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डायरी : ३ : गीत चतुर्वेदी


Véronique Brosset


26 अक्टूबर, २००८

कोई भी रीडर रिलीफ़ क्यों मांगता है ? जब हम फिल्म देखते हैं, तो उसमें रिलीफ़ खोजते हैं। शायद इसीलिए हिंदी फिल्मों में गाने ठूंसने की टुच्चई की जाती है। जैसे हर आदमी की पाठकीय मांग अलग होती है, वैसे ही हर आदमी की रिलीफ़ की मांग भी अलग होती है। 'गोमूत्र' के बारे में भी ऐसा है। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें रिलीफ़ नहीं है, लगातार एक तनाव है और पढ़ते-पढ़ते झल्लाहट हो उठती है। मैंने पूछा, फिर यह रिलीफ़ कैसे आ सकता था ? उन्होंने कहा, जैसे इसमें कोई प्रेमदृश्य हो सकता था, कुछ हल्की-फुल्की स्मृतियां हो सकती थीं, नैरेटर की पत्नी या उसकी बच्ची का एक समांतर जीवन हो सकता था और इन सबके साथ थोड़ी तरलता हो सकती थी।

क्यों हम तरलता की उम्मीद रखते हैं ? वह ऐसी कहानी नहीं थी, जिसमें तरलता की कोई गुंजाइश हो। एक मिडिल क्लास व्यक्ति, जो काइयां है, धूर्त है, मक्कार है, विरोधाभासी तरीक़े से भोला है, अपनी सुविधा के अनुसार ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही है, अभिनेता है, उसके जीवन में जितने लोग हैं, उनका अस्तित्व सिर्फ़ इसलिए है कि वे उसके जीवन में हैं। वह कभी यह नहीं सोचता कि जितनी देर मैं घर से बाहर हूं, उतनी देर घर में बाक़ी के दो प्राणी कैसे रहते होंगे ? वह उन्हें सिर्फ़ तभी देखता और पाता है, जब वे उसके सामने होते हैं। और उसके सामने उनकी उपस्थिति महज़ किसी वस्तु की तरह होती है।

वे दोनों किसी अपराध की सज़ा के तौर पर उसके परिवार के हिस्से हैं और उनका मूड-स्वभाव सिर्फ़ इसी नैरेटर के मूड-स्वभाव से संचालित होता है। एक मिडिल क्लास स्टीरियोटिपिकल पुरुष अपना स्पेस बढ़ाते हुए हमेशा दूसरों के ( ख़ासकर अपने परिजनों के ) स्पेस का अतिक्रमण करता है। सो, उस वस्तु जैसे जीवन में तरलता की जगह निकाल पाना मेरे लिए मुश्किल रहा। उसमें जो कुछ भी है, वह सिर्फ़ उसी मिडिल क्लास को दिखाता है। चूंकि वह फर्स्‍ट पर्सन में लिखी कहानी है, इसलिए हमारे यहां कई लोगों ने उसे नैरेटर की नहीं, राइटर की स्टोरी, आदतें और स्वभाव मान लिया।

११  नवंबर, २००८

आज प्रेम प्रकाश आए थे। पंजाबी के बड़े कथाकार हैं। कुछ बरस पहले साहित्य अकादमी मिला था। उनकी कहानियां मैंने पढ़ी कम, सुनी ज़्यादा हैं। मैं पंजाबी सुनकर पूरी तरह समझ लेता हूं, लेकिन पढ़ नहीं पाता। `डेड लाइन´ और `श्वेतांबर ने कहा था´ अद्भुत कहानियां हैं। सत्तर से ज़्यादा की उम्र में भी क्या सक्रिय हैं। पंजाबी के नए से नए लेखक की चीज़ें पढ़ी हुईं। यही नहीं, बाक़ायदा साहित्यिक शरारतों और ख़ुराफ़ातों में भी हिस्सेदारी। कभी किसी को चिमटी काट ली, किसी को गुदगुदा दिया।

मंटो की कहानियों पर बात शुरू हो गई। `बाबू गोपीनाथ´ चर्चा में आ गए। देर तक इसी कहानी पर बात होती रही। कहने लगे, इस कहानी में क्या-क्या है, क्या-क्या नहीं है, यह आज तक नहीं समझ आया। इसमें सब कुछ है, सब असाधारण है और सब ही कुछ साधारण, आसपास का है। मेरी कुर्सी के पीछे लगी निर्मल वर्मा की पेंटिंग को देर तक देखते रहे। फिर निर्मल जी पर बात शुरू। उसी की बग़ल में एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर वहीदा रहमान की है। फिर उस पर। ये पुराने ज़माने के लोग बात-बात में खो क्‍यों जाते हैं ?

