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Showing posts from 2009

सबद विशेष : ९ : मिक्लोश रादनोती

( मिक्लोश रादनोती हंगरी के किसी कवि का नाम है और उनकी कवितायें हिंदी में उपलब्ध हैं और यह सिवाय उन कविताओं के अनुवादक के किसी को ध्यान तक नहीं कि कवि का यह जन्म शताब्दी वर्ष है! इन्हीं तथ्यों से प्रेरित है सबद की यह विशेषपोस्ट. विष्णु खरे कविता और आलोचना लिखने के बाद जिस काम को बहुत श्रम और सुरुचि से अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं उनमें अनुवाद भी है. और हमें उनका ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने हिंदी में विश्व की अनेक भाषाओं से इतने विपुल अनुवाद किये हैं. रादनोती के ये अनुवाद और उन पर लेख छब्बीस बरस पहले उन्होंने पुस्तकाकार किये/लिखे थे. बत्तीस पृष्ठों की वह पुस्तक एक लम्बे अरसे से अप्राप्य है. मुझे संयोग से उसकी एक प्रति विष्णुजी की स्टडी में मिल गई थी और कवितायें पढने के फ़ौरन बाद मैं उसे ले उड़ा. क्यों,यह आप आगे पढ़कर जानिए. विष्णुजी का सहयोग के लिए आभार. )
खंड : क : कवितायें
यहाँ इतनी कारें

बहन, तुम देखती हो कितने सारे भिखारी
और अभागे, और कितने सारे भलेमानस चीथड़े बीनने वाले
सिर्फ़ हम दो हैं : मुट्ठी बंधे भिखारी
और गूंगे अभागे

बहन, अपना हाथ मुझे पकडाओ, यहाँ इतनी कारें
और इतने सारे ब…

निधन : दिलीप चित्रे

ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा

दिलीप चित्रेकैंसर से पीड़ित थे. लेकिन इतने जिंदादिल कि आप उनसे मुखातिब होकर यह अंदाज़ तक नहीं लगा सकते थे. वो आपसे प्रसन्न गप्प लगाते थे. वो कविताओं के बारे में बात करते थे. राजनीति पर भी. जब राज ठाकरे ने अपनी बदमाशियां शुरू की थी, खासकर हिंदी पट्टी के लोगों को मुंबई में अपनी गुंडई से परेशान करना शुरू किया था, दिलीप ने मेरे आग्रह पर नवभारत टाइम्स में ''राज-नीति'' का प्रतिवाद करते हुए एक बड़ा लेख लिखा था. दिलीप छोटों को मान देना जानते थे. उससे पहले उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं दी थी, जिसे युवा कवि तुषार धवल ने अनूदित किया था. हालाँकि दिलीप की कविताओं से मेरा परिचय उस दुबली-सी कविता-पुस्तक से हुआ था, जिसे चंद्रकांत देवताले ने मराठी से अनूदित किया था. कविताओं के अनुवाद में राजेंद्र धोड़पकर ने भी सहयोग किया था जिनसे बाद में उनकी कविता पर बात करने के अनेक अवसर आए. दिलीप अंग्रेजी और मराठी में लिखते हुए भी हिंदी के लिए अजाने नहीं थे. हिंदी में उन्हें पसंद करनेवाले, उनसे निकटता महसूस करनेवालों का एक बड़ा जागरूक समाज है, और इस समाज…

सबद विशेष : ८ : व्योमेश शुक्ल की लम्बी कविता

(अपने पहले संग्रह की सत्तावन कविताओं के बाद व्योमेश किस तरफ रुख करते हैं, इसका हम कविता-प्रेमी पाठकों को बेसब्री से इंतजार था. उनकी इस ५८ वीं कविता से, जो सबद के साथ-साथ रंग-प्रसंग के नवीनतम अंक की भी शोभा है, यह बात पुष्ट होती है कि वे अपनी कविता का एक सफल चक्र पूरा कर उसे दुहराने की बजाए अभी कुछ और पाने का दुर्लभ यत्न कर रहे हैं और उनकी अब तक की प्राप्ति को उनके रहबर चंद दूसरे कवियों की कविताओं के साथ मिलाकर देखें तो इधर की कविता पर इतरा लेने की पर्याप्त वजहें हमें आसानी से मिल जायेंगीं. व्योमेश के यहाँ शिल्प, भाषा और कथ्य के स्तर पर निरंतर सजगता बरती गई है और यह सजगता ही 'लीलामय' जैसी कविता संभव करती है. इसका विन्यास धोखेबाज़ है. विस्तार हैरत में डालनेवाला. आज और आज से पहले व्योमेश की अन्य कविताओं की तरह यहाँ भी अनिवार्य सन्दर्भ-बिंदु हैं और इनके '' बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे द…

