तीन श्रद्धांजलियाँ
12:13 am

पहले कवि-नाटककार हैरॉल्ड पिंटर, फ़िर चिंतक सैमुएल हंटिंगटन और अब चित्रकार मंजीत बावा के निधन की ख़बर आई है। रचना, विचार और कला की दुनिया को इन तीनों ने अलग-अलग ढंग से आलोकित किया। पिंटर ने कवि-नाटककार से आगे जाकर एक सार्वजनिक बौद्धिक की भूमिका का भी निर्वाह किया। मौजूदा वक्त में पिंटर सरीखे लेखक और जन बौद्धिक की प्रजाति लुप्तप्राय है। पिंटर का हमारे बीच से जाना इस सन्दर्भ में और भी दुखद है।हंटिंगटन को विचार-विमर्श की दुनिया में उनकी पुस्तक , '' The clash of civilizations and the remaking of world order'' की अत्यन्त मौलिक और विचारोत्तेजक स्थापनाओं के लिए याद किया जाता है। हंटिंगटन ने यह पुस्तक उस दौर में लिखी जब यह प्रश्न जिज्ञासा और आशंका के मिले-जुले स्वर में पुछा जा रहा था कि क्या आने वाले समय में सभ्यताओं का संघर्ष वैश्विक राजनीति के केन्द्र में होगा ? अपनी पुस्तक के ज़रिये उन्होंने इस सवाल का जवाब देने के अलावा सभ्यताओं के संघर्ष के बीच वैश्विक शान्ति और सहअस्तित्व कायम रखने के रास्ते भी बताए। कहना न होगा कि हंटिंगटन द्वारा शुरू किए गए विमर्श का दायरा आज कितना बड़ा हो गया है और एक साथ हम सभ्यतागत संकट और उसके नजदीकी संघर्ष से आए दिन कितना अधिक दो-चार हो रहे हैं। हंटिंगटन की तरह हमें भी तेजी से बदल रही दुनिया में इन सवालों का जवाब ढूंढते रहना होगा।
मनजीत बावा को उचित ही कई लोग भारतीय चित्रकला में हुसेन, रामकुमार और रजा की पीढ़ी के बाद के चंद विलक्षण चित्रकारों में से एक मानते हैं। रामचंद्रन की तरह उनके यहाँ भी मिथकों का एक गहन चित्रान्वेषण मिलता है। मनजीत ने अपने जीवन के आखिरी तीन वर्ष कोमा में गुजारे।
कुंवर नारायण पर असद ज़ैदी
1:11 pm
'ईमान का खाता' : कुंवर नारायण और उनकी कविताकुंवर नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा है जिसने बहुत ज़माना देखा है। वह अपने तजरुबे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते हैं और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहते हैं। काव्यशास्त्रीय नज़र से देखेंतो कह सकते हैं उनके लहजे ही में सब कुछ है। उनको पढ़ते हुए लगता है किउनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता है--यही उनकी तर्ज़ है। बुफ़ों के शब्दों में : 'द स्टाइल इज़ द मैन'।
ऐसा किफ़ायत-शुआर कवि जब कहता है 'अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा' तो यह एक बहुत बड़ा वक्तव्य बन जाता है, एक साथ विश्वसनीय और लगभग पौराणिक। कुंवर नारायण का हुनर यही है : उन्हें मालूम है कि उनकी सामर्थ्य का बिन्दु कब और कहाँ आ रहा है। उन्हें उसे पाने के लिए ज़ोरआज़माईश नहीं करनी पड़ती। जब वह कहते हैं कि 'इन गलियों से / बेदाग़ गुजर जाता तो अच्छा था' तो पिछले बीस तीस साल का भारतीय इतिहास ही नहीं, साराका सारा भारतीय दुखांत आंखों के सामने घूम जाता है। इन दो पंक्तियों में क्या नहीं है ? कुंवर जी के काव्य में दर्दमंदी तो है ही, 'अपने ही सिरहाने बैठकर' अपने को देखने की बेदर्द कोशिश भी है।