बात करते-करते ही मैंने उनसे कहा, `हमारे यहां कहानी के दो ट्रेंड्स बहुत साफ़ दिखते हैं, हालांकि इसे किसी आलोचकीय शब्दावली में नहीं बांध सकता, बस, मेरा पाठकीय निरीक्षण है ये कि दो कि़स्म की कहानियां हैं। एक में कहानी के चरित्र आपके साथ-साथ चलने लगते हैं, दूसरे में कहानी का परिवेश और वातावरण। आप प्रेमचंद, मंटो, बेदी और श्रीलाल शुक्ल के चरित्र कभी नहीं भूल सकते और निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल आदि का परिवेश, माहौल। निर्मल जी की उदासी और अवसाद तुरंत याद आ जाते हैं, उनके चरित्रों के नाम नहीं। जबकि मंटो के कैरेक्टर्स हमेशा याद रहते हैं, उनके आसपास का माहौल नहीं।´

४ दिसंबर, २००८

पिछले दिनों दानियल मुईनुद्दीन के बारे में काफ़ी पढ़ने को मिला। पाकिस्तान का कहानीकार है, जिसकी परवरिश पाकिस्तान और अमेरिका में हुई है और इन दिनों पश्चिमी पंजाब में कहीं खेती-किसानी करता है। उसका कहानी संग्रह आया है। संग्रह के कारण ही उसकी चर्चा पढ़ने में आई। पिछले साल से उसकी कहानियां छप रही हैं। शायद इसी साल, उसके कहानी संग्रह की नीलामी हुई। उसने महज़ कुछ प्रकाशकों के आने की उम्मीद की थी, जबकि बेतहाशा आए। सात-आठ कहानियों के उसके संग्रह का प्रकाशन अधिकार एक लाख डॉलर में बिका। वह भी सिर्फ़ अमेरिका और कनाडा के लिए। फिर कुछ दिनों बाद लंदन में बोली लगी। वहां भी क़रीब 80 हज़ार डॉलर। सब ओर दानियल-दानियल हो गई। किसी समीक्षक ने उसे तुर्गनेव और फॉकनर जैसा लेखक बताया है। उसे पढ़ने की उत्सुकता जग गई।

उसके पास अच्छी कहानियां हैं, जो पश्चिम को, ख़ासकर, आकर्षित करेंगी। पिछले कुछ बरसों से पाकिस्तान दुनिया की दिलचस्पी में है भी। जैसे नज़ीब महफ़ूज़ को नोबेल मिलने से पहले कोई अरबी फिक्शन की तरफ़ ध्यान भी नहीं देता था, वैसे ही पिछले डेढ़-दो साल में पाकिस्तान के साथ हुआ लगता है। अनेक कारणों से वह चर्चा में है और इसीलिए वहां का नया साहित्य भी।

दानियल की ज़्यादातर कहानियां एक ज़मींदार के एस्टेट और वहां के लोगों पर हैं। ज़मींदारों के ठाठबाट, बहुत मोटे तौर पर उभरे हुए दो वर्ग, उसमें अपने होने को बनाए रखने का संघर्ष करती स्त्री। दो चीज़ें लगातार टकराती रहती हैं। एक कि़स्म का क्लीशे बार-बार आता है। कई जगहों पर उसमें एक ख़ास चमक है, पर उसे पढ़ते हुए मैं कई बार सोचता हूं कि इसके पास ऐसा क्या है, जो उर्दू के असद मुहम्मद ख़ां के पास नहीं है? `बसोड़े की मरियम´ दानियल के `इन अदर रूम्स, अदर वंडर्स´ के मुक़ाबले कहीं भारी है। लेकिन `बसोड़े की मरियम´ कभी एक लाख डॉलर में नहीं जाएगी या उसे एक लाख पाठक नहीं मिल सकते। मुहम्मद मंशा याद, ज़ाहिदा हिना, ये लोग नदीम क़ासमी के बाद के हैं और मुस्लिम समाज, आधुनिकता और बाज़ार के दबाव को इन्होंने बेहतर पकड़ा है। जो चीज़ें उर्दू में काफ़ी पहले लिखी जा चुकीं, उसे अब अंग्रेज़ी में लिखकर ये लोग नाम-दाम कमाएंगे। उर्दू वाली चीज़ अनुवाद होकर जाएगी नहीं और दुनिया पाकिस्तान के नाम पर इन्हीं लेखकों को जानेगी। (जैसे भारत के नाम पर वही अंग्रेज़ी लेखक।)

दानियल ही नहीं, इन दिनों पाकिस्तान के और भी युवा लेखक चर्चा में हैं। मोहसिन हामिद, कैमिला शम्सी, मोहम्मद हनीफ़ आदि। 'डायरी ऑफ अ सोशल बटरफ़्लाई' अभी नहीं मिली है। उसमें क्या होगा ? एक सॉलीट्यूड, एक टिन ड्रम यहां से निकल आएगा?ऐन हैदर की कहानियां या नॉवल उस मुस्लिम एलीट की सड़ांध को ज़्यादा अच्छे तरीक़े से दिखाती हैं। रामलाल के पास अद्भुत कहानियां हैं। नैय्यर मसऊद की कहानियां- वाह। 'ताऊस चमन की मैना' मेरी पसंदीदा है। हमारे यहां भी तो इससे अलग स्थिति नहीं है।
हिंदी के किसी लेखक को ढंग से बाहर नहीं जाना जाता। वहां लोगों का मानना ही यही है कि भारत में ज़्यादातर लेखक अंग्रेज़ी में लिखते हैं। किसी जर्मन साइट पर अलका सरावगी का परिचय पढ़ा। उसमें लिखा था कि भारत के ज़्यादातर लेखक अंग्रेज़ी में लिखते हैं, पर अलका ने अपनी मातृभाषा में लिखना पसंद किया। बाहर जितनों से बात होती है, वे अमिताभ घोष, अरुंधति राय, चेतन भगत को जानते हैं, पर हिंदी-उर्दू वालों को कोई नहीं जानता। अनुवादक ही नहीं हैं या यहां वालों के लिखने में ही दम नहीं? या इंटरनेशनल रीडर को किस तरह कैटर करना है, इन्हें नहीं आता?

ऐन हैदर तक को अपना काम ख़ुद ट्रांसलेट करना पड़ा। वह भी तीस-चालीस साल बाद। उन पर लिखे एक संस्मरण में पढ़ा, कि अस्सी के शुरू में `मिडनाइट्स चिल्ड्रन´ की दुनिया भर में हुई चर्चा के बाद उन्होंने लंदन में रहने वाले अपने किसी दोस्त लेखक से पूछा था कि अंग्रेज़ी में, वह भी लंदन और न्यूयॉर्क के प्रकाशकों से, कैसे प्रकाशित हुआ जा सकता है?शायद, रुश्दी को अचानक मिली कीर्ति से अपने लेखन के बारे में वह सशंकित हुई होंगी। `आग का दरिया´ के साथ `चिल्ड्रन´ की तुलना उन्होंने मन ही मन की होगी, और पता नहीं, शायद, भीतर कहीं बे-ज़ाहिर कि़स्म का अफ़सोस भी किया होगा कि क्यों उन्होंने अंग्रेज़ी में नहीं लिखा ? या न भी किया हो। पर वह ऐसी बात तो थी ही कि वह अंग्रेज़ी में छपने के लिए सोचने लगी हों। जैसा सवाल ऐन हैदर ने अपने इंगलिस्तानी दोस्त से पूछा, वैसा ही एक सवाल बलराज मैनरा ने कभी ऐन हैदर से पूछा था- कि आपा, आपके ज़माने में तो फिर भी उर्दू में पाठक थे, हम बताइए, किसके लिए लिखें ? हिंदी में तो जाना ही पड़ेगा।

आज उर्दू वाला ही नहीं, हिंदी, मराठी, पंजाबी, बंगाली, जितनी भाषा वालों से मेरी बात होती है, वे सब यही सवाल पूछते हैं कि अंग्रेज़ी में जाना ही होगा? पर कैसे? देसी भाषाओं के लेखकों में जिस क़दर फ्रस्ट्रेशन आ गया है, वैसा पहले कभी नहीं था। हालांकि इसका पाप भी कमोबेश इन्हीं देसी भाषा वालों को ही है। एक कुंठित भाषा का कुंठित हो रहा लेखक जो लिखेगा, वह कैसा होगा? बार-बार रिजेक्शन का शिकार होती भाषा? करोड़ों बोलने वाले, पर पढ़ने वाले कितने? पोलिश भली, कुछ लाख लोगों की भाषा, पर ऐसा गौरव बना रखा है कि कई नोबेल पा लिए, उसके लेखक ट्रेंड बनाते हैं और पूरी दुनिया का साहित्य उसके पीछे चलता है। और जब ऐन हैदर ने `आग का दरिया´ ख़ुद अनुवाद किया, तो उसे उन्होंने री-क्रिएट करना माना। पर पता नहीं, उसकी अंग्रेज़ी में कितनी चर्चा हुई। हमारे यहां तो ख़ैर बड़ा है ही वह, पर उसके बड़े होने पर भी सवाल उठे हैं। घोर अचरज की बात है कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने इसके बारे में लिखा था- शायद यह अच्छा उपन्यास हो सकता था।

बड़े लेखकों को उनके समय के बाद ही क्यों समझा जाता है? या यही बाद में समझ आने का फैक्टर ही उन्हें बड़ा बनाता है? मंटो को हज़ार गालियां दी गईं। उस समय की चीज़ें पढ़ो, तो लिस्ट ऐसे बनती थी- कृश्न चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी और मंटो। उसका नाम तीसरे नंबर पर लिखा जाता था। कई को उसे तीसरा नंबर देते भी संकोच होता था। पचास साल बाद लिस्ट बनती है- मंटो, मंटो और सिर्फ़ मंटो। कृश्न चंदर और बेदी ग़ायब। यानी उस समय मंटो के साथ अन्याय और आज बाक़ी के साथ। ईमानदारी दोनों बार नहीं। रचना में अतिशयोक्ति को एक अलंकार या व्यवहार मानने से इंकार करने वाले आलोचकों को आलोचना में अतिशयोक्ति अपनाने से कोई गुरेज़ नहीं होता।बार-बार कहा जाता है कि जो लेखक अपने से बाद का समय पकड़ रहे होते हैं, वे उतना ठुकराए भी जाते हैं। अपने से बाद का समय पकड़ने जैसी क्या बात हुई ? लेखन कोई टैरो कार्ड रीडिंग या प्रीमॉनिशंस तो है नहीं।

जब पंकज बिष्ट `लेकिन दरवाज़ा´ लिख रहे थे, तो वह भारतीय मध्य वर्ग की सारी लंपटई, स्वार्थ में पगी भावुकता, झूठ और मक्कारी पकड़ रहे थे। अस्सी के शुरू में ऐसा मध्य वर्ग बन भी रहा था। बल्कि उससे भी पहले, `एक साहित्यिक की डायरी´ के समय से ही। मुक्तिबोध और रघुवीर ने तो उसकी पूरी मैपिंग करके बता दिया था कि यह मध्य वर्ग ऐसा होगा कि भीतरी औ बाहरी पाट के बीच ट्रैजडी नीच होगी और ताक़त ही ताक़त होगी, पर कोई चीख़ न होगी। पंकज बिष्ट ने ज़्यादा सहज और सरल तरीक़े से फिक्शन में इसका रूप गढ़ दिया। वह कोई भविष्यवाणी तो नहीं थी, पर उनके आसपास ऐसा वर्ग बन चुका था। उन्होंने उसे बारीकी से देख लिया था।

बाक़ी लोग 90 के बाद देख पाए, जब वह मध्य वर्ग ज़्यादा मूर्त हो गया। उसकी टुच्चइयां खुल कर सामने आ गईं। ट्रेट्स दिखने लगे, बिना किसी कोड या साइन के। (जैसा फ्रेंच समाज के मिडिल क्लास को डेढ़ सदी पहले बालज़ाक ने और बीसवीं सदी के लैटिन अमेरिका में कोर्ताज़ार ने या ग्रेप्स में स्टाइनबैक ने देखा था। बालज़ाक के समय में वे प्रवृत्तियां बहुत बारीक थीं। फिर सदी बदलते-बदलते पेटी बुर्जआ कैसे मिडिल क्लास का नाम ओढ़कर टहलने लगा, पता ही है। ) तो पवन वर्मा और शशि थरूर उस मध्य वर्ग की चरित्र की थ्योरी बनाने में लग गए। पंकज बिष्ट के लिखने के पंद्रह साल बाद। पर `लेकिन दरवाज़ा´ को क्या स्थान मिला? हिंदी में ही? अंग्रेज़ी या दूसरी भाषाओं की तो बात ही छोड़ दें। `लेकिन दरवाज़ा´ के पास बहुत पाठक हैं, पर `चिल्ड्रन´ जितने नहीं। मुझे वह पिछले पचीस साल का सर्वश्रेष्ठ हिंदी उपन्यास दिखता है।

हिंदी-उर्दू और अंग्रेज़ी में बहुत फ़र्क़ है। अंग्रेज़ी में फिर भी पाठक बहुत कुछ तय कर देते हैं। हमारी भाषाओं में ऐसा नहीं होता। हमारे यहां आलोचक होते हैं तय करने वाले। टैरी ईगलटन ने नायपॉल की बड़ी आलोचना की थी, लेकिन नायपॉल के लेखक या क़द पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। आज भी स्पैनिश में कई बड़े आलोचक टाइप के जीव कहते हैं कि मारकेस को `कॉलरा´ से शुरुआती पचास पेज हटा लेने चाहिए थे, कि मारकेस में अनावश्यक विवरण हद से ज़्यादा है, कि मारकेस को एज़रा पाउंड जैसा कोई संपादक मिला होता, तो `सॉलीट्यूड´ और `कॉलरा´ सौ-सौ पेज में निपट जाते।

अनावश्यक विवरण, लाउड हो गए, अतिकथन कर डाला, बाज़ारवादी हो गए, किस्म की बातें हिंदी आलोचना के भी प्यारे इतान्यातान्योफेरास हैं। जब चाहो, तब दुहरा दो। किसी पर भी चेंप दो। यह भूल जाना हुआ कि ये सब भी प्रविधि का ही हिस्सा होते हैं।मुझे लगता है कि किसी भाषा में आलोचक नाम की सत्ता के सर्वशक्तिमान हो जाने का अर्थ ही यह होता है कि उस भाषा से पाठक नाम की सत्ता का विलोप हो रहा है। और जिस भाषा से पाठक विलुप्त हो रहा हो, वह भाषा पचास साल भी निकाल ले, तो बहुत है। बहुत हुआ, तो हमारी भाषा भी मरे-न मरे, पर उसकी हालत उस बुज़ुर्ग की तरह हो जाएगी, जो घर के किसी कोने-कोपचे में खटिया पर पड़ा है, कांख-कराह रहा है, वहीं सू-सू पॉटी कर दे रहा है और घर वाले हर सुबह यह सोचकर उसके पास जाते हैं कि आज तो बुड्ढा नक्कीच कलट लिया होगा।
***
( गीत चतुर्वेदी हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि, कथाकार और अनुवादक हैं। उन्होंने अपनी डायरी के ये टुकड़े बहुत आग्रह करने पर भेजे। गीत की डायरी के इन टुकड़ों से पहले सबद में आप कृष्ण बलदेव वैद और मंगलेश डबराल की डायरी के अंश पढ़ चुके हैं। )
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10 comments:

काफ़ी दिनों बाद कुछ सीरियस पढ़ रहा हूँ गीत भाई. लेकिन दरवाजा की कहीं पर भी पहली बार चर्चा देख रहा हूँ. खुशी हुई कि आप उसकी महत्ता मानते हैं.


अच्छे पन्ने गीत भाई की डायरी से पेश किए अनुराग! बहुत सुन्दर.


achchi lagi aapki dayri bhi.anuvad ki bat mahatvapurn hai.
pallavkidak@gmail.com


डायरी में इस तरह विमर्श करना, डायरी लेखन को प्रतिष्‍ठा देना भी है।

लेकिन आत्‍मसंघर्ष, आत्‍मावलोकन और कलाकार के अकेलेपन की असीम दुनिया, जो इस संसार से टकराती ही रहती है और एक कलाजन्‍य व्‍यग्रता ही है जो पेसोआ और मुक्‍तिबोध की डायरी को आज भी सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण बनाती है। गीत, तुम्‍हें शुभकामनाएं।


पढ़ कर कुछ अच्छा पढ़ने का संतोष मिला। प्रस्तुति केलिए अनुराग जी आप बधाई के पात्र हैं।


गीत भाई…पूरी तरह सहमत हूँ खासकर आखिरी वाले हिस्से से।
अभी हमारे ग्वालियर के बुजुर्ग साहित्यकार प्रकाश दीक्षीत का उपन्यास आधी खिडकी पढा । 70 की शुरुआत मे लिखा था …अद्भुत क़िताब है पर किसी का ध्यान नही गया…ऐसी कितनी ही क़िताबे होंगी…ये पाठक वाला तिलिस्म तोडने के लिये कुछ तो करना होगा!!!!


देश विदेश के साहित्य का ईमानदारी से विश्लेषण करते हुए भारत में अंग्रेजी मैं लिखने वालों की तुलना में हिंदी लेखकों की दुर्दशा का सही चित्रण किया गया है.लेखकों को उनका सही स्थान न दिला पाने में आलोचकों के पक्षपाती रवैय्ये की भर्त्सना की गयी है.आज के माहौल में यह और भी सटीक है क्योंकि अतिसाधारण कृति की झूठी तारीफ करके उसे बैस्टसेलर बना दिया जाता है और गंभीर लेखकों को साहित्यिक खेमेबाजी के चलते दरकिनार कर दिया जाता है.यह साहित्य के पतन का चरम है जब नामी वयोवृद्ध लेखक और आलोचक इस खेल में शामिल हो जाते हैं.विश्वस्तर का साहित्य रचने के लिए बहुत प्रतिभा और मेहनत चाहिए. मगर शोर्ट कट से आगे बढ़ने वाले डिजर्विंग लेखकों पर ध्यान नहीं देने देते. श्रेष्ठ कृतियों का अंग्रेजी में स्तरीय अनुवाद न हो पाना भी हिंदी लेखकों के विश्व में पहचान न बना पाने का बड़ा कारण है.


बहुत 'जरुरी' पढने को मिला। इस तरह का विमर्श इधर हमारे लेखक-पाठक दोनों के बीच से लगभग गायब है। अनुराग आपका शुक्रिया,डायरी के बेहतरीन अंश आपने पढवाए .


बहुत 'जरुरी' पढने को मिला। इस तरह का विमर्श इधर हमारे लेखक-पाठक दोनों के बीच से लगभग गायब है। अनुराग आपका शुक्रिया,डायरी के बेहतरीन अंश आपने पढवाए .