बही- खाता : ९ : जयशंकर

(हिंदी के जाने-माने कथाकार जयशंकर के अब तक चार कहानी-संग्रह छप चुके हैं. मरुस्थल नामक उनका संग्रह अत्यंत चर्चित रहा था और बारिश, इश्वर तथा मृत्यु शीर्षक उनका नवीनतम संग्रह बिना किसी हो-हल्ले के हिंदी का बेस्ट-सेलर है, मेरे जाने पिछले पांच वर्ष में आया सबसे अच्छा कहानी-संग्रह भी. जयशंकर आमला जैसी छोटी जगह में रहकर लिखते हैं, यह लेखक-परिचय पढने में दिलचस्पी रखने के अलावा शायद ही कोई जानता हो. स्वयं जयशंकर के संज्ञान में लेखक संगठन या गुट वगैरह नहीं, उनसे सम्बन्ध तो दूर की बात है. ऐसे लेखकों के प्रति मन में एक सम्मान का भाव जगता है. जयशंकर ने कहानियों के अलावा समय-समय पर पत्रिकाओं में अपने जर्नल्स भी प्रकाशित कराये हैं. यह बही-खाता उनमें से ही कुछ वाक्यों का थीमैटिक चयन है. यों बही-खातास्तंभ की यह नौवीं प्रस्तुति है. बाद में जयशंकर के जर्नल्स की दूसरी झलकियाँ भी पेश की जाएंगी. )
लिखने के बारे में

लिख नहीं पाने की अपनी हार और हताशा, शर्म और पीड़ा से मुंह चुराने के लिए आप अपने रैक से कोई पुस्तक निकालकर पढ़ना शुरू करते हैं। अगर आपके दुर्भाग्य से वह किताब सचमुच की किताब रही तब पढ़ते हुए भी आप…

विचारार्थ : २ : इस पुरस्कार के प्रायोजक हैं...

गुरुदेव की आड़ में अकादेमी का 'सामसुंग' साहित्य प्रायोजन

विष्णु खरे
संसार भर के लेखक और बुद्धिजीवी, वे वामपंथी हों या न हों, कथित 'खुलापन', 'उदारवाद', 'बाजारवाद', 'उपभोक्तावाद', 'विज्ञापनवाद', 'प्रयोजन्वाद' तथा बहुराष्ट्रीय व्यापार निगमों के विरुद्ध हैं। सामान्यतः राष्ट्रवाद और विशेषतः वामपंथ के कारण, भारतीय साहित्यकार, और उसमें भी हिन्दी के कवि-कथाकार-आलोचक, जो अधिकांशतः 'प्रतिबद्ध' विचारधारा में यकीन करते हैं, वर्तमान नव-पूंजीवाद के ख़िलाफ़ हैं। यहाँ तक कि वे कथित 'नक्सलवाद' की दिग्भ्रमित हिंसा का विरोध तो करते हैं लेकिन उसकी आधारभूत भावना के नैतिक-सैद्धांतिक समर्थक हैं। आज हिन्दी का शायद ही कोई आत्मसम्मानी लेखक हो जो आर्थिक और राजनीतिक नव-साम्राज्यवाद का विरोध अपनी विधा में न कर रहा हो- वह ईमानदारी और कला की शर्तों पर कितना खरा उतर रहा है, उसके पाठक उसे समझदारी और गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं, यह अलग बहसों के विषय हैं। लेकिन ऐसी आशंका है कि भारत सरकार और उसके साहित्यिक प्रतिष्ठान या तो भारतीय लेखकों के इन रुझानो…

विचारार्थ : १ : इयुजेनियो मोन्ताले

वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है
नया मनुष्य बहुत बूढा पैदा हुआ है. वह नई दुनिया को झेल नहीं सकता.जीवन की मौजूदा स्थितियों ने अब तक अतीत के चिह्नों को मिटाया नहीं है. हम बहुत तेजी से दौड़ते हैं, पर फिर भी कहीं पहुँचते नहीं. दुसरे शब्दों में, नया मनुष्य एक प्रयोगात्मक अवस्था में है. वह देखता है पर विचार करने में असमर्थ है.
*
सड़क पर चलते आदमी को भी विशिष्ट होने का अधिकार है. वह भी अपने बारे में यह भ्रम रख सकता है कि सच्चाई को जिस तरह वह जानता है, वह तमाम बुद्धिजीवियों की उपलब्धियों से ज्यादा मौलिक है. पर भीड़ का मनुष्य भीड़ की तमाम बुराइयों का शिकार है. हममें से कोई इससे बचा नहीं है.
*
कलाकार का अलग-थलग पड़ जाना ( अक्सर यह स्थिति प्रचार पाने की एक बेहया प्रदर्शनप्रियता में भी बदल जाती है ) एक ऐसे समय में लाजमी है जब कर्म और ज्ञान दो विपरीत दिशाओं के यात्री हैं और कभी-कभार केवल संयोग से ही मिलते हैं.

{ एक उदाहरण :Just 24 hrs. left to return to my beloved country...but I'm sad inside...scared of those power-centers who might have planned something again to put my life in…

सबद पुस्तिका : २ : कुंवर नारायण

( कुंवरजी का यह ताज़ा लेख पहलेपहल सबद पुस्तिका के रूप में यहाँ छप रहा है। ८२ की उम्र में भी उनकी मेधा, चिंतन-प्रक्रिया और कवि-कर्म में कोई शैथिल्य नहीं आया है। इस बात की पुष्टि जितना आगे दिया जा रहा यह लेख करता है, उतना ही उनका नवीनतम काव्य-संग्रह 'हाशिए का गवाह' भी। कविता-संग्रह से कुछ कविताएं भी इस पुस्तिका की संगिनी हैं। साथ में दी गई तस्वीर हेनरी मतीस की। )

खंड : क


साहित्य और आज का समाज
इक्कीसवीं सदी का पहला दशक अब लगभग समाप्ति पर है। पिछले दस वर्षों में हुए परिवर्तनों पर एक उड़ती नज़र डालें तो कुछ ख़ास बातें सामने आती हैं जिनका समाज और साहित्य दोनों के लिए परिवर्तनकारी महत्वा रहा है। जैसे, आर्थिक, राजनीतिक और भाषाई दृष्टियों से एशियाई देशों - ख़ासकर भारत और चीन - का विश्व-शक्तियों के रूप में उभारना। हिन्दी साहित्य और समाज से सम्बंधित ऐसे कुछ सवालों की ओर ध्यान जाता है जो उपरोक्त तीनों विषयों से अलग रख कर नहीं सोचे जा सकते।

यह तथ्य कि हिन्दी इस समय संसार की प्रमुख भाषाओँ में से है, देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों से अनिवार्यतः जुड़ा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे मुख्…

स्वगत : २ : गीत चतुर्वेदी

( हिंदी के युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी ने  कहानी पर अपनी बातें यहाँ एक अलग लहजे में कही हैं. बिना लाग-लपेट के. एक विरल साफगोई और पैनेपन के साथ. परम्परित जार्गन से मुक्त और विमर्श के बेमतलबी होने के खतरे से पूरी तरह बाखबर. आज की हिंदी कहानी के लिए यह शुभ है. लेखक के बही-खाते से एक बार फिर से चीजें निकल रही हैं और उनमें कहानी की तरह ही एक टटकापन है. आश्वस्ति से ज़्यादा विनम्र संदेह. खुद पर और उस पर भी जो कथा के नाम पर पेश्तर दे दिया गया है. अस्तु. स्वगत शीर्षक से यह सबद की दूसरी प्रस्तुति है.  )


संदेह - दृष्टि

बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी…