Wednesday, January 28, 2009

कवि कह गया है : २ : बोर्हेस



मैं अनिवार्यतः एक पाठक हूँ




मेरी समझ से काव्यशास्त्र कविता लिखने का एक औजार भर है। मैं मानता हूँ कि कविता लिखने के उतने गुण-धर्म या सिद्धांत भी हो सकते हैं जितने कि कवि।

मैं अपने आप को अनिवार्यतः एक पाठक मानता हूँ।...मैंने जो पढ़ा है वह मेरे लेखन से कहीं ज़्यादा महत्व का है। आप वही पढ़ते हैं जो आपको पसंद है -- लेकिन आप ठीक वही नहीं लिख पाते जो आप लिखना चाहते हैं। असल में आप उतना भर ही लिख पाते हैं जितना आपसे लिखा जाता है।

एक व्यक्ति का जीवन हजारों क्षणों और दिनों का योग होता है। इन मार-तमाम दिनों और इनमें घटित घटनाओं की महज एक क्षण में समाई हो सकती है : ऐन उस क्षण में जब व्यक्ति यह जान लेता है कि वह कौन है और अपने को आमने-सामने देखने लगता है।

एक महान किताब लिखने लिए, शायद एक ही मूल और सामान्य योग्यता की दरकार होती है : किताब के हर हिस्से में कुछ न कुछ ऐसा हो जो हमारी कल्पना को एक सुखद अहसास से भर दे।

मेरे लिए एक लेखक होने का क्या मतलब है ? इसका मतलब अपनी कल्पनाओं के प्रति निष्कपट होना है। जब मैं कुछ लिख रहा होता हूँ, मैं इसकी परवाह नहीं करता कि यह वस्तुतः कितना सच है। मसलन, मैं एक कहानी लिखता हूँ, इसलिए कि मुझे इसमें विश्वास है। पर वैसा विश्वास नहीं जैसा किसी को इतिहास में होता है, बल्कि उस तरह का विश्वास जो कोई अपने सपनों और ख़यालों पर करता है।

हमें चीजों को बदलना होगा। तब भी जब हमें ऐसा करना अप्रासंगिक जान पड़े। अगर हम ऐसा नहीं करते तो हमें ख़ुद को कलाकार नहीं, महज पत्रकार या इतिहासकार मानना चाहिए। गोकि मैं मानता हूँ कि सच्चे इतिहासकारों ने भी यह जान लिया है कि वे एक उपन्यासकार की तरह कल्पनाशील हो सकते हैं।

लेखकों को सलाह के नाम पर मैं सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि वे अपने लिखे हुए में जितनी कम फेरबदल करें, उतना अच्छा। मुझे नहीं लगता कि लिखे हुए को और ज़्यादा सँवारने से उसमें निखार आता है।

जब मैं लिखता हूँ, मैं पाठक के बारे में नहीं सोचता ( क्योंकि पाठक एक काल्पनिक पात्र है )। सोचता तो मैं अपने बारे में भी नहीं हूँ ( शायद मैं भी पाठक की तरह ही काल्पनिक हूँ ) , पर मैं जो कहना चाहता हूँ उसके बारे में ज़रूर सोचता हूँ और मेरी हरचंद कोशिश रहती है कि मैं उसे ज़ाया न होने दूँ।

मैं अभिव्यक्ति में नहीं, सिर्फ़ संकेतों में विश्वास करता हूँ। आखिरकार शब्द क्या हैं ? शब्द साझा स्मृतियों के संकेत ही तो हैं। अगर मैं किसी शब्द का इस्तेमाल करता हूँ, तो पढ़नेवाले को उस शब्द का कोई अर्थ पहले से पता होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो उस शब्द का उसके लिए कोई मानी नहीं। मेरे ख़याल में हम लेखक पाठकों के मन में उस शब्द विशेष के अर्थ की स्मृति जगाकर उसे कल्पनाशील ही बनाते हैं।
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अनुवाद : अनुराग वत्स

( अर्जेंटीना के अप्रतिम कवि-गल्पकार जॉर्ज लुई बोर्हेस ने "दिस क्राफ्ट ऑफ़ वर्स '' नाम से प्रसिद्द द चार्ल्स एलियट नोर्टन लेक्चर सीरीज के तहत १९६७-६८ में पाँच व्याख्यान दिए थे। ये व्याख्यान कुछ वर्ष पहले ही पुस्तकाकार संकलित होकर आए हैं। मैंने इन्हें कुंवर नारायणजी के दुर्लभ पुस्तक संग्रह से लेकर पढ़ा। इस स्तंभ की दूसरी प्रस्तुति में बोर्हेस के आखिरी व्याख्यान, ''अ पोएट'स क्रीड'' से कुछ अनूदित अंश दिए जा रहे हैं। )

5 comments:

Geet Chaturvedi said...

बोर्हेस की लिखी हर पंक्ति 'कोटेबल कोट' जैसी होती है. इस टुकड़े में भी हर पैराग्राफ़ वैसा ही अनुभव देता है.पूरी किताब पढ़ने की उत्‍सुकता बढ़ गई.

और हां, अनुवाद भी अच्‍छा किया है.

vidya said...

bahut din se kuch bhi nahi likh pad pa rha hun. aaj borges ki ye panktiyan padne ke bad silsila shuru hua,unke lekhan me dilchaspi badhi.apke dwara kiye anuvad me bhi ek visais aakarsan hai.

shraddha said...

kai baar likhne ke dauraan jo pareshaniya jehan me aati hai aisi sadgi se unko baya kar pana aur sahaj hi un uljhano ko suljhane ki kala kisi bade lekhak me hi hoti hai.likhte waqt agar hum is baat ko jehan me rakhe "जब मैं लिखता हूँ, मैं पाठक के बारे में नहीं सोचता ( क्योंकि पाठक एक काल्पनिक पात्र है )। सोचता तो मैं अपने बारे में भी नहीं हूँ ( शायद मैं भी पाठक की तरह ही काल्पनिक हूँ ) , पर मैं जो कहना चाहता हूँ उसके बारे में ज़रूर सोचता हूँ और मेरी हरचंद कोशिश रहती है कि मैं उसे ज़ाया न होने दूँ।" to likhna aasan ho sakta hai . is behtareen ansh ka anuvaad karne ke liye shukriya.

अनुपमा पाठक said...

शब्द साझा स्मृतियों के संकेत ही तो हैं।

इन सुन्दर संकेतों को अनुदित कर हमतक पहुँचाने के लिए कोटि कोटि आभार!

mahesh mishra said...

बहुत अच्छा काम कर रहे हैं आप। कितना सुंदर अनुवाद करते हैं, वाह! कितना अच्छा चयन है!बहुत बहुत शुक्रिया।