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रंगायन : ३ : हबीब तनवीर

2:18 pm
( हबीब तनवीर उन जीवित मूर्धन्यों में से एक हैं जिनका होना उस कला-माध्यम को न सिर्फ़ एक अमाप ऊँचाई देता है, बल्कि जिन मूल्यों और प्रतिबद्धताओं से वह विकस रही होती है, उसमें हमारी आस्था भी दृढ़ करता है। रंगायन में इस दफा हबीब तनवीर। )

'' आओ, देखो सत्य क्या है ''

हृषीकेश सुलभ

अब छियासी के हो चुके हबीब तनवीर को याद करना सिर्फ रंगकर्म से जुड़े एक व्यक्ति को याद करने की तरह नहीं है। दसों दिशाओं से टकराते उस व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जिसके सिर पर टूटने को आसमान आमादा हो, धरती पाँव खींचने को तैयार बैठी हो और कुहनियाँ अन्य दिशाओं से टकराकर छिल रही हों; और वह व्यक्ति सहज भाव से सजगता तथा बेफ़िक्री दोनों को एक साथ साधकर चला जा रहा हो। अब तक कुछ ऐसा ही जीवन रहा है हबीब तनवीर का। भारतेन्दु के बाद भारतीय समाज के सांस्कृतिक संघर्ष को नेतृत्व देनेवाले कुछ गिने-चुने व्यक्तित्वों में हबीब तनवीर भी शामिल हैं। भारतेन्दु का एक भी नाटक अब तक मंचित न करने के बावजूद वे भारतेन्दु के सर्वाधिक निकट हैं। उन्होंने लोक की व्यापक अवधारणा को अपने रंगकर्म का आधार बनाते हुए अभिव्यक्ति के नये कौशल से दर्शकों को विस्मित किया है।

विस्मय अक्सर हमारी चेतना को जड़ बनाता है, पर हबीब तनवीर के रंग कौशल का जादू हमें इसलिए विस्मित करता है कि उनकी प्रस्तुतियों में सहजता के साथ वे सारे प्रपंच हमारे सामने खुलने लगते हैं, जो सदियों से मनुष्य को गुलाम बनाए रखने के लिए मनुष्य द्वारा ही रचे जा रहे हैं। इन प्रपंचों के तहख़ानों में निर्भय होकर उतरना और सारे गवाक्षों को खोलकर आवाज़ लगाना कि आओ, देखो सत्य क्या है; आज सरल काम नहीं है। रचनाकर्म में इसके दोहरे ख़तरे होते हैं। एक तो कलात्मकता के ह्रास का ख़तरा हमेशा बना रहता है और दूसरी ओर प्रपंच रचनेवालों की हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। हबीब तनवीर इन दोनों ख़तरों से जूझते हैं। कलात्मकता के स्तर पर वह निरंतर उन रूढ़ियों को तोड़ते हैं, जिन्होंने आज़ादी के बाद के हिन्दी रंगमंच का नैसर्गिक विकास नहीं होने दिया। तथाकथित बौद्धिकता और आभिजात्यपन की लालसा में इन रूढ़ियों के आधार पर हिन्दी रंगमंच का ऐसा स्वरूप उभरा, जो आज सामान्य जनता की सांस्कृतिक भूख मिटाने में सक्षम नहीं है।

हबीब तनवीर ने इन रूढ़ियों को तोड़ते हुए नये प्रयोग किए और प्रयोगों की सफलताओं- असफलताओं के बीच से अपनी प्रस्तुतियों के लिए नयी रंगभाषा और नयी रंगयुक्तियों की खोज की। उन्होंने अपने नाटकों की केन्द्रीय चेतना से कभी कोई समझौता नहीं किया। अपने हर नाटक को अपने समय और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए रखा। समाज के सारे प्रपंचों और अंतर्द्वंद्वों को उजागर करते हुए वे उस शक्ति से न कभी भयभीत हुए न ही समझौता किया, जो मनुष्यता के विरोध में संगठित होकर हिंसा करती है।

हबीब साझा संस्कृति की वकालत करते रहे हैं। धार्मिक आडम्बरों-बाह्याचारों-कट्टरताओं के ध्वजवाहकों की क्रूरताएँ हों या पूँजी के मद में बौरायी शक्तियों की हिंसा - सबका उन्होंने सामना किया। पुनरुत्थानवाद और शुचितावाद को उन्होंने एक सिरे से नकारा। अपने रंगकर्म के आरम्भिक काल से ही हबीब तनवीर इस बात बल देते रहे हैं कि रंगमंच को आलोचनात्मक होना चाहिए। रजनीतिक दलों की नकेल पहने बिना राजनीतिक विचारों से लैस रंगमंच की उनकी कल्पना को आरम्भिक दौर में संदेह की नज़र से देखा गया। पर जैसे-जैसे उन्होंने अपने नाटकों के लिए नयी युक्तियों की खोज की और नाटकों में विचार के स्तर पर मनुष्य की पक्षधरता का संघर्ष तेज़ किया, फलस्वरूप रंगकर्मियों-दर्शकों का एक बड़ा तबका उनकी तरफ आकर्षित हुआ।

जिस इप्टा आन्दोलन ने अपनी सक्रियता से देखते-देखते समग्र भारत को एक सूत्र में बाँध दिया था, राजनीतिक बँटवारे के बाद उसका बिखरना एक सदमे की तरह था। इस सांस्कृतिक सदमे से उबरने के लिए अधिकांश कलाकारों ने सृजन का ही रास्ता अपनाया। इप्टा के साथ जुड़े रहने का रंगमंचीय अनुभव हबीब तनवीर के काम आया और साथ ही राजनीतिक अंतर्द्वंद्वों से उपजे संकटों और निराशा ने नये रास्तों की खोज के लिए विवश किया। मानवतावादी विचारों तथा जीवन की संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र राहों की निर्मिति के संघर्ष ने हबीब तनवीर को इस सदमे से मुक्ति दी। रॉयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आट्र्स (राडा) में प्रशिक्षण के दौरान अपनी भाषा में रंगकर्म करने की उनकी आस्था ने प्रशिक्षण के उत्तरार्द्ध के प्रति उनके मन में अनास्था जगा दी। उन्होंने राडा छोड़ने का निर्णय लिया, जो असामान्य और जोखिम भरा था। यह जोखिम सब नहीं उठा सकते। अपनी रंग परम्परा और भाषा के भीतर बहुत गहरे उतरकर उसकी शक्ति की पहचान किए बगैर यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता।

हबीब तनवीर को अपनी रंग परम्पराओं तथा अपनी भाषा की पहचान थी और इनकी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने यह जोखिम उठाया और राडा छोड़कर ब्रिस्टल ओल्ड विक थियेटर में प्रशिक्षण लेने लगे। यहाँ उन्हें डंकन रास मिले, जिन्हें वह आज भी अपना गुरु मानते हैं। डंकन रास ने उन्हें नाटक के पहले पाठ के दरम्यान प्राप्त नाटक की चेतना और मूल प्रयोजन से जुड़े रहने का हुनर सिखाया। हबीब तनवीर ने ब्रिस्टल ओल्ड विक के बाद ब्रिटिश ड्रामा लीग में प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर यूरोप की यात्रा पर निकले। एक ऐसी यात्रा, जिसे संचालित कर रही थी दुनिया की विविध रंग छवियों को देखने-समझने की बेचैनी।

इस यात्रा ने उनकी इस धारणा को ताक़तवर बनाया कि शब्द और संस्कृति की रचनात्मक दुनिया में उस स्थान और पर्यावरण का बहुत महत्त्व होता है, जहाँ आप जनमते और पालित-पोषित होते हैं। सृजनात्मकता के लिए तमाम उर्वरा शक्तियाँ आपकी अपनी ज़मीन में ही छिपी होती हैं। आज़ादी के बाद रंगमंच के संदर्भ में परम्परा के उपयोग को लेकर चलनेवाली बहस को हबीब तनवीर ने अपने रंगकर्म से तीव्र किया और धुँधलके को छाँटने के लिए सूत्र दिए। परम्परा के बीच से जीवन को गतिशील बनानेवाली आधुनिकता के तत्त्वों को चुनकर हबीब तनवीर ने एक नये रंग परिदृश्य की रचना की।

हबीब तनवीर कला को जीवन का अंग मानते हैं। एक ओर शैली, तकनीक और प्रस्तुतिकरण के सम्पूर्णता में देशज बने रहने पर बल देते हैं, तो साथ-साथ इस बात पर भी बल देते हैं कि इसे कथ्यात्मक रूप से विश्वजनीन, आधुनिक तथा समसामयिक होना चाहिए। वह महानगरों में मंचित होनेवाले आँचलिक मुहावरों वाले अपने नाटकों के पक्ष में आक्रामकता के साथ यह तर्क रखते हैं कि, '' मैं इस तथाकथित सभ्य समाज के बनावटी और ओढ़े हुए आवरण को उतार देना चाहता हूँ। '' हबीब तनवीर को न तो परम्परा का दास बनना स्वीकार्य है और न ही परम्परा से मनमानी करना। वह सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों के मूल सरोकारों से जुड़ी परम्परा के उन जीवित अंशों के उपयोग की वकालत करते हैं, जो कलात्मकता को भ्रष्ट न करें।

मृच्छकटिक पहला नाटक था, जिसे प्रस्तुत करते हुए हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ के पारम्परिक रंगकर्म की युक्तियों, बोली, शैली और कलाकारों का प्रयोगधर्मी उपयोग किया। हबीब तनवीर ने आगा हश्र कश्मीरी, विशाखदत्त के अलावा मौलियर, ब्रेख्त , लोर्का, ऑस्कर वाइल्ड, शेक्सपीयर, गोल्डनी आदि के नाटकों को मंचित किया। उन्होंने ग़ालिब के जीवन पर भी नाटक किया। इस कालावधि में उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी आगरा बाज़ार के मंचन से मिली थी। पर उनकी प्रयोगधर्मिता बहस के केन्द्र में रही।

गाँव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद ने उन्हें एक बार फिर सफल निर्देशक के रूप में स्थापित किया। यहीं से उन्होंने अपने रंगकर्म के लिए एक ऐसे रास्ते को पकड़ा या ऐसी दिशा की खोज की, जिसके कारण उन्हें बाद के दिनों में अपार सफलता और महत्त्व प्राप्त हुआ। चरनदास चोर ने उनको विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया। अपने नाटकों की प्रस्तुतियों से हबीब तनवीर बार-बार अपनी सृजनात्मकता का अतिक्रमण करते हैं। यह एक दुस्साहस भरा काम है। अक्सर बड़े नाम इससे बचना चाहते हैं क्योंकि अपने ही रचे को फिर से रचकर आगे निकल जाना बहुत कठिन होता है। असफलता का भय ऐसा करने से रोकता है। पर हबीब तनवीर की प्रयोगधर्मिता असफलताओं से जूझती रही है।
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अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : अंतिम किस्त

2:00 pm
( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की यह आखिरी पेशकश है। इस अपेक्षाकृत लंबी पोस्ट को भी रूचि और लगाव से पढ़ा गया है। इसके पीछे जितना काफ़्का और सिताती हैं उससे कतई कम अशोक का उद्यम नहीं है। हम इस पेशकश की समाप्ति पर पुनः उनके सहयोग के लिए अपना आभार प्रकट करते हैं। )

यह रूपान्तरण हमारी आंखों के सामने होता है। शुरू में सास्सा को लगता है कि वह एक ऐसी देह में कैद है जिसे वह उस नैसर्गिकता के साथ काबू या निर्देशित नहीं कर पाता जैसा पहले अपने प्राकृतिक हाथ पैरों के साथ कर पाता था। जब वह बोलने के लिए अपना मुंह खोलता है उसे नीचे कहीं से चिड़िया की सी दर्दनाक आवाज अपने शब्दों के साथ घुलती महसूस होती है और उस प्रतिध्वनि में उसे संदेह होता है कि उसने अपनी आवाज सुनी भी या नहीं। उसे भान होता है कि उसकी देह अकल्पनीय रूप से चौड़ी है। जब वह बिस्तर से उतरना चाहता है उसके पास हाथ पैर नहीं बल्कि कई सारे छोटे छोटे पैर हैं ; अगर वह उन में से एक को मोड़ना चाहता है तो उसे अपने को खींचना होता था और जब वह उसे मोड़ पाता है वह देखता है कि बिना उसके प्रयास किए बाकी सारे पैर भी भीषण दर्दभरी उत्तेजना में हिलने लगते हैं।

उसकी पाशविक प्रवृत्ति जल्द ही और विकसित होती हैः उसकी आवाज जो अब तक आधी मानवीय आधी पशुओं जैसी थी अब पूरी तरह पशुओं जैसी हो जाती है और अब वह उन शब्दों को समझने लगता है जो पहले उसे अजनबी लगे थे। वह अपने नए शरीर को अपनाना शुरू करने का प्रयास करता है। अब उसे अपने असंख्य हिलते डुलते पैरों से भय नहीं लगता ; जब वह फर्श को छूता है वह पाता है कि वे उसकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं और उसे जहां वह चाहे ले जा सकते हैं जैसा वह पहले के पैरों से कर सकता था। और उसे एक शारीरिक बेहतरी का अनुभव होता है और एक तरह की प्रसन्नता का भी मानो वह अभी अभी अपने नए हाथ पैरों में प्रविष्ट हुआ हो। वह अपने एन्टीना का इस्तेमाल करना शुरू करता है। जब वह दूध जो उसे कभी अतिप्रिय था के प्याले में अपना सिर डुबाता है उसे उबकाई आ जाती है : अब एक कीड़े की तरह उसे सड़ी सब्जियां बदबूदार पनीर और फफूंदभरा दूध पसंद है। ऊंची छत वाले कमरे से उसे डर लगता है और उसकी पशुप्रवृत्ति उसे पलंग के नीचे छिपने और कूड़े में टहलने को प्रेरित करती है।

