सबद
vatsanurag.blogspot.com

बही-खाता : ४ : प्रत्यक्षा



लिखना साँस लेने जैसा ज़रूरी है...कई बार !

कोई
खदबदाहट होती है, लगातार होती है, पात्र रात बेरात कुसमय दरवाज़ा ठकठकाते, झाँकते, हुलकते हैं और आखिर में आजिज़ कर उनकी कहानी लिखी जाती है। ये प्रकिया लगातार अपने भीतर उतरते जाना होता है, भीड़ में भी अपनी दुनिया साथ पीठ पर रकसैक टाँगे घूमना होता है, क्या जाने कब घुमक्कड़ी पर निकल जायें किस अजाने कूल किनारे। कोई एक शब्द, एक बिम्ब चेतना में ऐसे घुसपैठ करे कि हम बेदम हो जायें, लिखवा कर ही छोड़े या फिर कुछ पकता रहे इतनी देर कि अंत में सारी काहिली भाप की तरह स्वत: स्फूर्त उड़ जाये। अंत में सबसे अंत में लिखने को किसी भी फॉर्मुले में बाँधना संभव नहीं। कब किसी कोलरिज़ की कुबला खान या गिंसबर्ग की सनफ्लॉवर सूत्रा सपने में ही पूरी लिखी जाये कौन जानता है।

लिखाई का हर नया शब्द किसी अनजानी यात्रा पर जाने जैसा है। निकले थे पता होता है पर कहाँ और कब पहुँचेंगे ये नहीं मालूम और इस नहीं जानने का सुख ही लिखने का सुख है। किसी जंगल में रास्ता बनाते खोजी हैं हम सब, नई दुनिया की खोज है, नये रास्तों की खोज है, नये शब्दों की खोज है। जब तक ऐसी यायावरी का जुनून है लिखी जायेंगी कहानियाँ, कवितायें। हर बार ज़रूरी नहीं संप्रेषण उतना ही हो, वैसा ही हो, जैसे दिमागी कल्पना में देखा था। परवाह नहीं। लिखे जायेंगे शब्द, अपने साथ उन समयों का भार लिये, उन दिनों का अर्थ लिये, जब ये गढ़े गये थे, और उसी सच्ची ईमानदारी से चमकेंगे, रेत पर पड़े चमकीले चिकने पत्थरों की तरह, कहानियों को बहने देंगे अपने साथ जैसे सफेद चिड़िया के पँख पर हवा की अनुभूति या फिर नदी के चाँदी पानी में मछली के पीठ पर बिछलती सूरज की किरण । ऐसी सहजता से कही जायेगी कहानी, कही जायेगी कविता।

जीवन में कहानियाँ वही वही हैं, उनको हम किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं, उसमें कितनी परतें खोलते हैं और कितनी फिर भी ढकी छुपी रहने देते हैं, कहानी कहना मेरे लिये यही खेल है, बच्चे के निर्बाध उत्साह और भोलेपन का खेल है, ऐसे जैसे ये खेल मैंने ही तलाशा है, इसके नियम मेरे हैं, जब चाहूँ उसकी विधा बदल दूँ, कोई उठापटक कर दूँ। मुझे नहीं लगता कि स्टेक्स मेरे लिये इतने ऊँचे हैं कि ऐसी उठापटक का जोखिम न ले सकूँ। जिस दिन इस अहसास से दबूँगी, उस दिन लिखना बोझिल हो जायेगा। फिर ये मज़ा चाहे कहानी लिखने में हो या ब्लॉग लिखने में ...जिस दिन आनंद खत्म होगा उस दिन लिखना खत्म होगा। तो बहुत गंभीरता से लिखती हूँ, ये नहीं कहूँगी, अभी नहीं कहूँगी। लेकिन कोई आंतरिक छटपटाहट, सुगबुगाहट है जो अकसर ठेलता है कि लैपटॉप उठाऊँ, तब पता नहीं होता कि क्या लिखना है। सिर्फ इतना भर कि लिखना है। कोई मायावी दुनिया बार बार अपने भीतर गप्प से खींच लेती है। इसका जादू फँसाता है, रोजमर्रा के काम के बीच फेंका ऐयार का कमंद है, अकुलाहट, बेचैनी है , ज़रूरत है, कई बार साँस लेने जैसा ज़रूरी।

और शायद अचेतन में अब तक, जब तक लिखा नहीं था, तब जहाँ-जहाँ से गुज़रे सब भीतर किसी बड़े गहरे कूँये में इकट्ठा होता रहा ... समय , अनुभूति , लोग , दुख। सब स्मृति में अटका रहा कील। जीभ की नोक पर कौन भूला स्वाद कब तृप्त कर दे, किस बंसी पर कौन सी स्मृति फँस कर निकल जाये, किस कहानी की घटना बन जाये ये मालूम नहीं लेकिन देखा, भोगा, काल्पनिक, वास्तविक ...सब किसी तरतीब में जुट जाये, कोई रहस्यमय जादू का खेला हो जाये, बस इसी की तलाश है। लिखना मेरे लिये चतुराई नहीं। कथ्य और शिल्प का चौकन्ना खेल नहीं है। कुछ नया अजूबा कर दूँ का सजग शातिरपना नहीं है, इसिलिये जब किसी कहानी पर ये सुनाई पड़ता है कि चीज़ें साफ नहीं तब सहजता से सोचती हूँ कि सब जवाब लिख दूँ, सब चीज़ें पहले से अगृदृष्टि रख कर कवर कर लूँ। ऐसा सोच कर तो लिखा नहीं था। इसलिये भी कि अब तक की लिखाई , सोची समझी लिखाई नहीं है , आलोचकों को चुप करा दूँ , सारे फ्लैंक्स कवर कर लूँ वाली चालाकी नहीं है। कहानियाँ एक बार में लिखी गई हैं। उनपर कुछ "काम" नहीं किया गया है। यहाँ तक कि जो शब्द पहली बार में ज़ेहन में आये उन्हें परिष्क़ृत नहीं किया गया है। हो सकता है ये "तरीका" गलत हो लेकिन जंगल की उन्मत्त सुन्दरता किसी तरतीबवार बगीचे से ज़्यादा आकर्षित करता है।