उनकी कविता में कई ज़बानों, कई वक़्तों, और कई साहित्यिक संस्कृतियों का संगम है। उन्हें पढ़ते हुए अक्सर कवाफ़िस और लुई बोर्खेस की याद आती है जो उन्हीं जैसे गुणग्राहक और पारखी कवि थे। और उनकी दिलचस्पियों का घेरा भी काफ़ी बड़ा है : इतिहास, पुरातत्व, सिनेमा, संगीत, कला, क्लासिकल साहित्य, आधुनिक विचार, समकालीन विश्व साहित्य, संस्कृति विमर्श। उर्दू की क्लासिकी कविता तो उनकी प्रेरणा का स्रोत रही ही है।
इन सब चीज़ों पर और बहुत सी बातों पर सोचते हुए जिस एकमात्र हिन्दी कवि की बार-बार याद आती है वह हैं उनके पुराने साथी रघुवीर सहाय, जिन्हें गए अब क़रीब बीस साल हो जाएँगे। दोनों एक ही परम्परा के जुड़वां वारिस हैं, दोनों की अपनी-अपनी ज़मीन है--कुंवर नारायण का इलाक़ा ज़्यादा बड़ा है, उनके यहाँ ज़्यादा चीज़ें, ज़्यादा आवाज़ें, ज़्यादा भाषाएँ और ज़्यादा स्वीकार है। वह कम मध्यवर्गीय और कम परेशान हैं। पर न सिर्फ़ उनके काम एक-दूसरे के पूरक हैं, बल्कि दोनों की खामोशियाँ और नाराज़ियाँ एक ही तरह की हैं। अपनी चुप्पी और फ़िक्रमन्दी में वे बिल्कुल एक हैं। दोनों के शाइर नासिख़ नहीं ग़ालिब ठहरते हैं, और दोनों अनीस से ज़्यादा मीर की महफ़िल में दिखाई देते हैं। उर्दू में जिसे 'देहलवियत' कहा जाता है, हिन्दी कविता में वह चीज़ और वह तर्ज़ लखनऊ के इन दो हिन्दी कवियों में पाई जाती है। वह शोखी से बचते हैं पर अपनी ज़राफ़त दिखाते हुए कहते हैं : 'लगता है कोई भीषण दुर्व्यवस्था / हमारी रक्षा कर रही।'
ज्ञानपीठ पुरस्कार ने भी, जो बीच बीच में बुरी तरह लड़खड़ा जाता है, कुंवर नारायण के बहाने कुछ विश्वसनीयता और प्रासंगिकता वापस पाई है।
सिगरेट छोड़ने के बहाने : ओरहन पामुक
11:37 am
लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैंओरहन पामुक
मुझे सिगरेट छोड़े हुए २७२ दिन हो गए। अब आदत हो गई है। मेरा तनाव कम हो गया है और मुझे अब ऐसा नहीं लगता कि मेरे शरीर का कोई हिस्सा टूट रहा है। पर ऐसा असल में है नहीं । सचाई यह है कि एक अभाव की भावना से मैं अब तक नहीं छूटा हूँ। मैं इस सोच की ज़द में रहा कि मुझे मेरे स्व से अलग कर दिया गया है। और ज्यादा सही यह कहना होगा कि अब मुझे ऐसे जीने की आदत हो गई है। निष्ठुर सत्य को मैंने स्वीकार कर लिया है।
अब मैं फिर कभी सिगरेट पीऊंगा। कभी नहीं।
ऐसा कहते हुए भी मैं दिवास्वप्न देखता हूँ कि मैं सिगरेट पी रहा हूँ। अगर मैं कहूँ कि ये दिवास्वप्न इतने भयानक और गोपनीय हैं कि उन्हें हम अपने आपसे भी छिपाते हैं... समझते हैं ? वैसे भी, यह बात ऐसे ही एक दिवास्वप्न के दौरान होगी और उस क्षण जो भी खिचड़ी मैं पका रहा होऊँगा, जैसे-जैसे मैं इस फिल्म यानी कि अपने सपने को शिखर तक जाता देखता हूँ, मुझे उतनी ही खुशी मिलती है जितनी कि पीने के लिए एक सिगरेट जलाने से मिलती है।
तो सुख-दुख, आकांक्षा और हार, उदासी और उल्लास, वर्त्तमान-भविष्य के अनुभव को धीमा कर देना और हर दो तस्वीरों के बीच नई राहें और नए शार्टकट ढूँढना; मेरे जीवन में सिगरेटों का यही मुख्य उद्देश्य था। जब ये संभावनाएँ नहीं रहतीं, आदमी खुद को नंगा जैसा महसूस करने लगता है। कमज़ोर और असहाय।
एक बार मैं एक टैक्सी में बैठा, ड्राइवर एक के बाद एक सिगरेट पी रहा था। गाड़ी के अंदर गहरा धुआँ भरा हुआ था। मैं साँस के साथ धुआँ अंदर खींचने लगा।
'माफ कीजिएगा' उसने कहा। वह खिड़की खोलने लगा था।
'नहीं,नहीं, 'मैंने कहा, 'बंद रखो। मैंने सिगरेट छोड़ दिया है।'
मैं देर तक बिना सिगरेट की चाहत के जी सकता हूँ, पर जब पीने को जी चाहता है तो यह चाहत अंदर गहरे कहीं से आती है।
फिर मुझे अपना भूला हुआ आपा याद आता है, जो दवाओं, जोड़तोड़ और स्वास्थ्य की चेतावनियों से बँधा हुआ स्व है। मैं वह वापस बनना चाहता हूँ, वह ओरहान जो मैं कभी था, सिगरेट पीने वाला, जो शैतान का सामना करने में कहीं ज्यादा काबिल था।
पुराने ओरहन के बारे में सोचते हुए सवाल यह नहीं उठता कि मैं तुरंत सिगरेट जलाऊँ। पुराने दिनों की वह रासायनिक जुगुप्सा अब नहीं होती, बस अपना पुराना आपा बहुत याद आता है, जैसे कि कोई खोया दोस्त या चेहरा याद आए। बस यही मन होता है कि मैं वापस वह बन सकूँ जो कि मैं कभी था। ऐसा महसूस होता है कि मुझे ऐसे कपड़े पहना दिए गए हैं, जिन्हें मैंने नहीं चुना। जैसे कि उन्हें पहनकर मैं ऐसा कुछ बन गया हूँ जो मैं कभी नहीं था। अगर मैं फिर सिगरेट पी सकूँ तो मुझे फिर पहले जैसे रातों के तीखे अहसास होंगे, उस व्यक्ति के आतंक वापस आ जाएँगे, जो कि मैं खुद को मानता था ।
जब मैं अपने पुराने ओरहन तक लौटना चाहता हूँ, मुझे याद आता है कि उन दिनों मुझे शाश्वत जीवन की बेतरतीब सूचनाएँ आती थीं। उन पुराने दिनों में, जब मैं सिगरेट पीता था, वक्त रुक जाता था। मुझे कभी ऐसा चरम सुख मिलता या कभी इतनी तीव्र पीड़ा होती कि मुझे लगता कहीं कुछ बदलेगा नहीं। मैं मजे से सिगरेट के कश लेता और दुनिया अपनी जगह खड़ी होती।
फिर मुझे मौत से डर होने लगा। कागज़ात में यह गहराई से समझाया हुआ था कि सिगरेट पीता वह आदमी कभी भी गिर कर मर सकता है। ज़िंदा रहने के लिए मुझे धुएँ के नशेड़ी को छोड़ना पड़ा और मैं कुछ और बन गया। ऐसा करने में मैं सफल हुआ। अब मेरा त्यागा हुआ स्व शैतान से जा मिला है और मुझे वापस उन दिनों में लौटने को कहता है जब वक्त हमेशा के लिए रुका हुआ था और कोई मरता नहीं था।
उसकी पुकार से मैं डरता नहीं हूँ।
क्योंकि जैसे कि आप देख सकते हैं, लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं।
*****
( पामुक किसी परिचय के मुहताज नहीं। २००६ में नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए तुर्की के इस पहले साहित्यकार की कथाकृतियों से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। ऊपर पामुक की कथेतर गद्य के चयन ''अदर कलर्स'' से एक अंश दिया गया है। इसका अनुवाद हमारे आग्रह पर कवि-लेखक लाल्टू ने किया है। हम इसके लिए उनके अत्यंत आभारी हैं। हिन्दी के वाक्य-विन्यास आदि को ध्यान में रख कर गद्य के इस टुकड़े में अनुवाद से पुनरीक्षण तक आंशिक बदलाव किए गए हैं। हम आगे भी इस तरह के अनुवाद प्रकाशित करेंगे। )
किस तरह से लिखूं मैं / निवेदिता / कि लगे/ तुम / हो ?
6:59 pm
( वक्त-वक्त पर सबद में नए कविओं को वरिष्ट कवि-लेखकों के समान ही महत्व देकर प्रकाशित किया जाता रहा है। उसी कड़ी में इस बार विपिन कुमार शर्मा की कविताएं दी जा रही हैं। विपिन की कविताएं यों पत्र-पत्रिकाओं में आती रही हैं और वे इतने भी अजाने और नए नहीं हैं कि उनकी कवि-पत्री बांची जाए। पर यह ज़रूर है कि जैसा उनकी कविताओं से किसी काव्य-मुद्रा के असर में न होकर लिखने का पता चलता है, उसी तरह व्यवहार में कवियशःप्रार्थी न होने की वजह से वे अलक्षित होते रहे हैं। ऐसे कई युवा और महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी किसी दरबार में हाजिरी नहीं है और वे अपनी कविताओं के बूते सुधि पाठकों की निगाह में बने हुए हैं। सबद इन कवि-लेखकों का सच्चा सखा बनने की आकांक्षा रखता है। विपिन ने अपनी जो कविताएं दी थीं उनमें से चार कहीं भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं, जबकि पांचवीं कविता पूर्व प्रकाशित है। )नई कविताएं
सुकवि की मुश्किल
बहुत तड़पकर हाथ मलता है कवि
जब उसे पता चलता है
कल रात
साड़ी दुनिया का प्रेम ओढ़कर
जब वह लिख रहा था प्रेम कविता
ठीक उसी वक्त
पड़ोस की एक लड़की
उसको मदद के लिए पुकार रही थी
किया जा रहा था उसका बलात्कार
लगभग उसी समय
चंद रुपयों के लिए
दबाया जा रहा था गला
एक वृद्ध का
जो परदेस में पसीना बहा रहे
दो मजदूरों का पिता था
और भी जाने कितनी बुरी खबरें लेकर
आया था वह दिन
कवि सोचता है
अगर उस रात
उसने नहीं लिखी होती कविता
तो सुन सकता था वह इन सबकी गुहार
और कुछ न कुछ करता ज़रूर
शर्मसार हो जाता है वह
और चाहता है फाड़कर फ़ेंक दे उस कविता को
फिर कुछ सोचकर रह जाता है
कल रात
कुछ प्रेमी ज़रूर ही लिख रहे होंगे
प्रेम-पत्र
और कुछ प्रेमी रोते रहे होंगे
पूरी रात
इबादत की मुद्रा में
उन सब तक पहुंचानी होगी यह कविता
जीवन जहाँ से बच सके
बचाना होगा
इन दुखों से
पार तो पाना होगा
****
पाषाण युग
सुनते हैं
सभ्यता के विकास-क्रम में
जब आग की खोज अधूरी थी
तो मनुष्य
कच्चा ही चबा जाता था जानवरों को
( इंसानों को नहीं )
फिर जानवर कम होने लगे
इंसानों में बढोतरी होने लगी
फिर भी खाने की समस्या नहीं थी
खाने की चीजें इफरात में थीं
लेकिन
आग नहीं थी
फिर लोगों ने एक अद्भुत तरकीब निकाली
( यह चकमक पत्थर से पहले की बात है )
वे आपस में ही टक्कर मारने लगे
उनके टकराने से
कभी-कभी चिनगारी भी निकल आती
जिससे वे जला लेते आग
उसमें भून लेते खाने को कुछ
इससे खाने की समस्या भी कम हुई
और इंसान भी कम होने लगे
हालाँकि
यह चकमक पत्थर से पहले की बात है
तब मनुष्य
आज की तरह सभ्य नहीं था।
****
किताब के बहाने से : एक
तुमने पढ़कर लौटा दी किताब
आज मेरे पास काम ही काम है
पहले हरेक पृष्ठ
फिर परिच्छेद
और अब एक-एक शब्द को
टटोल रहा हूँ
कहाँ छुपी हुई हो तुम
कहीं से तो निकलो
हरेक शब्द को स्नेह से छूता हूँ, पर
कहीं नहीं मिलती तुम्हारी
कैसी भी पहचान
हारकर, बेसहारा-सा
किताब से आँखें ढँक कर
रो रहा हूँ...
आख़िर कहीं तो मिलोगी तुम !
****
किताब के बहाने से : दो
मैंने कहा ,
'' कितना कुछ है इस कहानी में
अजब-सा प्रेम और आवेग !''
तुमने कहा,
'' ऐसा तो कुछ भी नहीं
निरी भावुकता !''