काफ़्का की पैनी निगाहों के सामने ग्रगोर साम्सा धीरे धीरे अपनी सारे मानवीय इन्द्रियों को खोता जाता है जिन्होंने उसके लिए संसार की तमाम चीजों को परिभाषित किया था। शुरू में वह देख और सुन सकता है। कई दयनीय प्राणियों की तरह दृष्टि उसके लिए एक तरह की मुक्ति थी। उसने कई घंटे खिड़की से बाहर देखते हुए बिताए थे और उन दृश्यों से उसे खुद को कहीं खो पाने की उम्मीद बनी रहती थी। अब जब वह एक कुर्सी को खिड़की तक खिसकाता है और उस पर रेंग कर ऊपर चढ़ कर बाहर देखता है चीजों को अलग कर पाने की उसकी क्षमता कम होती जा रही है। अब वह बाहर अस्पताल को साफ नहीं देख पाता था और अगर उसे यह पता न होता कि वह चालोर्टनस्ट्रासे में रहता है तो बाहर देख कर उसे लगता कि वह किसी रेगिस्तान को देख रहा है जहां सलेटी आसमान और धरती एक अस्पष्टता में एक दूसरे से मिलते हैं। वह बस सुन सकता है और अपने कमरे में बन्द सारे अपार्टमेन्ट की आवाजों को सुनना उसके लिए दर्दनाक होता है - कोई नहीं सोचता कि वह उन आवाजों को समझ पाता है। लेकिन अभी उसकी मानवीय संवेदनाएं खत्म नहीं हुई हैं : सपने, कुछ बेढब उम्मीदें, स्मृतियां, उसकी नौकरी, ट्रैवलिंग सेल्समैन के तौर पर की गई उसकी यात्राएं, एक क्षणिक प्रेमसंबंध, उसकी संकरी बन्द जिन्दगी।

उस लिहाज से साम्सा का रूपान्तरण ओविड जितना संपूर्ण नहीं है। ग्रगोर साम्सा कोई तिलचट्टा या कीड़ा नहीं बना है : वह एक बंटा हुआ जीव है आधा पशु आधा आदमी जो पूरी तरह जानवर बन सकता है या वापस आदमी पर पूरे रूपान्तरण के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति नहीं है। बाहरी संसार कोहरे ने मिटा दिया है। सारा विराट बाहरी संसार खिड़की के शीशों पर पड़ रही बारिश की बूंदों में सिमट जाता है जो शरद के कदमों को एक लय प्रदान करती हैं और सड़क की रोशनियों में जो कमरे के फर्श और फनीर्चर पर प्रतिविम्बित होती हैं। कमरे में कोई और रोशनी नहीं है : उसकी अल्मारी मेज और पलंग जिन पर कभी चमकदार रोशनी होती थी फिलहाल गोधूलि जैसे मद्धिम प्रकाश से ढंके हैं और नीचे जहां ग्रेगोर साम्सा है वहां सिर्फ अंधेरा है। चाभी से बंद दरवाजा बमुश्किल कभी खुलता है। वह कमरा एक तरह की कैद है जहां कीड़े में बदल चुका ग्रेगोर साम्सा एकाकी जीवन काट रहा है। यह ठीक वैसा ही जीवन है जिसके बारे में काफ़्का अपने क्लास्ट्रोफोबिया के बीच सोचा करता था।

स्थान सघन हो गया था। समय पूरी तरह खत्म हो गया था। वह अलार्म घड़ी जिसकी गति से वह शुरू में रेलगाड़ी की समयसारिणी और संसार की विशालता से जोड़ कर देखता था भी गायब हो गई थी। उसे कोई वहां से उठा ले गया था। उस अंधेरे कमरे में समय का कोई हिस्सा नहीं थाः घन्टों का मतलब एक स्थाई गोधूलि हो गया था। ग्रेगोर को समय के बीतने की भी स्मृति नहीं रह गई है और कहानी के बीच में आते आते उसे यह भी पता नहीं रहता कि क्रिसमस बीत चुका या अभी आने को है। कुछ हफ्तों के बाद अपने नए शरीर से परिचित हो चुकने के बाद ग्रेगोर दीवारों पर रेंगना और चढ़ना सीख लेता है। छत पर चढ़ कर धरती से ऊपर वह अधिक स्वतंत्रता से सांस ले सकता है ; शारीरिक तन्दुरुस्ती की एक अजीब सनसनी उसके भीतर भर जाती है और प्रसन्न विस्मृति के साथ वह खेलना शुरू करता है और अपने शरीर को फर्श पर गिर जाने देता है। हालांकि वह देखने की शक्ति खो चुका है जो मानवेन्द्रिओं में श्रेष्ठतम होती है ; उसने ऊपर चढ़ पाने की एक मानवेतर स्थिति को भी पा लिया है जो एक तरह का शारीरिक और अध्यात्मिक आनन्द है। ट्रैवलिंग सेल्समैन के तौर पर उसने इतनी प्रसन्नता नहीं जानी थी। अगर पशुओं वाले खेल जारी रहते तो संभवतः ग्रेगोर पूरी तरह रूपान्तरित हो जाता। सारी मानवीय स्मृति से मुक्त अपने कमरे में पूरी तरह एक कीड़ा बनकर वह अकेलेपन शान्ति और हल्केपन का आनन्द महसूस कर सकता था। उसकी बहन रोज उसका खाना लेकर आती और अपनी मूक उपस्थिति से उसे सहलाती। अगर ऐसा होता तो उसकी भयानक त्रासदी एक अतुलनीय आनन्द में बदल जाती और उसे उसकी ईडिपल नियति से बचा लेती। ऐसे में इस कहानी ने विशुद्ध रूप से पशुजीवन के महिमागान के साथ खत्म हो जाना था।

काफ़्का ने खुद के लिए किसी और भाग्य की कल्पना नहीं की थी। किसी अंधेरी कोठरी में सारी चीजों से दूर रहना जहां सिवा एक मेज दिए और कागजों के कुछ नहीं होना था - बिना किसी से बात करे बिना किसी की बात सुने बस जहां एक बहन - मिस्ट्रेस की अस्पष्ट सुदूर सांस उसे बस छुआ करे। वहां वह भी मनुष्यों की बातों को भूल सकता था। वह बिना बाहरी संसार से संपर्क रखे अपनी देह के अंधेरे से सामग्री जुटाता हुआ महीनों तक लिखता रह सकता था और उसी परामानवीय हल्केपन को महसूस कर सकता था जिसे कमरे की दीवारों पर रेंगता चढ़ता कीड़ा महसूस करता है। ग्रेगोर साम्सा की एक छोटी बहन भी है जिसके लिए उसकी भावनाएं एक ही समय पिता जैसी भी हैं और प्रेमी जैसी भी। ग्रेटे वायलिन बजाती है ; अपने रूपान्तरण से पहले ग्रेगोर ने उसे किसी संगीत विद्यालय भेजने की योजना बनाई थी ताकि वह अपने हुनर को संवार सके। भाई का रूपान्तरण ग्रेटे को तबाह कर देता है ; वह उसकी भीषण पशु गंध और आकृति को सहन नहीं कर पाती और न ही वह उसके खाने के कटोरे को छूने की हिम्मत कर पाती है। इस घृणा के बावजूद भाई बहन अब भी उस पुराने प्रेम संबंध से जुड़े हुए हैं। उनके बीच एक शब्दहीन समझौता स्थापित हो जाता है। जैसे ही वह दरवाजे के ताले में चाभी लगाए जाने की आवाज सुनता है वह अपने को पलंग के नीचे छिपाकर चादर ओढ़ लेता है और उसकी बहन उसे कृतज्ञ निगाहों से धन्यवाद देती है।

ग्रेटे उससे ईष्र्या करती है ; वह चाहती है कि भाई की देखभाल सिर्फ वही करे और जब कभी मां उसका कमरा साफ करती है ग्रेटे को बुरा लगता है और वह रोने लगती है। जहां ग्रेगोर अपने पशुओं वाले खेल खेलता रहता है ग्रेटे उसकी इच्छाओं को समझने लगती है। वह कमरे से अल्मारी और डेस्क को हटाने की सोचती है जो पिछले समय की स्मृतियों से अटे हुए हैं ताकि ग्रेगोर दीवारों पर आजादी से रेंग सके और नीचे गिर सके। उसका सपना यह था कि ग्रेगोर पूरी तरह पशु बन जाए ताकि वह उस खाली खोह में खेलता रहे और उन दोनों के बीच वैसा है मजबूत चुम्बकीय प्रेम हो जैसा कि काफ़्का फेलीसे के साथ चाहता था। इस पर मां राजी नहीं होतीः वह कमरे को एक खोह में तब्दील नहीं करना चाहती ; वह समझती है कि फनीर्चर के वहां रहने से ग्रेगोर मानवीय अस्तित्व कभी नहीं छोड़ेगा।

इस तरह ग्रेगोर चौराहे पर खड़ा होता है। लेकिन तुरन्त ही अपनी खुद की इच्छाओं को नकारते हुए वह अपनी मां के विचारों से सहमत हो जाता है ; उन चीजों और बीते समय की गरमी को वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा ( उसका पुरान कमरा 19वीं सदी के किसी उपन्यास के कमरे की तरह पुराने पारिवारिक फनीर्चर से सजा हुआ था। ) उसके भीतर सब कुछ नकार कर पूरी तरह पशु संसार में चले जाने की ताकत नहीं है। क्या हम यह कहें कि वह कमजोर है ? क्या हम एक ट्रैवलिंग सेल्समैन से वह कर पाने की उम्मीद करें जैसा अब तक कोई मनुष्य नहीं कर सका ? पशु संसार में उतर पाने का काम बस काफ़्का कर सकता था जब अपनी अंधेरी कोठरी में बैठा वह एक पशु की तरह नहीं बल्कि एक मृत व्यक्ति की तरह लिखता रहता था। स्त्रियों ने कपड़े की अल्मारी को पहले ही हटा दिया था। डेस्क अभी कमरे में ही थी और दीवार पर एक स्त्री की तस्वीर थी जिसे ग्रेगोर ने चित्रों वाली एक पत्रिका से काटा था। ट्रैवलिंग सेल्समैन के समय के उदास घण्टों में ग्रेगोर ने उस तस्वीर को लकड़ी के एक सुनहरे कामदार फ्रेम से सजाया था। एक मूक फ्लाबेरियन संकेत की तरह यह चित्र उसकी दमित वासना और असफल प्रेम का सतत बिम्ब है।

ग्रेगोर गुस्से के साथ अपना विरोध जाहिर करता है "वे उसका कमरा खाली कर रहे थे। वे उस हर चीज को बाहर ले जा रहे थे जे उसे प्रिय थीः उसके उपकरणों वाली दराज पहले ही बाहर ले जाई जा चुकी थी ; अब उन्होंने उसकी भारी डेस्क को तोड़ना शुरू किया जिस पर बैठकर उसने अपने विद्यार्थी जीवन का सारा होमवर्क किया था …" एक क्षण के अनिश्चय के बाद वह जल्दी जल्दी उस स्त्री के चित्र के ऊपर चढ़ जाता है। उसका शरीर चित्र को पूरी तरह ढंक लेता है जिससे उस के पेट को आनन्द मिलता है। "कम से कम इस तस्वीर को कोई नहीं ले जाएगा।" ग्रेगोर ने चुनाव कर लिया है। वह उस स्त्री की छवि में अपनी कलात्मक सनकों और भावनात्मक फन्तासियों को देखता है और उस खामोश और अंधेरे जीवन को अस्वीकार कर देता है जो उसकी बहन ने उस के सामने प्रस्तुत किया होता है। पशु के तौर पर रूपान्तरित होने की प्रक्रिया थम जाती है।

पुत्र के रूपान्तरण के पहले ही पिता को थक चुका दिखाया गया है। शाम को जब ग्रेगोर काम से लौटता था वे उसका स्वागत अपनी आरामकुर्सी में बैठे करते हैं ; उन्होंने अपना लबादा पहना होता है और वे उठ नहीं पाते ; साल के दो इतवारों को जब वे साथ टहलने जाया करते थे वे बेहद धीमे धीमे घिसटा करते थे। अब जब उनका पुत्र खामोश अपनी कोठरी में है उन्हें लगता है कि उनकी जीवन्तता को मिलने वाली चुनौती खत्म हो गई है और वे एक तरो ताजा व्यक्ति में बदल जाते हैं : उन्हें जैसे वह रक्त वापस मिल जाता है जो कभी उनके पुत्र ने उनसे लिया था। कुछ ही समय पहले उन्होंने एक बैंक में दुबारा काम करना शुरू किया था। अब वे बढ़िया कपड़े पहने अपना काम फुर्ती के साथ करते हैं। उन दोनों के बीच का संघर्ष जीवित रहने का संघर्ष है। अगर बेटे ने जानबूझ कर पिता को मारना चाहा था तो अब यह काम पिता करना चाहते हैं।

ग्रेगोर का रूपान्तरण एक गलत काम है एक पाप है जिसे कड़ा दण्ड मिलना चाहिए। एक शाम जब पिता घर आते हैं मां बेसुध पड़ी होती है और निराश ग्रेगोर लिविंग रूम में पसरा हुआ होता है। उसे देखते ही पिता अपना बूट उठाकर उस पर चोट करते हैं मानो वह किसी परीकथा का दैत्य हो। पिता अपना जूता लेकर उसे कमरे के बाहर खदेड़ देते हैं जबकि भयभीत साम्सा की आंखें तक बंद हो जाती हैं। यदि वह इस पितृसत्तात्मक हिंसा से बचना चाहता तो वह अपने पशु संसार में पनाह लेता हुआ दीवार पर ऊपर चढ़ सकता था और हमेशा के लिए पुरुषों के उस ईडिपल संसार को छोड़ सकता था जहां पिता अपने बेटों की हत्या करते हैं और बेटों ने अपने पिताओं को मारने पर विवश होना पड़ता है। लेकिन वह एक कीड़ा बनने से मना कर देता है। वह एक मुक्त कीड़े की बजाय बलि दिया हुआ एक पुत्र बनना चाहेगा। सो लिविंगरूम में बचाव के लिए उसकी दर्दभरी दौड़ जारी रहती है। पिता अल्मारी में रखे एक कटोरे से कुछ छोटे लाल सेब निकालकर उस पर उनकी बमबारी शुरू कर देते हैं : पहले सेब फर्श पर लुढ़कते हैं मानो उनमें बिजली बह रही हो ; फिर एक सेब ग्रेगोर हे शरीर को छू कर जाता है फिर एक और जोर से उसकी पीठ पर पड़ता है। उसकी मां के गाउन के बटन खुले हुए हैं और वह पिता से उसे छोड़ देने की याचना कर रही है। ग्रेगोर की इन्द्रियां बुरी तरह थकी हुई हैं और वह फर्श पर पसर जाता है।

क्या ही विचित्र और हैबतनाक यह दृश्य है जिसमें अब्राहम द्वारा आइजैक की बलि का अनुष्ठान पूरा होता है और जिसमें हम पवित्रता की सिहरन और नियम का एक ही साथ पालन और उल्लंघन देखते हैं। ग्रेगोर का घाव करीब महीने भर तकलीफ देता है। वह अपने कमरे में रहता है - वह मनुष्य नहीं रह गया है न ही जानवर बना है ; वह एक घायल पशु और अपमानित पुरुष है। उसकी देह में धंसा सेब एक लाइलाज घाव है जिसे किसी भी स्त्री का हाथ ठीक नहीं कर सकता : उसके पिता की घृणा की चाक्षुष स्मृति¸ उसके बलिदान का विम्ब। अब वह आजादी से दीवारों पर नहीं चढ़ पाता था ; वह मानवीय संसार में कैद हो गया था ; अब वह बच कर भाग भी नहीं सकता था और करीब करीब पश्चाताप और समझौते के तौर पर उसे वापस परिवार में शामिल कर लिया जाता है। हर शाम लिविंग रूम का दरवाजा खुल जाता था "ताकि औरों की सहमति के साथ वह सारे परिवार को रोशन मेज के गिर्द देख सके और उनकी बातें सुन सके। " हालांकि वह बेआवाज है उसे परिवार की ध्वनियों में शामिल कर लिया जाता है। लेकिन इस संपर्क के कारण परिवार के जीवन का ह्रास होने लगता है और वह अपने पुराने जीवन का क्षुद्रतर रूप बन जाता है। प्रसन्नताभरे समय के बारे में उत्तेजित वार्तालाप अब नहीं होते ; हर रात गंदी दागदार पोशाक पहने उसके पिता मेज पर ही सो जाते हैं अपनी आंखों को तबाह करती उसकी मां सिलाई में लगी रहती है और उसकी बहन स्टेनोग्राफी और फ्रेंच का अध्ययन करती रहती है ; नौकरानी की छुट्टी कर दी जाती है और परिवार के गहने बिकने लगते हैं।

अंधेरे कमरे से देखे गए इस दृश्य से अधिक नैराश्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता था कि स्त्रियां काम करती थीं और पिता सोए रहते थे। फिर एक और पतन होता हैः तीन किराएदार रख लिए जाते हैं ; सारा परिवार अपना भोजन रसोई में करता है। अपनी खोह में से काफ़्का इन किराएदारों की चपचप सुनता था और अपने परिवार के अपमान को महसूस करता था - उसके पिता बैठने की हिम्मत नहीं कर पाते थे और मेज के बगल में अपनी टोपी हाथ में लिए भिखारी की तरह खड़े रहते थे। ग्रेगोर के जीवन में भी पतन आता है। मां और बहन उसके प्रति वही असहिष्णुता महसूस करते हैं जो किसी ऐसे संबंधी के लिए होती है जिस के साथ कुछ दुर्घटना घट गई हो¸ ठीक जैसा बर्ताव इवान इल्यीच के साथ उसकी पत्नी और बच्चे करते हैं। प्रेम पूरी तरह बुझ जाता है। सिर्फ एक महामानवीय दुभार्ग्य को सह पाने की अक्षमता बच जाती है। वही बहन जो कभी प्यार से उसका खाना बनाती थी अब कैसा भी खाना अपने पैरों से उसके कमरे में खिसका देती है बिना इस बात की परवाह किए कि ग्रेगोर उसे छुएगा भी या नहीं। वह सफाई भी नहीं करती और न किसी को करने देती है। कमरे की दीवारों और फर्श पर कूड़े और गंदगी के निशान होते हैं। अवांछित चीजें और तमाम कूड़ा करकट कमरे में धकेल दिए जाते हैं। ग्रेगोर ने उस खाली खोह को नकार दिया था जहां वह अपने खेल खेल सकता था लेकिन अब उसका कमरा मानवता द्वारा अस्वीकृत की गई चीजों की शरणस्थली बन गया था। एक तिलचट्टे की तरह वह घर भर की धूलसनी चीजों से अपने को गंदा करता घिसटा करता था।

कुछ समय और बीतता है। एक शाम किराएदारों से घिरी ग्रेटे वायलिन बजा रही है। किराएदारों की समझ में वह संगीत नहीं आता क्योंकि उन्होंने किसी मनोरंजक संगीत की उम्मीद की थी और वे परेशान से होकर अपने सिगार पीने लगते हैं। ग्रगोर संगीत के कोमल स्वरों को सुनता है ; कूड़े गन्दगी और बालों से सना वह रेंगता हुआ अपने कमरे से निकलता है और लिविंग रूम की चौखट पर अपना सिर ढुलका कर उस क्षण की प्रतीक्षा करता है जब उसकी बहन उसकी तरफ देखती ; चूंकि वह बोल नहीं सकता था संवाद अब उस के लिए केवल दृष्टि के माध्यम से संभव रह गया था। पहले समय में जब वह एक आदमी था उसे संगीत अच्छा नहीं लगता था। अब जब कि वह एक पशु में पतित हो चुका था संगीत उसे भावुक बना देता था और उसे लगता था कि संगीत उसके लिए "वांछित और अनजाने पोषण" की तरह था। हम काफ़्का के लेखन की आत्मा में पहुंच गए हैं - "वांछित और अनजाने पोषण" की धारणा एक महान प्लेटोनिक थीम है ; एक अनजानी पुरातन छवि की तरफ आत्मा की गति ; फ्लाबेरियन पात्रों का असफल और अप्राप्य उम्मीदों की तरफ उत्तेजित सफर।

जब तक वह एक मनुष्य था एक सेल्समैन था एक आज्ञाकारी बेटा था गहरी उम्मीदें उसके भीतर नहीं जागती थीं। पशु बनने के बाद कम से कम उसके कान महामानवीय संगीत के लिए खुल गए हैं। अब जबकि वह गंदगी में लिथड़ा एक घायल पशु है वह जान गया है कि उसकी आत्मा की मंद्र आवाज एक अपरिभाषेय इच्छा है जिसे प्रकट नहीं किया जा सकता और जो उसे उस लक्ष्य की तरफ ले जाती है जहां मनुष्य और पशु के बीच की विभाजनरेखा बेमतलब हो जाती है। बिना इस बात को जाने कि वह क्या कर रहा है ग्रेगोर एक साथ प्राचीन कथाओं की दो मूल चीजों को पुनर्जीवित करता हैः खजाने की पहरेदारी करता ईर्ष्यालू ड्रैगन ; और पशु में बदल गया राजकुमार जो राजकुमारी के बगल में रहता हुआ उम्मीद करता है कि वह उस से शादी कर पाएगा और दुबारा से आदमी बन जाएगा।

लेकिन कथा के इस पशु के बरखिलाफ ग्रेगोर दुबारा आदमी नहीं बनना चाहता ; वह समझता है और जैसा उसकी बहन ने उस से कहा भी था पशु बने रहना ही उस पर पूरी तरह जंचता था। वह सिर्फ इतना चाहता था कि वायलिन बजाती अपनी बहन के उतना पास जा सके जितना वह अनुमति देगी क्योंकि वही उसके संगीत को सबसे अच्छा समझता है। वह उसे अपने कमरे में तालाबन्द कर देगा ठीक जिस तरह ड्रैगन राजकुमारी को कैद रखता है या काफ़्का की तरह जो अपने को कोठरी में बन्द रखता है ताकि वह लिख सकेः क्योंकि खुशी केवल वहीं पाई जा सकती है जहां दीवारें हमें बन्द कर देती हैं : जेल में। अब आखिरकार काफ़्का अपनी बहन के उस प्रेम प्रस्ताव को समझता है जिसे उसने अस्वीकृत कर दिया होता है। पलंग पर बैठी उसकी बहन फर्श पर उसकी तरफ झुकती ताकि वह उसके कान में अपनी योजना बताता कि अगर यह दुर्घटना न घटती तो वह उसे संगीत सिखाने भेजना चाहता था और इस बात को वह पिछले क्रिसमस को सब को बताने वाला था। "इस स्पष्टीकरण के बाद उसकी बहन की रुलाई फूट जाती और ग्रेगोर उसके कन्धे तक अपने को उठाकर उसकी गरदन को चूमता रहता जो अब बिना कालर या स्कार्फ के अनावृत्त होती क्योंकि अब वह काम पर जाती थी।"

लेकिन ठीक इसी क्षण ग्रेगोर समझता है कि वह उस "वांछित और अनजाने पोषण" के नजदीक है जो ग्रेटे अपने भाई को देने से मना करती रही है। वह उस खोह में अपने पशु भाई के साथ रहना चाहती थी और अस्वीकृत कर दी गई थी और अब वह उस स्वप्न को अस्वीकृत कर रही थी जो उसका भाई उसके सामने प्रस्तुत कर रहा था। वह अपना बदला लेती हैः वह जब भी उसे देखती है वह इस बात को मानने से इन्कार कर देती है कि वह दैत्य अब भी उसका भाई है और अपने यौवन की क्रूरता में वह मां बाप के सामने उसे मृत्युदण्ड की घोषणा करती है। "आप लोग शायद उसे नहीं जानतेः मैं जानती हूं। मैं इस दैत्य के सामने अपने भाई का नाम नहीं लेना चाहती। और मैं इतना ही कहती हूं कि हमें इससे छुटकारा पा लेना चाहिए।" सुन्दरी पशु की हत्या कर देती है। ग्रेगोर अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ता है। इस से अधिक श्रमसाध्य कुछ नहीं हो सकताः उसकी देह लगातार भूखा रहने से कमजोर पड़ चुकी है और उसका दिमाग जम गया है; उसे नहीं पता वह उतना बड़ा फासला कैसे तय कर सका। जैसे ही वह अपने कमरे में दाखिल होता है ग्रटे दरवाजे को जोर से भेड़ती है ताला बन्द करती है और चीखकर कहती हैः "आखिरकार।"

उस क्षण अंधेरे कमरे में ग्रगोर के लिए मर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। वह भूख से मर जाता हैः वह बहुत दिनों का भूखा था। लेकिन यह मृत्यु भी एक बलिदान हैः वह अपना सिर झुका कर मौत के फरमान को स्वीकार करता है और बेहद प्यार और संवेदना के साथ अपने परिवार के बारे में सोचता है। जैसा कि वल्टर सोकेल ने लिखा है वह अपने प्रियजनों के पापों की सजा पाने वाली बलि की बकरी है। वह ईसामसीह है जो समूची मानवता को बचाने के लिए मर जाता है। सबसे बड़ा गुण अन्ततः न तो शान्त पशुवत हल्कापन है न "वांछित और अनजाने पोषण" की खोज न अपनी बहन के साथ वह प्रमसंबंध न ही अपनी कोठरी में बिना हाथ उठाए लिखते जाना; सबसे बड़ा गुण बलिदान में है।

मरने से पहले ग्रेगोर को वह उपहार मिलता है जो शायद मृत्यु से पहले ही मिल सकता है - एक खाली और विचारशील मस्तिष्क। वह आखिरी बात घन्टाघर की घड़ी को तीन बजाते सुनता है। वह खिड़की के बाहर आसमान को चमकदार होता देखता है। फिर उसका सिर ढुलक जाता है और उसके नथुनों से आखिरी कमजोर सांस बाहर आती है।ग्रेगोर के बलिदान की प्रतिध्वनि सारी प्रकृति में गूंजती हैः वह जाड़ों के बीतने और वसन्त के आगमन की घोषणा करती है। अगर ग्रेगोर अपनी जान नहीं देता तो शायद प्रकृति सदा के लिए अपनी मृत ठण्डी आकृतियों में थम जाती - किसी मृत कीड़े की देह की तरह सूखी हुई। नया रक्त अब प्रकृति की नसों में बह सकता था और ब्रह्माण्ड के रूपान्तरण का चक्र फिर से शुरू हो सकता था।

परिवार अपना शीतकालीन पतन फेंक देता हैः उसके पिता अपना खोया स्वाभिमान वापस पाते हैं और किराएदारों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं; उसकी बहन का चेहरा खुशी से लाल हो जाता है और मां उसे गले से लगा लेती है। सारे के सारे मृत व्यक्ति के लिए आंसू बहाते हैं। लेकिन हमने प्रकृति के भलेपन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ग्रेगोर के शरीर को कोई नहीं दफनाताः उसके अंतिम संस्कार का जिम्मा उस रूखी नौकरानी को जैसे तैसे निभाने को सौंप दिया जाता है जिसका "उस बूढ़े तिलचट्टे" के साथ एक वास्तविक सम्बन्ध था। ग्रेगोर का रूपाान्तरण हमें पिछले जाड़ों में घटा दुस्वप्न लगने लगता है। मां बाप और बेटी ट्राम में बैठकर गांवों की तरफ जाते हैं और उत्तेजना के साथ भविष्य की बातें करते हैं। संभावनाएं काफी आकार्षक हैं : तीन नए रोजगार के मौके बढ़िया हैं¸ उन्होंने रहने के लिए नई जगह देखनी चाहिए और ग्रेटे की शादी के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए। ग्रेटे उठती है और सारे दुखों और सारी मौतों की तरफ जीवन की क्रूरता के साथ अपना युवा शरीर तानती है। ग्रेगोर ने अस्तित्व की सदाबहार प्रकृति को बचा लिया है। लेकिन वह ईसामसीह की तरह उसे परिष्कृत नहीं कर पाता। जीवन का कारोबार वैसा ही चलता रहता है उसके सारे खौफनाक चेहरों और अभिमानों के साथ और कोई भी अपनी आत्मा के लिए उस "अजाने पोषण" की लालसा नहीं करता।

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अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : जारी ...तीसरी किस्त

2:12 pm
( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की अगली पेशकश। इसमें काफ़्का की कालजयी कहानी मेटामोर्फोसिस के वक्त काफ़्का की मनःस्थिति और पृष्ठभूमि पर अच्छी रोशनी पड़ती है। )

काफ़्का जो इस कदर अध्यात्मिक आदमी था - सारी जिन्दगी अपनी देह को लेकर आब्सेस्ड रहा। उसका शरीर, जो उसे उसके जन्म के साथ किसी ने उसे ऐसे ही या नफरत के साथ दिया था, लगातार उसके बौद्धिक और अध्यात्मिक विकास लिए बाधाएं खड़ी करता रहा : उस शरीर के साथ वह अपने भविष्य में केवल त्रास देख पाता था। वह काफी ज्यादा लम्बा और कोणों से भरा हुआ था। वह उन सुन्दर देहों की तरह एक सीधी रेखा में बड़ा नहीं हुआ जिन्हें वह इस कदर सराहा करता था। उसके शरीर ने उसे झुकने और गिरने पर विवश किया। उसकी सारी नैसर्गिकता उस के साथ समाप्त हो गई। उसका कमजोर दिल लगातार दुखता था और उसकी धमनियों में पर्याप्त खून प्रवाहित नहीं कर पाता था जिस के कारण उस के हाथ पैर ठण्डे रहते थे। उसके भीतर जरा भी अन्दरूनी आग नहीं थी ; न वह न्यूनतम चबीर् जो उसकी आत्मा के लिए भोजन बनती। बहुत जल्दी उसे अपने दुबलेपन का रहस्य समझ आ गया था। उसकी सारी शक्तियां साहित्य में केंद्रित हो गई थीं ; उसने उन सारी ताकतों का दमन किया था जो और लोगों को खाने, पीने, संगीत सुनने और दर्शनशास्त्र के बारे में लिखने के लिए प्रेरित करती हैं ; और उसका शरीर बेतरह दुबला हो गया था।

सबसे गंभीर बात यह थी कि उसका शरीर उस के लिए अजनबी था ; एक अविवाहित के तौर पर उसकी प्रकृति को ढालने वाला सबसे बड़ा कारक। कौन सी आक्रामक शक्ति थी जिसने उसे ऐसे खोल में ढाला था ? "जो भी मेरे पास है वह मेरे खिलाफ है और जो मेरे खिलाफ है वह मेरा नहीं रह गया है। मिसाल के लिए अगर मेरा पेट दुखता है तो वह मेरा पेट नहीं है। वह किसी भी उस बाहरी आदमी जैसा है जो मेरी ठुकाई करना चाहता ह। और सब कुछ ऐसा ही है। मेरा पूरा अस्तित्व कांटेदार बाड़ से बना हुआ है जो मुझे चुभती हैं और अगर मैं ताकत लगाकर उनसे लड़ना चाहूं तो वे और गहरे मेरे भीतर धंस जाती हैं।" उसके शरीर के भीतर क्या था ? शायद धागे का एक गोला था जिसमें अनन्त सिरे थे और जो लगातार खुलता रहता था। और क्या इस बात का खतरा नहीं था कि दुश्मन की फौजें जो दुनिया के अजनबी कोनों से आ रही थीं उसे कुचल दें ? इसलिए बीमारी के वर्षों से पहले काफ़्का ने अपनी देह पर काबू करने का फैसला किया। वह घंटों टहला करता था तैरता था। तमाम शारीरिक अभ्यास करता था, खुली हवा में आधे कपड़ों में रहता था और उम्मीद करता था कि प्रकृति उसे उसके साथ रहने देने में मदद करेगी।

उसे लगता था उसके भीतर कोई पशु है। बार बार अपने अचेतन की आकृतियों में से जो मध्यकाल की पशुओं के चित्रों वाली किसी किताब की तरह विराट थीं वह अपने भीतर किसी सोते हुए गुबरैले को महसूस करता था ; जमीन में सुरंगें खोदते किसी छछूंदर को ; उस चूहे को जो आदमी के आते ही भाग जाता है ; एक फड़फड़ाते चमगादड़ को ; हमारे रक्त पर पलने वाले किसी परजीवी कीट को ; एक भुतहा जानवर को जो हताश किसी गड्ढे में या अपनी मांद में पड़ा होता है ; राख के रंग के कौए को जिसके पंख पूरी तरह विकसित नहीं होते ; एक गुर्राते हुए कुत्ते को जो उसके चैन में खलल डालने वाले हर शख्स को दांत दिखाता है या एक बुत के चारों तरफ परेशान भौंकता दौड़ता रहता है ; कभी दो जानवरों से बने जीव को जिसका शरीर भेड़ का है और सिर और पंजे बिल्ली के और जिसकी आंखों में दोनों की मिलीजुली चमक है ; या उन घृणित दुष्ट और परजीवी आदमियों में से एक को जिन्हें उसने 'अमेरिका' के आखिरी हिस्से में दिखलाया है। वह कई जानवरों से बेतरह डरता था। जब वह ज़ुराउ में था वह चूहों के बीच रहा था। उसे उस शान्त पशु शक्ति से डर लगता था जो कहीं घात लगाए बैठी होती थी। पर साथ ही उसे लगता था कि वे ही पाशविक शक्तियां उसके भीतर भी छिपी बैठी हैं। उसे अपने भीतर के पशुओं से इसलिए डर लगता था कि उसे खौफ था वे कभी भी अपने आप को प्रकट कर सकते थे और उसके हाथ पैर बालों से ढंक सकते थे और उसकी आवाज ने चहचहाहट में बदल जाना था जैसा कि उसने ओविड की 'मैटामारफासिस' में पढ़ा था। उसे पता था कि ऐसा होने पर वह मानवीय स्तर से नीचे उतर जाएगाः उस अंधकार में जो हमारी चेतना के नीचे वास करता है ; लेकिन वह इससे डरता नहीं था क्योंकि ऐसा होने पर उसका स्तर इस मायने में ऊंचा उठ जाना था कि वह अब तक न जीती गई रोशनी और संगीत को जीत सकता था।

तब उसे अपनी सिहरनें समझ में आईं। उसके भीतर रहने वाला पशु उसकी आत्मा और लेखक के उसके शरीर के अलावा कुछ न था जो हर रात अपने को प्रेरणा की आवाज की आज्ञा का पालन करता हुआ कोठरी में बन्द कर लेता था ठकि उसी तरह जैसे कुछ जानवर जाड़े का सारा मौसम खोहों में सोते हुए बिताया करते हैं। 17 नवम्बर 1912 को वह अपने कमरे में बन्द बिस्तर पर लेटा हुआ था। इतवार था। पिछली रात 'अमेरिका' लिखता हुआ वह संतुष्ट नहीं थाः उसे लग रहा था कि उपन्यास बदतर होता जा रहा था; फिर उसने सपना देखा कि एक जादुई डाकिए ने उसे फेलीसे के लिखे दो अन्तहीन पत्र ला कर दिए। अब बिस्तर में बैठा वह फेलीसे के वास्तविक पत्रों की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने पौने बारह तक इन्तजार किया और इन्तजार के उन दो भीषण घन्टों में उस पर बार बार होने वाला नैराश्य का वह आक्रमण हुआ - उसे लगा कि वह कोई ऐसा परजीवी पशु है जिसे दुनिया से बहिष्कृत कर दिया गया है और बाकी लोग जिसे कुचल सकते हैं या लतिया सकते हैं। संपूर्णता के साथ अपना मानवीय आयाम खोए हुए वह पूरी तरह बेहोशी और स्वप्नावस्था से गुजरा होगा और उसने एक कहानी सोची जिसे वह शब्दों में ढालना चाहता होगा। हमेशा की तरह उसने समय बरबाद नहीं किया। 'अमेरिका' को किनारे रख कर उसी शाम उसने उसे लिखना शुरू कियाः कहानी उसके हाथों में विस्तार लेने लगी। यह ऐसी कहानी थी जो हर दिशा में बढ़ रही थी और उसके और बाकी लोगों के जीवन की जटिलता को अपने भीतर समोए हुए थी। वह चाहता था उसके सामने एक न खत्म होने वाली रात होती जिसमें वह इस कहानी को पूरी तरह प्रकट कर पाता। उसने 7 दिसम्बर को उसे पूरा किया। वह "द मैटामारफासिस" थी।

निकलाशश्ट्रासे के छोटे से कमरे में उन दिनों एक दोहरा रूपान्तरण हुआ। रात की अपनी मांद में काफ़्का उन गहराइयों में उतर गया जहां अब तक कोई नहीं गया था। सभी सर्जकों की तरह उसने सभी चीजों में बदल सकने और सारे रूप धर पाने की अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। महीने भर से कम समय में एक ठण्डी बेहोशी के बीच उसने एक नया शरीर धारण किया और बेहद चौकन्नी निगाहों के साथ उसने अपनी कहानी के पात्र के रूपान्तरण का अनुसरण भी किया मानो कागज पर लिखते हुए वह भी एक विशाल परजीवी कीड़े में बदल रहा हो। ताल्सताय भी अपने आप को ब्रहमाण्ड की विराटता में एकरूप करते हुए कीड़े घोड़े या चिड़िया में तब्दील कर सकते थे ; लेकिन काफ़्का ऐसा अपनी गहराइयों को खोजने के लिए कर रहा था। निकलाशश्ट्रासे के उस छोटे से कमरे को जहां वह अपने मां बाप के साथ रहता था उसने ग्रेगोर साम्सा के अपार्टमेन्ट में बदल दिया। हर चीज सही सही थी : कपड़ों से भरी अल्मारियां, डेस्क और पलंग, खिड़की के बाहर अस्पताल, कमरे के ऊपरी हिस्से में प्रतिविम्बित होती गली की रोशनियां, दरवाजे, अपार्टमेन्ट के बाकी कमरों की व्यवस्था। इस तरह एक महीने के लिए उसका कमरा उस त्रासदी का रंगमंच बन गया था जिसने पूरे जाड़ों भर चलते जाना था।

जब हम कहानी शुरू करते हैं रूपान्तरण हो चुका होता है। शाम को ग्रेगोर साम्सा एक सामान्य ट्रैवलिंग सेल्समैन होता है ; उस रात उसे खराब सपने आते हैं ; अगली सुबह - जाड़ों की सुबह जो उतनी ही ठण्डी थी जितनी वह रात जब काफ़्का लिख रहा था - वह पाता है कि उसकी पीठ किसी जिरहबख्तर जैसी सख्त हो गई है, उसका पेट मुड़ा हुआ, भूरा और ऊंचा नीचा हो गया है, और उसकी आंखों के सामने असंख्य छोटे छोटे दयनीय पैर दर्दनाक उत्तेजना में हिल रहे होते हैं। उसके चारों तरफ बाकी सारी चीजें वैसी ही हैं : वही छोटा कमरा, मेज पर रखी कपड़े के नमूनों की किताब, तस्वीरों वाली किसी पत्रिका से काटा गया एक स्त्री का फोटो, वही उदास बारिश जो अंधेरे आसमान से गिरती रहती है। जिस तरह से हम इस नए प्राणी की संवेदनाओं को साझा कर पाते हैं वह महान होता हैः ठीक ग्रेगोर की ही तरह हम पाते हैं कि हमारी पीठ जिरहबख्तर जैसी सख्त हो गई है, पेट मुड़ा हुआ, भूरा और ऊंचा नीचा हो गया है और हमारी आंखों के सामने असंख्य छोटे छोटे दयनीय पैर दर्दनाक उत्तेजना में हिल रहे हैं। हमें एक तरफ हल्का दबा दबा दर्द है, पेट में खुजली लग रही है, ठण्ड और नमी है ; हम अचरज से भर जाते हैं जब हम पाते हैं कि हमारी आवाज के साथ चिड़िया की सी एक अजीब दर्दभरी आवाज मिल जाती है और वे असंख्य कांपती टांगें हमें बिस्तर से बाहर नहीं ले जा पातीं। चाहे पहले दान्ते के साथ हुआ हो या ओविड के पशु में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया कभी भी इतने विस्तार से नहीं लिखी गई थी जो हमें इस कदर अपने साथ जोड़ लेती है।

लेकिन खुद ग्रेगोर साम्सा हम से कम इस से जुड़ा प्रतीत होता है। वह आश्चर्यचकित नहीं है‚ न उसे कोई सदमा पहुंचा है ; ऐसा लगता है कि यह रूपान्तरण उसके लिए एक सामान्य प्राकृतिक तथ्य भर है जैसे रोज सुबह सात बजे की ट्रेन पकड़ना। जानते हुए या अचेतन में वह अपने साथ घटी हर चीज को संक्षिप्त कर लेता है ; वह उसे कोई महत्व नहीं देता और समझता है कि जो हो चुका वह लौटाया नहीं जा सकता मानो वह अपने भाग्य की इस एब्सर्ड त्रासदी को जी पाने में अक्षम हो। दयनीय भलेपन के साथ वह प्रयास करता है कि जो हो चुका है उसे व्यवस्थित किया जाए ताकि असंभव और भयानक को सामान्य बनाया जा सके। काफ़्का यहां पर अपने प्रिय नरेटिव उपकरण का प्रयोग करता हैः "मैदान को सीमित करना"; जिसके कारण हम ग्रेगोर की चेतना के कुछ हिस्सों से वंचित रह जाते हैं (जैसा बाद में कार्ल, जोसेफ के॰ और के॰ के साथ होता है)। इस तरह काफ़्का एक साफ साधारणता के साथ जीवन की उस त्रासद और दर्दनाक सच्चाई के स्वीकार को अभिव्यक्त कर पाता है जो ग्रेगोर साम्सा को फ्लाबेरियन नायकों में आखिरी और महानतम बनाता है।

अगली पोस्ट में जारी ...

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अनकहा कुछ : ३: फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : जारी ...दूसरी किस्त

4:30 pm
( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की अगली पेशकश। साथ में दी गई चित्रकृति स्वयं काफ़्का की है। )

'हिस्ट्री आफ द डेविल' में उसने पढ़ा था कि वर्तमान कैरिबियन में रात में काम करने वाले को संसार का सृष्टा माना जाता है। उसके पास संसार की रचना या पुनर्रचना करने की ताकत नहीं थी; लेकिन अगर उसने रातों को जगा रहना था तो वह उस सब को प्रकट कर सकता था जिसे उसके अजाने देवता ने उसे बताया था। सो उसने अपने ऊपर यह अनुशासन लागू किया : वह रात दस बजे अपनी डेस्क पर बैठता था और वहां से तीन या कभी कभी छः बजे उठता था। वह अंधेरे, एकान्त और खामोशी में लिखता था जबकि बाकी सारे सोए होते थे : फेलीसे जिसे वह मिलना नहीं चाहता था ; उसके मां बाप जिनके साथ वह बस बहुत थोड़े शब्द साझा करता था ; और उसके दोस्त - तब भी उसे लगता था कि रात अभी पूरी तरह से रात नहीं होती थी। वह चाहता था कि दिन और गर्मियों, सूर्योदय और सूर्यास्त को खत्म कर समय को एक अंतहीन शरद की रात में बदल देता। उसके चारों तरफ एक धीरगंभीर गतिहीनता होती और ऐसा लगता था मानो संसार उसे भूल गया था।

रात उसके लिए काफी नहीं होती थी। चूंकि उसकी प्रेरणा ऊपर स्वर्ग से नहीं बल्कि पाताल से आती थी उसे भी नीचे धरती के गर्भ में उतरना होता था और एक बार वहां पहुंच जाने पर अपने आप को ताले में बंद कर लेना होता था। वह सबसे दूर एक कोठरी में रहना चाहता था। पर कोई न कोई आवाज तब भी उसकी कोठरी तक पहुंच सकती थी ; शायद उसका अदृश्य साथी या फेलीसे या कोई दोस्त सारी बाधाओं को पार कर उसके एकान्त में दखल देने आ जाता। उसे इस एकान्त से ज्यादा कुछ चाहिए था : उसे मृत्यु की गहरी नींद चाहिए थी और कब्र की निबार्ध शान्ति जहां किसी भी तरह का मानवीय संपर्क असंभव होता है। तो आखिरकार एकाकी और मृत हो चुकने के बाद काफ़्का के पास लिखने के लिए आदर्श परिस्थितियां थीं। दफ्तर की चिन्ताओं से दूर, मानवीय संपर्क और विवाह जैसे झमेलों से दूर, उसके पास सारा समय अपने लिए था ; समय का एक अनन्त विस्तार क्योंकि समुद्र जैसी सीमाहीन प्रेरणा को बांधा नहीं जा सकता।

रात की गहराई में अकेले लिखते हुए अपने भीतर छिपी हुई और जड़ हो गई हर चीज को मुक्त किया और इस तरह उसे एक ऐसी खुशी मिलती थी जो उसके बर्फ जैसे हाथों और कांपते दिल को गरमा देती थी। शाम को जैसे ही वह अपनी डेस्क पर पहुंचता था फेलीसे को लिखे पत्रों का वह तूफान और हिंसा कहीं दूर चले जाते थे। वहां न कोई आईना था न मनुष्य न ही खुद वह जिसे कोई बात समझाई जानी हो। दिन भर की मानसिक यातना और हिस्टीरिया के बाद वह महामानवीय शान्ति का एक कोना खोज लेता था। उस जगह उसने एक भी टूटी पंक्ति नहीं लिखी : उसकी भीषण शान्ति और वह कोमल स्पर्श तब भी बने रहते हैं जब ग्रेगोर साम्सा और जोसेफ के॰ को उनकी मौत की तरफ ले जाया जाता है। कहानी वह जगह थी जहां हर चीज नियत और सही राह पर रखी जाती थी। इस दौरान रात को उस जगह पर अंधेरे का कायाकल्प हुआ करता था। उसे भली तरह पता था कि अचेतन में इस कदर पूरी तरह डूब जाने में बहुत सारे खतरे हैं : इसमें अपनी खोज से कभी वापस न आ सकने का जोखिम शामिल था या पागलों जैसी विकृत वापसी का।

लेकिन उसे यह भी मालूम था कि अगर वह अंधकार को तर्क के सामने लाएगा और इसे किसी बौद्धिक खेल में बदलेगा जैसा कि पो ने किया था उसका सारा काम व्यर्थ हो जाएगा। सो उन रातों को वह जादू हुआ करता था जो काफ़्का को आधुनिक लेखकों के बीच अद्वितीय बनाता है। रात अपना गाढ़ा अंधेरापन नहीं खोती थी ; अचेतन का रूपान्तरण होता था पर वह अचेतन बना रहता था; तर्क कभी खुद को चीजों पर नहीं लादता था; तो भी समूचा अजाना द्वीपसमूह रोशन हो कर सामने आता था बिना किसी परछाई या अपरिभाषित के जैसे कि वह दिन की रचना हो। हमें एक अद्वितीय अनुभव होता हैः हम एक साथ अचेतन और रोशनी की लहर में डूब जाते हैं।

उसके महान उपन्यास बेहद जटिल हैं : उनके भीतर हजारों संबंध और अन्दरूनी संपर्क दौड़ा करते हैं ; कोई भी घटना सैकड़ों पन्नों की दूरी के बाद संशोधित की जाती है ; हर आकृति का सिर्फ एक अर्थ होता है जब वह बाकी आकृतियों के रूबरू होती है; हर वाक्य को स्वतंत्र तरीके से समझा जा सकता है चाहे उसे किताब की संपूर्णता से अलग कर के ही क्यों न देखा जाए। ऐसे में हम यह सोच ही सकते हैं कि वह श्रमपूर्वक अपनी किताबों की योजना बनाता था और उन्हें लगातार संशोधित करता चलता था जैसा कि दोस्तोव्स्की और ताल्सताय किया करते थे। यह कतई सच नहीं है। अपनी कोठरी में 'अमेरिका' या ' द कासल' या 'द ट्रायल' लिखते हुए काफ़्का ने कभी किसी किताब का खाका नहीं बनाया। लेखन के वास्तुशिल्प की किसी भी समस्या का अस्तित्व नहीं था। किसी अतिप्रेरित व्यक्ति की तरह वह अपनी असीम लहरदार कल्पना के आगे समर्पित हो जाता था जो उसके भीतर रातों को बहा करती थी। और इस रात्रिकालीन प्रेरणा के लिए सारा संरचनात्मक ज्ञान उसे मिला हुआ था।

उसका लेखन लावा के महान प्रवाह जैसा होता था जिसमें न अध्याय होते थे न पैराग्राफ न विराम चिन्ह - उन्हें बाद में जोड़ा जाता था। वह बहुत कम संशोधन किया करता था। 1912 के पतझड़ के समय के ये दिन काफ़्का के जीवन में निणार्यक बने। 'डेस्कि`प्शन आफ अ स्ट्रगल' और 'मेडिटेशन' के जोकरपन के बाद उसने पाया कि वह वैसा कारीगर लेखक नहीं है जैसा वह सोचा करता था। अचेतन की छायाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया था ; 'मेटामारफासिस' 'अमेरिका' और फेलीसे को लिखे पत्रों के दौरान जो अनन्त तक लिखे जा सकते थे काफ़्का को आभास हुआ कि उसके पास कल्पना का उदद्ाम खजाना है। सब कुछ जैसे उसके काबू में था। अगर उसने चाहा होता तो वह दूसरा दोस्तोव्स्की बन सकता थाः ऐसी रचनाओं का लेखक जिनसे केवल प्रकृति ही टक्कर ले सकती है। मुझे यह कहने में मुश्किल हो रही है कि काफ़्का ने कितना जानबूझ कर ऐसा किया होगा। जैसा उसने कहीं लिखा है कि वह अपनी कल्पना के बड़े हिस्सों को संकरे रास्तों और संकरी सीमाओं में भेजा करता था। कैद काफ़्का की महानता का स्रोत थी। उसके बिना वह रह ही नहीं सकता था। लेकिन इस जीवन के लिए उसे एक पाप किए जाने का पछतावा रहा ; उसने अपने अजाने देवता द्वारा प्रस्तुत की गई संभावना को नकार दिया था।

उसे और शंकाएं भी थीं। किसी भी बाधा के सामने हार जाना उसके लिए बहुत होता था ¸ और वह दो दिनों के लिए लिखना छोड़ देता था क्योंकि उसे भय होता था कि वह सदा के लिए अपनी प्रतिभा खो चुका है। वह अपनी प्रेरणा पर विश्वास नहीं करता था। उसे लगता था कि वह बिना रुके किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाता था पर वहां एक पल को भी नहीं ठहर पाता था। एक तरह से इन संशयों को समझा जा सकता है : वह उन लेखकों में नहीं था जो हर सुबह अपने काम की मेज पर बैठा करते हैं - प्रेरणा आती थी और चली जाती थी। वह शान्त होकर वर्षों तक के लिए उसे छोड़कर जा सकती थी जिसके कारण वह बेहद दुखी हो जाता था। और इसके अलावा अगर हर चीज उसका ख्वाब भर थी तब? मान लिया कोई महाशक्ति अपने मकसद के लिए उसका इस्तेमाल कर रही थी तब? और अन्त में अगर अपने को कोठरी में बंद कर लिखते रहना ही सब से बड़ा पाप होता तब ? क्या फर्क पड़ता है कि उसने सारे नियमों को अस्वीकृत कर दिया? वह साहित्य से प्रेम करता था लेकिन वह सौन्दर्यवादी का विलोम था। उसका मानना था कि मनुष्य के सबसे महान कर्म दानशीलता से प्रेरित होना चाहिए जैसा कि ग्रेगोर अपने परिवार के लिए खुद को जला कर करता है।

अगली पोस्ट में जारी ...

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अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का

5:40 pm
( काफ़्का बीसवीं सदी के महानतम लेखकों में से एक थे। जितनी दिलचस्पी लोगों को उनके साहित्य के बारे में रही , उतनी ही जीवन के प्रति भी। काफ़्का के बारे में हालाँकि उनके साहित्य, डायरियों और पत्रों के मार्फ़त अच्छा पता मिलता है, पर अब भी उनके जीवन और लेखन के बारे में बहुत-सा तथ्य अनकहा है। हाल ही में कुछ ऐसे कागज़ात भी मिले हैं, जिसके बिना पर यह पुष्टि होती है कि काफ़्का के आत्मकथात्मक लेखन का एक बड़ा हिस्सा अभी छपना बाकी है। बहरहाल, साहित्य की पत्रिका, ''आधारशिला'' में जब इतालवी आलोचक और जीवनीकार पिएत्रो सिताती का लिखा काफ़्का की जीवनी अशोक पांडे के अनुवाद में पढ़ने को मिली तो यह लोभ स्वाभाविक था कि उसके अगले अध्याय सबद पर हों। अशोकजी ने कृपापूर्वक अब तक अनछ्पा जीवनी का तीसरा अध्याय हमें भेजा। हम उनके शुक्रगुजार हैं। पोस्ट लंबी न हो जाए इसलिए यह पूरा अध्याय टुकड़ों में दिया जा रहा है। इस स्तंभ में इससे पहले आप शेक्सपियर और अर्नेस्ट हेमिंग्वे के बारे में पढ़ चुके हैं। )

पशु की भूमिका में लेखक

अपनी युवावस्था में भी काफ़्का ने काव्यात्मक प्रेरणा को एक प्रवाह की तरह महसूस किया थाः एक ज्वार या तेज हवा की मानिन्द जो उसके दिमाग और शरीर को भर देती थी और उसे समुन्दर के पार ले जा सकते थी जहां महान काव्य की रचनाएं बहा करती थीं। ये हवाएं आम तौर पर रात को बहती थीं जिनके कारण या तो उसे नींद नहीं आती थी या उसे अपने सपनों से युद्ध करना होता था। यह एक तरह की मुक्तिदायक शक्ति होती थी पर साथ ही इससे उसके हाथ पैर टूट जाया करते थे। यह किनारों से उपजने वाला एक विद्रोह होता था, उसकी आत्मा का पाताल, उसकी चेतना का अचेतन अंधेरा। उसके भीतर कुछ था जिसके बारे में वह भी नहीं जानता था जो इस तूफान का सामना करता था। या तो वह उसे अपने में "समो लेता था या उसका दमन कर देता था"। वह कभी भी अपने अचेतन को पूरी तरह मुक्त नहीं करता था और शायद इसी कारण उसे दिशा नहीं दे पाता था। इस तरह काफ़्का को लगता था कि बजाय एक जीवन्त साम्य के उसके भीतर एक चिंघाड़ रहा करती थी।

उसने शब्दों की आक्रामकता को जान लिया था : "मेरा सारा शरीर मुझे शब्दों के खिलाफ पहरे में लगाए रखता है और मेरे द्वारा लिखे जाने से पहले हर शब्द अपने चारों तरफ देखता है "; और उसके दिमाग ने चीजों पर वह निबार्ध प्रवाह अभी लादना बाकी था जिसे उसके उपन्यासों का महान गुण बनना था। हर पंक्ति के साथ उसे फिर से शुरू करना होता था मानो वह किसी बेहद श्रमसाध्य पैटर्न पर काम कर रहा हो। उसकी डेस्क पर उसे हर चीज रूखी, मुड़ीतुड़ी, गतिहीन, हर तरफ से अपमानित, शर्मसार और सब से ऊपर खाली जगहों से भरी नजर आती थी। सिर्फ कटी फटी चीजें सतह पर आ पाती थीं ; हरेक टुकड़ा करीब-करीब बेघर मंडराया करता और अलग अलग दिशाओं में दौड़ जाता "मेरा तकरीबन हर शब्द दूसरे शब्दों से मेल नहीं खाता। मेरे संदेह मेरे शब्दों के चारों तरफ घेरा बनाए खड़े रहते हैं और मैं उन्हें अपने शब्दों से पहले देखता हूं।" मैक्स ब्राड को 'अमेरिका' के पहले ड्राफ्ट के बारे में बताता हुआ वह लिखता है कि बजाय एक दूसरे से जुड़े होने के वह अलग अलग टुकड़ों से बनी है।

मुक्ति आखिरकार आई। इतवार था - 22 सितम्बर 1912 - फेलीसे से उसकी मुलाकात के तकरीबन एक महीने बाद। उसे एक पूरा दिन अपने परिवार के व्यस्त कार्यक्रम के बीच गुजारना पड़ा थाः उसके बहनोई के कुछ रिश्तेदार पहली दफे घर आए थेः उसने अपना मुंह एक बार भी नहीं खोला और वह मारे उकताहट और हताशा के चीख पड़ना चाहता था। रात के खाने के बाद करीब दस बजे वह अपनी डेस्क पर था। उसकी इच्छा थी कि एक युद्ध का वर्णन करे। एक युवक ने एक खिड़की से एक भीड़ को आते देखा; इस पर उसकी कलम ने 'द जजमेन्ट' लिखना शुरू किया - पिताओं और पुत्रों की एक गाथा, क्रूरता और बलिदान की एक कहानी - जिसमें पहली बार उसका ईडिपस काम्प्लेक्स सामने आया। उसे तुरन्त आभास हुआ कि संघर्ष के वर्णन के उस पल अब वह फकत उंगलियों के पोरों स खेलने का मामला नहीं रह गया था। यह कहानी उसकी पूरी ऊर्जा के साथ लिखी गई है : दिल शरीर और आत्मा के साथ। यह एक तरह से "कूड़े और आंव से ढंका हुआ" सच्चा और वास्तविक जन्म था। उसके अचेतन की ताकत जिसे उसने अब तक दबाए रखा था अचानक पूरी तरह प्रकट हो कर सामने आ गई। उसके रास्ते की सारी बाधाएं अचानक टूट गई थीं।

वह रात भर बिना रुके बिना सोए लिखता रहा; उसकी टांगें डेस्क पर बैठे रहने के कारण अकड़ गई थीं। बिना किसी मनोवैज्ञानिक वर्णन के उसने वह सब लिखा जो उसके भीतर घुमड़ रहा था। अगर वह एक पल को भी रुका होता या अगर उसने एक किताब पलटी होती या उसका ध्यान जरा भी बंटा होता वह उस समय तक न कहे न सुने गए सत्यों को उजागर नहीं कर सकता था। लेखन इसी तरह का न रोका जाने वाला ज्वार था ; उसके भीतर जल की अपार अपरिभाषित निबार्ध गति थी और साथ ही उसका सफर भी मानो समुद्र की एकरूपता में एक के बाद एक जलसमूह एक दूसरे के ऊपर चढ़ रहे थे। अपनी डेस्क से चिपका हुआ काफ़्का अपना हाथ कागज से नहीं हटा पा रहा था। अगर ऐसा होता तो वह अपनी भाषा के उस प्रवाह और ऊर्जा को नहीं पा सकता था जिसके लिए उसने लम्बे समय तक साधना की थी। उसकी समझ में आया कि आपको एक ही बार में लिख देना होता है - न सिर्फ कहानियों को बल्कि लम्बे उपन्यासों को भी जैसा उसने 'द सैन्टीमैन्टल एजूकेशन' के साथ किया था और जिसे वह एक ही सिटिंग में अपने श्रोताओं को पढ़कर सुनाना चाहता था। "लेखन केवल इसी तरह संभव है। इसी तरह की एकरूपता के साथ जब शरीर और आत्मा अपने आप को पूरी तरह प्रकट कर देते हैं।"

दो बजे उसने आखिरी बार घड़ी देखी। उसकी थकान गायब हो गई। कुछ घंटों बाद बाहर की हवा नीली होनी शुरू हुई ; एक बग्घी गुजरी; फिर दो आदमियों ने पुल पार किया। दिन का उजाला हो चुका था जब उसने बत्ती बुझाई। छः बजे जब नौकरानी गलियारे से होकर गुजरी वह अपना आखिरी पैराग्राफ लिख रहा था। उसने कुर्सी पीछे खिसकाई और कमरे के बाहर पसर कर नौकरानी से कहाः "मैं अब तक लिख रहा था"। लड़खड़ाते हुए वह अपनी बहन के कमरे में घुसा और उसने वह कहानी पढ़ी ; उसे कहानी का अर्थ नहीं पता था। उसे महसूस हुआ कि उसकी आंखें चमक रही हैं। फिर थकान और प्रसन्नता के साथ वह अपने बिस्तर पर पहुंचा। उसके दिल के आसपास हल्का सा दर्द था और पेट की मांसपेशियों में ऐंठन।

उस रात दस बजे से सुबह के छः बजे तक काफ़्का ने अपने लिए सदा के लिए साहित्य और काव्यात्मक प्रेरणा का सिद्धान्त स्थापित कर लिया - जैसा प्लेटो और गुइटे बाद कभी नहीं हुआ था। वह इस बात को लेकर निश्चित था कि कहीं न कहीं एक महाशक्ति है जो उसके हाथ का इस्तेमाल करती है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वह कौन थी : चाहे वह कोई जाना अजाना देवता हो चाहे कोई दैत्य या फिर अंधकार का वह समुद्र जिसे वह सदा अपने साथ लिया चलता था और जिसे वह महानतम वस्तुनिष्ठ शक्ति के रूप में पहचानता था। उसे बस उसकी आज्ञा का पालन करना था और उसके संकेतों को पहचानना था और महान साहित्य की रचना करनी थी। यह एक बहुत बड़ा काम था ! इसका मतलब था संदेहों और प्रतीक्षाओं से भरपूर मेहनत। वह सिर्फ आज्ञा का पालन करने से संतुष्ट न था ; उसने अपने भीतर और बाहर बहुत सारी चीजों को तहस नहस करना था। बहुत सी बातों को भुलाया जाना था : परिवार, दोस्त, प्रकृति, स्त्रियां, यात्राएं, फेलीसे, बच्चे, बातचीत, संगीत।

यह एक तरह की कीमियागरी थी : अपने आप को त्याग कर उस महत्तर और पवित्र पदार्थ की रचना करना जिसे साहित्य कहते हैं। अगर वह ऐसा नहीं करता तो साहित्य का देवता उसे जिन्दा नहीं रहने देता। "कल मैं फिर लिखना शुरू करूंगा। मैं चाहता हूं अपनी पूरी ताकत से जुट जाऊं ; अगर मैं लिखूंगा नहीं तो मुझे लगता है वह कठोर हाथ मेरे भीतर से जीवन निकाल लेगा।" अगर वह नहीं लिखता तो वह हल्की से हल्की चीज का गुलाम बन जाता। और अगर वह लिखता तो शायद कोई उम्मीद थी। शायद वह दुनिया को रूबरू देख पाने लायक बन जाता और साहित्य का देवता उसके लिए उपहार के तौर पर फेलीसे को लेकर आता।

वह जानता था कि भले लोग रातों को सोया करते हैं - बच्चों की तरह अपनी नींद में सुरक्षित जहां एक दैवीय हाथ उन्हें दुस्वप्नों से बचाए रखता है। नींद सबसे पवित्र दैवीय वस्तु होती है जो केवल पवित्र लोगों की पलकों पर उतरती है। जिन्हें नींद नहीं आती वे अपराधी लोग होते हैं क्योंकि उन्हें आत्मा की शान्ति के बाबत कुछ पता नहीं होता और वे अपनी सनकों से प्रताड़ित होते रहते हैं। सभी अपराधियों की तरह वह भी अनिद्रा का शिकार था। शाम को उसे नींद आ जाती थी पर एक घंटे में वह फिर जाग जाता था मानो उसने अपना सिर गलत जगह पर रखा हो।

वह पूरी तरह जगा होता था और उसे लगता था कि या तो वह जरा भी नहीं सोया या फिर नींद बस उसकी महीन त्वचा के ऊपर आई थी। अभी उसे और सोने का जतन भी करना होता था। फिर वह दुबारा सो जाता था। उसका शरीर खुद अपनी बगल में सोया होता था जबकि वह अपने सपनों से संघर्ष करता हुआ भटका करता था। पांच बजे के आसपास नींद के आखिरी निशान खत्म होने को होते थे और उसके दुस्वप्न जागृतावस्था से भी अधिक थका देने वाले होते। जब वह पूरी तरह जाग जाता उसके स्वप्न उसके चारों तरफ इकठ्ठा हो कर भयभीत आंखों से उसे देखा करते। लेकिन वह जान गया था कि उसकी अनिद्रा जो उसका पाप थी वही उसकी ताकत भी थी। इस तरह की बेचैन नींद सोने वाला रात और उसके राक्षसों को पहचानने लगता है और अपने अचेतन में छिपे इन दैत्यों को उसने जगाना ही था जैसा कि उसने 'द जजमेण्ट' लिखने की रात फिर कभी न सो पाने की कीमत पर किया।

अगली पोस्ट में जारी ....

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सबद विशेष : ४ : दिलीप चित्रे

8:47 pm


( दिलीप चित्रे मराठी के शीर्षस्थानीय कवि हैं और 1७ सितंबर को जीवन के सत्तर वर्ष पूरे कर रहे हैं। चित्रे की कविताओं का करीब पच्चीस बरस पहले हिन्दी में कवि चंद्रकांत देवताले ने पुस्तकाकार अनुवाद किया था। तब उनकी कविता और उसके कंसर्न से लोग चकित हुए थे क्योंकि चित्रे कविता के भीतर नवाचारी थे पर उसे पोसते नितांत पारंपरिक काव्य-स्रोतों से थे। बदलते वक्त और कविता के प्रतिमानों के तइं भी उन्होंने अपने इस मूल काव्य-गुण को बचाए रखा है। चित्रे ने अंग्रेजी में भी प्रभूत कविताएं लिखी हैं। हालाँकि यह तथ्य है कि छिटपुट अनुवादों के अलावा उन्हें हिन्दी में गृहस्त बनाने का देवताले सरीखा एकनिष्ठ उद्यम किसी ने नहीं किया। अब युवा कवि तुषार धवल ने यह पहल की है और चित्रे के सौजन्य, प्रेरणा और अपने पित्तामार मेहनत से वे उनकी अनेक कविताओं का अनुवाद कर गए हैं। हमें उन अनुवादों में से कुछेक को सबद में प्रकाशित करते हुए प्रसन्नता हो रही है। स्वयं चित्रे ने सबद को जो परोक्ष स्नेह, समर्थन और मार्गदर्शन दिया है उसका भी खुला स्वीकार यहाँ ज़रूरी है। हम आने वाले दिनों में अन्य भारतीय भाषाओँ के मूर्धन्य कवि-लेखकों के अनुवाद भी प्रकाशित करेंगे। फिलहाल चित्रे को सबद की ओर से : जीवेत् शरदं शतम्। )

कविताएं तुषार धवल के अनुवाद में

प्रस्तावना

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
हर कोने हर एकांत में
जहाँ रोशनी नहीं पहुँचती तुम्हें खोजने
तुम्हारे एकांत को भयानक भीड़ बनाने

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
मन के हर दरार हर तरेड में
जहाँ विचार रिस कर नहीं आते

पड़े रहो नीचे और गहरे
क्योंकि सतह वाली कोई भी चीज़ तुम्हें सहायता नहीं देगी

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
हो जाओ छविहीन और रहो एकाकी
क्योंकि तुम्हें फ़िर भी एक मौका मिल सकता है
मनुष्यों की दुनिया में उग आने का।

****
धरती तेजी से अपनी स्मृति खोती जा रही है

धरती तेजी से अपनी स्मृति खोती जा रही है
और इसमें मैं अपनी स्मृतियों को खोता हुआ पाता हूँ
क्योंकि मैं बहुत पहले से जानता हूँ कि
स्मृति केवल आपराधिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है
स्मृतियाँ हैं जो लगातार आती हैं
जड़, तने और टहनियों से
और ज़िन्दा रहती हैं आसन्न भविष्य के बाद भी
स्मृतियाँ पुनर्सृष्‍ट होती उगती हैं
गढ़ती हैं अपना काम, पहचान और रूप
वे उस जीवन से ज्यादा अलग नहीं हैं जिसे हमने जाना है
घाव, उत्सव और
ज्ञान में उठते चक्र और भंवर
शून्यता के प्रति

अब मैं पाता हूँ कि यह धरती छोटी पड़ गई है
अपनी असंख्य और अकबकाई मनुष्यता के लिए
जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जगह हड़प लेना चाहता है
और जगह बचती नहीं है किसी की स्मृतियों के लिए
ख़ुद स्मृति की भी नहीं।

और जब स्मृति खो जाती है
पागल हिंसाओं का युग आता है

भय की कोई स्मृति नहीं होती
घृणा की कोई स्मृति नहीं होती
अज्ञान की कोई स्मृति नहीं होती
एक बेलगाम हिंसक पशु अब संभावित ईश्वर नहीं रहा।


****
खून धीरे धीरे निकलता है कलेजे से

खून धीरे धीरे निकलता है कलेजे से
वह धड़कता रहता है ख़त्म हो जाने तक।
लगातार खून बहाते रहना हमारे भाग्य में है
जब तक कि हमारा नामोनिशान मिट न जाए।

मैं वो कागज़ नहीं हूँ, जिस पर मैं लिखता हूँ
न ही वो शब्द जिसे मैं टाइप, प्रिंट या स्याही से उगलता हूँ।
मैं किसी घटना की छाया नहीं हूँ
न ही उसका कोई दाग जो मिट नहीं सकता।

यह
एक तरह का खून है जो न जमता है न थमता है।
यह प्रतीक भी नहीं है
ज्ञान की अमिट लौ और उसकी रोशनी के मिथकों का।

मेरे पंछी बिना आकाश के उड़ते हैं।
मेरी मछलियाँ तैरती हैं शून्य में।
मेरे शब्द पड़े हैं आहटों के जंगल में
उन पेड़ों के बीच जो अभी उगे नहीं हैं, उभरे नहीं हैं।

****
२२ दिसंबर, उत्तरी गोलार्ध का सबसे छोटा दिन

मैं तरसता हूँ आदिम गुफा के लिए।
मेरे पशु को नींद चाहिए।
मेरे पोषण को बहुत कम बचा है सिवाय उसके जो मेरे भीतर जमा है।
मैं बहुत धीमी साँस लेना चाहता हूँ, तल को छूते हुए।

काश यह दिन और भी छोटा हो पाता, रोशनी के क्षणांश जितना।
काश यह चक्र और भी धीमा हो पाता, बस एक क्षणिक चमक,
चौबीस घंटों में, बाकी सब एक गहरी रात।

मैं आँखें बंद कर लेना चाहता हूँ हिमपात पर,
मैं अनजान रहना चाहता हूँ बदलाव की निरंतरता की पीड़ा से,
घड़ी की ज़िद से, धरती के घूमने से, नक्षत्रों की चाल से।

सितारों और उपग्रहों से, उस बल से जो हमें देश काल में
मोड़ देता है, चेतना के आंतरिक घुमाव से,
मैं होना चाहता हूँ : न ऊर्जा, न पदार्थ, न जीवित कुण्डलिनी।

सिवाय उस बोध की सबसे छोटी झपक के, जो दबी है त्वचा
और मांस के भीतर, मस्तिष्क की खोह में छुपा, जाड़ों का रहस्य।

****
धीरे धीरे

धीरे धीरे आओ, जैसे आता है शोक
या फुर्सत से आओ जैसे आती है दर्द की याद
जो सुन्न हुए दर्द से भी गहरी यातना देती है

ज़िन्दगी ने मुझे पहले भी सुन्न किया है
और मौत ने उसके बाद हमेशा।
आओ मेरे पास, जैसे धीमी ताल में आती है कविता
एक अनकहा अर्थ पाने।

धीमे सधे क़दमों से पास आओ मेरे
जैसे आती है मौत
करो मेरे साथ टैंगो का अंतिम मत्त नर्तन।

बिजली की गति, चौंका दो मुझे
अपनी गणितीय निरंतरता से
अंकित करो मुझे ईश्वरीय धुंध पर
और कृपा दो कि धीमा हो सकूँ
गहरे अतल में समाते हुए।

****

मेरे लिए ये कविताएं अंत हैं

मेरे लिए ये कविताएं अंत हैं
ये एक तरह से मुझे ख़त्म करती हैं
भले ही ये किसी सुइसाइड बॉम्‍बर की तरह
आपके पास पड़ोस में फट जाए

मैं आतंकवादी नहीं हूँ लेकिन आतंक के युग में जीता हूँ
इनमें से कुछ मेरे कोमल मुहावरों में घुस जाते हैं
मैं किसी इलहाम को सच करनेवाला जेहादी भी नहीं हूँ
बस मेरी कविताएं ही मुझे ख़त्म करती हैं

फिर एक बार नए आश्चर्य पाने को
मैं इंतज़ार करता हुआ खालीपन बन जाता हूँ
लेकिन ज्यादातर वे दर्द ही लाते हैं
कुछ कभी लाते हैं अलभ्य प्रकटन
सीमाहीन सुरों सा

इसका कोई अंत नहीं, सिवाय मेरे
दूर मुझसे बल्कि सभी कविता उड़ी जा रही है।

****

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सखा पाठ : २ : गुलजार बजरिए रवींद्र व्यास

5:42 pm

( वे
पेंटर हैं, कहनियाँ लिखते हैं, हरा कोना नाम का उनका ब्लॉग है और हिन्दी के इस वर्चुअल वर्ल्ड में उनकी सजग उपस्थिति चहुँ ओर सराही गई है। जब हमने सखा पाठ स्तंभ शुरू किया था तो उसके पीछे किसी रचना से प्रेरित रचना को सामने लाने की अवधारणा थी। सबद में ही रिल्के पर छपे राजी सेठ के लेख के बाद बतौर बढ़त गिरिराज किराडू की कविता दी थी। उसके बाद यह सिलसिला थम सा गया। रवींद्र व्यास के माध्यम से अब फिर से शुरू हुआ है। उन्होंने गुलजार की कविता पर न सिर्फ़ पेंटिंग दी, बल्कि इसरार करने पर गद्य भी भेजा। हम उनके आभारी हैं। )



एक
और रात


गुलजार

चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात खामोश है, रोती नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला-सा गुंबद है, उड़ा जाता है
खाली खाली कोई बजरा-सा बहा जाता है

चांद
की किरनों में वो रोज-सा रेशन भी नहीं
चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है

काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता

****


ये देखो तो क्या होता है

गुलजार
की जमीन और आसमान सरगोशियों से मिलकर बने हैं। ये सरगोशियां खामोशियों की रातें बुनती हैं। इन रातों में कई चांद डूबते-उतरते रहते हैं। कई टंगे रहते हैं, अपने अकेलेपन में जिनकी पेशानी पर कभी-कभी धुआं उठता रहता है। दूज का चांद, चौदहवीं का चांद और कभी एक सौ सोला रातों का चांद। कभी ये चांद किसी चिकनी डली की तरह घुलता रहता है। ये चांद ख्वाब बुनते रहते हैं। ख्वाबों में रिश्ते फूलों की तरह खिलते रहते हैं और उसकी खुशबू पलकों के नीचे महकती रहती है। ये रिश्ते कभी मुरझा कर ओस की बूंदों की तरह खामोश रातों में झरते रहते हैं।

वे किसी गर्भवती स्त्री की तरह गुनगुनी धूप में यादों को गुनगुनाते महीन शब्दों से मन का स्वेटर बुनते हैं। इसमें उनकी खास रंगतें कभी उजली धूप की तरह चमकती रहती है। कभी इसमें सन्नाटों की धूल उड़ती रहती है। इसकी बनावट और बुनावट की धीमी आंच में रिश्तों के रेशे अपने दिलकश अंदाज में आपके मन को आपकी देह को रूहानी अहसास कराते हैं।

कहते हैं किसी की आत्मा पेड़ों में बसती है। किसी आत्मा एक फूल में बसती है। कहते यह भी हैं कि आत्मा एक पिंड में बसती है। और यह भी कि आत्मा एक स्वर्ग में बसती है, एक मुहूर्त में बसती है। क्या कहा जा सकता है कि गुलजार की गीतात्मा चांद में बसती है। और चांद यानी रात भी। और रात यानी तारे भी। और तारे यानी समूची कायनात। और इसके बीच वह भी जिससे हिज्र की रात में कहा जा रहा है कि काश इक बार कभी नींद में उठकर तुम भी ये देखो तो क्या होता है...

यह एक और रात है...

इस नज्म की पहली लाइन में रात के बहाने अपनी स्थिति बताने का एकदम सादगीभरा जलवा है। कोई बनाव नहीं। कोई श्रृगांर नहीं। लुभाने-रिझाने का कोई अंदाज नहीं। अकेलेपन में रात का चुपचाप, एकदम खामोश गुजरनाभर है। यह एक इमेज है। कहने दीजिए गुलजार इमेजेस के ही कवि हैं। दूसरी लाइन में कोई आहट नहीं, कोई गूंज नहीं। न रोना, न हंसना। एक अनकहे को पकड़ने की कोशिश। एक जरूरी दूरी पर खड़े होकर। न डूबकर, न उतरकर। अपने को भरसक थिर रखते हुए। तीसरी लाइन में रात के जादू को आकार में पकड़ने का वही दिलकश अंदाज है। इसमें चार चीजें हैं-कांच है, नीला है, गुंबद है और वह उड़ा जाता है। कांच, जाहिर है यह रात को उसकी नाजुकता में देखने की निगाह है। रात नीला गुंबद है। अहा। क्या बात है। इसमें एक कोई देखी मुगलकालीन भव्य इमारत की झीनी सी याद है।

यह रात को कल्पना से तराशने का सधा काम है। रात को एक आकार देना। उसे देहधारी बनाना। और यह गुंबद है, जो उड़ा जाता है। यानी एक एक मोहक और मारक गति है। एक उड़ती हुई गति। जाहिर है इस गति में रात की लय शामिल है। बीतती लयात्मक रात। यह मोहब्बत का स्पर्श है जो गुंबद के भारीपन को किसी चिड़िया की मानिंद एक उड़ान देता है। विश्व विख्यात मूर्तिकार हेनरी मूर को याद करिए। वे पत्थर में चिड़िया को ऐसे ढालते हैं कि पत्थर अपने भारीपन से मुक्त होकर चिड़िया के रूप में उड़ने-उड़ने को होता है। यह फनकार की ताकत है, अपने मीडियम से मोहब्बत है।

पांचवी लाइन बताती है कि यह शायर रातों की जागता है और रोज ही रातों को निहारता है। इसी जागने से यह एक और रात बनी है जिसमें कहा जा रहा है कि चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन नहीं। यह आपकी इंद्रियों का जागना भी है। कलाकार यही करता है। वह सभी इंद्रियों के प्रति आपको सचेत करता है। यह देखना-दिखाना भर नहीं है। छठी पंक्ति में चिकनी डली है। स्पर्श का अहसास है। फिर घुलना है। यह एक और रात कि घुली जा रही है। कि पर गौर फरमाएं। है न कुछ बात। और सातवीं लाइन में इन सबसे घुल-मिल कर एक सन्नाटा रात की तरह ही फैलता जा रहा है। वे इसे उड़ती धूल में पकड़ते हैं। महीन धूल। आठवीं और नौवीं लाइन मारू है। यह रात का जो जादू है, उसकी सुंदरता का जो भव्य स्थापत्य है, अकेलापन है, सन्नाटा है और खामोश गुजरना भर है, इसमें एक ख्वाहिश भी है कि कोई हिज्र की रातों में नींद से उठकर इसे देखे। यह भी कि- ये देखो तो क्या होता है।
***

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कवि की संगत कविता के साथ : ५ : लाल्टू

4:26 pm
( लाल्टू लंबे अरसे से कवि-कर्म में संलग्न हैं और अपने को हिन्दी की उखाड़-पछाड़ की साहित्यिक गुटबाजी से बिलकुल अलग रखा है। पर ऐसा वे अकेले नहीं कर रहे हैं। कवि नाम धरे ऐसे कई लोग हैं जिन्हें गुटबाजी से मतलब नहीं। पर ज़रूरी नहीं कि इस शुचिता से उन्होंने अच्छी कविता भी संभव कर ली हो। लाल्टू अगर ऐसा संभव कर सके हैं तो उसकी वजह यह है कि जिस हाशिए से कविता की कार्रवाई वे शुरू करते हैं, वहां मुख्यभूमि का बहुत कुछ त्याज्य/वर्जित पड़ा हुआ है। और असल में वह त्याज्य न होकर समाज का ही अभिन्न अनुभव है। इस बार कवि की संगत कविता के साथ में लाल्टू को पढ़िए। )

आत्मकथ्य

अनंत संभावना है कविता के लिए

कविता पर नया कुछ लिखने के लिए सचमुच मेरे पास कुछ नहीं है। पेशेगत रुप से साहित्य से दूर होने की वजह से या अन्य कारणों से इस सवाल पर बहुत सोचने की गुंजाइश भी नहीं रही। बचपन से किशोरावस्था तक कहानियाँ, उपन्यास पढ़ते हुए मन में आगे चलकर कहानीकार बनने कि तीव्र इच्छा पनपी। कहानियाँ लिखीं भीं। गद्य में और भी बहुत कुछ लिखा। शायद वक्त मिले तो अभी और भी बहुत लिखने की छटपटाहट है। सच यह है कि कविता लिखते हैं क्योंकि कविता पर रुक रुक कर काम करने की संभावना बेहतर है। गद्य एकबार में ज्यादा वक्त माँगता है। संगत के अभाव से और समय के अभाव से कविता पर जितना काम करना चाहिए, उतना दे नहीं पाया हूँ, पर फिर भी कोशिश की है।

विकल की कुछ पंक्तियाँ कविता के बारे में बहुत साफ कहती हैं - जैसे कि 'कविता आदमी का निजी मामला नहीं एक-दूसरे तक पहुँचने के लिए एक पुल है।' या यह पीड़ा कि 'मैंने बचपन में ज़िद क्यों की थी/ माँ ने क्यों मुझको झूठा बायस्कोप देखना सिखलाया था?' बायस्कोपी मायावी दुनिया में गोते लगाकर कविता हमें सच्चाई तक ले जाती है। इतने वर्षों बाद दुनिया की तमाम कविताओं में से पता नहीं क्यों विकल की कविताएँ सबसे पहले याद आ रही हैं। बचपन में मुहल्ले में बांग्ला कविता 'आवृत्ति' करते हुए कभी सोचा न था कि नजरुल, सुकांत से आगे भी कुछ होगा। धीरे धीरे न केवल आगे, बल्कि पीछे भी बढ़े या यूँ कहें की पीछे की रचनाओं में आगे की संभावनाएँ दिखने लगीं। रवींद्र से लेकर घर में जबरन पढ़वाई गई गुरबाणी (आदि सच जगादि सच, है भी सच नानक होसी भी सच) तक न जाने क्या क्या बातें असर कर गई हैं। इन दिनों पठाने खान का गाया फरीद सुनता हूँ और लगता है 'क्या हाल सुनावाँ दिल दा...' से बेहतर क्या लिखा क्या गाया जा सकता है। तो हम ठहरे महज लिखने वाले, जो भी पढ़ते सुनते हैं उसी को दुबारा लिख डालते हैं। अपना तो सचमुच कुछ है ही नहीं।

उम्र के साथ मेरी कविता मध्यवर्गीय जागरुक पर विभाजित व्यक्तित्व से जूझने की चीख बन गई है। मेरी कोशिश है कि कविता में ईमानदार रहूँ। अक्सर हम पाते हैं कि निजी जीवन में हमारी प्रतिबद्धता सीमित है, पर कविता में वह मुखर है। जबकि होना चाहिए कि कविता में उतनी ही बात हो जितनी हम जीते हैं। प्रतिबद्धता स्वयं हमारे शब्दों में आती है। इसी तरह रुप पर ध्यान दिए बिना हम क्या लिख सकते हैं? हर सचेत कवि इन बातों को सोचता है। कविता एक तरह की सेल्फ-थिरेपी भी है। लिख कर सुकून मिलता है। यह सुख उसे भी चाहिए जो दुनिया को बुनियादी तौर पर बदलना चाहता है और इसके लिए संगठित प्रयासों के साथ जुड़ा है। मैंने ऐसे लोगों की ओर से कुछ कहने की कोशिश की है। यह ज़रुर कहना है कि कविता की माँग कितनी ज्यादा है यह कवियों तक को नहीं पता है। मैंने आम तौर से कविता से विमुख माने जाने वालों के साथ ही कविता चर्चा की है और पाया है कि हर कोई कविता के प्रति स्वतः खिंचता है। इसलिए अनंत संभावना है कविता के लिए।

दो नई कविताएं

हाजिरजवाब नहीं हूँ

हाजिरजवाब लोग
जवाब देने के बाद होते हैं निश्चिंत
उनके लिए तैयार होते हैं जवाब
जैसे जादूगर के बालों में छिपे रसगुल्ले

जादूगर बाद में बाल धोता होगा
अगली शो की तैयारी में फिर से रसगुल्ले रखता होगा

मैं हाजिरजवाब नहीं हूँ
इसलिए नहीं कह पाया किसी महानायक को
सही सही, सही वक्त पर कि उसकी महानता में
कहीं से अँधेरे की बू आती है
मैं ताज़िंदगी सोचता रहा
कि बहुत जरुरी थी
सही वक्त पर सही बात कहनी।

कभी
कहा ठीक तो किसी बच्चे से कहा
कि गिरने पर चोट उसे नहीं
उसकी धरती को लगी है
जो उसी के साथ हो रही है धीरे धीरे बड़ी
कभी कहा ठीक तो किसी सपने से कहा
कि माफ कर देना
रख दिया तुम्हें अधूरा
बहुत चाहते हुए भी नहीं हो सका असाधारण

अचरज यह कि प्यार करते हैं मुझे सबसे ज्यादा
बच्चे और सपने।

****
शहर में शहर की गंध है

बारिश में बहती
नक्षत्रों के बीच
यात्राओं पर चली
मानव की गंध।

शहर में शहर की गंध है
मानव की गंध
सड़क पर मशीनें बन दौड़ती

बचते हम सरक आते
टूटे कूड़ेदानों के पास
वहां लेटी वही मानव-गंध

मानव-शिशु लेटा है
पटसन की बोरियों में

गू-मूत के पास सक्रिय उसकी उँगलियाँ
शहर की गंध बटोर रहीं
जश्न-ए-आज़ादी से फिंके राष्ट्रध्वज में

****
पुराना चावल

आजीवन

फिर मिले
फिर किया वादा
फिर मिलेंगे।


बहुत दूर
इतनी दूर से नहीं कह सकते
जो कुछ भी कहना चाहिए

होते करीब तो कहते वह सब

जो नहीं कहना चाहिए

आजीवन ढूंढते रहेंगे
वह दूरी
सही सही जिसमें कही जाएँगी बातें


****
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बही - खाता : ३ : कुमार अंबुज

12:19 pm
( उनकी पहचान हालाँकि कवि के रूप में है और जिन लोगों ने क्रूरता और अनंतिम कविता-संग्रहों की कविताएं पढ़ी हैं वे शीघ्रता से अनुमान लगा लेंगे कि वे एक कवि के रूप में अपने साथ लिखने वाले कविओं से कितने अलग हैं। यह बात अब उनकी कहानियो के बारे में भी लोग कह सकेंगे जब उनके हाथ उनका पहला कहानी-संग्रह ( इच्छाएं नाम से ) आएगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य भेजा है। उस अबूझ-अनसुलझी गुत्थी पर इस दफा बही-खाता में कुमार अंबुज को पढ़िए। हम आनेवाले दिनों में उनका कुछ और गद्य भी प्रकाशित करेंगे। )

अव्याख्येय प्रक्रिया

कुमार अंबुज

याद कीजिए, बचपन में आपने एक चट्टान देखी, हिनहिनाते हुए एक ऊंचे-पूरे घोड़े ने आपका मन मोह लिया, खेत पर सिर्फ़ प्याज के साथ रोटी खाते हुए घर के हलवाहे को देखा, घर में ही अशक्त दादी को पेशाब करते समय देखा कि उसका गर्भाशय नीचे लटक आया है, और उस समय ठीक-ठीक इसे समझा नहीं जा सका। मरे हुए बैल को घसीटा जाना, उसका चमड़ा उतरते देखना, छप्पर से आती चांदनी और माघ महीने की सुबह सात बजे की नदी के पानी की ऊष्णता। तब हम भाषा का लिखित रूप भी प्रायः नहीं जानते थे।

बचपन में देखे ऐसे असंख्य दृश्यों, अनुभवों से गुजरते हुए क्या पता था कि ये कभी रचना-प्रक्रिया, रचना-अनुभव, जीवन को समझने के लिए सूत्र, जिज्ञासा के कारक और आनंद और बेचैनी की अनुभूतियों के हिस्सा हो जाएंगे। एक दिन कागज़ पर उतरने को बेताब रहेंगे और अधिकांश रचना का रूप ले ही न सकेंगे अथवा कागज़ पर आकर हास्यास्पद, कुरूप और ठस्स हो जाएंगे। या नई दीप्ति, उत्तेजना, आक्रोश और पीड़ा से भर उठेंगे। फिर जीवन भर जो देखा-सुना-पढ़ा-लिखा और अनुभव किया जाएगा वह पीछा करता ही रहेगा। वह असीम रेगिस्तान में जुड़ता जाएगा जिसमें चलना और चमक के पीछे भागना नियति होगी।

रचनाकार जानता है कि रचना-प्रक्रिया सर्वाधिक अव्याख्येय है। यहाँ किंचित ठहरकर सोचा जा सकता है कि क्या वे ही क्षण इस प्रक्रिया में शामिल हैं जब हम शरीर में घटित किसी रासायनिक प्रक्रिया, उत्तेजना या सांद्रता के चलते अपनी टेबुल से जा लगते हैं, राह चलते सिगरेट के खाली पैकेट को उठा कर उस पर चुपचाप कुछ लिख लेते हैं अथवा पहली फुरसत में विस्तार दे सकने के लिए एक वाक्यांश को लगभग कंठस्थ कर लेते हैं। जबकि चीजें अक्सर अवाक् कर देने वाले ढंग से आपके पास आती हैं। उनके प्रेरणा स्रोत इतने विविध, अप्रत्याशित और अज्ञात हैं कि उन्हें किन्हीं निश्चित बिन्दुओं में ढालना उनकी अवमानना करना है, उनके साथ धोखा करना है।

सच है कि वे क्षण अपने आप में इतने मायावी हैं कि सुख के अनुभव से गुजरते हुए, उद्दीप्त होकर गहरे दुःख की कहानी लिखी हो जाती है और एक ऐतिहासिक इमारत या खंडहर देखने के बाद ' सिम्फनी ' पर कविता लिखी जा सकती है। सारे पदार्थ, सारे अनुभव इस कदर एक-दूसरे के नजदीक हैं कि उनमें कोई न कोई बारीक रिश्ता निकल ही आता है, जबकि सतह पर उनमें साम्यता नज़र नहीं भी आ सकती। बल्कि विभिन्न समय और मानसिक अवस्थाओं में एक तरह की वस्तु और अनुभव अलग-अलग तरह से आपको प्रभावित करते हैं। नई और अजानी जगहों पर ले जाते हैं।

लेकिन उन लंबे अंतराल खंडों को, जो एक महीने से लेकर बीस साल तक के हो सकते हैं, क्या रचना-प्रक्रिया के दायरे से बाहर किया जा सकता है ! जो निष्क्रियता, चुप्पी, आलस्य है और अब कभी न लिख पाने के भाव का बीच-बीच में उठता असमर्थताबोध है, वह भी तो अंततः रचना-प्रक्रिया का हिस्सा है। शायद इसलिए प्रकारांतर से बार-बार कहा जाता रहा है कि दुनिया की सबसे रहस्यमई कोई चीज़ है तो वह रचना-प्रक्रिया ही है। तमाम आविष्कारों और संज्ञान के वावजूद वह अज्ञेय है, अकथनीय है। अभेद्य है। कुछ हद तक वह आवेगपूर्ण तानाशाह है। वह अलौकिक नहीं है लेकिन रहस्य है।

और मैं आज जब एक झरने के सामने अभिभूत खड़ा हूँ, उसे एकटक देख रहा हूँ। आँखें मन और जीवन के वे क्षण पूरी आयु से अलग होकर वहां ठिठके रह गए हैं तब कविता लिखते समय, जानता हूँ कि उसमें पिछले समय में देखे गए तमाम झरने, उनकी कौंध, संपन्नता, एकाकीपन और विशालता भी जुड़ गई। एक अनुभव कभी अकेला नहीं होता। उसमें स्मृतियाँ, बोध, कल्पना, वैचारिकता और सामानांतर रचनाशीलताएँ एक साथ हस्तक्षेप करती हैं। आप एक 'ट्रांस' में होते हैं। किसी जादू के प्रभाव में। अथवा यह ख़ुद एक जादू है लेकिन जादूगर को नहीं पता कि यह कैसे होता है क्योंकि यह सिर्फ़ हाथ की सफाई, अभ्यास या आंखों में धूल झोंकना नहीं है। यह कुछ हद तक शिकार होने जैसा है। आपको पता तब चलता जब आपकी गर्दन पंजों में आ चुकी है या आप किसी के जबड़े में हैं। कई बार आपको पीछा करके, दौड़ा-दौड़ाकर, थकाकर भी कब्जे में ले लिया जाता है। और कई बार आप ख़ुद ही समर्पण कर देते हैं जैसे बचना ही नहीं चाहते।

वह एक भौतिक अनुभव भी है और एक अध्यात्मिक अनुभव भी जिसके जरिये आप अंततः भौतिकता से ही निबटना चाहते हैं। या कहें कि ठीक इसका उलटा। कुल मिलाकर आप रचना कर रहे हैं जिसमें 'शायद' को आप 'निश्चित' करना चाहते हैं और आप 'निश्चित' को कुछ 'कल्पना' देना चाहते हैं क्योंकि इसके बिना कुछ संभव नहीं हो पाता है। इस तरह आप रचना-प्रक्रिया के बारे में एक अमूर्त कहानी या कविता ही कह सकते हैं जो कब और कितनी असंगत हो जायेगी, यह कह पाना मुश्किल है। रचना-प्रक्रिया के बारे में जितना ज्यादा कुछ कहा जाएगा उतना ही चेतन मन का ज्ञान, चातुर्य और सजगता उसमें जुड़ती जायेगी। उसकी व्याख्या करना उसे आग में जलाना है।

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स्मृति - शेष : वेणु गोपाल

9:08 am
हिन्दी के जाने-माने कवि-लेखक वेणु गोपाल का हैदराबाद में सोमवार रात निधन हो गया। वेणु कैंसर से पीड़ित थे। वेणु उन कविओं में रहे जिनसे उनके दौर का जन आन्दोलन ऊर्जा पाता रहा। नक्सलबाड़ी आन्दोलन के उभार के साथ धूमिल, कुमार विकल, वेणु गोपाल और आलोकधन्वा सरीखे कवि उसके संबल बने। इन कविओं ने कविता में उस हर संभव कार्रवाई को जायज़ ठहराया जिससे सूरतेहाल में बदलाव आए। मलयज के शब्दों में कहें तो इनके यहाँ कविता कुछ करती थी, सुंदर पड़ी नहीं रहती थी।

वेणु गोपाल ने एक कठिन जीवन जिया। हैदराबाद में ही जीवन का बहुलांश बिताया। कागज़ और जमीन दोनों जगह सक्रीय रहे। क्रन्तिकारी कवि-मन मिला था, सो कहीं टिक कर नौकरी नहीं की। अध्यापकी बड़े चाव से करते थे। पर वह भी छूटती रही। अंत समय में आजीविका के लिए किसी मंदिर में पुजारी का काम करते थे। इसे आप आसानी से उनकी नियति कह देंगे। पर दरअसल यह हमारी, हमारे समाज की विडंबना है। एक ऐसी विडंबना और सरलदिमागी जिसके बारे में जयशंकर प्रसाद ठीक कह गए हैं : '' यह विडंबना ! अरि सरलते, तेरी हँसी उडाऊं मैं ! ''

कुछ कविताएं

अँधेरा मेरे लिए

रहती है रोशनी
लेकिन दिखता है अंधेरा
तो
कसूर
अंधेरे का तो नहीं हुआ न !
और
न रोशनी का !
किसका कसूर ?
जानने के लिए
आईना भी कैसे देखूं
कि अंधेरा जो है
मेरे लिए
रोशनी के बावजूद !

****
सिलसिले का चेहरा

बेजोड़ में
झलक रहा है
सिलसिले का चेहरा
जब कि
बेजोड़ खुद क्या है
सिवाय
सिलसिले की एक कड़ी के!
इस तरह होता है स्थापित
महत्व
परम्परा का।

****
उजाला ही उजाला

आ गया था ऐसा वक्त
कि भूमिगत होना पड़ा
अंधेरे को
नहीं मिली
कोई
सुरक्षित जगह
उजाले से ज्यादा।
छिप गया वह
उजाले में कुछ यूं
कि शक तक नहीं
हो सकता किसी को
कि अंधेरा छिपा है
उजाले में।
जबकि
फिलहाल
चारों ओर
उजाला ही उजाला है !

****

( ये कविताएं कविता-कोश से साभार, वेणुजी की तस्वीर अनिल जनविजय के सौजन्य से। )

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जब तक यह पृथ्वी रसवती है ...

9:42 am

हालांकि लग तो यह रहा है कि इस बार कोसी सब लील लेगी, लेकिन यह बची हुई पृथ्वी, घर, ये धेनुएँ, वृक्ष और अपने इर्द-गिर्द अथाह जल में भी अदम्य जिजीविषा में मनुष्य का ऊंचा उठा हुआ हाथ, आश्वाशन हैं जीवन के। बाबा त्रिलोचन की मानें तो ....

जब तक यह पृथ्वी रसवती है
और
जब तक सूर्य की प्रदक्षिणा में लग्न है,
तब तक आकाश में
उमड़ते रहेंगे बादल मंडल बाँध कर ;
जीवन ही जीवन
बरसा करेगा देशों में, दिशाओं में ;
दौड़ेगा प्रवाह
इस ओर उस ओर चारों ओर ;
नयन देखेंगे
जीवन के अंकुरों को
उठकर अभिवादन करते प्रभात काल का।

बाढ़ में
आंखों के आंसू बहा करेंगे,
किंतु जल थिराने पर,
कमल भी खिलेंगे
सहस्त्रदल।

( कवि के संग्रह ताप के ताए हुए दिन से साभार )

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संपादन : अनुराग वत्स.

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सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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