जहाँ तक भाषा का सवाल है, पात्र जिस परिवेश के हैं, वही भाषा बोलेंगे। अगर पेरिस और हाईडेलबर्ग जायेंगे तो शायद पार्ले वू फ्रांसे या वी हाईस्त दू कहेंगे। आज के समय में जब रेस्तरां के वेटर्स और दुकानों में सेल्समैन तक अंग्रेज़ी बोलते हैं, वहाँ हमारी कहानियों के पात्र कैसी भाषा बोलेंगे, वही जो आज के समय की देन है। जैसे पहले संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फिर फारसी उर्दू के रास्ते चलती हिंदुस्तानी यहाँ तक पहुँची है। हम आम बोलचाल में चार वाक्य में कमसे कम पाँच शब्द अंग्रेज़ी के बोलते हैं, बहुत गर्व की बात नहीं, लेकिन यही इस समय की त्रासद सच्चाई है, वैश्विकरण का एक साईडईफेक्ट है, बाज़ार की, अर्थव्यवस्था और विज्ञान कम्प्यूटर की भाषा को इस्तेमाल करने की मज़बूरी है। इस बोलचाल की दुनिया से कट कर लेखक कहाँ, किधर जायेगा, किस कृत्रिम दुनिया के पात्र रचेगा ?

मैं जब लिखती हूँ तब शब्द मेरे लिये नदी के किनारे, रेत में चमकते पत्थर होते हैं, उनका अनगढ़पना, उनकी रंगत, उनकी छुअन मेरे लिये कई कई पगडंडियाँ बनाती हैं, उन सुदूर पहाड़ों से पहचान कराती हैं जहाँ से किसी कठिन सफर के बाद वो मुझ तक पहुँची हैं। चाहे वो ठेठ देशज शब्द हों, जैसे 'जंगल का जादू तिल तिल' या 'फुलवरिया मिसराईन' में या फिर 'दिलनवाज़ तुम बहुत अच्छी हो' में अंग्रेज़ी या तेलुगु का इस्तेमाल हो। मुझे ज़रूरत पड़ेगी तो मैं सिर्फ अंगेज़ी क्यों तमिल, बंगला, फ्रेंच, जर्मन या कोई भी दूसरी भाषा के शब्द भी इस्तेमाल करूंगी, किया है, अगर मेरे उस भाव को सिर्फ वही शब्द सही और पूरे समग्र भाव से पकड़ रहे हैं, डिफाईन कर रहे हैं। ऐसा करते मैं बेहद सहज हूँ, ईमानदार हूँ। बाकी पाठक उस को शुद्धतावादी तर्क से न जोड़ कर देखें, क्योंकि भाषा एक बहती हुई नदी है, जबतक और छोटी नदियाँ जुड़ती रहेंगी, सहज प्रवाह रहेगा, भाषा जीवित रहेगी।

भाषा सिर्फ किसी एक समय के संदर्भ में शुद्ध होती हैं। जिन्हें आज हम परिमार्जित समझते हैं वो कल अपभ्रंश था और जो आज अशुद्ध है शायद वही भविष्य में शास्त्रीय समझा जायेगा। जिस तरीके से हम अपना अंतरलोक संप्रेषित कर पाते हैं, पूरी सच्चाई और ईमानदारी से, वही सच है, वही रचना की प्रक्रिया है। लेखक को सबसे पहले और सबसे अंत में खुद के साथ सच्चा होना पड़ता है। मेरे लिये लिखना अपने साथ सतत संवाद कायम करने की प्रक्रिया है।


( प्रत्यक्षा युवा कहानीकार हैं। कवितायें और ब्लॉग भी लिखती हैं। फोटोग्राफी से लेकर संगीत तक में उनकी गहरी रूचि है। उनकी कहानियों का एक संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ ने जंगल का जादू तिल-तिल नाम से प्रकाशित किया है। प्रत्यक्षा की कहानियाँ कहानी होने न होने से लेकर भाषा के स्वछंद व्यवहार के लिए भी विवादित-प्रशंसित हुई हैं। यहाँ उन्होंने इस ओर भी रोशनी डाली है। इससे पहले बही-खाता स्तंभ में आप संजय खाती, पंकज मित्र और कुमार अम्बुज को पढ़ चुके हैं। )

5 comments:

हम आम बोलचाल में चार वाक्य में कमसे कम पाँच शब्द अंग्रेज़ी के बोलते हैं, बहुत गर्व की बात नहीं, लेकिन यही इस समय की त्रासद सच्चाई है, वैश्विकरण का एक साईडईफेक्ट है, बाज़ार की, अर्थव्यवस्था और विज्ञान कम्प्यूटर की भाषा को इस्तेमाल करने की मज़बूरी है।


आपका यह स्तभ काबिले-तारीफ है।
शुक्रिया!


बहुत बहुत बढिया है सबद...
बधाई...


सुन्दर! युवा कहानीकार के बारे में जानकर अच्छा लगा!


खूब खूब भालो
सरस रचना है.


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी