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सबद विशेष : ५ : के. सच्चिदानंदन की कविताएं

11:23 am

एक ही भाषा नहीं


व्योमेश शुक्ल

मलयाली कवि के. सच्चिदानंदन समसामयिक हिंदी कविता के अनूठे दोस्त हैं। उनकी कविता की अंतर्वस्तु, प्रतिक्रिया करने की पद्धतियाँ, मुख्यधारा की राजनीति के पतन का हिस्सा बन जाने को लालायित वामपंथी भटकन के प्रति उनकी चिढ़, और फिर भी मार्क्सवाद को एकमात्र विकल्प मानने की अक्सर अदृश्य और कभी-कभी ज़ाहिर ज़िम्मेदारी उनके साथ आज की हिंदी कविता के रिश्ते को एक आदर्श तनाव में स्थापित कर देती है। हालाँकि, इसके अलावा आप मलयाली जीवन-संस्कृति की अनेक खुश और उदास, बेबस और प्रचंड , अतिसाधारण और असामान्य फिल्में भी उनके यहाँ देख सकते हैं। इस कविता में स्मृतियों, जगहों , लोगों प्रकृति और लगावों का ऐसा वैभव मुमकिन हुआ है जिसमें डूबकर मुग्ध, विस्मृत या आत्महीन नहीं हुआ जा सकता। सच्चिदानंदन की कविता कभी भी ऐसी सहूलियत ख़ुद को या अपने पाठकों को नहीं देती।

उनकी कविताएं सरलता लगभग हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं और एक आश्चर्यजनक उमंग के साथ मिथकों, पुराकथाओं, मनुष्येतर प्रकृति के उपेक्षित नायकों के शरीर और आत्मा में दाख़िल होकर वहीं से कुछ उनकी, कुछ अपनी बातें कहने लगती हैं। उनके उदबोधनों का यह स्थाई नैसर्गिक मंच है। यहीं से वह सभ्यता और जिंदगी को सेलिब्रेट करते हैं, पतनशील राज्य की भर्त्सना करते हैं और ज़रूरत होने पर नंदीग्राम के हत्यारों तक को बेनकाब कर डालते हैं।

साहित्य
संसार के कुछेक मूर्धन्यों के मन में जब इसी बात पर भ्रम और संशय है कि सिंगूर और नंदीग्राम के असल खलनायक कौन हैं; और वे वंचित मनुष्यता के हक़ के लिए किसी भी हद तक जाकर प्रतिकार करने वाली महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर जैसी शख्सियत पर शक करने के प्रस्ताव कर रहे हैं, सच्चिदानंदन की खुली, साफ, निर्भ्रान्त और उत्तेजित पक्षधरता हमें बहुत दूर तक राहत पहुँचाती है। ऐसी कविताएं पाठक को अपने गांव-कस्बे, अपने जनपद अपनी दुनिया का नागरिक बना लेती हैं और भूमंडल को जगह आईने में देखने की पेशकश करती हैं। सच्चिदानंदन की कविताएं पढ़ते हुए यह तथ्य भी एक विलक्षण बोध से आपको संपन्न करता हुआ सामने आता है कि लौकिक रूप से इतर भाषा में लिखी जाकर भी यह हमारी समस्याओं, हमारे समाधानों की कविता है और किसी भी तकलीफ की एक ही भाषा नहीं होती।

कविताएं

शाकुंतलम

हर प्रेमी अभिषप्त है
भूल जाने को, कम से कम कुछ देर के लिए
अपनी स्त्री को : जैसे विस्मरण की नदी
अपने ही प्यार पर बाढ़ ला दे

हर प्रेमिका अभिशप्त है
तब तक भुला दिए जाने को जब तक उसका रहस्य
स्मृति के जाल में फँस नहीं जाता

प्रत्येक शिशु अभिशप्त है
पितृहीन बड़ा होने को
शेर के मुँह में अपना हाथ डालकर
****
हिन्दू

मैं एक श्रेष्ट हिन्दू हूँ
मैं कुछ नहीं जानता
कोणार्क या खजुराहो के बारे में
मैंने कामसूत्र को छुआ तक नहीं है
मैं उल्टी करने लगूंगा अगर दुर्गा या सरस्वती को
नग्न देख लूँ हमारे देवी देवता कामहीन हैं
जो कुछ भी उनका था
हमने चढ़ा दिया काशी और कामाख्या पर
कबीर के राम को हमने कैद कर लिया
अयोध्या में, और गाँधी के राम को,
उनके अपने जन्मस्थल पर ज़िंदा जला दिया
भगवा ध्वज से अपनी आत्मा को बदल डालने के बाद
हरेक भिन्न रंग मुझे पागल कर देता है
निकर के नीचे मेरे पास....एक चाकू है
औरतों के सिर चूमने के लिए नहीं
काट डालने के लिए होते हैं
****
राष्ट्र

राष्ट्र
ने मुझसे कहा
तुम मेरे ऋणी हो
हवा के लिए जिसमें तुम साँस लेते हो
पानी के लिए जो तुम पीते हो
खाने की रोटी के लिए
चलने-फिरने की सड़क के लिए
बैठने की ज़मीन के लिए

मैंने
राष्ट्र पूछा
तब जवाब कौन देगा ?
मेरी माँ को जिनका गला घोंट दिया गया
मेरी बहन को जिसने ज़हर पी लिया
दादी को जो भीख माँगती भटकती रही
मेरे पिता को जो भूख से मर गए
मेरे भाई को जो तुम्हें आज़ाद कराता हुआ जेल चला गया

मैं
किसी खेमे की नहीं हूँ, हवा ने कहा
कोई मेरा मालिक नहीं, पानी ने कहा
मैं ज़मीन से पैदा हुई, रोटी बोली
मैं सीमाओं की परवाह नहीं करती, सड़क ने कहा
घास का कोई दोष नहीं होता, ज़मीन ने कहा

तब
प्यार के साथ
राष्ट्र ने मुझे ऊपर उठा लिया
गोद में और कहा
अब क्या तुम मानते हो कि राष्ट्र सचाई है ?
लहुलुहान गर्दन से गिरता ख़ून ज़मीन पर फैल गया
' राष्ट्र की जय हो '
****
नन्दी

वे आए
सुनिश्चित चाल और लाल झंडों के साथ
हमारे अपने अपने कॉमरेड
उन्होंने हमें दी ज़मीन, पानी, बादल, आत्मवत्ता

वे फिर आए
काली बंदूकों और डगमगाते क़दमों के साथ
हमारे अपने शत्रु
उन्होंने छीन ली हमसे हमारी
ज़मीन, पानी, बादल, आत्मवत्ता

झंडे यों भी लाल कर दिए जाते हैं
हँसिया स्वस्तिक में बदल जाती है
हथौड़ा भी वहां करने लग सकता है खूनी पंजों को
सितारा दूसरे झंडों पर भी सवार हो सकता है

लेनिन-लेनिन का उद्घोष
सलीम-सलीम के जयकारे में परिणत हो सकता है
उक्रेन, प्राग, ब्रातिसलेवियारूमानिया
रूमानिया, कम्पूचिया, अल्बानिया
उन बड़ी मूंछों की बाढ़
अभी तक थमी नहीं है
****
पेड़

कोई कभी कह नहीं सकता
कि कब पेड़ चलना शुरू कर देंगे
और कहाँ के लिए
उनके पैर खास तत्पर हैं और
उनके हाथ झूम ही रहे हैं
उन्हें याद हैं
वे जगहें जो उन्होंने छोड़ीं
और मालूम है पता वहां का
जहाँ पहुँचाना है

चिडियाएँ चढ़ती-उतरती भर
नहीं हैं पेड़ों पर
पेड़ उन्हें अपनी शाखों
के इशारे से बुलाते हैं
और उन्हें उनके नामों से पुकारते हैं
पेड़ों के ऊपर लगा फलों का मेला
उन्हें निमंत्रित करना बंद कर देता है
तब भी कुछ कृतज्ञ पक्षी
ढांपे रहते हैं उन्हें
सर्दियों में गर्म रखने के लिए
पेड़ न अस्तित्ववादी हैं
न आधुनिकतावादी
फिर भी उनके पास विचार तो हैं
ये वो बात है जिसे हम कलियों के तौर पर देखते हैं
उन्क्की कामनाएं फूल हो जाती हैं
जितनी दूर तक उनके पास वसंत कि याद है
वे बुढ़ापे कि शिकायत नहीं करते
जब स्मृति का अवसान होने लगता है
वे छोड़ देते हैं दुनिया
अपनी पत्तियां गिराते हुए

जब मृत्यु आती है
वे चुपके-चुपके झुक जाते हैं आगे की ओर
जैसे वे गिलहरियों के लिए झुकते हैं
जैसे ही वे गिरते हैं वे भेजते हैं
एक अवशेष धरती के जरिये
अपनी अनावृत जड़ों से
एक नवांकुर
अपने बालसुलभ आश्चर्य में धरती को टकटकी लगाकर देखता है
सूर्य उसे आशीष देता है
पक्षी उसकी मंगलकामना में गीत गाते हैं

जन्म की खुशी मनाने के लिए
बिस्मिल्ला खां अपनी शहनाई बजाते हैं
सातवें आसमान से
****
नागफनी

कांटे मेरी भाषा हैं
मैं अपने होने का उद्घोष करता हूँ
एक रक्तिम स्पर्श के साथ

कभी ये कांटे फूल थे
मैं दगाबाज प्रेमियों से नफरत करता हूँ
कविओं ने मरुस्थल से कन्नी काट ली है
बगीचों की ओर लौटने में
सिर्फ यहाँ ऊँट बचे, और व्यापारी
जो रौंद डालते हैं मेरी लाली को धूल में
पानी की हर दुष्प्राप्य बूँद के लिए एक काँटा
मैं तितलियों को नहीं ललचाता
कोई चिड़िया मेरी प्रशंषा में गीत नहीं गाती
मैं अकाल नहीं उपजाता

मैं एक भिन्न सौन्दर्य रच लेता हूँ
चंद्रमा की रोशनी के पार
सपनों की ओर
एक तीखी, भेदक
प्रतिभाषा
****
घोंघा

तुम कहाँ घिरे हुए हो
तुम्हारा घर तुम्हारी पीठ पर
और तुम्हारे नन्हें सींग सतर्क
किस यात्रा के लिए

गीली लकड़ी पर फूल
काई के सफ़ेद आशिक
शिथिल दार्शनिक
मनुष्यों के उन्मत्त संसार की जो खिल्ली उड़ाता है
क्या ये तुम्हारा बाहर है जिसे हम देखते हैं
या तुम्हारा भीतर ?

तुम हमारे लड़ाई-झगड़ों को चुनौती देते हो
और त्वचा के नीचे तक उतर गए हमारे भेदभाव को
तुम जामे रहते हो हमारे दिनों और यादों पर
शुरू से आखिर तक
लेकिन हम
हम प्यार तक हड़बड़ी में करते हैं
हम दुनिया बदलने के लिए भी भागमभाग करते रहते हैं

तुम कहते हो हमसे : समय अंतहीन है
धीमे-धीमे तुम फुसफुसाते हो
तुम्हारी चिपचिपी चेतावनी
चुपचाप आह्वान करती है
उस संसार का जिसे हमने गंवा दिया है
एक पृथ्वी जो धीरे-धीरे चक्कर लगाती है
एक सूर्य जो धीरे-धीरे उगता है
एक चंद्रमा जो धीरे-धीरे पृथ्वी की परिक्रमा करता है
धीरे बारिश
धीरे संगीत
धीरे जीवन
धीरे मृत्यु
****
जब हाथी नहाता है

जब हाथी नहाता है
हम देखते हैं सिर्फ
एक घना अँधेरा पर्दा छाते की तरह और
एक उतुंग सूंड पाइप की तरह

अब मछलियाँ नाचने लगती हैं चारों ओर
उसके पैरों के, घासें
उसकी नाम देह को गुदगुदाती हैं
जंगल अपने शेरों, भेड़ियों
और पक्षियों के साथ अपनी तंग आँखों को तृप्त कर लेता है
उसके पृष्ट पर लगी हुई धूल
तांबें में सने सोने की तरह चमकती है
कीचड़प्लावित तालाब लहराने लगता है
एक जंगली सोते की तरह

जब हाथी नहाता है
हमारे त्योहार
व्याकुल कर देने की हद तक
तुच्छ दिखाई देते हैं...साजोसामान
से प्रसन्न नहीं होता हाथी
आप उसे रोते देख सकते हैं
पर्वों की शोभायात्राओं में
हाथियों और मनुष्यों की नियति पर विलाप करते हुए

जब हाथी नहाता है
गर्मी उस सूँड में से होती हुई गम हो जाती है
और मानसून आ जाता है
वन्य चांदनी उन आखों में
समा जाती है
पानी गाता है हिंडोल
तालाब में उसके एक डबाक पर
समग्र जंगल की खुशबू
एक फूल में
लोगों को दीवाना कर देती है
प्यार बंदिशें तोड़ देता है खुद की
आज़ादी बिगुल बजाती है
और अक्षर उसकी सूंडों को उठा देते हैं ऊपर
वसंत के स्वागत में।
****

( प्रख्यात मलयाली कवि सच्चिदानंदन ने हमारे विशेष आग्रह पर अपनी मलयाली कविताओं का स्वयम अंग्रेजी में अनुवाद करके भेजा था। इसके आधार पर ही युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने इन्हें अनूदित किया है। व्योमेश के हेराल्ड पिंटर के अनुवाद को लोगों ने पहले भी पसंद किया है। हम इन दोनों कविओं के सहयोग के लिए आभारी हैं। )

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डायरी : २ : कृष्ण बलदेव वैद

7:05 pm

( कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के कथा परिदृश्य में अपनी विरल उपस्थिति के कारण जाने जाते हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ उन्हीं अर्थों में कथा कृतियाँ नहीं हैं जिनकी चिर-परिचित छवि हमारे मन में परम्परित कथाकृतियों को पढ़ कर बनी है। वैद ने अपने फॉर्म और कंटेंट को लेकर लगातार प्रयोग किया है और अब भी उनमें प्रयोगशीलता और जोखिम उठाने का माद्दा कम नहीं पड़ा है। कहना न होगा कि हिन्दी में अपनी इस प्रयोगवृत्ति के कारण उन्हें लेकर एक नासमझी का भी माहौल बना है जो प्रकारांतर से उसकी क्षीण पड़ती आलोचनात्मक मेधा का ही परिचायक है। हालाँकि वैद और उनके जैसे लेखकों की अब तो एक बड़ी जमात ही है, पर वैचारिक असहमतियों आदि का बहाना बना लोग अब भी ऐसे लेखकों की कृतियों पर विचारने-बतियाने से कतराते हैं। होना यह चाहिए कि इस ओर एक सच्चा और निर्भीक आलोचनात्मक उद्यम के लिए हम एक माहौल बनाएं। इसके लिए यह आवश्यक है कि अवसर और औचित्य की चिंता किए बगैर इस करुण तथ्य की ओर इशारा किया जाए। यहाँ भी यही करने की मंशा है।
आगे आप वैद साहब की तीसरी डायरी, '' डुबोया मुझको होने ने '' के अंश पढ़ेंगे जिसे ज्ञानपीठ ने हाल ही में प्रकाशित किया है। इससे पहले सबद पर उनकी पिछली डायारियों के बारे में आप पढ़ चुके हैं। इस बार उनसे और प्रकाशक की इजाज़त से हमने उसके एक महत्वपूर्ण अंश को छापने का निर्णय लिया है। यह अंश जितना वैद के अंदाजे-बयां से तार्रुफ कराता है उतनी ही शिद्दत से मूर्धन्य भारतीय चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन से अपने लगावों और उनके बहुरंगी व्यक्तित्व के बारे में भी बताता है। दी गई चित्र कृति स्वामी की ही है। सबद पर इससे पूर्व आप कवि मंगलेश डबराल की डायरी भी पढ़ चुके हैं।



आज सुबह (२५.४.९४ ) स्वामीनाथन चल बसा। अचानक।

हम पाली और आशा के साथ नाश्ता कर रहे थे और उसके समधियों के घर जाने को तैयार बैठे थे कि अशोक का फ़ोन आया कि कुछ ही देर पहले उन्हें खबर मिली कि स्वामी बेहोश हो गया है। मैंने स्वामी के घर फोन किया तो कालीदास ने बताया कि स्वामी बचेगा नहीं। हम उसी वक्त स्वामी के घर को चल दिए। पता नहीं मैंने गाड़ी कैसे चलाई। हमारे वहां पहुँचने से पहले ही स्वामी जा चुका था। जब हम ऊपर पहुंचे तो स्वामी की लाश उस बड़े कमरे में पड़ी हुई थी जिसमें वह काम किया करता था। धोती, दाढ़ी, मुंह खुला, बाल दीवान के सिरे से नीचे लटक रहे थे। मनजीत बावा उसके हाथ पकड़े उसके पास यूँ बैठा था जैसे उसके जाग उठने का इंतज़ार कर रहा हो। मैंने स्वामी को छुआ और छूते ही मैं फूट पड़ा, मनजीत मेरे साथ।

रिश्तेदार और चित्रकार दोस्त आ रहे थे। भिवानी की हालत ख़राब थी। स्वामी की बहनें चुपचाप रो रही थीं। कालिदास और हर्षा इधर-उधर डोल रहे थे। स्वामी सबसे बेखबर और दूर था।

शाम। कुछ ही देर पहले श्मशान घाट से लौटे। जब स्वामी की लाश पर लकडियां रखी जा रही थीं तो रामू मेरे साथ खड़ा था। उसका ग़म बातों में बह रहा था, मेरा खामोशी में। अशोक भी ऐसे अवसरों पर खामोश नहीं रह पाते।

कल रात नींद कई बार टूटी।

स्वामी के चाहने वालों को उसके दोष भी उसके गुण नज़र आते थे -- मसलन उसका न नहाना, उसकी बदपर्हेजियाँ, उसके आत्मालाप, उसका अंहकार। वह बिलाशक एक असाधारण बल्कि विलक्षण शख्स था। डॉक्टरों से वह डरता था। वह अपना डॉक्टर आप था। अपनी नब्ज़ टटोलता रहता था, अपने लिए दवाइयाँ भी खुद ही तजवीज़ करता रहता था। दांत का दर्द हो या दिल का, अपना इलाज वह खुद ही कर लिया करता था। धार्मिक नहीं था, आध्यात्मिक था। उसकी आवाज़ में हरारत और मुस्कराहट में शरारत थी।
एक बचकाना-सी सादगी।

स्वामी एक बहुत बड़ा अभिनेता या नेता भी हो सकता था। लेकिन वह अदंर से एक मस्तमौला, फक्कड़ और एक निहायत मौलिक कलाकार ही था।

उसे अपने परिवार से अथाह प्यार था। बातें करते-करते वह खो जाता था और खोया-खोया सजग हो उठता था।

स्वामी की आँखों की गहराइयों में लोग अक्सर खो जाया करते थे।

पी कर वह पीरोमुरशिद भी हो सकता था और गुस्सैल भेड़िया भी।

उसके घर की बेसरोसामानी में भी एक विलक्षण सलीका था।

गुस्सा और गमगुसारी। अतिभावुकता और अतिसंयत समझ-बूझ। बज़्मआराई और एकान्तप्रियता। लगन और अलगाव। खुदी और बेखुदगी। जलवत और खिलवत।

शामों का शहंशाह। पीरेमुगां। रिन्दाना बांकपन।
अपना मज़ाक उड़ाने की क्षमता। अपनी गलतियों को कबूल कर लेने की क्षमता। बेगर्जी की क्षमता।

शाम। अभी-अभी स्वामी के घर से लौटे हैं। मनजीत वहीं था। कुछ देर बाद अशोक भी आ गए। कालिदास अजीजाना अंदाज़ में मेरे पास बैठा रहा। कल शोक सभा है।

कल शाम त्रिवेणी में स्वामी की याद में हम सब इकट्ठे हुए। हाल भर गया। बोलने वालों में मैं भी था। बाद में हर्षा ने धीमे से मेरे कान में कहा -- आप जो बोले वह सबसे अच्छा था। हॉल से बहार निकलते ही मैं ठोकर खाकर बुरी तरह गिरा। बच गया लेकिन दोनों टांगें छिल गईं। रास्ते में आईआईसी में रुके। जब बाकी लोग चले गए तो रामू बहुत उदास नज़र आया, इसलिए हम कुछ देर उसके साथ बैठे रहे। जब हम चलने लगे तो रामू बोला कि अगर वह हमारे साथ हमारे घर चले तो हमें कोई एतराज़ तो नहीं होगा। हमने पुरतापाक तरीके से उसे साथ ले लिया। वह बंगाली मार्किट वाले अपने कमरे में उस रात अकेला नहीं सोना चाहता था। हम आधी रात घर पहुंचे। स्वामी कि याद में एक-एक जाम और लिया, खाना खाया, स्वामी को याद किया, और दो बजे सोए।
जब मैं बोल रहा था तो मेरी नज़र कृष्णा और अमजद अली खाँ पर बार-बार जा टिकती रही। जब-जब मेरी आवाज़ में उर्दू का रंग आया तब-तब अमजद का सर सराहना में हिला।

अभी-अभी कालिदास से बात हुई। भिवानी के बारे में बात हुई। डॉक्टर उसे वेलियम देना चाह रहा है। कालिदास ने बताया कि स्वामी कोई वसीयत नहीं छोड़ गया है, इसलिए कई कानूनी झमेले उठेंगे। गेलरी वाले भी बेईमानियाँ कर रहे हैं। बैंक में जो पैसा है उसे हाथ नहीं लगाया जा सकता।

स्वामी का मातम कर रहा हूँ इसलिए काम नहीं हो रहा। बार-बार मृत स्वामी कि बंधी हुई दाढ़ी सामने आ जाती है। उसके जबड़ों को बंद करने के लिए उन्हें बांधना पड़ा था। उसके माथे का ठंडा स्पर्श मुझे याद है, और उसके सरहाने बैठी उसकी बहन का झुका हुआ चेहरा। उसके जाने के बाद अब कृष्णा के सिवा मेरा कोई समकालीन दोस्त बाकी नहीं रहा।
****
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सृजन : तुषार धवल की लंबी कविता

1:32 pm
( हिंदी में लंबी कविताओं के लेखन की अत्यंत समृद्ध परंपरा है। उन कविओं की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने कविता के इस विधान को साध कर सार्थक रचनाएं दीं। युवा कवि तुषार धवल की यह सद्यः लिखित कविता उसी सार्थक सृजन की एक कड़ी है जिसमें हम अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं से साक्षात होते हैं। अच्छी बात यह है कि इस विद्रूप अंकन के बाद भी कवि के पास मनुष्यों के लिए जीवनदायनी आस्था बच रहती है और कविता में उसकी पुनर्प्रतिष्ठा इन लंबी कविताओं के ज्ञात इतिहास में भी प्रीतिकर विलोम है। प्रसंगवस जोड़ दूँ की सबद पर यह तुषार की दूसरी लंबी कविता पहलेपहल प्रकाशित हो रही है। )


काला राक्षस

तुषार धवल

समुद्र एक
शून्य अंधकार सा पसरा है।
काले राक्षस के खुले जबड़ों से
झाग उगल-उचक आती है
दबे पाँव घेरता है काल
इस रात में काली पॉलीथिन में बंद आकाश

संशय की स्थितियों में सब हैं
वह चाँद भी
जो जा घुसा है काले राक्षस के मुंह में

काले राक्षस का
काला सम्मोहन
नीम बेहोशी में चल रहे हैं करोड़ों लोग
सम्मोहित मूर्छा में
एक जुलूस चला जा रहा है
किसी शून्य में

कहाँ है आदमी ?

असमय ही जिन्हें मार दिया गया
सड़कों पर
खेतों में
जगमगाती रोशनी के अंधेरों में
हवा में गोलबंद हो
हमारी ओर देखते हैं गर्दन घुमा कर
चिताओं ने समवेत स्वर में क्या कहा था ?

पीडाएं
अपना लोक खुद रचती हैं
आस्थाएँ अपने हन्ता खुद चुनती हैं
अँधेरा अँधेरे को आकार देता है

घर्र घर्र घूमता है पहिया

(२)

काला
राक्षस

वह
खड़ा है जमीन से आकाश के उस पार तक
उसकी देह हवा में घुलती हुई
फेफड़ों में धंसती धूसर उसकी जीभ
नचाता है अंगुलियाँ आकाश की सुराख़ में

वह
संसद में है मल्टीप्लेक्स मॉल में है
बोकारो मुंगेर में है
मेरे टीवी अखबार वोटिंग मशीन में है
वह मेरी भाषा
तुम्हारी आंखों में है
हमारे सहवास में घुलता काला सम्मोहन

काला सम्मोहन काला जादू
केमिकल धुआं उगलता नदी पीता जंगल उजाड़ता
वह खड़ा है जमीन से आकाश उस पार तक अंगुलियाँ नचाता
उसकी काली अंगुली से सबकी डोर बंधी है
देश सरकार विश्व संगठन
सत्ताओं को नचाता
उसका अट्टहास।

काली
पालीथिन में बंद आकाश।

(३)

अट्टहास

फ़िर सन्नाटा।

सम्मोहित मूर्छा में
एक जुलूस चला जा रहा है
किसी शून्य में --
काल में
वह
हमारे मन की खोह में छुप कर बैठा है
जाने कब से

हमारे तलों से रोम छिद्रों से
हमरे डीएनए से उगता है
काला राक्षस
हुंकारता हुआ
नाजी सोवियत व्हाइट हाउस माइक्रोसॉफ्ट पेप्सी दलाल स्ट्रीट
सियाचीन जनपथ आईएसआई ओजोन एसपीएम एसिड रेन
स्किटज़ोफ्रेनिया सुइसाइड रेप क्राइम सनसनी न्यूज़ चैनल

बम विस्फोट !!!

तमाशा
तमाशबीन ध्वंस
मानव मानव मानव
गोश्त गोश्त गोश्त

घर्र घर्र घूमता है पहिया

(४)

घर्र घर्र घूमता है पहिया

गुबार

उठ रही है अंधकार में
पीली-आसमानी
उठ रही है पीड़ा-आस्था भी
गड्डमड्ड आवाजों के बुलबुलों में
फटता फूटता फोड़ा
काल की देह पर
अँधेरा है
और काले सम्मोहन में मूर्छित विश्व

फिर
एक फूँक में
सब व्यापार ...
देह जीवन प्यार
आक्रामक हिंसक
जंगलों में चौपालों में
शहर में बाज़ारों में
मेरी सांसों में
लिप्सित भोग का
काला राक्षस

(५)

एक छाया सा चलता है मेरे साथ
धीरे धीरे और सघन फिर वाचाल
बुदबुदाता है कान में
हड़प कर मेरी देह
जीवित सच सा
प्रति सृष्टि कर मुझे
निकल जाता है
अब मैं अपनी छाया हूँ। वह नहीं जो था।
पुकारता भटकता हूँ
मुझे कोई नहीं पहचानता
मैं किसी को नज़र नहीं आता

उसके हाथों में जादू है
जिसे भी छूता है बदल देता है
बना रहा है प्रति मानव
सबके साथ छाया सा चला है वह

अब कोई किसी को नहीं पहचानता
अब कोई किसी को नज़र नहीं आता

प्रति मानव !
कोई किसी को नज़र नहीं आता

(६)

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
इच्छाएं अनंत असंतोष हिंसक

कहाँ है आदमी ?

उत्तेजित
शोर यह
छूट छिटक कर उड़ी इच्छाओं का
गाता है
हारी हुई नस्लों के पराभूत विजय गीत
खारिज है कवि की आवाज़
यातना की आदमखोर रातों में
एक गीत की उम्मीद लिए फिर भी खड़ा हूँ
ढेव गिनता
पूरब को ताकता

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
खोल दिया सदियों से जकड़े
मेरे पशु को उन्मुक्त भोग की लम्बी रातों की हिंसा में

(७)

बिकता है बिकता है बिकता है
ले लो ले लो ले लो
सस्ता सुंदर और टिकाऊ ईश्वर
जीन डीएनए डिज़ाइनर कलेक्शन से पीढियां ले लो
ले लो ले लो ले लो
बीपीओ में भुस्स रातें
स्कर्ट्स पैंटीज़ कॉन्डोम सब नया है
नशे पर नशा फ्री
सोचना मना है क्योंकि
हमने सब सोच डाला है
ले लो ले लो ले लो
स्मृतियाँ लोक कथाएँ पुराना माल
बदलो नए हैपनिंग इवेंट्स से
तुम्हारी कथाओं को री-सायकल करके लाएंगे
नए हीरो आल्हा-ऊदल नए माइक्रोचिप से भरेंगे
मेड टू आर्डर नया इंसान
ले लो ले लो ले लो
मेरे अदंर बाहर बेचता खरीदता उजाड़ता है
काला राक्षस
प्यास
और प्यास

(८)

इस धमन भट्ठी में
एक सन्नाटे से दूसरे में दाखिल होता हुआ
बुझाता हूँ
देह
अजनबी रातों में परदे का चलन
नोंचता हूँ
गंध के बदन को

यातना की आदमखोर रातों में
लिपटता हूँ तुम्हारी देह से
नाखून से गडा कर तुम्हारे
मांस पर
लिखता हूँ
प्यास
और प्यास...

एड़ियों के बोझ सर पर
और मन दस फाड़
खून पसीना मॉल वीर्य सन रहे हैं
मिट्टी से उग रहे ताबूत


ठौर नहीं छांह नहीं
बस मांगता हूँ
प्यास
और प्यास...


(९)

प्यास
यह अंतहीन सड़कों का अंतर्जाल
खुले पशु के नथुने फड़कते हैं
यह वो जंगल नहीं जिसे हमारे पूर्वज जानते थे
अराजक भोग का दर्शनशास्त्र
और जनश्रुतियों में सब कुछ
एक पर एक फ्री


हँसता है प्यारा गड़रिया
नए पशुओं को हांकता हुआ


(१०)

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
निर्बंध पशु मैं भोग का
नाखून से गडा कर तुम्हारी देह पर
लिखता हूँ
प्यास
और प्यास...

भोग
का अतृप्त पशु
हिंसक ही होगा
बुद्धि के छल से ओढ़ लेगा विचार
बकेगा आस्था
और अपने तेज पंजे धंसा इस
दिमाग की गुद्दियों में --
रक्त पीता नई आज़ादी का दर्शन !


लूट का षड़यंत्र
महीन हिंसा का
दुकानों की पर्चियों में, शिशुओं के खिलौनों में
धर्म और युद्ध की परिभाषा में भात-दाल प्रेम में
हवा में हर तरफ
तेल के कुएं से निकल कर नदी की तरफ बढ़ता हुआ
हवस का अश्वमेध
नर बलि से सिद्ध होता हुआ।


बम विस्फोट !!!

(११)

सबके बिस्तर बंधे हुए
सभी पेड़ जड़ से उखडे हुए
सड़क किनारे कहीं जाने को खड़े हैं
यह इंतज़ार ख़त्म नहीं होता
भीड़ यह इतनी बिखरी हुई कभी नहीं थी


काला सम्मोहन काला जादू
सत्ताओं को नचाता
उसका अट्टहास।
काली पॉलीथिन में बंद आकाश।


(१२)

वो जो नया ईश्वर है वह इतना निर्मम क्यों है ?
उसकी गीतों में हवास क्यों है ?
किस तेजाब से बना है उसका सिक्का ?

उसके हैं बम के कारखाने ढेर सारे
जिसे वह बच्चों की देह में लगाता है
वह जिन्नातों का मालिक है
वह हँसते चेहरों का नाश्ता करता है

हँसता है काला राक्षस मेरे ईश्वर पर
कल जिसे बनाया था
आज फिर बदल गया
उसकी शव यात्रा में लोग नहीं
सिर्फ़ झंडे निकलते हैं

(1३)

सत्ताएं रंगरेज़
वाद सिद्धांत पूँजी आतंक
सारे सियार नीले


उस किनारे अब उपेक्षित देखता है मोहनदास
और लौटने को है
उसके लौटते निशानों पर कुछ दूब सी उग आती है।


(१४)

पीड़ाओं का भूगोल अलग है
लोक अलग
जहाँ पिघल कर फिर मानव ही उगता है
लिए अपनी आस्था।


काला सम्मोहन --

चेर्नोबिल। भोपाल।
कालाहांडी। सोमालिया। विधर्व।
इराक। हिरोशिमा। गुजरात।
नर्मदा। टिहरी।
कितने खेत-किसान
अब पीड़ाओं के मानचित्र पर ये ग़लत पते हैं

पीड़ाओं का रंग भगवा
पीड़ाओं का रंग हरा
अपने अपने झंडे अपनी अपनी पीड़ा।


(१५)

कहाँ है आदमी ?

यह नरमुंडों का देश है
डार्विन की अगली सीढ़ी --
प्रति मानव
सबके चेहरे सपाट
चिंतन की क्षमताएं क्षीण
आखें सम्मोहित मूर्छा में तनी हुई
दौड़ते दौड़ते पैरों में खुर निकल आया है
कहाँ है आदमी ?
प्रति मानव !

(१६)

मैं स्तंभ स्तंभ गिरता हूँ
मैं खंड खंड उठता हूँ


ये दीवारें अदृश्य कारावासों की
आज़ादी ! आज़ादी !! आज़ादी !!!


बम विस्फोट !!!

कहाँ है आदमी ?
प्रति मानव सब चले जा रहे किसी इशारे पर
सम्मोहित मूर्छा में


मैं पहचानता हूँ इन चेहरों को
मुझे याद है इनकी भाषा
मुझे याद है इनकी हँसी इनके माटी सने सपने


कहाँ है आदमी ?

सुनहरे बाइस्कोप में
सेंसेक्स की आत्मरति
सम्भोग के आंकड़े
आंकड़ों का सम्भोग
आंकडों की पीढ़ियों में
कहाँ है आदमी ?

सन्नाटे ध्वनियों के
ध्वनियाँ सन्नाटों की
गूंजती है खुले जबड़ों में

यह सन्नाटा हमारी अपनी ध्वनियों के नहीं होने का
बहरे इस समय में

बहरे इस समय में
मैं ध्वनियों के बीज रोप आया हूँ।


(१७)

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
उगती है पीड़ा
उगती है आस्था भी
जुड़वां बहनों सी
तुम्हारे चाहे बगैर भी


घर्र घर्र घूमता है पहिया

कितना भी कुछ कर लो
आकांक्षाओं में बचा हुआ रह ही जाता है
आदमी।
उसी की आँखों में मैंने देखा है सपना।
तुम्हारी प्रति सृष्टि को रोक रही आस्था
साँसों की
हमने भी जीवन के बेताल पाल रखे हैं

काले राक्षस

सब बदला ज़रूर है
तुम्हारे नक्शे से लेकिन हम फितरतन भटक ही जाते हैं
तुम्हारी सोच में हमने मिला दिया
अपना अपना डार्विन
हमने थोड़ा सुकरात थोड़ा बुद्ध थोड़ा मार्क्स फ्रायड न्यूटन आइन्स्टीन
और ढेर सारा मोहनदास बचा रखा था
तुम्हारी आँखों से चूक गया सब
जीवन का नया दर्शनशास्त्र
तुम नहीं
मेरी पीढियां तय करेंगी
अपनी नज़र से

यह द्वंद्व ध्वंस और सृजन का।

(१८)

काले राक्षस

देखो तुम्हारे मुंह पर जो मक्खियों से भिनभिनाते हैं
हमारे सपने हैं
वो जो पिटा हुआ आदमी अभी गिरा पड़ा है
वही खडा होकर पुकारेगा बिखरी हुई भीड़ को
आस्था के जंगल उजड़ते नहीं हैं

काले राक्षस

देखो तुमने बम फोड़ा और
लाश तौलने बैठ गए तुम
कबाड़ी !
जहाँ जहाँ तुम मारते हो हमें
हम वहीं वहीं फिर उग आते हैं

देखो
मौत का तांडव कैसे थम जाता है
जब छटपटाए हाथों को

हाथ पुकार लेते हैं

तुम्हारे बावजूद
कहीं न कहीं है एक आदमी
जो ढूंढ ही लेता है आदमी !

काले राक्षस !
घर्र घर्र घूमता है पहिया

****


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कोठार से बीज : ४ : रघुवीर सहाय

7:08 pm


( हिन्दी के जिन कविओं का अपने समय और बाद की कविता पर बहुत सीधा, निर्णायक और सार्थक असर रहा, रघुवीर सहाय उनमें से एक थे। उन्होंने कविता को इस योग्य बनाया कि उसकी तरफ उम्मीद से देखा जा सके : उसकी ज़रूरत महसूस हो। उनकी ऐसी अनेक स्मरणीय कविताएं हैं जिनसे इस अंधेर समय में रोशनी के कल्ले फूटते हैं।
मसलन यही : कुछ तो होगा / कुछ तो होगा / अगर मैं बोलूँगा / न टूटे / तिलस्म सत्ता का / मेरे अदंर / एक कायर टूटेगा / टूट मेरे मन / अब अच्छी तरह से टूट / झूठ मूट मत अब रूठइसीलिए रघुवीर सहाय को याद करना कभी-कभी निराशा का कर्तव्य भी लगता है। कोठार से बीज में इस दफा गद्यकार रघुवीर सहाय। आगे दिए गए गद्य के टुकड़े सुरेश शर्मा द्वारा संपादित रघुवीरजी के गद्य चयन, '' यथार्थ यथास्थिति नहीं '' से हैं जिसे चयन में से एक और चयन भी कहा जा सकता है। )

जो कविता बचा लेती है

कविता क्या चीज़ें बचा सकती है ? बहुत सोच करके देखूं तो भी मैं उसको कुछ पहचानी जाने वाली शक्लों में नहीं देख पाता -- सिवा इसके कि कुछ चीज़ें हैं जो कि रोज हम अपनी जिंदगी में करते हैं या पाते हैं और हर वक्त एक तरह की भावना से आक्रांत रहते हैं कि ये हमें रिआयतों के रूप में मिली हैं, जबकि वे हमारे अधिकार हैं। उन चीज़ों को अगर बचा रखा जा सके तो हम सोच सकते हैं कि कभी-न-कभी हम इनको अपने अधिकार की तरह से बरतेंगे। आप कह सकते हैं कि मैं चाहता हूँ कि इस बात को बचा रखा जाए कि बच्चा अपनी माँ और अपने बाप के साथ एक रिश्ता रखता है। आप कह सकते हैं कि इस बात को बचा रखा जाए कि मैं जब कोई बहुत जायकेदार चीज़ खाता हूँ तो मेरे शरीर में एक संवेदन होता है। वह बचा रखनेवाली चीज़ है।

कविता क्या करती है ?

कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। हर रचना उसे हमेशा एक बेहतर व्यक्ति बनाती है जिसने उसको किया है। रचना कम-से-कम उस व्यक्ति को जो उसे कर रहा है, एक बेहतर इंसान ज़रूर बनाती है, क्योंकि पहले तो वह इन शर्तों का अनजाने पालन करता है कि उसके मन में द्वेष नहीं है। क्रोध हो सकता है, एक तरह की छटपटाहट हो सकती है, मजबूरी हो सकती है, लेकिन हताशा नहीं है और अन्याय भी नहीं है। दूसरे कदम पर वह एक बेहतर इंसान इसीलिए बनता है कि हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है।

इस तरह वह रचना योग्य बना रहता है

यह मैं मान सकता हूँ कि अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैरबराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता। वह एक भी कविता नहीं लिख सकता -- ऐसी जिसको पढ़ कर मैं खुश होऊं कि यह कविता है। इसके उलट अगर आप यह मानें कि जो आदमी इस गैरबराबरी को हटाना चाहता है -- अब वह कैसे भी हटाना चाहता हो, वह अवधारनाओं के द्वारा हटाना चाहता हो, किसी संगठित कार्रवाई के द्वारा हटाना चाहता हो या केवल इसी के द्वारा हटाना चाहता हो कि मैं कम-से-कम नहीं करूंगा और इसकी निस्सारता को भी पहचानता हो कि मेरे अकेले यह न कर देने से होगा नहीं, लेकिन मैं करूंगा नहीं -- तो मैं समझता हूँ कि तीनों-चारों प्रकारों में वह रचना करने में समर्थ और योग्य बना रहता है।

कविता की मृत्यु और अमरत्व

कविता हुई नहीं कि मरी का मतलब सिर्फ़ यह है कि जिस क्षण आप एक कविता को पूरा लिख लेते हैं अर्थात् आप किसी एक जगह से शुरू करके यह जान लेते हैं कि आपने क्या लिखा, उसके बाद कवि के लिए उसका वह महत्व नहीं रह जाता जो कि दूसरों के लिए होता है। इसके साथ यह भी होता है कि जिस सामग्री में आपने रचना कि थी, वह ख़त्म हो जाती है। साथ ही और भी एक बात होती है कि जिस कलात्मक अनुभव को आपने दुबारा से अनुभव और अभिव्यक्त किया वह अनुभव ख़त्म हो जाता है। कभी-कभी यह भी संभव है कि वह पूरी तरह से ख़त्म न हो। तब यह भी मानना पड़ेगा कि वह कविता जो आपने उस समय लिखी है वह भी पूरी तरह से पूरी नहीं हुई।

कविता की ज़रूरत

बार-बार ऐसा वक्त आता है कि कवि को जीने का उद्देश्य समझ में नहीं आ रहा होता है। उसी वक्त कविता की ज़रूरत कवि को होती है। कविता उसे जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। कह सकते हैं कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं बनती : ख़ुद एक जीवन बन जाती है जिसका उदेश्य वह स्वयं होती है। '' कविता ख़ुद एक जीवन बन जाती है '' के क्या माने ? इस जीवन में जो भी है -- रहस्य, बोध, जिज्ञासा, राग, विरक्ति, भय और साहस वह सब कविता में एक दर्जा फर्क हो जाता है -- उसमें से ममत्व छूट जाता है। कविता नामक जीवन में मृत्यु नहीं होती : मृत्यु तो ममत्व का ही दूसरा नाम है। तब क्या उसमें अमरत्व होता है ? अवश्य होता है, परन्तु समझने की बात यह है कि ख़ुद कविता अमर नहीं होती : कविता तो इस जीवन में शायद सबसे अधिक मर्त्य है। वह हुई नहीं कि मरी... वह न जाने कैसा कवि होगा जो अपनी कविता को लेकर लगातार जी सकता होगा।
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संपादन : अनुराग वत्स.

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