मैं ऊपर-ऊपर हंस देता हूँ -
'' यों ही कहा था मैंने
तुमने सच कहा
ऐसा तो बिल्कुल नहीं है
इस कहानी में।''
तुम भी खुलकर मिला देती हो
मेरी हँसी में
अपनी हँसी
मगर इतनी-सी बात पर
छलक आए हैं मेरे आंसू
रोना
क्या अकेले ही होगा ?
****
पुराना चावल
किस तरह से
मूल्य बन चुका है
अविश्वास
इस युग का !
कुछ भी विश्वसनीय नहीं
न शब्द
न अर्थ
न भाषा
न लिपि
मैं कैसे लिखूं ''प्यार''
कि उसका अर्थ
घृणा न हो
द्वेष न हो
छल न हो
केवल प्यार हो ?
किस तरह से लिखूं मैं
निवेदिता
कि लगे
तुम
हो ?
****
कवि कह गया है : १ : संजय कुंदन
12:28 pmहिंदी कविता के बारे में दो परस्पर विरोधी बातें कही जा रही हैं। एक तो यह कि अब काव्य परिदृश्य में ऐसा कुछ खास नजर नहीं आ रहा जो ध्यान खींचता हो, युवा कवियों ने ऐसा कुछ नया नहीं जोड़ा जिसे रेखांकित किया जा सके। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग बेहद आश्वस्त होकर यहां तक कहते हैं कि यह कविता का स्वर्ण युग है। इतने सारे कवि लिख रहे हैं, यही क्या कम है। एक कवि इन दो तरह के वक्तव्यों को किस रूप में ले ? या उसे इन पर ध्यान देने की कोई जरूरत है भी कि नहीं ?
एक बार एक वरिष्ठ कवि ने मुझसे कहा था कि हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हमारे पाठक हैं या नहीं। तब मुझे यह सवाल बहुत दिनों तक परेशान करता रहा था कि क्या कवि अपनी एक स्वायत्त दुनिया में बंद होकर चुपचाप कविता लिखता रहे, किसी गुह्य या रहस्यमय साधना की तरह ? क्या हमें उनकी अपेक्षाओं और शंकाओं से मुंह फेर कर बैठ जाना चाहिए, जिनके लिए हम लिखने का दावा करते हैं ? क्या हमें उनसे यह कहना चाहिए कि मैं जो लिख रहा हूं लिखता रहूंगा तुम्हें समझना है तो समझो वरना भाड़ में जाओ। हमें तुम्हारी परवाह नहीं।
क्या कवि इस बात की चिंता बिलकुल न करे कि वह जो लिख रहा है, उसका आखिरकार क्या होने वाला है ? या वह काव्य परिदृश्य में अपनी भूमिका और कविता की स्थिति या भविष्य पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करे ? कविता की सार्थकता और कवि के सरोकार का मामला मुझे रह-रहकर परेशान करता है। यह सवाल हर बार नए रूप में सामने आ खड़ा होता है। मेरे कई साहित्यिक मित्र (जो नियमित-अनियमित रूप से कविता पढ़ते हैं ) यह शिकायत करते रहते हैं कि आज की कविता बिलकुल एक जैसी लगती है। सभी कवि एक तरह से लिख रहे हैं। मैं पहले इसे उनका साहित्यिक अज्ञान मान कर खारिज कर देता था लेकिन अब इसे गंभीरता से लेता हूं और खुद को कठघरे में खड़ा पाता हूं। मेरे उन मित्रों की आपत्ति पूरी तरह सही न भी हो, तो भी हिंदी कविता की वर्तमान भाषा या उसके ढांचे को लेकर गंभीर बहस की गुंजाइश जरूर है।
सच कहा जाए तो हिंदी कविता कहीं न कहीं ठहराव का शिकार होती जा रही है। पिछले दो दशकों में इसकी भाषा में, कहने के अंदाज में कोई अहम बदलाव नहीं आया है। इस अवधि में मोटे तौर पर दो तरह की भाषा प्रचलित रही है। एक तो केदारनाथ सिंह की भाषा, जो कुछ हद तक अपनी संरचना में प्रगीतात्मक लगती है और दूसरी रघुवीर सहाय की नाटकीय भाषा जो गद्य के बेहद करीब है। इन दोनों के बाद उभरे ज्यादातर कवियों ने इन्हीं दो भाषा रूपों को अपनाया। किसी के ऊपर एक का ज्यादा प्रभाव है तो किसी में इन दोनों का मिला-जुला रूप दिखता है। इन दोनों से हटकर एकदम अलग तरह से लिखने का कोई महत्वपूर्ण प्रयास अब तक सामने नहीं आया है। शायद इसीलिए आज की कविता के बारे में कहा जाने लगा है कि हरेक कविता एक ही कवि की लिखी हुई प्रतीत होती है।
गद्य में निहित काव्यात्मक संभावना को विष्णु खरे ने एक उत्कर्ष पर पहुंचाया है। आज कई कवि उसका अनुसरण कर रहे हैं। उसी तरह केदारनाथ सिंह ने अपने भाषा-शिल्प को क्लाइमेक्स पर पहुंचा दिया है। कई युवा कवियों में उसका दोहराव ऊब पैदा करता है। जब भाषा का कोई चौखटा बन जाए तो उनमें कई नए विषयों, संवेदनाओं और अनुभवों के प्रवेश की गुंजाइश कम हो जाती है। शायद इसलिए हिंदी कविता में विषयों-प्रसंगों का भी दोहराव हो रहा है। हालांकि इसकी एकमात्र वजह यही नहीं हो सकती। यह कवियों के अनुभव संसार की सीमा या उनकी वर्गगत सीमा हो सकती है, जिस पर अलग से बहस की जरूरत है।
क्या ऐसा नहीं लगता कि आज काव्यभाषा को एक बड़े झटके की जरूरत है ताकि कविता के लिए कुछ नए रास्ते खुलें, उसका एक नया तेवर, नया मिजाज सामने आए ? लेकिन यह बदलाव क्या होगा, कैसा होगा इस बारे में किसी तरह का अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके बारे में कोई बना-बनाया सिद्धांत भी नहीं है।
कई बार नए रास्ते की तलाश के लिए पीछे मुड़कर देखना होता है। अक्सर भाषा-शिल्प का रिवाइवल भी होता है। मुमकिन है हर कवि अपने स्तर पर इस सवाल से जूझ रहा हो और अपने तरीके से हाथ-पैर भी मार रहा हो। लेकिन यह कुल मिलाकर एक जोखिम है जिसे स्वीकार करना आसान भी नहीं है। सच कहा जाए तो कवियों में इससे बचने की प्रवृत्ति ज्यादा रही है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आम तौर पर भाषा संबंधी प्रयोग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। इसकी एक वजह यह है कि हिंदी में एक खास तरह का सौंदर्यशास्त्र हावी है। उसी के तहत लिखने वालों को प्रोत्साहन-पुरस्कार आदि मिलता है। एक युवा कवि एकदम नए रास्ते अपनाकर गुमनाम होने की बजाय प्रचलित काव्यरूढि़ का दामन थामकर तुरंत-फुरंत कवि होने का तमगा हासिल कर लेना बेहतर समझता है।
असल दिक्कत यह है कि कविता के संसार में पाठक की दखल कम से कम है। कवि को पहचान वरिष्ठ कवियों या आलोचकों से मिलती है न कि पाठकों से। अब यहां यह सवाल सामने आता है कि क्या हिंदी कविता की नियति एक छोटे से क्लब में सीमित हो जाने में है या उसका हिंदीभाषी जनता से भी कुछ लेना-देना है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह समय ही कविता के ड्राइंग रूम में बंद हो जाने का है ? फिर हम उस काव्य परंपरा का क्या करें जो हमें नागार्जुन-त्रिलोचन जैसे कवियों से मिली है ?
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( संजय कुंदन जाने-माने कवि-कथाकार हैं। उनके दो कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। कविता के लिए उन्हें वर्ष १९९८ का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल सम्मान मिल चुका है। सबद में संजय जी का लिखना लंबे अरसे से टल रहा था। पर जब उन्होंने अपना यह पर्चा लिख कर दिया तो लगा इस देरी की एक तरह से भरपाई हुई। उन्होंने अपने पर्चे में जोखिम लेकर कुछ बहुत ज़रूरी सवाल उठाये हैं। ऐसे सवालों का सामना न करने में ही कई बार हम अपनी सुरक्षा महसूसते हैं और गर सामना करना ही पड़े तो अक्सर किसी बौद्धिक तैयारी के बगैर पिष्टपेषण करते हैं। )
