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Showing posts from January, 2009

कवि कह गया है : २ : बोर्हेस

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मैं अनिवार्यतः एक पाठक हूँ


मेरी समझ से काव्यशास्त्र कविता लिखने का एक औजार भर है। मैं मानता हूँ कि कविता लिखने के उतने गुण-धर्म या सिद्धांत भी हो सकते हैं जितने कि कवि।

मैं अपने आप को अनिवार्यतः एक पाठक मानता हूँ।...मैंने जो पढ़ा है वह मेरे लेखन से कहीं ज़्यादा महत्व का है। आप वही पढ़ते हैं जो आपको पसंद है -- लेकिन आप ठीक वही नहीं लिख पाते जो आप लिखना चाहते हैं। असल में आप उतना भर ही लिख पाते हैं जितना आपसे लिखा जाता है।

एक व्यक्ति का जीवन हजारों क्षणों और दिनों का योग होता है। इन मार-तमाम दिनों और इनमें घटित घटनाओं की महज एक क्षण में समाई हो सकती है : ऐन उस क्षण में जब व्यक्ति यह जान लेता है कि वह कौन है और अपने को आमने-सामने देखने लगता है।

एक महान किताब लिखने लिए, शायद एक ही मूल और सामान्य योग्यता की दरकार होती है : किताब के हर हिस्से में कुछ न कुछ ऐसा हो जो हमारी कल्पना को एक सुखद अहसास से भर दे।

मेरे लिए एक लेखक होने का क्या मतलब है ? इसका मतलब अपनी कल्पनाओं के प्रति निष्कपट होना है। जब मैं कुछ लिख रहा होता हूँ, मैं इसकी परवाह नहीं करता कि यह वस्तुतः कितना सच है। मसलन, मैं एक कहानी लिख…

कोठार से बीज : ५ : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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( हममें नए कवि-लेखकों के साथ-साथ पुरखों को पढ़ने-गुनने की सलाहियत बनी रहे, इसीलिए इस स्तंभ की शुरुआत की गई थी। इसके तहत अब तक आप शमशेर , त्रिलोचन , नागार्जुन औररघुवीर सहाय की रचनाएं पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कुछ कविताएं। सर्वेश्वर नई कविता के दौर में उभरे, पर वे उन कम कविओं में थे जो नई कविता का ज़ोर कम पड़ने पर भी अपने काव्य-गुण और प्रतिबद्धता की वजह से लंबे अर्से तक अच्छी कविताएं लिख सके। )

तुम्हारे साथ रहकर

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर महसूस हुआ है
कि दिशाएं पास आ गई हैं,
हर रास्ता छोटा हो गया है,
दुनिया सिमटकर
एक आँगन सी बन गई है
जो खचाखच भरा है,
कहीं भी एकांत नहीं
न बाहर, न भीतर।

हर चीज़ का आकार घट गया है,
पेड़ इतने छोटे हो गए हैं
कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
आशीष दे सकता हूँ,
आकाश छाती से टकराता है,
मैं जब चाहूँ बादलों में मुंह छिपा सकता हूँ।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे महसूस हुआ है
कि हर बात का एक मतलब होता है,
यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
हवा का खिड़की से आने का,
और धूप का दीवार पर
चढ़कर चले जाने का।

तुम्हारे साथ रहकर
अक्सर मुझे लगा है
कि हम असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से…

डायरी : ३ : गीत चतुर्वेदी

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26 अक्टूबर, २००८

कोई भी रीडर रिलीफ़ क्यों मांगता है ? जब हम फिल्म देखते हैं, तो उसमें रिलीफ़ खोजते हैं। शायद इसीलिए हिंदी फिल्मों में गाने ठूंसने की टुच्चई की जाती है। जैसे हर आदमी की पाठकीय मांग अलग होती है, वैसे ही हर आदमी की रिलीफ़ की मांग भी अलग होती है। 'गोमूत्र' के बारे में भी ऐसा है। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें रिलीफ़ नहीं है, लगातार एक तनाव है और पढ़ते-पढ़ते झल्लाहट हो उठती है। मैंने पूछा, फिर यह रिलीफ़ कैसे आ सकता था ? उन्होंने कहा, जैसे इसमें कोई प्रेमदृश्य हो सकता था, कुछ हल्की-फुल्की स्मृतियां हो सकती थीं, नैरेटर की पत्नी या उसकी बच्ची का एक समांतर जीवन हो सकता था और इन सबके साथ थोड़ी तरलता हो सकती थी।

क्यों हम तरलता की उम्मीद रखते हैं ? वह ऐसी कहानी नहीं थी, जिसमें तरलता की कोई गुंजाइश हो। एक मिडिल क्लास व्यक्ति, जो काइयां है, धूर्त है, मक्कार है, विरोधाभासी तरीक़े से भोला है, अपनी सुविधा के अनुसार ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही है, अभिनेता है, उसके जीवन में जितने लोग हैं, उनका अस्तित्व सिर्फ़ इसलिए है कि वे उसके जीवन में हैं। वह कभी यह नहीं सोचता कि जितनी देर मैं …

बही-खाता : ४ : प्रत्यक्षा

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लिखनासाँसलेनेजैसाज़रूरीहै...कईबार !

कोई
खदबदाहटहोतीहै, लगातारहोतीहै, पात्ररातबेरातकुसमयदरवाज़ाठकठकाते, झाँकते, हुलकतेहैंऔरआखिरमेंआजिज़आकरउनकीकहानीलिखीजातीहै।येप्रकियालगातारअपनेभीतरउतरतेजानाहोताहै, भीड़मेंभीअपनीदुनियासाथपीठपररकसैकटाँगेघूमनाहोताहै, क्याजानेकबघुमक्कड़ीपरनिकलजायेंकिसअजानेकूलकिनारे।कोईएकशब्द, एकबिम्बचेतनामेंऐसेघुसपैठकरेकिहमबेदमहोजायें, लिखवाकरहीछोड़ेयाफिरकुछपकतारहेइतनीदेरकिअंतमेंसारीकाहिलीभापकीतरहस्वत: स्फूर्तउड़जाये।अंतमेंसबसेअंतमेंलिखनेकोकिसीभीफॉर्मुलेमेंबाँधनासंभवनहीं।कबकिसीकोलरिज़कीकुबलाखानयागिंसबर्गकीसनफ्लॉवरसूत्रासपनेमेंहीपूरीलिखीजायेकौनजानताहै।लिखाई का हर नया शब्द किसी अनजानी यात्रा पर जाने जैसा है। निकले थे पता होता है पर कहाँ और कब पहुँचेंगे ये नहीं मालूम और इस नहीं जानने का सुख ही लिखने का सुख है। किसी जंगल में रास्ता बनाते खोजी हैं हम सब, नई दुनिया की खोज है, नये रास्तों की खोज है, नये शब्दों की खोज है। जब तक ऐसी यायावरी का जुनून है लिखी जायेंगी कहानियाँ, कवितायें। हर बार ज़रूरी नहीं संप्रेषण उतना ही हो, वैसा ही हो, जैसे दिमागी कल्पना में देखा था। परवाह नहीं। लिखे जायेंगे …