूखने न पाए।

उजड़ी अयोध्या कैसे आबाद होती है ? रामायण कहती है, '' रामायण पढ़ने से''। पाठक रामायण पढ़ता है और पाता है कि इस उजड़ी हुई अयोध्या का रास्ता इतना उबड़खाबड़ है कि वह बिना रथ से उतरे, बिना इसको भूले कि वह किस देशकाल में है, उसका अपना समाज और उसका अपना मन क्या है, उसमें नहीं जा सकता। और ऐसा करते ही वह पाता है कि वह ख़ुद ही तो उस उजड़ी हुई अयोध्या में बिखरा हुआ था और यही उस अयोध्या का आबाद होना है।

जब
प्रौद्योगिकी धर्म गढ़ती है तो वह एक किताब को स्वीकार करती है जिसमें सारे जवाब हैं। ज़ाहिर है कि यह किताब मनुष्य को दो हिस्सों में बांटती है और जब भी एक किताब का दूसरी किताब से सामना होता है, एक किताब को माननेवाले दूसरी किताब को अफीम बत्ताते हैं।

कला
का हर काम एक खोज है। उसे कोई जवाब नहीं मालूम होता।

कला
को 'पेगन' कहते हैं, विश्वास और अन्धविश्वास में फर्क न कर पाती हुई, अंधेरे में डूबी रोशनी से कतराती हुई, जिसने किताब को नहीं पहचाना।
उसके पास किताब नहीं होती, किताबें होती हैं और हर किताब अपने समझे जाने को एक दूसरी किताब में बताती है।
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( वागीश शुक्ल हिन्दी आलोचना में एक अपवाद हैं। उनकी आलोचना में भारतीय काव्यशास्त्र से लेकर उत्तरआधुनिक विमर्शों के लिए जगह के साथ-साथ संस्कृत तथा उर्दू की समृद्ध काव्य-परम्परा की प्रखर स्मृति और बसाव भी है। निराला की कालजयी कविता ''राम की शक्तिपूजा'' की अद्वितीय टीका लिखने के अलावा आलोचना की दो और पुस्तकें भी उनके नाम हैं। ''याज्ञवल्क्योपाख्यान'' नामक वृहदाकार उपन्यास पर वे वर्षों से काम कर रहे हैं जिसके कुछ अंश सुधि पाठकों ने विभिन्न पत्रिकाओं में पढ़ा होगा। यहाँ वागीशाजी के आलोचनात्मक लेखन से कुछ पंक्तियाँ चुन कर दी गई हैं। सबद में आगे भी आलोचना का पक्ष, बजरिये आलोचक, इसी लघु कलेवर में दिया जाएगा। वागीश शुक्ल का रेखांकन जितेन्द्र व्यास ने बनाया है। )