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कोठार से बीज : ५ : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

( हममें नए कवि-लेखकों के साथ-साथ पुरखों को पढ़ने-गुनने की सलाहियत बनी रहे, इसीलिए इस स्तंभ की शुरुआत की गई थी। इसके तहत अब तक आप शमशेर , त्रिलोचन , नागार्जुन और रघुवीर सहाय की रचनाएं पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कुछ कविताएं। सर्वेश्वर नई कविता के दौर में उभरे, पर वे उन कम कविओं में थे जो नई कविता का ज़ोर कम पड़ने पर भी अपने काव्य-गुण और प्रतिबद्धता की वजह से लंबे अर्से तक अच्छी कविताएं लिख सके। )

तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर महसूस हुआ है
कि दिशाएं पास आ गई हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन सी बन गई है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकांत नहीं
न बाहर, न भीतर।

हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गए हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुंह छिपा सकता हूँ।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुजर सकता है।

शक्ति अगर सीमित है
तो हर चीज़ अशक्त भी है,
भुजाएं अगर छोटी हैं,
तो सागर भी सिमटा हुआ है,
सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
वह नियति की नहीं मेरी है।
****

कितना अच्छा होता है

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

शब्दों की खोज शुरू होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
ख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ ख़ुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना।
****

अंत में

अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ
एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।

अन्यथा
इससे पूर्व कि
मेरा हर कथन
हर मंथन
हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,
उस अनंत मौन में समा जाना चाहता हूँ
जो मृत्यु है।

'वह बिना कहे मर गया'
यह अधिक गौरवशाली है
यह कहे जाने से --
'कि वह मरने के पहले
कुछ कह रहा था
जिसे किसी ने सुना नहीं।'
****

8 comments:

सर्वेश्वर की याद दिलाने का शुक्रिया !
" चुपाई मारो दुल्हिन मारा जाई कौआ !"


uffh!kaha se dhundha hai aapne sarweshvar ji ke in mohak kavitao ko...maja aa gaya...dhanyvad.


बहुत सुन्दर कविताएँ,आभार सहित.


खूब... ये कवितायें कितने ही बार पढ़ी हैं मगर लुत्फ़ में कमी नहीं आती. वैसे भी सर्वेश्वर मेरे priy कवि हैं.


सर्वेश्वर जी मेरे प्रिय कवि है. मुझे उनकी यह रचनाये बहुत पसंद है. हर दीवार में द्वार बन सकता है. बहुत प्रेरणा मिलती है. मानो जीवन से ही निकली है. धन्यवाद - लीना मल्होत्रा


तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरे हैं,
हर दीवार में द्वार बन सकता है
और हर द्वार से पूरा का पूरा
पहाड़ गुजर सकता है।

बहुत बहुत सुन्दर!


शब्दों की खोज शुरू होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।

bahut achhe


कुछ भी ठीक से जान लेना
ख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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