तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर महसूस हुआ है
कि दिशाएं पास आ गई हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन सी बन गई है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकांत नहीं
न बाहर, न भीतर।
हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गए हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुंह छिपा सकता हूँ।
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुजर सकता है।
शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएं अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।
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कितना अच्छा होता है
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।
शब्दों की खोज शुरू होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।
हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
ख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।
कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ ख़ुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना।
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अंत में
अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ
एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।
अन्यथा
इससे पूर्व कि
मेरा हर कथन
हर मंथन
हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,
उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ
जो मृत्यु है।
'वह बिना कहे मर गया'
यह अधिक गौरवशाली है
यह कहे जाने से --
'कि वह मरने के पहले
कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।'
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Sunday, 25 January, 2009
सर्वेश्वर की याद दिलाने का शुक्रिया !
" चुपाई मारो दुल्हिन मारा जाई कौआ !"
Sunday, 25 January, 2009
uffh!kaha se dhundha hai aapne sarweshvar ji ke in mohak kavitao ko...maja aa gaya...dhanyvad.
Sunday, 25 January, 2009
बहुत सुन्दर कविताएँ,आभार सहित.
Thursday, 29 January, 2009
खूब... ये कवितायें कितने ही बार पढ़ी हैं मगर लुत्फ़ में कमी नहीं आती. वैसे भी सर्वेश्वर मेरे priy कवि हैं.
Wednesday, 27 April, 2011
सर्वेश्वर जी मेरे प्रिय कवि है. मुझे उनकी यह रचनाये बहुत पसंद है. हर दीवार में द्वार बन सकता है. बहुत प्रेरणा मिलती है. मानो जीवन से ही निकली है. धन्यवाद - लीना मल्होत्रा
Thursday, 09 February, 2012
तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुजर सकता है।
बहुत बहुत सुन्दर!
Tuesday, 10 April, 2012
शब्दों की खोज शुरू होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।
bahut achhe
Sunday, 18 November, 2012
कुछ भी ठीक से जान लेना
ख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।
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