‘’बाहर जितनों से बात होती है वे अमिताभ घोष ,अरुंधती राय ,चेतन भगत को तो जानते हैं ,लेकिन हिंदी उर्दू वालों को कोई नहीं जानता |अनुवादक ही नहीं हैं ,या यहाँ वालों के लिखने में दम नहीं है ?या इंटर नेशनल रीडर को किस तरह कैटर करना है इन्हें आता ही नहीं ‘’आज यही मुद्दा यानि हिंदी साहित्य की ‘’सीमाबद्धता ‘’सबसे चिंतनीय और निराशाजनक विषय है |बावजूद इन वर्षों में हिन्दी का सर्वाधिक लेखन (संख्यात्मक आंकड़ों के आधार पर )होने के क्या हिन्दी के पास दो चार भी स्तरीय लेखक /अनुवादक नहीं हैं जो विश्वस्तरीय स्तर पर अपनी (हिन्दी की )उपस्थिति दर्ज करा सकें या फिर यहाँ की तुश्तिपूर्ण मानसिकता इसके लिए ज़िम्मेदार है?हिन्दी के जो लेखक अंग्रेज़ी में भी थोडा बहुत दखल रखते हैं भले ही लेखन हिन्दी में करें वो अधिकांशतः अपने ‘’संबंधों ‘’ का निर्वहन करते हुए अपनी (व्यक्तिगत तौर पर)कोई कहानी /कविता किसी दुसरे देश की भाषा में अनुवाद या उसकी समीक्षा किसी दूसरी भाषा में करने (अंतर्ध्वनि करवाने )का चौतरफा गुण गान तो करते ही हैं दूसरी तरफ वही ‘’ख्यातिनाम लेखक’’चेतन भगत और अमिताभ बासु जैसे “तथाकथित अंग्रेज़ी चिप्पी सज्जित हिन्दी लेखकों ‘’के लेखन को लुगदी साहित्य कहने में भी नहीं हिचकते |निस्संदेह आज हिन्दी लेखन पहले से दुगुना चौगुना किया जा रहा है बावजूद इसके गुणवत्ता और सरोकार पर प्रश्नचिन्ह अभी भी अपनी जगह खडा है | आपने पोलिश लेखकों का ज़िक्र किया या फिर विश्वस्तरीय किसी भी लेखक जैसे हेमिंग्वे,गोर्की,चेखव.ब्रेख्त.,मोपांसा आदि के साहित्य में आखिर क्या खासियत थी उनके लेखन में जो हमारे यहाँ नहीं ?अथवा ‘’होने के बावजूद’’अनुवाद की शिथिलता ?या कुछ और ? हिन्दी के ही मूर्धन्य लेखकों तक बात सीमित की जाए तो आज जब भी बात हिन्दी के लोकप्रिय और ख्यातिनाम लेखकों की निकलती है तो हमारी द्रष्टि प्रेमचन्द ,कमलेश्वर ,निर्मल वर्मा जैसे लेखकों पर टिक जाती है (क्षमा सहित)|हमारे यहाँ लेखन अपने ठीक से पढ़े जाने के पहले ही आलोचना का शिकार हो जाता है |हम अतिवादी प्रेमी लोग हैं आलोचना तो गाली गलौच (या गलौंज)तक और तारीफ़ तो आसमान तक |सोशल साईटों ने इस मनोवृत्ति को उकसाने में आग में घी का काम किया है| इस मनोवृत्ति के चलते क्या हम हिन्दी के भविष्य के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं ? आलोचना हिन्दी साहित्यकारों का संवैधानिक (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ लेते हुए )अधिकार भी है और स्वास्थ्य आलोचना की द्रष्टि से देखा जाये तो सही भी |लेकिन बिना पुख्ता प्रमाणों या समझ के बे सर पैर की आलोचना के संतोष सुख में हम नख शिख डूबे हुए हैं और डूबे रहना चाहते हैं |चेतन भगत अमिताभ घोष जैसे लेखक जिन्हें वैश्विक साहित्य के अनुक्रम में बतौर हिन्दुस्तानी लेखक माना जाता है (रेखांकित किया जाए )विद्वानों के अनुसार बेहद ''कचरा साहित्य '' लिखते हैं |सवाल सिर्फ ये हैं कि जो 'विद्वान -आलोचक' उक्त लेखकों को जिन २ मुद्दों पर कोसते हैं कटघरे में खड़ा करते हैं वे क्यूँ नहीं उन मुद्दों को खारिज कर उस स्थान को पाने की कवायद शुरू करते?क्यूँ नहीं झंडे गाड़ने के लिए किसी खुदाई का श्री गणेश करने का बीड़ा उठाते?


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सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी