सबद
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बही - खाता : २ : पंकज मित्र

9:11 pm
( पंकज मित्र के यहाँ पात्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जिस कौशल से वे अपने पत्रों के इर्द-गिर्द कथा बुनते हैं उससे उन्हें कहानी कहने की तमाम सहूलियत और शिल्प आप से आप मिलते जाते हैं। अच्छी बात यह है कि अनगढ़ में बहुत गहरी कलात्मक तराश के बावजूद उनकी कथा-भाषा सहज-प्रांजल बनी रहती है। क्विजमास्टर और अन्य कहानियाँ तथा हुडुकलुल्लु नाम से उनके दो संग्रह प्रकाशित हैं। बही-खाता में इस बार पंकज का अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य पढ़िए। )

होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे

पंकज मित्र

रचना प्रक्रिया पर कुछ कहने की बात आते ही घबराहट-सी होने लगती है। '' कैसे लिखते हैं '' का एक ही उत्तर दिमाग में आता है कमल से कगज पर ''। अब कौन-सी चीज कब, कैसे, क्यों तीरे-नीमकश की तरह गड़ी रह गई खलिश पैदा करती हुई, कौन-सी रसायनिक प्रक्रिया किस न्यूरोन में कैसे काम कर गई, और क्या घट गया वहाँ पर, बताना मुश्किल है। बहुत सारी चीज़ें जमा थीं न जाने कब से और उसमें एक नया रसायन पड़ते ही कोई कीमियागरी हो गई।

लेकिन एक बात तो तय है कि बचपन से आदत पड़ गई थी तमाशे देखने की। स्कूल से लौटते समय कचहरी के पास साँप को ललकारता सपेरा कहता, '' ऐ बेट्टा! काटा-काटी मत कर। जड़ी को सूँघ चोट मत कर। '' फिर जोड़ता , '' तो हजूर यह दुधिया खरीश (साँप की एक प्रजाति) काटता है तो निकाल देता है जीरा और गोलमरिच (काली मिर्च)। '' फिर जमूरे से उसकी प्रश्नोत्तरी चलती : '' खेल दिखायेगा ? दिखायेगा। काहे दिखायेगा ? पापी पेट के लिए। '' तो साहब तमाशा देखने का सुख मेरे लिए गूंगे के गुड़ की तरह है। कोई लतीहा तमाशबीन भी इस आंनन्द की पूरी अभिव्यक्ति शायद ही कर पाये।

दुर्गा पूजा में मुंगेर (मेरा शहर) के बांगला क्लब में जात्रा की वह आश्चर्यलोक की सृष्टि करती रातों का तमाशा- जरी गोटे लगे साटन के अंगरखे, टीन की तलवारें, गदाएँ , मुकुट, नकली दाढ़ी मूछ बाल, मुद्राशंख से चमकते चेहरे। तब पता भी कहाँ था कि ये तमाशे सच नहीं हैं। पता रहने पर भी मन कहाँ मानता। शाहजहाँ के चमकदार कपड़े उतार कर मंटू ठाकुर कल सुबह से एक-एक रूपया लेकर इंजेक्शन देने लगेंगे। ये हनुमान से शक्तिशाली पल्टू काका उस मरियल मैनेजर के सामने भीगी बिल्ली बन जायेंगे। अंगदेश की राजधानी मुंगेर - राजा कर्ण की दानशीलता के तमाशाई किस्से - राजा कर्ण नहा-धोकर माँ चंडिके की मूर्ति के सामने खौलते कड़ाह में कूद पड़ते थे और चंडी माता प्रकट होकर सवा मन सोना देती जिसे दान कर देते थे वे। लेकिन मंदिर के आस-पास चार-चार आने के लिए भटकते - चिरौरी करते पुजारियों एवं उनके नाक सुड़कते बच्चों को देखकर यकीन डगमगा जाता क्योंकि इनके पुरखों को ही तो मिला होगा सवा मन सोने का कुछ हिस्सा। तो फिर रोज क्यों इन्हें दुख और अपमान के खौलते कड़ाह में कुदना पड़ रहा है अभी भी।

इन तमाशों का तिलस्म धीरे-धीरे खुलता गया तो इनके पीछे की तकलीफदेह तमाशों की शक्ल साफ होती गई धीरे-धीरे। तमाशे अब सुख नहीं देते -- ठिठुरती ठढ़ में काम करते छोटे बच्चे, उपेक्षा पड़ोसी बूढ़ों की, जबतब अपमान स्त्रीयों का, मनुष्यों से अधिक प्रतिष्ठा चीज़ों की, निर्दोष निमुहें लोग घायल होते विभिन्न कारणों से अनजाने ही -- कड़वाहट भरते थे अब तमाशे और सितमजरीफी ये कि ऐसे ही तमाशे ज्यादा दिखते हैं इस टुच्चे समय में। चारों ओर विज्ञापनी शोर, छोटी-छोटी चीजें पाने के लिए टकराता लहुलुहान होता आदमी, रहबरों के रहजन होते जाने के तमाशे - सिर्फ तमाशे देखन और कुछ न कर पाने का व्यर्थताबोध ही उकसाता रहता है खिलंदडे अंदाज़ में इन तमाशों को देखने और दिखाने को।

शायद दुख को दुख की तरह लिखने से इतना सांद्र हो जायेगा दुख कि ऐहसास ही खत्म हो जाए। इसलिए भाषा की, स्थितियों की खिलंदडेपन की चासनी जरूरी लगती रही है और ये सब भी अपनी कहाँ है ? सब तो उधार ली है अपने आसपास से, देखी-सुनी-जानी है अगल-बगल से ही। भाषा भी तो लोगों की ही है - जीवन ने उन्हें दिया, उन्होंने हमें। साहिर ने जिसे '' तजरबात ओ हवादिस '' की शक्ल में दुनिया से पाया हुआ बताया है। पर यह भी सच है कि जीवन अपने आप में इतना बड़ा और पेचीदा तमाशा है कि किसी के लिए न तो पूरा देखना संभव है और न दिखाना - बस वही थोड़ा कहना ज्यादा समझना। ज्यादातर तमाशे आदमी के विरूद्ध, आदमी के मन के विरूद्ध लेकिन निरीह आदमी सब झेलते जाने और हँसकर रोकर देखते जाने के लिए मजबूर। वही जमूरे के पापी पेट का सवाल है की तरह।

एक तमाशोदार कथारूपक याद आ रहा है - एक गरीब आदमी के पास सिर्फ एक धोती थी और वह मेले में था - शोरोगुल के बीच । पास में धेला नहीं, खाने को कुछ नहीं। धोती थी जो खा नहीं सकता था। चार खूंटों में धोती को बाँधकर एक घेरा बनाया कमरानुमा। सम्पूर्ण उलंग होकर बीच में बैठकर आवाज़ें लगाने लगा - आइए, देखिए, दो रुपये में गजब तमाशा। जो देखे वो पछताये जो न देखे वो भी पछताये। दो रुपये फेंकिये तमाशा देखिए। अब आदमी दो रुपये देकर अंदर जाय और नंगे आदमी को देखकर मारपीट पर उतारू। हाथ जोड़कर पैर पकड़ ले वह - बाबू, पेट का सवाल है। बाहर जाकर बताइएगा नहीं किसी को। तो अब आदमी इस पर हँसे, रोये या सिर धुने। कुछ लोगों के लिए जीवन ही तमाशा है तो कुछ के लिए तमाशा ही जीवन। अब इस अंतर की चट्टान को नाखून से खरोचना ही शायद लेखन है। लिख सकता हूँ थोड़ा बहुत तो लिखता हूँ। एक सिर है अपने पास जिसे धुन सकता हूँ। रचना प्रक्रिया पर बात करना अब भी मेरे लिए मुश्किल है।


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ज़बां उर्दू : फ़िराक़ गोरखपुरी

9:12 am
यह पचासवीं पोस्ट है। मैंने सोचा न था कि इतनी गति और निरंतरता से सबद निकाल पाऊंगा। यह लेखकों के सहयोग और पाठकों के समर्थन से ही संभव हो सका। लेखकों को यह समझाने में कि भले ही माध्यम भिन्न है, रचनाएं अनछपी ही भेजें, कुछ वक्त तो लगा, लेकिन उन्होंने मुझ नए छोटे का मान रख नई रचनाएं भेजी। फिर मैंने भी गाँठ नहीं बांधी थी कि पुराना कुछ छापूंगा ही नहीं। इसीलिए 'कोठार से बीज' नामक स्तंभ शुरू किया। इससे इतर पहले से छपी हुई महत्वपूर्ण रचनाओं के समायोजन की भी योजना है। एक जिम्मेदारी उर्दू को लेकर भी अनुभव करता हूँ। हम सब ने उर्दू से बहुत कुछ सीखा है और अभी और बहुत सीखना बाकी है। उस पर हमारा उत्तराधिकार पुष्ट होना चाहिए। सबद में इसीलिए ' ज़बां उर्दू ' नाम से कुछ देर से ही सही यह स्तंभ। बतौर पहली पेशकश फ़िराक़ गोरखपुरी की यह ग़ज़ल उनकी पुस्तक बज़्मे-ज़िन्दगी : रंगे-शायरी से ( साभार )। फ़िराक़ के बारे में क्या लिखूं, ग़ज़ल के बारे में यह है कि इसकी कहन पर बोलियों का प्रभाव आप साफ़ लक्षित करेंगे। खालिस हिन्दोस्तानी बोली-बानी जो फ़िराक़ियत की खास पहचान भी है।


हमसे फ़िराक़ अकसर छुप-छुप कर पहरों-पहरों रोओ हो

हमसे फ़िराक़ अकसर छुप-छुप कर पहरों-पहरों रोओ हो
वो भी कोई हमीं जैसा है क्या तुम उसमें देखो हो

जिनको इतना याद करो हो चलते-फिरते साये थे
उनको मिटे तो मुद्दत गुज़री नामो-निशाँ क्या पूछो हो

जाने भी दो नाम किसी का आ गया बातों-बातों में
ऐसी भी क्या चुप लग जाना कुछ तो कहो क्या सोचो हो

पहरों-पहरों तक ये दुनिया भूला सपना बन जाए है
मैं तो सरासर खो जाऊं हूँ याद इतना क्यों आओ हो

क्या गमे-दौराँ की परछाईं तुम पर भी पड़ जाए है
क्या याद आ जाए है यकायक क्यों उदास हो जाओ हो

झूठी शिकायत भी जो करूँ हूँ पलक दीप जल जाए हैं
तुमको छेड़े भी क्या तुम तो हँसी-हँसी में रो दो हो

ग़म से खमीरे-इश्क उठा है हुस्न को देवें क्या इलज़ाम
उसके करम पर इतनी उदासी दिलवालो क्या चाहो हो

एक शख्स के मर जाये से क्या हो जाये है लेकिन
हम जैसे कम होये हैं पैदा पछताओगे देखो हो

इतनी वहशत इतनी वहशत सदके अच्छी आँखों के
तुम न हिरन हो मैं न शिकारी दूर इतना क्यों भागो हो

मेरे नग्मे किसके लिए हैं खुद मुझको मालूम नहीं
कभी न पूछो ये शायर से तुम किसका गुण गाओ हो

पलकें बंद अलसाई जुल्फ़ें नर्म सेज पर बिखरी हुई
होटों पर इक मौजे-तबस्सुम सोओ हो या जागो हो

इतने तपाक से मुझसे मिले हो फिर भी ये गैरीयत क्यों
तुम जिसे याद आओ हो बराबर मैं हूँ वही तुम भूलो हो

कभी बना दो हो सपनों को जलवों से रश्के-गुलज़ार
कभी रंगे-रुख बनकर तुम याद ही उड़ जाओ हो

गाह तरस जाये हैं आखें सजल रूप के दर्शन को
गाह नींद बन के रातों को नैन-पटों में आओ हो

इसे दुनिया ही में है सुने हैं इक दुनिया-ए-महब्बत भी
हम भी उसी जानिब जावें हैं बोलो तुम भी आओ हो

बहुत दिनों में याद किया है बात बनाएं क्या उनसे
जीवन-साथी दुःख पूछे हैं किसको हमें तुम सौंपो हो

चुपचुप-सी फ़ज़ा-ए-महब्बत कुछ कुछ न कहे है खलवते-राज़
नर्म इशारों से आँखों के बात कहाँ पहुँचाओ हो

अभी उसी का इंतज़ार था और कितना ऐ अहले-वफ़ा
चश्मे-करम जब उठने लगी है तो अब तुम शरमाओ हो

ग़म के साज़ से चंचल उंगलियां खेल रही हैं रात गए
जिनका सुकूत, सुकूते-आबाद है वे परदे क्यों छेड़ो हो

कुछ तो बताओ रंग-रूप भी तुम उसका ऐ अहले-नज़र
तुम तो उसको जब देखो हो देखते ही रह जाओ हो

अकसर गहरी सोच में उनको खोया-खोया पावें हैं
अब है फ़िराक़ का कुछ रोज़ो से जो आलम क्या पूछो हो

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स्मृति - शेष : अहमद फ़राज़

9:04 am
( उनकी ग़ज़लों-नज़्मों से उस कम उर्दू आदमी की भी पटती है जो पहलेपहल उन तक मुहावरों जैसा मजा पाने जाता है। उनका अंदाजे-बयां सादा पर असरदार है। उसमें ज़ज़्ब दुनिया और लोग पढ़ने वालों को बहुत पास अपने लगते हैं। इसकी शायद एक वजह यह भी रही कि फ़राज़ ने बहुत पहले यह तय कर लिया था : '' अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं / फ़राज़ अब ज़रा लहज़ा बदल के देखते हैं।'' कहना न होगा कि उन्होंने अपने दौर की ग़ज़ल का लहज़ा बारंबार बदला और हर बदलाव से उनकी मकबूलियत बढ़ती ही गई। वे थे पड़ौसी पाकिस्तान के, लेकिन उनकी शायरी का वास्ता उसकी चौहद्दी को पार कर गया था। दो दिन पहले जब उनके निधन की ख़बर आई तो सबकी जुबां पर उनका कहा यह शेर फिर याद हो आया : '' अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें / जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।'' उनकी एक किताब का नाम भी, ''ख़्वाबफ़रोश'' है जिसमें उन्होंने अपनी चुनी हुई कविताएं दी हैं। यहाँ उसी संग्रह से एक ग़ज़ल पेश है। )

इतने तो मरासिम थे कि आते जाते...

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते

शिकवा-ए-जुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शम्अ जलाते जाते

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी इक उम्र
लगी जान से जाते-जाते

जश्न-ए-मक़तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पा-ब-जोलाँ ही सही नाचते गाते जाते

उसकी वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम फ़राज़ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते

( शब्दार्थ : शिकवा-ए-जुल्मत-ए-शब = रात के अंधकार की शिकायत, जश्न-ए-मक़तल = वधस्थल का समारोह, पा-ब-जोलाँ = श्रृंखलाबद्ध पाँव )

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रंगायन : २ : नेमिचंद्र जैन

12:30 am
( लेखकों को याद करने का हमारा ढंग इस कदर रवायती या देखादेखीपन का शिकार है कि किसी सच्चे-खरे लेखक की उसके अवदान के बिना पर याद हमें अब शायद ही आती है। नेमिचंद्र जैन उन कम लेखकों में से थे जिन्होंने हिन्दी को अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता से न सिर्फ़ समृद्ध किया, उसे अनेक वर्षों तक पोसते भी रहे। उन जैसा जिम्मेदार जतन दुर्लभ है, इसलिए उन्हें याद किया जाना उस जिम्मेदारी को महसूसना भी है। इस बार रंगायन में सुलभजी के मार्फ़त नेमिजी। )

वे सिसृक्षा का बीज रोपते थे

हृषीकेष सुलभ

उनकी कई छवियाँ मेरे मन में अंकित हैं। उनसे हुई मुलाक़ातें स्मृति में जीवित हैं। मुझे यह स्वीकारते हुए रंचमात्र भी संकोच नहीं कि अगर मैं उनसे नहीं मिला होता, तो शायद आज नाटक नहीं लिख रहा होता। यह जानकर कि मैं कहानियाँ लिखता हूँ और रंगकर्म करता हूँ, उन्होंने नाटक लिखने और इसके लिए तैयारी करने की सलाह दी थी। मेरे जैसे न जाने कितने लोगों के भीतर उन्होंने सिसृक्षा के बीज रोपे होंगे! अपने जीवंत सम्पर्क से वह इसे अंकुरित होने के लिए पर्यावरण देते और अपनी अनुभवसिद्ध सजग आँखों से देखरेख भी करते।

मेरे नाटकों (अमली और माटीगाड़ी) का प्रदर्शन देखने के बाद उन्होंने मुझे मैला आँचल को रूपांतरित करने की सलाह दी। मैं साहस नहीं कर पा रहा था, पर उन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि मैं यह कर सकता हूँ और दबाव बनाए रखा। मैला आँचल का फैलाव मेरे विश्वास को डिगाता रहा और मेरे ऊपर उनका भरोसा प्रोत्साहन देता रहा। वे पहले प्रदर्शन के अवसर पर पटना में उपस्थित भी थे। नाट्यालेखों या नाट्य प्रस्तुतियों पर बातचीत करते या लिखते हुए प्रसिद्ध लोगों की कमज़ोरियों की ओर संकेत करने में वे कभी संकोच नहीं करते और नए लोगों के महत्त्वपूर्ण काम और उनकी प्रयोगधर्मिता को हमेशा उदारता के साथ रेखांकित करते।

नेमिजी कवि थे। तारसप्तक के कवि। हिन्दी कविता के विकास में तारसप्तक का योगदान निर्विवाद है। वे आलोचक थे और उन्होंने हिन्दी उपन्यास की आलोचना का स्थापत्य गढ़ा। रंगमंच की दुनिया में अपनी सक्रियता के लिए वह परिस्थितियों को जिम्मेवार मानते थे। इप्टा आंदोलन से अपने गहरे संबंध के बावजूद उनका मानना था कि रंगमंच निजी तौर पर उनका विषय नहीं था। पहले संगीत नाटक अकादमी और फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ने के बाद उन्होने रंगमंच के प्रति जो दयित्व अनुभव किया उसने उन्हें गहन अध्ययन के लिए प्रेरित किया।

उनके अध्ययन और उनकी सक्रियता और कविता तथा आलोचना की दुनिया के अनुशासन ने उन्हें रंगसमीक्षा और रंगचिंतन के क्षेत्र में शिखर पर पहुँचाया। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय रंगजगत को अपनी साधना और चिंतन से उन्होंने समृद्ध किया। नेमिजी का सांस्कृतिक जीवन कम्युनिस्ट आंदोलन के बीच उपजा और उन्होंने अपने लिए यहीं से दृढ़ता अर्जित की। इसी दृढ़ता ने उन्हें कम्युनिस्ट आंदोलन की रूढ़ियों से मुक्त रखा। वे उज्जवल भाव से समाज की समस्त सुगबुगाहटों और हलचलों के प्रति उत्सुक और जिज्ञासु बने रहे तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिहार्य बनते गए।

नेमिचंद्र जैन हिन्दी में आधुनिक नाट्यालोचना के जनक माने जाते हैं। उन्होंने साहित्यिक मूल्यों के साथ-साथ रंगमूल्यों के प्रश्न उठाए। नाट्यालेख को रंगमंच से काटकर परखने और विश्लेषित करने की परम्परा को अनुचित बताया। नाटक के पाठ के भीतर छिपे रंगतत्त्वों की खोज के लिए नाट्यालोचना के नए उपकरणों को आविष्कृत किया। हिन्दी के पास रंगप्रस्तुति की समीक्षा की कोई परम्परा नहीं थी। साहित्यिक धारणाओं के आधार पर ही प्रस्तुतियों का मूल्यांकन होता आया था।

नेमिजी ने नाटक रचे जाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया के विविध आयामों को अपनी अलोचना-पद्धति में शामिल करते हुए उसके लिखे जाने, मंचित होने और दर्शकों तक पहुँचने के क्रम को एक सूत्र में बाँधा। उन्होंने इसे समग्र प्रक्रिया के रूप में रेखांकित किया। दृश्यकाव्य कहे जाने वाले नाटक की काव्यात्मक संवेदना के साथ-साथ रंगकर्म के व्यवहार-पक्ष को भी हमेशा महत्त्व दिया। नेमिजी की इस दृष्टि ने भारतेन्दु और प्रसाद जैसे नाटककारों तक पहुँचने के लिए रास्तों की खोज की। नाटक की भाषा को लेकर उनकी समझ बिल्कुल साफ़ थी कि ‘‘ उसमें भाव, विचार और चित्र तीनों को वहन करने का सामर्थ्य तो हो, पर फिर भी वह बोलचाल की भाषा से बहुत दूर न हो। ’’

नेमिजी का जन्म 16 अगस्त सन् 1919 को और देहावसान 24 मार्च सन् 2005 को हुआ। अपने दीर्घ जीवनावधि में उन्होंने भरपूर लेखन किया। तारसप्तक की कविताओं के अलावा अचानक हम फिर और एकांत शीर्षक दो काव्य संकलन प्रकाशित हुए। अधूरे साक्षात्कार को उपन्यास की आलोचना के क्षेत्र में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है। रंग आलोचना पर केंद्रित रंगदर्शन, रंग परम्परा, तीसरा पाठ, दृश्य-अदृश्य, भारतीय नाट्य परम्परा आदि कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं। नाटकों के अनुवाद और मुक्तिबोध रचनावली सहित अन्य कई ग्रंथों का उन्होंने संपादन किया। उनकी रचनाओं का विपुल भंडार हिन्दी की सृजनशील परम्परा की धरोहर हैं।

सृजन की दुनिया में नवाचार के प्रति नेमिजी की उत्सुकता चकित करती थी। परम्परा के प्रति वे बेहद सजग थे। उन्होंने परम्परा को कभी पुनरुत्थानवादी दृष्टि से नहीं देखा और हमेशा परम्परा के प्रति संवेदनशीलता के साथ नवाचार की वकालत की। उनका मानना था कि भारतीय रंगमंच को रचनात्मक तरीके़ से समकालीन जीवन के अनुभवों से अपने को लैस करना चाहिए और यह तभी सम्भव है, जब हम अपने पारम्परिक और शास्त्रीय रंगमंच के प्रति गम्भीर हों और अपने लिए मौलिक मुहावरा विकसित करें। नेमिजी की आलोचना और आस्वाद की समझ में रूढ़िवादिता नहीं थी।

नेमिजी से मिलना हमेशा सुखद होता था। मिलते ही एक आत्मीय मुस्कान तिरती। वे बेहद गम्भीर व्यक्ति थे, पर उनकी संयमित हँसी का कोई सानी नहीं था। जिज्ञासाओं और प्रश्नों का जवाब देते हुए वे कभी अधीर नहीं होते और न ही सामनेवाले को अपने ज्ञान से आतंकित करते। वे विनम्र थे और दृढ़ भी।

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बही - खाता : संजय खाती

1:33 pm

( सबद में कहानी को लेकर कोई बात नहीं हो रही थी। इस बाबत कुछ स्नेही बंधुओं ने उलाहना भी दिया। हमने आश्वस्त किया था कि जल्द ही कथा की बात होगी। कथाकारों से आग्रह किया कि वे अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य हमारे पाठकों के लिए लिखें ताकि उनकी कथा-कहानी की कुछ और सिम्तें खुलें। 'बही-खाता' नामक यह स्तंभ हम हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार संजय खाती से शुरू कर रहे हैं। इनकी कहानियां बेसब्र प्रतीक्षा के बाद सामने आती हैं और चाव से पढ़ी जाती हैं। 'पिंटी का साबुन' और 'बहार कुछ नहीं था' दो संग्रह प्रकाशित हैं। )


कहानी मन में ही चुक सकती है

संजय खाती


रचना प्रक्रिया पर जितना मैं सोचता हूं, यह पहेली उलझती जाती है। जिस मन से हम रचते हैं, क्या हम उसके स्वामी हैं ? जो हम रचते हैं, क्या वह हमारी कृति है ? जैसा कि हम जानते हैं मानव मस्तिष्क कुदरती विकास की देन है और अब इस बात के ज्यादा से ज्यादा सबूत साइंटिस्ट पेश कर रहे हैं कि दिमाग का जो कोर है, वह लगभग स्वायत्त तरीके से काम करता है। एक मन अपनी प्रतिभाओं के साथ हमें दे दिया गया है, जो माहौल से विकसित होता है और हम ज्यादा से ज्यादा जो कर सकते हैं, वह यही कि उसे पहचानें और उसके खिलने के लिए माहौल तैयार करते रहें।

कला जब जन्म लेती है, तो क्या होता है ? आनंद ने जब कथा सुननी चाही, तो बुद्ध ने कहा था कि मानवों की कोई कथा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां दुःख ही दुःख है। देवताओं की भी कोई कथा नहीं हो सकती, क्योंकि वहां सुख ही सुख हैं। यानी कहानी तभी हो सकती है जब सुख और दुःख के बीच की कोई स्थिति हो, यानी कलाकार एक ऐसी भावभूमि का जीव होता है, जो मर्त्यलोक और देवलोक के बीच कहीं अवस्थित है। हर कथा एक मानवीय दैवीय अनुभूति है, लेकिन वह धर्म नहीं है, क्योंकि वह निर्वान की कामना नहीं कर सकती, क्योंकि उसे बीच के उस झुटपुटे में टिके रहना है -- अपने आनंद और अभिशाप के साथ।

मेरी कहानी स्मृतियों से शुरू होती है -- किसी बिन्दु या विचार की तरह, जो किसी छवि की तरह उभरता है। फिर उसे कथा में बदलना एक मानवीय श्रम है -- बहुत लंबा मानवीय श्रम। मैं कभी कोई कहानी एक सिटिंग में एक ड्राफ्ट में नहीं लिख सका। मेरे लिए यह श्रमबहुल कार्य है, जिसे मैं भरसक टालता हूँ, क्योंकि श्रम से दूर और आराम की तरफ भागना मन का सहज व्यवहार है। कहानी को मन में बुनना जितना आनंददायक है, उतना उसे शब्दों में उतारना नहीं -- और कई बार यह हो सकता है कि मन में ही उसका होना चुक जाए, आस्वाद पूरा हो जाए और कहानी कभी पैदा न हो सके। शायद यह कविता के ज्यादा अनुकूल है, लेकिन मैंने कथा को चुना है और इसलिए मुझे बार-बार विचार की उस लौकिकता की ओर ख़ुद को धकेलना पड़ता है, जो श्रम शक्ति और समय की मांग करती है।

अपनी प्रेरणाओं में मैं बहुत से लोगों को पाता हूँ। लगभग सभी को जिनका लिखा और कहा मुझे किसी नए विचार या अनुभव की रोशनी देता है। यहाँ तक कि जे के रोलिंग्स को भी, इसलिए कि बिना ओछे हुए रहस्य का वितान गढ़ लेना एक दुर्लभ गुण है। मैं लगभग हर चीज़ पढ़ता हूँ, बल्कि साहित्य से ज्यादा, क्योंकि विचार की दुनिया बहुत बड़ी है, उस पर साहित्यकारों की मनोपली नहीं है। असल खोज अंतर्दृष्टि की है -- उस चाबी की, जो यथार्थ में एक सुराख बनाती है और हमें मानवता के मर्म की झलक देती है। साहित्य ही नहीं, सारा ज्ञान-विज्ञान इसी खोज में लगा है। मेरा मानना है किसाहित्यकारों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वे ही सारे सवालों का जवाब दे देंगे। उन्हें ज्ञान के तमाम अनुशासनों से रोशनी चुरानी चाहिए और तब उसे जीवन से जोड़ने का काम करना चाहिए, जो सिर्फ़ वही कर सकते हैं। साहित्य मानवीय नियति का दस्तावेज़ है, लेकिन वह कोई टापू नहीं है।

मैं उपन्यास नहीं लिख सका, जबकि कहा जाता है कि उपन्यास मानव नियति का आख्यान है। शायद यह ग़लत है। मानव नियति की सबसे अच्छी पहचान हमें छोटी-छोटी बोधकथाएं कराती हैं। महाकाव्यों से ज्यादा हमें दो लाइन की कविताएं और एक लाइन की सूक्तियां रास्ता सुझाती हैं। एक छोटा सा चुटकुला संसार पर सबसे अच्छा कमेंट हों सकता है और व्यास और वाल्मीकि तमाम दैवीय सहायता के बावजूद एक लतीफा नहीं लिख सकते। मैं उसी सूक्ष्म और सरल की ओर लौटना चाहता हूँ -- कहानियों से भी लघु कथा की ओर।

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कोठार से बीज : ३ : नागार्जुन

6:46 pm
( बरस भर पहले फिल्मकार संजय झा से मुलाकात हुई थी। उन्होंने उस दौरान अपनी नई फ़िल्म, 'स्ट्रिंग्स' भेंट की थी। ज़िक्र किया था कि इसमें हिन्दी के कवि और हमारे दुलारू बाबा नागार्जुन की एक कविता का भी फिल्मांकन किया है। फिर जोड़ा कि इस कविता पर हिंदुत्ववादियों ने बड़ा गुस्सा निकाला और इलाहबाद हाईकोर्ट में कविता को भारतीय जन-मन का विरोधी बताते हुए पीआईएल तक दाखिल कर दिया। संजय को इस बात का अफ़सोस था कि इस पर हिन्दी जगत ने लगभग चुप्पी साध ली और सारा मसला, जैसा कि हर बार होता है, एक महाशोर में गुम गया। सबद के इस स्तंभ के लिए जब शमशेर और त्रिलोचन के बाद बाबा की रचनाओं को खारोल-परोल रहा था तो बरबस इस कविता का ध्यान हो आया। एक आज़ाद देश के रूप में हम अभी-अभी ६१ के हुए हैं। बाबा ने यह कविता करीब ४० बरस पहले लिखी थी। आप ही पढ़कर बताइए कितना कुफ़्र और कितनी तल्ख़ सच्‍चाइयां दर्ज हैं इसमें। बाबा की तस्वीर औए यह कविता, दोनों राजकमल से प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कविताओं की पुस्तक से साभार ली गई है। )

मंत्र कविता

ओं शब्द ही ब्रह्म है
ओं शब्द और शब्द और शब्द और शब्द
ओं प्रणव, ओं नाद, ओं मुद्राएँ
ओं वक्तव्य, ओं उदगार, ओं घोषणाएँ
ओं भाषण ...
ओं प्रवचन ...
ओं हुंकार, ओं फटकार , ओं शीत्कार
ओं फुसफुस, ओं फुत्कार, ओं चित्कार
ओं आस्फालन, ओं इंगित, ओं इशारे
ओं नारे और नारे और नारे और नारे
ओं सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ
ओं कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं
ओं पत्थर पर की दूब, खरगोश के सींग
ओं नमक-तेल-हल्दी-जीरा-हींग
ओं मूस की लेंड़ी, कनेर के पात
ओं डायन की चीख, औघड़ की अटपट बात
ओं कोयला-इस्पात-पेट्रोल
ओं हमी हम ठोस, बाकी सब फूटे ढोल

ओं इदमन्नं, इमा आप: , इदमाज्यम, इदं हवि
ओं यजमान, ओं पुरोहित, ओं राजा, ओं कवि :
ओं क्रांति : क्रांति : क्रांति : सर्वग्वम क्रांति :
ओं शांति : शांति : शांति : सर्वग्वम शांति :
ओं भ्रांति: भ्रांति : भ्रांति : सर्वग्वम भ्रांति :
ओं बचाओ बचाओ बचाओ बचाओ
ओं हटाओ हटाओ हटाओ हटाओ
ओं घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ओं निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ओं दलों में एक दल अपना दल, ओं
ओं अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
ओं मुष्टीकरण, तुष्टीकरण, पुष्टीकरण
ओं एतराज़, आक्षेप, अनुशासन
ओं गद्दी पर आजन्म वज्रासन
ओं ट्रिब्‍युनल ओं आश्वासन
ओं गुट निरपेक्ष सत्तासापेक्ष जोड़तोड़
ओं छल-छंद, ओं मिथ्या, ओं होड़महोड़
ओं बकवास, ओं उद्घाटन
ओं मारण-मोहन-उच्चाटन

ओं काली काली काली महाकाली महाकाली
ओं मार मार मार, वार न जाए खाली
ओं अपनी खुशहाली
ओं दुश्मनों की पामाली
ओं मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ओं अपोजिशन के मुंड बनें तेरे गले का हार
ओं ऐं हीं वलीं हूँ ओं
ओं हम चबाएंगे तिलक और गाँधी की टाँग
ओं बूढे की आँख, छोकरी का काजल
ओं तुलसीदल, बिल्वपत्र, चंदन, रोली, अक्षत, गंगाजल
ओं शेर के दाँत, भालू के नाखून, मरकत का फोता
ओं हमेशा हमेशा हमेशा करेगा राज मेरा पोता
ओं छू : छू : फू : फू : फट फिट फुट
ओं शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट

ओं भैरो, भैरो, भैरो, ओं बजरंगबली
ओं बन्दूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ओं डालर, ओं रूबल, ओं
ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंड

ओम् ओम् ओम्
ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम् व्योम्
ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे
ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे
ओं दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा
ओं इसी पेट के अदंर समा जाए सर्वहारा
हरि : ओं तत्सत् हरि : ओं तत्सत्

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मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना

7:00 pm
एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं

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मंगलेश डबराल
के अनुवाद में

मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना

प्रभु
स्वीकार करो इस लड़की को जो सारी दुनिया में
मर्लिन मुनरो कही जाती थी

हालांकि उसका नाम यह नहीं था
( लेकिन प्रभु, तुम जानते हो उसका असली नाम,
उस अनाथ का जो नौ साल की उम्र में बलात्कार की शिकार हुई,
दूकान में नौकरी करने वाली वह लड़की जिसने सोलह की होने पर
खुदकुशी की कोशिश की थी )

और जो अब जा रही है तुम्हारे हुज़ूर में, बगैर मेक-अप के,
बगैर अपने प्रेस एजेंट के
बगैर अपनी तस्वीरों के, बगैर कोई ऑटोग्राफ दिए हुए
एकाकी, जैसे कोई अंतरिक्ष यात्री
अनंत के अंधकार में जाता है

जब वह बच्ची थी उसने सपने में देखा
( 'टाइम' पत्रिका के मुताबिक़ )
कि वह एक चर्च में नग्न खड़ी है
ज़मीन पर लोटती अपार भीड़ के सामने
और लोगों के सर बचाने के लिए
उसे पंजों के बल चलना पड़ रहा है

प्रभु, तुम हमारे सपनों को
मनो-चिकित्सकों से ज़्यादा अच्छी तरह जानते हो
चर्च, घर या गुफा : सब कोख की सुरक्षा के प्रतीक हैं
बल्कि इससे भी अधिक कुछ हैं ...
यह तो साफ़ है कि ये प्रशंसकों के सर हैं
( परदे पर पड़ती रोशनी की शहतीर के नीचे अंधेरे में मार-तमाम सर )
लेकिन यह मंदिर २०एथ सेंचुरी फॉक्स का स्टूडियो नहीं है
सोने और संगमरमर का यह मंदिर
उसकी देह का मंदिर है जहाँ आदम का बेटा
हाथ में कोड़ा लिए खड़ा है
२०एथ सेंचुरी फॉक्स के बनियों को खदेड़ता हुआ
जिन्होंने प्रभु, तुम्हारे प्रार्थना-घर को
चोरों के अड्डे में बदल दिया है

प्रभु,
इस संसार में जो कि रेडियोएक्टिविटी और पाप से
अपवित्र है, तुम निश्चय ही दूकान पर बैठनेवाली
उस लड़की को दोष नहीं दोगे
जिसने ( ऐसी किसी भी लड़की की तरह ) --
स्टार बनने का स्वप्न देख था
और उसका स्वप्न 'हकीक़त' बन गया
( एक टेक्नीकलर हकीक़त )
उसने यही किया कि हमने अपनी ज़िन्दगियों की
जो पटकथा उसे दी उसी के मुताबिक़ काम करती रही
लेकिन उसमें कोई अर्थ नहीं था
प्रभु, उसे और हम सबको क्षमा करो
अपनी इस २०एथ सेंचुरी के लिए
और उस विशाल सुपर प्रोडक्शन के लिए --
जिसके निर्माण में हम सब शरीक रहे

वह प्यार चाहती थी और हमने उसे नींद की गोलियां दीं
उसे हमारे संत न होने का ग़म था और उसके लिए --
मनोविश्लेषण के नुस्खे सुझाए गए
याद करो प्रभु, कैसे वह कैमरे से डरने लगी थी
कैसे मेक-अप से उसकी घृणा बढती गई
( और तब भी हर दृश्य में ताज़ा मेक-अप कराने की उसकी जिद बनी रही )
कैसे बढ़ती रही उसकी यातना
और कैसे वह स्टूडियो पहुँचने में लापरवाह होती गई

दूकान पर नौकरी करती किसी भी लड़की की तरह
उसने स्टार बनने का स्वप्न देखा था
और उसका जीवन उतना ही अवास्तविक था जितना
एक स्वप्न जिसकी जांच मनोविश्लेषक
करता है और अपनी रिपोर्ट बनाता है

उसके प्रेम आँखें मूंदकर दिए गए चुंबन थे
जो आँखें खुलने पर दीखता है
कि वे तेज़ स्पॉटलाइटों के नीचे दिए गए थे
स्पॉटलाइटें बुझा दी गई हैं
और कमरे की दोनों दीवारें
( वह एक सेट था ) उखाड़ दी गई हैं
और सीन ठीक ठाक शूट करने के बाद
निर्देशक हाथ में नोटबुक लिए जा रहा है
या फिर वे एक नौका विहार की तरह थे,
एक चुंबन सिंगापुर में एक नाच रियो में,
एक जश्न विंडसर के डयूक और डचेज के महल में
किसी सस्ते फ्लैट की मनहूस तड़क-भड़क के बीच फिल्माए हुए

फ़िल्म ख़त्म हो गई अंतिम चुंबन के बगैर ही --
उन्होंने उसे अपने बिस्तर पर मरा हुआ पाया,
हाथ में टेलीफ़ोन लिए हुए
जासूस कभी जान नहीं पाए कि वह --
किससे बात करना चाहती थी
लगता था जैसे किसी ने
एकमात्र दोस्त आवाज़ को फ़ोन मिलाया हो
और उधर से सुनाई दी हो पहले से टेप की हुई
आवाज़ : ' ग़लत नंबर ' !
या जैसे डाकुओं के हमले में घायल कोई व्यक्ति
एक कटे हुए फ़ोन की तरफ़ लपका हो

प्रभु, वह जो भी रहा हो
जिसे वह फ़ोन पर बुलाने जा रही थी
पर नहीं बुला सकी
( और शायद वह कोई भी नहीं था
या कोई था जिसका नाम लास एंजेलिस की टेलीफ़ोन निर्देशिका में
दर्ज नहीं है )

प्रभु, तुम उस फ़ोन का जवाब दो

****
मठ के पीछे

मठ के पिछवाड़े, नीचे सड़क से सटी हुई
एक कब्रगाह है इस्तेमालशुदा चीज़ों की
वहां पड़े हैं टूटेफूटे चीनी मिट्टी के बर्तन, जंग खाई धातु
तिड़के हुए सिगरेट की डिब्बियां और बुरादा
लोहे की चद्दरें, पुराना प्लास्टिक
और टायर जो मरम्मत के लायक नहीं रहे
सबके सब हमारी ही तरह
प्रतीक्षा करते हुए पुनर्जीवन की

****
अदोल्फो बयाज़ बोन का समाधि-लेख

उन्होंने तुम्हें मार डाला और हमें कभी नहीं बताया
कि तुम्हें उन्होंने कहाँ दफ़नाया
लेकिन तबसे समूचा देश ही तुम्हारी समाधि है
या फिर : जहाँ-जहाँ तुम्हें नहीं दफ़नाया गया
उस हर जगह से तुम उठ खड़े होते हो

उन्होंने सोचा था तुम्हें मार दिया गया है
फ़ायर का हुक्म देते ही
उन्होंने सोचा था उन्होंने तुम्हें दफ़ना दिया है
लेकिन उन्होंने जो कुछ दफ़नाया
वह एक बीज था

****
सोमोज़ा स्टेडियम में सोमोज़ा की प्रतिमा
का अनावरण करता हुआ सोमोज़ा

ऐसा नहीं है कि लोगों ने ख़ुद मेरी यह मूर्ति निर्मित की हो
तुम्हारी ही तरह मुझे भी पता है कि यह, ख़ुद
मैंने बनवाई है
ऐसा भी नहीं है कि इसके जरिये मुझे अमर होने की उम्मीद है
ऐसा भी नहीं है कि मैं जीते जी अपना ऐसा स्मारक
बनवाना चाहता था जिसे तुम
मेरे मरने के बाद कभी नहीं बनवाओगे
मैंने बनवाई है यह प्रतिमा यह जानते हुए
कि तुम इससे नफरत करोगे

****
होआकिन पासोस का समाधि-लेख

वह इन सड़कों पर चला, बेरोज़गार और बेकाम
बिना पैसे के
सिर्फ़ कवियों , वेश्याओं और पियक्कड़ों को
उसकी कविताएं याद थीं
वह कभी विदेश नहीं गया
वह जेल में रहा
उसका कोई स्मारक नहीं है
लेकिन
उसे याद करना जब तुम्हारे पास कंक्रीट के पुल होंगे
विशाल भट्टियाँ, ट्रैक्टर और चांदी जैसे
झलझलाते गेहूं के भण्डार होंगे
अच्छी सरकारें होंगी
इसलिए कि उसने संस्कार दिया अपने लोगों की भाषा को
जिस भाषा में एक दिन व्यावसायिक संधियाँ, संविधान,
प्रेमपत्र और सरकारी आदेश लिखे जाएंगे

****
एक दिन

हमारी कविताएं अभी छप नहीं सकतीं
वे हाथों
हाथ घूमती हैं हाथ से लिखी
या साइक्लोस्टाइल की हुईं
पर एक दिन लोग उस तानाशाह को भूल जाएंगे
जिसके ख़िलाफ़ ये कविताएं लिखी गईं थीं
और कविताएं पढ़ी जाती रहेंगी

****
मेरी ये कविताएं

क्या तुमने रात को चींटीखोर की चीख सुनी है
ऊ-ऊ-ऊ-
या चांदनी रात में भेड़िये का चीत्कार
हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू हू
हाँ, ऐसी ही हैं मेरी ये कविताएं

****

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सबद विशेष : ३ : एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं

4:49 pm


( यह पोस्ट हर लिहाज से कवि मंगलेश डबराल की है। सबद का इतना सौभाग्य ज़रूर है कि उन्होंने कार्देनाल सरीखे कवि की कविताओं के अपने अनुवादों को प्रकाशन के लिए इसे उपयुक्त माना। इसके लिए पुराने अनुवादों को उन्होंने न सिर्फ़ पुनरीक्षित किया, हमारे बहुत कहने पर कार्देनाल की कविता पर एकाग्र गद्य भी लिखा। बताते चलें की यह अधूरी पोस्ट है। इसे पूर्णता कार्देनाल की कुछ लंबी और महत्वपूर्ण कविताओं के बिना न मिल सकेगी। अगली दफा आप उनकी 'मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना' सहित कुछ और कविताएं भी पढ़ सकेंगे। )

ओला, पाद्रे !

मंगलेश डबराल

रूबेन दारियो, पाब्लो नेरुदा और सेसर वाय्यखो के बाद १९२५ में निकारागुआ में जन्मे एर्नेस्तो कार्देनाल लातिन अमेरिकी धरती के चौथे बड़े कवि माने जाते हैं। मार्क्सवाद और रोमन कैथलिकवाद दोनों से उनकी प्रतिबद्धता दुनिया भर में चर्चित रही है। शुरू में कार्देनाल की कविता पर दारियो और नेरुदा का गहरा असर था, लेकिन अमेरिका के आधुनिक आध्यात्मिक कवि थॉमस मर्टन के संपर्क में आने के बाद वे एज़रा पाउंड की काव्य-कला से बहुत प्रभावित हुए। अमेरिकी साम्राज्यवाद और लातिन अमेरिकी तानाशाहों के प्रखर विरोधी और लिबरेशन थिओलाजी के समर्थक कार्देनाल की कविता में बाइबल की सूक्तियों जैसी संक्षिप्ति, चीन के थांग काल के महकविओं जैसी शुद्धता और एज़रा पाउंड जैसी वृत्‍तात्‍मकता मिलती है। उन्होंने दो-तीन पंक्तियों के 'वचनों' से लेकर 'ज़ीरो आवर' जैसी लम्बी 'डाक्युमेंट्री' कविताएं भी लिखी हैं जिनमें पूंजीवादी व्यवस्था की घटनाओं, सूचनाओं और आंकड़ों के इस्तेमाल से एक शोषक सभ्यता पर टिप्‍पणियां की गईं हैं।

कार्देनाल ने 'एक्सतीरियरिज्मो' नाम से एक काव्य आंदोलन की शुरुआत भी की थी जिसमें आत्मगत और वैयक्तिक तत्वों को बुहार कर कविता को अधिक से अधिक वस्तुगत स्वरुप देने का प्रयत्न था। कार्देनाल निकारागुआ के तानाशाह सोमोज़ा के विरद्ध भूमिगत संघर्ष करते रहे और कई वर्ष बाद जब निकारागुआ में सांदिनीस्ता क्रांतिकारियों की सरकार बनी तो वे उसमें संस्कृति मंत्री रहे। इससे पहले उन्होंने १९७० में क्यूबा जाकर क्रांति के बाद उस समाज में आए बदलावों पर एक विस्तृत डायरी 'इन क्यूबा' प्रकाशित की थी।

कार्देनाल की इन सूक्तियों/सुभाषितों/वचनों -- 'एपिग्राम्स' -- को १९७६ में सबसे पहले नरेंद्र जैन ने अनुदित किया था। भोपाल की ब्रिटिश लाइब्रेरी में 'लंदन मैगज़ीन' में छपे अंग्रेज़ी अनुवादों से हिन्दी अनुवाद करके उसने अपने सुलेख में एक पोस्टर प्रकाशित किया जो शायद आज भी किसी न किसी कविता-प्रेमी की दीवार पर चिपका हो। कुछ वर्ष बाद मेरे मित्र अमरजीत चंदन ने जब मुझे लंदन से कार्देनाल का संग्रह, 'मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना' भेजा तो मेरे किए हुए कुछ अनुवाद 'तनाव' पत्रिका में प्रकाशित हुए।

एक अद्भुत संयोग से कुछ समय बाद २० जनवरी, १९८९ को मेरी कार्देनाल से दिल्ली में एक मुलाकात हुई। वे तब निकारागुआ के संस्कृति मंत्री थे, भोपाल के भारत भवन में हुए अंतरराष्ट्रीय कविता उत्सव से लौटे थे और निकारागुआ के दूतावास में उनका जन्मदिन मनाया जा रहा था। सफेद दाढ़ी, काली टोपी, और किसी तब्लानावाज़ या फकीर जैसे दीखते, वाइन के घूंट लेते हुए कार्देनाल को मैंने अपना अनुवाद दिखाया तो वे बोले, ' मैं इसे भोपाल में देख चुका हूँ।' उन्होंने उस पर हस्ताक्षर किए : ' पारा मंगलेश .... इस किताब के लिए मेरा आभार।' मैंने उनसे पूछा,' फादर, आप मार्क्सवाद और ईसाइयत के बीच किस तरह तालमेल बिठाते हैं ? उन्होंने कहा, ' दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है, दोनों ही मनुष्य की मुक्ति की विचारधाराएं हैं।' मैंने पूछा,' लेकिन आप सक्रिय पादरी हैं' तो वे बोले, ' मुझमें और दूसरों में फर्क यह है कि मैं ईश्वर और लोगों के बीच की कड़ी नहीं हूँ और मेरे और ईश्वर के बीच भी कोई नहीं है।' मैंने उनसे नई कविताओं की मांग की तो उन्होंने मेरी डायरी में अपना पता लिखते हुए कहा, ' तुम मुझे चिट्ठी लिखो, मैं भेज दूँगा।' मैंने पूछा,'कॉपीराइट की समस्या तो नहीं होगी, तो वे बोले : तुम्हें सीधे कवि से कविताएं मिलेंगी।'

उन दिनों मैं 'जनसत्ता' में काम करता था जहां से चलते समय मुझे कवि-कार्टूनकार राजेन्द्र धोड़पकर ने एक कोरा कागज़ थमाते खा था कि इस पर आप मेरे लिए कार्देनाल से हस्ताक्षर करवाकर ले आइएगा। मैंने जेब से वह कागज़ निकालकर फादर से दस्तखत करने के लिए कहा। वे मासूमियत से कलम निकालकर लिखने ही वाले थे कि उनके पीछे खड़ा दूतावास का एक अधिकारी बोला,' ओह नो! डू यू वांट फादर टू साइन ऑन अ ब्लैंक पेपर ?' तब मुझे एहसास हुआ कि कार्देनाल एक विदेशी सरकार के मंत्री हैं और मैं एक बड़ी गलती करने जा रहा था। मैंने घबराकर कागज़ वापस जेब में रख लिया। फिर सब लोग फादर की सेहत और कविता के लिए जाम उठाने में जुट गए। उनसे लम्बी बात करने की बहुत इच्छा थी पर यह संभव नहीं था क्योंकि उन्हें अगले दिन वापस लौटना था। इतन्व वर्ष हुए, मैं उन्हें लिख भी नहीं पाया। लेकिन उस मुलाकात की याद इतनी अमिट है कि मैं अब भी झूमते-मुस्कराते, हर चीज़ को बच्चों जैसे कुतूहल से देखते फादर को अपने सामने देख सकता हूँ और कह सकता हूँ,' ओला, पाद्रे ( हलो, फादर ) !

कार्देनाल की कविता ने लातिन अमेरिकी समाज को रूमानी, राजनैतिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर बहुत गहरे प्रभावित किया है। एक प्रमाण हैं ये सूक्तियां जो लगभग ५५ साल पहले लिखी गईं थीं लेकिन उनका रोमांच आज भी बरकरार है।

कविताएं एर्नेस्तो कार्देनाल की

( मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित )

1.

ये कविताएं मैं तुम्हें सौंपता हूँ, क्‍लॉदिया, क्योंकि ये तुम्हारी हैं
मैंने इन्हें बहुत सादगी से लिखा है ताकि तुम समझ सको
ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए हैं, पर अगर तुम इनसे ऊब जाओ
तो मुमकिन है एक दिन ये पूरे स्पानी अमेरिका में फैल जाएंगी
और अगर तुम उस प्यार का भी तिरस्कार करोगी --
जिसने इन्हें लिखा
तब उस प्यार का सपना दूसरी स्त्रियाँ देखेंगी --
जो कि उनके लिए नहीं बना था
और क्‍लॉदिया, शायद तुम पाओगी कि ये कविताएं
( जो तुम्हारे प्रेम निवेदन में लिखी गईं थीं )
इन्हें पढ़नेवाले दूसरे प्रेमीजनों में उन चुम्बनों को जगाएंगी
जिन्हें एक कवि तुममें नहीं जगा पाया

2.

यही होगा मेरा प्रतिशोध :
कि एक दिन तुम्हारे हाथों में होगी
एक प्रसिद्द कवि की कविता की किताब
और तुम पढ़ोगी उन पंक्तियों को जो कवि ने
तुम्हारे लिए लिखी थीं
और तुम कभी जान नहीं पाओगी यह बात

3.

उन्होंने मुझे बताया तुम किसी दूसरे से प्यार करती हो
यह सुनकर मैं अपने कमरे में चला गया
और मैंने लिखा सरकार के खिलाफ़ वह लेख
जिसने मुझे खिला दी जेल की हवा

4.

तुम जिसे मेरी कविताओं पर गर्व है
इसलिए नहीं कि उन्हें मैंने लिखा
बल्कि इसलिए कि वे तुम्हारी प्रेरणा से लिखी गईं
हालांकि वे लिखी गईं थीं तुम्हारे विरुद्ध

तुम बेहतर कविता प्रेरित कर सकती थीं
तुम बेहतर कविता प्रेरित कर सकती थीं

5.

मैंने बांटे हैं भूमिगत पर्चे
सड़क के बींचोबीच इंकलाब ज़िन्दाबाद का नारा लगते हुए
बंदूकधारियों सिपाहियों की परवाह न करते हुए
मैंने अप्रैल विद्रोह में शिरकत की
लेकिन जब तुम्हारे घर के सामने से गुजरता हूँ
मैं पीला पड़ जाता हूँ
मुझे हिला देती है तुम्हारी एक ही निगाह

6.

कोस्ता रीका के इन गुलाबों को
स्वीकार करो मरियम, इन प्रेम कविताओं के साथ :
ये कविताएं तुम्हें याद दिलाएंगी
कि गुलाबों के चेहरे तुम्हारे चेहरे की तरह हैं ; ये गुलाब
याद दिलाएंगे कि प्रेम को टूटना ही होगा
और तुम्हारा चेहरा यूनान और रोम की तरह मिट जाएगा
जब न प्रेम होगा और न कोस्ता रीका के गुलाब होंगे
मरियम, तब तुम्हें याद आएगा यह उदास गीत

7.

अब भी मुझे याद है पीली बत्तियों वाली वह गली
बिजली के तारों के बीच पूरा चाँद
और कोने पर वह तारा, कहीं दूर रेडियो की आवाज़
ला मेरसेद के गुंबद पर बजता ग्यारह का गजर :
और तुम्हारे खुले दरवाज़े पर सुनहरा प्रकाश : उसी गली में

8.

भीड़ में अकेली तुम हो
जैसे आसमान में अकेला चाँद
और अकेला सूरज है

कल तुम स्टेडियम में थीं
हज़ारों-हज़ारों लोगों के बीच
और जैसे ही मैं आया मैंने तुम्हें देख लिया
गोया अकेली तुम थीं
खाली स्टेडियम में

9.

हो सकता है, मेरे प्यार,
इस साल हम कहीं यात्रा पर निकल जाएं
हो सकता है
इस साल हम विवाह कर लें
हो सकता है, मेरे प्यार,
इस साल सोमोज़ा का पतन हो जाए

10.

बारिश की भारी बूंदें
सीढियाँ चढ़ते पैरों की आहट की तरह हैं
और दरवाज़े को थपथपाती हवा
जैसे कोई स्त्री भीतर आने-जाने को हो

11.

तुम आईं सपनों में
लेकिन जो शून्य तुम छोड़ गईं
वह था यथार्थ

( अगली पोस्ट में जारी... )

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सोल्झेनित्सिन पर शंकर शरण

10:26 pm
( सोल्झेनित्सिन सिर्फ नोबेल प्राप्त एक साहित्यकार भर नहीं थे। वे उसी रूस से थे जहाँ तोल्स्तोय और गोर्की हुए, क्रांति और कम्युनिज्म का नारा बुलंद हुआ और जिसकी अकल्पनीय परिणति यातना शिविरों के रूप में हुई। सोल्झेनित्सिन रूसी यातना शविरों के त्रासद दौर के लेखक थे। उन्होंने व्यवस्था विरोध की कीमत चुकाई। उन्हें यातनाएं दी गईं। निर्वासित हुए। प्रतिबन्ध झेला। फिर भी लिखते रहे। उनका लिखा दस्तावेजी महत्व रखता है। उनके लेखन को कम्युनिज्म विरोधी मानकर अलक्षित करना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वे हमारे लिए एक ज़रूरी लेखक हैं। इन मायनों में भी कि उनके ज़रिए हम उस अंधी गली में दाखिल होने का जोखिम उठाते हैं जिससे बचने या जी चुराने से हमारे भीतर विचारधारा और उसकी व्यावहारिक परिणति के प्रति आलोचनात्मक रिश्ते के शिथिल पड़ने की गुंजाइश बढ़ जाती है। हम शंकर शरण के आभारी हैं जिन्होंने हमारा आग्रह मान सोल्झेनित्सिन के अवदान पर यह लेख लिखा। उन्होंने सोल्झेनित्सिन की कुछ कृतियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। )


सोल्झेनित्सिन की विरासत

शंकर
शरण

सोल्झेनित्सिन
का लेखन अपने ढंग की विधा है। उस में कथा, संस्मरण, जीवनी, विवरण, विश्लेषण और इतिहास जीवंत रूप में गुँथे हैं। उस की कलात्मक शक्ति और सौंदर्य पढ़कर स्वयं अनुभव करने की चीज है। कैंसर वार्ड, पहला घेरा, गुलाग, लाल चक्र जैसे उपन्यास ग्रंथ हों अथवा “मैत्र्योना का घर”, “हम कभी गलती नहीं करते” जैसी लंबी कहानियाँ – सोल्झेनित्सिन के लेखन में प्रत्येक कहा-अनकहा शब्द, ध्वनि, रिक्त स्थान, विभिन्न विराम-चिन्ह तक अत्यंत गहरे अर्थों से संपृक्ति हैं। एक पाठ में कई उप-पाठ छिपे हैं, जिन पर संकेत भर कर के छोड़ दिया गया।

यह
उन के लेखन की विशेषता थी। प्रत्येक शब्द, प्रत्येक चिन्ह मस्तिष्क में या कागज पर स्थान और समय लेता है – इसलिए स्थान अनावश्यक न घेरना, उस का और समय का मूल्य पहचानना। अतः वही लिखो, जो नितांत आवश्यक, सार्थक और मूल्यवान हो। इस अर्थ में भी गुलाग आर्किपेलाग (1968) अपने तरह की अकेली रचना है। अपनी किशोरावस्था, युवावस्था, सैनिक सेवा, जेल और यातना शिविरों में – अर्थात कोई तीस-पैंतीस वर्षों तक – सोल्झेनित्सिन ने सोवियत संघ में जो देखा, महसूस किया था उसे, तथा असंख्य अन्य रूसियों की बातों को भी कहने के लिए उन्हें अपने तरह की विधा - ‘लिटररी इन्वेस्टीगेशन’ - बनानी पड़ी। इस में तथ्य-संग्रहण, जीवनी, संस्मरण, पत्र-लेखन, शोध, बयान, टिप्पणियाँ, समाचार-कतरन और विश्लेषण आदि अनेक तत्व हैं।

बिना गुलाग पढ़े उस की विराट, लोमहर्षक सच्चाई, किसी तानाशाही द्वारा अपने ही लोगों पर पागलपन भरा और अविश्वसनीय अत्याचार, दशकों तक करोड़ों रूसियों द्वारा झेली गई असह्य वेदना, आदि को समझा ही नहीं जा सकता। पढ़ कर लगता है कि सोल्झेनित्सिन ने सोच-समझ कर यह विधा नहीं बनाई। अपनी अनुभूत बातों को सर्वोत्कृष्ट ढंग से कहने की उत्कट इच्छा और अदम्य प्रयास से लेखन का वह अनोखा रूप आप ही आप रूपायित होता गया जिसकी बदौलत गुलाग आर्किपेलाग बीसवीं शती की संपूर्ण विश्व में सबसे महत्वपूर्ण कथा-इतर (नॉन फिक्शन) पुस्तक मानी गई।

किंतु रोचक तथ्य यह है कि जिस लेखन ने उस समय सर्वशक्तिमान प्रतीत होने वाली सोवियत सत्ता की नींव हिला दी, उस में कम्युनिस्ट अत्याचारियों के लिए कोई कटुता, भड़काऊ शब्द नहीं था। चाहे ईवान डेनिसोविच के जीवन का एक दिन के सौ पृष्ठ हों, अथवा गुलाग आर्किपेलाग के तीन हजार पृष्ठ – सोल्झेनित्सिन का लेखन प्रतिशोध या आंदोलन के आवाहनों से नितांत मुक्त है। तब क्या था जिस ने सोवियत कम्युनिज्म की चूल हिला दी? यहाँ तक कि मिखाइल शोलोखोव जैसे लेखक-नेता ने सार्वजनिक रूप से हाथ मले कि सोल्झेनित्सिन जैसा ‘जिद्दी कीड़ा’ यातना-शिविरों से जीवित क्यों बच कर आ गया! सोल्झेनित्सिन के लेखन की शक्ति इस बात में थी कि उस ने सोवियत व्यवस्था की अमानवीयता और पाखंड को मानो एक विराट् आईने में उतार दिया था। संयत, सधे पर अत्यंत कलात्मक रूप में। आइना इतना जीवंत था कि सोवियत प्रचारतंत्र सोल्झेनित्सिन को ‘विदेशी एजेंट’ जैसी घिसी-पिटी पुरानी कम्युनिस्ट गाली के सिवा कोई उत्तर न दे सका। क्योंकि सोल्झेनित्सिन ने एक शब्द भी अप्रमाणिक नहीं लिखा था, न उन का मूल्यांकन अतिरंजित था। वह कठोर, पर सजीव सत्य से भरा था जिसके समक्ष सर्वशक्तिमान कम्युनिस्ट तानाशाही थरथरा गई थी।

यह सोल्झेनित्सिन की अनमोल विरासत है। उन्होंने एक बार लेखकों से कहा भी थाः कभी ऐसा एक शब्द भी न लिखो जिसे तुम स्वयं सत्य नहीं समझते हो। चाहे किसी उद्देश्य से, दूसरों के दिए विचारों या नारों को न दुहराओ यदि तुमने स्वयं उस की सच्चाई नहीं परख ली। किंतु उन की विरासत केवल इतने तक सीमित नहीं है। लेखन और चिंतन की विराटता, कलात्मक सौष्ठव, गहन दार्शनिक अवलोकन और आध्यात्मिक भाव के कारण ही रूस में लेव टॉल्सटॉय के बाद सोल्झेनित्सिन को ही उस स्तर का लेखक-चिंतक माना गया। यह अनुभव करने के लिए गुलाग आर्किपेलाग के तीन वृहत खंडों, तथा कई खंडों में इतिहासात्मक कृति लाल चक्र को पढ़ना चाहिए।

( सोल्झेनित्सिन का गए चार अगस्त को ८९ साल की उम्र में निधन हो गया। )

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रंगायन : कारंथ पर हृषीकेश सुलभ

7:59 pm


( कारंथ वट वृक्ष थे. उनका विरुद सैकडों पन्नों में गाया जा सकता है. गाया गया भी है. सुलभजी ने उनके रंग-व्यक्तित्व के महत्व का बखान यहाँ थोड़े में करने की कोशिश की है. इस क्रम में उनके बारे में बहुत कुछ अनकहा-अलक्षित भी सामने आया है. बहरहाल, हमें खुशी है कि कुछ देर से ही सही उन्होंने सबद के लिए स्तंभ लिखना शुरू कर दिया. वे भारतीय रंगमंच के मूर्धन्यों पर हर बार अपना लेखन एकाग्र करेंगे. अगले रंग-व्यक्तित्व नेमिचंद्र जैन होंगे. )



बोयण्णा
से बाबा तक का सफर


हृषीकेश सुलभ

भारतीय रंगमंच के दुर्लभ व्यक्तित्व ब. व. कारंथ का पूरा नाम बहुत कम लोगों को मालूम है। ब. व. या बी. वी. कारंथ को बाद के दिनों में लोग ‘बाबा’ कहकर बुलाने लगे थे। बाबूकोड़ी व्यंकटरामन कारंथ को बचपन में घर पर सब ‘बोयण्णा’ कहते थे। उन्हें अपनी सही जन्म तिथि नहीं मालूम थी। 19-09-1929 के बारे में उनका कहना था कि अंक 9 की पुनरावृत्ति के कारण इसे याद रखने में सुविधा होती इसलिए इसे हाईस्कूल के फ़ार्म में भर दिया। बाद में उनकी माँ ने उन्हें बताया कि उनका जन्म सन् 1928 में हुआ था।

कारंथ अपने रंगकर्म के लिए जितना जाने जाते हैं, उतना ही अपनी यायवरी और अपने व्यक्तित्व के विरोधाभासों के लिए भी। वह एक जगह टिक कर कभी नहीं रहे। वह निरंतर बेचैन रहते। हमेशा लगता, जैसे उनके भीतर कोई हाहाकार मचा हो। इसी आकुलता ने उन्हें स्थान, काल और अपनी ही रचनात्मकता का अतिक्रमण कर जीने और रचने का हुनर और साहस दिया। उनके रंगकर्म की तमाम विषिष्टताओं के सूत्र उनके विरोधाभासों में ही छिपे हैं।

कारंथ का जन्म मंगलूर के तटीय क्षेत्र के एक छोटे-से गाँव मंची में हुआ। केरल की सीमा पर कर्नाटक का यह गाँव छोटी-छोटी पहाड़ियों और घने वृक्षों से घिरा है, जिनके शीर्ष से विशाल समुद्र के जादू को निहारा जा सकता है। गाँव से कुछ मील की दूरी पर बहती थी नेत्रवती नदी। उन्होंने तीसरी कक्षा में पढ़ते हुए ही अभिनय की शुरुआत ''भागवत और पंडित की मुठभेड़'' नामक नाटक में पुजारी की भूमिका से की थी। फिर पुटप्पा के लिखे बाल नाटक मेरा गोपाल में अभिनय किया। आठवीं तक पढ़ने के बाद पिता ने पढ़ाई बंद करा दी और एक ज़मींदार के घर पढ़ाने के काम पर लगा दिया। मंगलूर के इस इलाके़ में यक्षगान की समृद्ध परम्परा रही है। पर्व-त्योहार, उत्सव-अनुष्ठान और जीवन के हर व्यवहार में गीत-संगीत रचा-बसा था। इसी परिवेश से कारंथ ने लोक-संस्कार ग्रहण किया। इसी लोक-संस्कार से उन्होंने अपने रंग-संस्कार को विकसित किया।

उनके इलाक़े में गुब्बी थिएटर कम्पनी नाटक करने आती थी। एक बार कम्पनी का नाटक देखने के लिए कारंथ घर से भागकर मीलों दूर पुत्तूर चले गए थे। उन्हें बचपन में चोरी की लत लग गई थी। वह अपने गाँव में प्रतियोगिताएँ आयोजित करते और चोरी के पैसों से पुरस्कार बाँटते। यही कारण था कि पिता ने पढ़ाई बंद करवा दी और गाँव से दूर ज़मींदार के घर पढ़ाने के काम पर लगवा दिया। कारंथ ने वहाँ भी चोरी की और उन पैसों से संगीत और संस्कृत सीखा और साहित्य की पुस्तकें ख़रीदकर पढ़ना शुरु किया। पर वह पकड़े गए और बहुत लज्जित हुए। फिर वह घर से भागकर मैसूर पहुँचे। उस समय मैसूर में गुब्बी कम्पनी का प्रदर्शन चल रहा था। कारंथ गुब्बी कम्पनी में भर्ती हो गए। यहाँ उनके रंग-संस्कार को संगीत की विविधताओं से तैयार नई ज़मीन मिली।

रंगमंच के लिए किसी भी प्रकार का शुद्धतावाद घातक होता है। यही कारण है कि रंगसंगीत के क्षेत्र में अपनी प्रयोगधर्मिता से उन्होंने हर बार नया प्रतिमान स्थापित किया। उनका रंगसंगीत नाटक के गर्भ से उपजता था और संगीत की पारम्परिकता का अतिक्रमण कर रंगभाषा में तब्दील हो जाता था। कई बार उन्होंने पारम्परिक वाद्यों को छोड़कर मंच-सामग्री से संगीत घ्वनियों की रचना की। उन्होंने थिएटर में संगीत के स्वतंत्र अस्तित्व को नकारते हुए उसके रंग और नाटकापेक्षी होने पर बल दिया। उनके नाटकों में चरित्र के भावों की स्थिति को बनाए रखने के लिए संगीत का उपयोग हुआ है। उन्होंने चरित्र की एकान्विति के लिए संगीत रचा। कुछ सालों तक इधर-उधर भटकने, हिन्दी प्रचारक बनने और तरह-तरह के कामों में उलझे रहने के बाद कारंथ वाराणसी पहुँचे और विश्वविद्यालय में पंडित हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के छात्र हो गए। उन्होंने वाराणसी में ही पंडित ओंकारनाथ ठाकुर से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। एम. ए. करने के बाद शोधकार्य अधूरा छोड़कर उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाख़िला लिया। इस बीच प्रेमा से उनका विवाह हो चुका था। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रसिक्षण प्राप्त करने के बाद का उनका जीवन रंगमंच की दुनिया में एक खुली क़िताब की तरह है।

एक बेचैन आत्मा की तरह भटकते हुए कारंथ का रिश्ता रचनात्मकता से हमेशा जुड़ा रहा। अपनी अस्थिर प्रकृति के कारण उन्हें निरंतर आलोचना का सामना करना पड़ा। पर एक सच यह भी है कि इसी अस्थिरता के बीच से वह अपने लिए हठ भी चुनते थे और कई बार उनके हठ ने उनसे महत्त्वपूर्ण काम करवाए। प्रसाद ने हिन्दी रंगमंच को जो चुनौती दी थी, हिन्दी रंगमंच लम्बे समय तक उससे भयभीत रहा। असफलता के भय से अधिकांश रंगकर्मियों ने प्रसाद के नाटकों को छूने का साहस नहीं किया। फलतः प्रसाद के नाटकों को अमंचीय और दुरूह मान लिया गया।

कारंथ ने प्रसाद की इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी प्रयोगधर्मिता और रंगचेतना से उनके नाटकों को फिर से आविष्कृत करने का प्रयास किया। उन्होंने सबसे ज़्यादा प्रसाद के नाटकों को मंचित किया। स्कंदगुप्त का मंचन उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी। दर्शकों और उनके आलोचकों ने इसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की। कारंथ ने स्कंदगुप्त के अलावा चंद्रगुप्त, विशाख और कामना को मंचित किया। यक्षगान की रंगयुक्तियों के साथ रघुवीर सहाय द्वारा किए गए मैकबेथ के रूपांतर बरनम वन को मंचित किया। इस मंचन ने लोक रंगमंच की युक्तियों के साथ आधुनिक रंगकर्म के सम्बन्धों पर चल रहे विमर्श को नए आयाम दिए।

भारतेन्दु के नाटक अन्धेर नगरी के मंचन से कारंथ ने हिन्दी रंगमंच को नई त्वरा दी और अपने आलोचकों को विस्मित किया। इस प्रस्तुति ने अपनी प्रतीकात्मकता और कल्पनाशीलता से नई अर्थछवियों को दर्शकों तक संप्रेषित किया। कालिदास के नाटकों मालविकाग्निमित्र, विक्रमोवर्शीयम और कन्नड़ में रघुवंशम को मंचित किया। कारंथ ने कन्नड़ और हिन्दी में लगभग सौ नाटकों के अलावा उर्दू, पंजाबी, संस्कृत, गुजराती, मलयालम, तेलगू आदि भाषाओं में भी नाटकों को मंचित किया। वह बच्चों के रंगमंच के प्रति भी बेहद संवेदनशील और उत्सुक थे। उन्होंने हिन्दी और कन्नड़ में तीस से ज़्यादा बाल नाटकों को निर्देशित किया। प्रतिभा के धनी कारंथ को भोपाल में विवादों का भी सामना करना पड़ा, पर वह इस आग में तपकर कुन्दन की तरह बाहर निकले और अपनी रचनात्मकता और गहरी संवेदनशीलता के बल पर दर्शकों की आशाओं का केन्द्र बने रहे।

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कवि की संगत कविता के साथ : 4 : सुंदर चन्द ठाकुर

3:03 pm
( बारहा तो यही होता है कि जब अनुभव का खुरदरापन भाषा में उतरता है और कवि सजग न हुआ तो वह एक अनुभव अद्वितीय को लद्धड़ भाषा के हवाले करके ही अपनी कविता हुआ समझता है। सुंदर चन्द ठाकुर और उनकी कविता अपने भोगे-जाने यथार्थ के प्रति गहरी आसक्ति के बावजूद भाषा और अभिव्यक्ति में एक साफ़-सुथरापन लिए है जो प्रकारांतर से इधर की कविता में उन्हें विशिष्ट भी बनाता है। सबद के लिए उनकी दो नई कविताएं और पहले संग्रह, '' किसी रंग की छाया '' से चयनित कविता के अलावा उनका आत्मकथ्य भी इस कथन का साक्षी है।  )

आत्मकथ्य

मैं पेड़ को पेड़ की तरह व्यक्त करना चाहता हूँ

कोई व्यक्ति कविता क्यों लिखता है, क्यों पढ़ता है, इसका कोई ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता। जब ख़ुद से ऐसे सवाल करता हूँ तो इसकी एक वजह यह दिखती है कि कई वर्षों से कविताएं लिखते-पढ़ते अब मुझे इसकी आदत हो गई है -- ऐसी आदत जो अब शायद मरने पर ही छूटे। लेकिन इस जवाब के साथ दिक्कत यह है कि कविता के लिए आदत जैसा शब्द अनुपयुक्त लगता है, क्योंकि आदत तो हमें सिगरेट-शराब पीने से लेकर सुबह देर से उठने की भी हो सकती है। ऐसी आदतों से भी तो कई बार हम जीवन भर छुटकारा नहीं पा पाते।

फिर यह भी है कि ये आदतें नशे और शरीर को आराम देने का काम करती हैं, जबकि कविता लिखना सृजन-सुख के गहरे नशे के अलावा एक तकलीफ और एक सीमा के बाद जिम्मेदारी का सौदा ज्यादा हो जाता है -- समाज के प्रति, भाषा के प्रति, इस विपुल पृथ्वी, समूचे ब्रह्मांड के प्रति, जीवन और विचारधारा के प्रति जिम्मेदारी का सौदा। कई बार इससे मुश्किलें बढ़ती हैं। बल्कि कहूँगा कि अतीत में जितने प्रतिभाशाली, समर्पित कवि हुए हैं, उनके लिए कविता अंततः सिर्फ़ और सिर्फ़ तकलीफ का सौदा ही बनी। कविओं ने किसी सत्ता पर कब्जा नहीं किया, कविता लिखने कि योग्यता ने उन्हें किसी देश का राजा- महाराजा नहीं बनाया, बल्कि हिंदुस्तान में तो ज्यादातर गरीबी, बीमारी, निराशा और कई बार बुढ़ापे में अकेला छोड़ दिए जाने से त्रस्त होकर मरे - निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, पाश से लेकर विदेशों में फर्नान्दो पेसोआ या रूसी कवि मायकोवस्की, ऐसे कई नाम लिए जा सकते हैं।

इन्हीं सब विभूतियों को थोड़ा बहुत जानने-समझने के बाद से कविता मेरे लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है -- मैं अपने सामने खुलने वाले हर दृश्य और जिन लोगों से मिलता हूँ -- अजनबी और परिचित, जिन स्थितियों से गुजरता हूँ -- पहचानी और नई, हर सपने, हर अनुभूति पर उसे ठीक-ठीक व्यक्त करने वाली कविता लिखने के फेर में रहता हूँ। इसे सरल ढंग से कहा जाए तो बहुत घिसीपिटी बात लगेगी कि मैं पेड़ को पेड़, बच्चे को बच्चे या एक दुर्घटना को दुर्घटना की तरह व्यक्त करना चाहता हूँ -- उनके भीतरी रहस्यों को उजागर करने की कोशिश करते हुए।

मैं समझता हूँ कि महानगर में जी रहे नौकरीपेशा के रूप में मुझे मिलनेवाली तमाम रियायतों के साथ मैं अगर कभी सृजन के उर्वर क्षणों में एक कभी-कभार हाथ आनेवाली मनःस्थिति पा सका और तत्क्षण अगर मुझ पर सरस्वती मेहरबान हुई तो ही शायद ऐसा कुछ लिख सकूंगा -- पत्थर-पानी से लेकर हत्या-राजनीति और न जाने किस-किस चीज़, किस-किस व्यक्ति और स्थिति के बारे में ठीक वैसा जैसा मैं अपने रोज़मर्रा की व्यस्तताओं के बीच कई बार ठिठककर उन्हें देखते हुए सोचने लगता हूँ।

****
दो नई कविताएं


दो प्रेमी


यह न सोचिए कि हमें न था मालूम कि मार दिए जाएंगे
प्यार को राह पर छोटे से सफर में ही हम जान गए थे
अपने प्यार की खातिर उठाया हो किसी ने कितना ही जोखिम
दूसरे के प्रेम में सबको खोट नज़र आया है

दूसरों का प्रेम अपने शरीर से बहार घटता है
आत्मा से तो कोसों दूर

इसलिए जब हमें चारों ओर से घेर लिया गया जैसे किसी आदमखोर बाघ को
उसके सताए गुस्से से भरे लोग घेर लेते हैं आंखों में उन्मादी हिंसा भरे हुए
और हमारे सिरों के ऊपर धारदार कुल्हाड़ी की चमक कौंधी
मृत्यु हमारे लिए दहशत न बन सकी
बल्कि चारों ओर बंद रास्तों के बीच वह बनी अकेली एक खुली राह
जिस पर हमारे साथ चलने पर किसी को कोई एतराज न था
जिस पर हम आगे बढ़े जैसे बढ़ना ही चाहिए सच्चे प्रेमिओं को
उतनी ही बेतकल्लुफी से जैसे डूबते हुए सूरज को देखते हुए
वे बढ़ते हैं समुद्र की गीली रेत पर
मिट जाने को छोड़ते निशान।

****

धूप
में एक रविवार


धूप मेरी आत्मा में ऊष्मा बनकर उतर रही है
आकाश का नीला मुझे हरा बना रहा है

मैंने आँख मूंदकर पक्षियों की आवाजें सुनीं
गाड़ियों और जीवन के शोर के ऊपर तिरती महीन
और जाना कि किस तरह वे एक पल को भी ख़त्म न होती थीं
चारों ओर से हम पर बरसता रहता है कितना जीवन
मगर हम ही हैं कभी बुद्धिमान कभी मूर्ख बनकर
ज़िन्दगी गंवाने पर तुले रहते हैं

मैं देर तक सोखता रहा धूप
करवट बदल-बदलकर
काम के हर सोच को मुल्तवी करता
अप्रत्याशित इस समय को भरा माँ ने
अपने बचपन के किस्सों और धूप पर एक लोकगीत से
वह जब दिन का भोजन बनाने चली गई
मैंने उड़ते तोतों को देख अपना बचपन याद किया
इस शहर में कितने लोग धूप का आनंद ले पाते हैं
चालीस की रवां उम्र में तो यह नामुमकिन हो चला है
मगर आज धूप में बेफिक्र लेटा अपनी उपलब्धि पर खुश होता रहा मैं
सोचा मैंने लिखूं इस खुशी पर एक कविता
जिसमें धूप हो, आकाश का नीलापन
रविवार की फुर्सत और तोतों की टवां-टवां
मगर लिख न पाया

धूप मेरे विचारों को सोखती रही
मेरे पास थी पेसोआ की कविताओं की किताब
मैंने पढ़ी एक के बाद एक उसकी कविताएं अनेक
अंततः जब मैं छत से उतर लौटा घर के भीतर
धूप और कविताओं से भर चुका था इस कदर
कुछ भी लिखने-सोचने की चिंता से बेज़ार
मैंने माँ के हाथ का खाना खाया
और कंबल ओढ़कर सो गया।

****
पुराना चावल


अनुपस्थिति


एक चिड़िया दृश्य से बाहर उड़ी है अभी-अभी
यहाँ सिर्फ़ उसकी अनुपस्थिति रह गई है
जहाँ थी वह अपने दो पंजों पर फुदकती हुई
वहीं उसकी कूक थी दृश्य को भरती हुई
उसके आकार की परछाईं थी
उसी की तरह हिलती-डुलती चोंच रगड़ती

वह चिड़िया दृश्य से उड़कर जा चुकी है बाहर
अब वही किसी दूसरे दृश्य को भर रही होगी
जहाँ उसकी परछाईं थी घास पर
उतना हिस्सा चमक रहा है धूप में
उसकी कूक हवा की जिस पार्ट पर सवार तैरती थी
अब वहां एक चुप्पी उतर रही है

दृश्य से जा चुकी वह चिड़िया
अभी बची हुई है वहां
उसके पंजों के नीचे दबी घास
खुल रही है धीरे-धीरे
वातावरण में
उसकी कूक की अनुपस्थिति मौजूद है।

****
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सबद विशेष : २ : हैरॉल्ड पिंटर की कविताएं

3:00 pm
( इन पन्नों पर हैरॉल्ड पिंटर की कविताएं आ सकीं इसके लिए युवा कवि-लेखक व्योमेश शुक्ल के हम अत्यन्त आभारी हैं। उन्होंने हमारे सतत आग्रह का मान रख न सिर्फ़ एकमुश्त आठ कविताओं का अनुवाद किया, बल्कि इन पर एकाग्र अपना गद्य भी मुहैया कराया। पिंटर को ज़्यादातर उनके नाटकों के लिए जाना-सराहा जाता है। उनकी कविताओं में लक्षित साम्राज्यवाद विरोधी प्रबल स्वर स्वयं कविता और कव्याभिरुचि को एक चुनौती है। इस स्वर को पुनः-पुनः रेखांकित करने की ज़रूरत है। हमने वही किया है। प्रसंगवस यह भी जोड़ दें कि व्योमेश ने इससे पहले पहल के लिए चर्चित अमरीकी कवि-पत्रकार इलियट वाइनबर्गर की पुस्तक , '' व्हाट आई हर्ड अबाउट इराक '' का भी प्रशंसित अनुवाद किया है। )

ऐसे भी मुमकिन
हैरॉल्ड पिंटर नाटककार और कवि के रूप में लोकप्रिय हैं। उनके कई नाटकों के पूरी दुनिया में अनगिनत मंचन हुए हैं और उनकी लिखी पटकथाओं पर बनी फिल्में भी ख़ासी कामयाब हैं। पिंटर को नोबेल समेत पश्चिम के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार मिले हैं और उनका नोबेल पुरस्कार व्याख्यान साम्राज्यवाद के प्रतिकार के मॉडल की तरह सुना, पढ़ा और समझा गया है। पिंटर हमारे लिए एक ऐसे सर्जक के तौर पर सामने आते हैं जिसके लिए राजनीति और कला अलग-अलग चीजें नहीं हैं। उन्होंने अमेरिकी ज़्यादतियों की मीमांसा की हरेक संभावना का कला और सच्चाई के हक़ में इस्तेमाल कर अप्रत्याशित संरचनाएँ संभव की हैं। पिंटर के यहां गद्य और कविता, नाटक और व्याख्यान, यात्रावृत्त और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को लिखी गई चिट्ठी में ज़्यादा फ़र्क नहीं है।

शायद मनुष्यता के काम आने वाली रचना हर बार विधागत घेरेबंदी के बाहर चली जाती है। उनकी नीले रंग के कवर वाली गद्यपद्यमय किताब ‘वैरियस वायसेज़: प्रोज, पोएट्री, पॉलिटिक्स 1948-2005’ इस धारणा का अद्वितीय प्रमाण है जिसे पढ़ते हुए रघुवीर सहाय की ऐसी ही पुस्तक ‘सीढ़ियों पर धूप में’ लगातार याद आती है। ज़ाहिर है कि ये दोनों कृतियाँ साहित्य, कला, विचार और संघर्ष के सुविधामूलक, शरारती, प्रवंचक और प्राध्यापकीय द्वैतों का अतिक्रमण करती हुई आती हैं। हैरॉल्ड पिंटर की कविताओं में साम्राज्यवादी उतपात, दमन और फरेब को लेकर गहरी नफरत है जिसे अपने विलक्षण कौशल से वे अलग-अलग शक्लों में ढाल लेते हैं। इराक और दूसरे इस्लामी देशों के साथ हुए जघन्य दुष्कृत्यों का बयान करती उनकी कविताएं किसी अतियथार्थवादी फिल्म की तरह देखी भी जा सकती हैं।

हैरॉल्ड पिंटर की कविताएं

अनुवाद : व्योमेश शुक्ल

मौत

लाश कहाँ मिली ?
लाश किसे मिली ?
क्या मरी हुई थी लाश जब मिली थी ?
लाश कैसे मिली ?

लाश किसकी थी ?

कौन
पिता या बेटी या भाई
या चाचा या बहन या माँ या बेटा
था मृत और परित्यक्त शरीर का ?

क्या लाश मरी हुई थी जब फेकी गई ?
क्या लाश को फेका गया था ?
किन्होंने फेका था इसे ?

लाश
नंगी थी कि सफर की पोशाक में ?

तुमने कैसे घोषित किया कि लाश मरी हुई है ?
क्या तुम्हीं ने घोषित किया कि लाश मरी हुई है ?
तुम लाश को इतना बेहतर कैसे जानते थे ?
तुम्हें कैसे पता था कि लाश मरी हुई है ?

क्या तुमने लाश को नहलाया ?
क्या तुमने उसकी दोनों आँखे बन्द की ?
क्या तुमने लाश को दफनाया ?
क्या तुमने उसे उपेक्षित छोड़ दिया ?
क्या तुमने लाश को चूमा ?

****
मौसम पूर्वानुमान

एक बादली शुरुआत से आएगा दिन
यह खासा सर्द होगा
लेकिन दिन बीतते-न-बीतते
सूरज निकल आएगा
और तीसरा पहर सूखा और गर्म होगा

शाम चमकेगा चाँद
और खासा चमकीला
तब, यह कहा जाना है कि
तेज हवा होगी
लेकिन वह आधी रात तक खत्म हो जाएगी
फिर कुछ नहीं होगा

यह अंतिम पूर्वानुमान है

****
लोकतंत्र

कोई उम्मीद नहीं
बड़ी सावधानियाँ ख़त्म
वे दिख रही हर चीज की मार देंगे
अपने पिछवाड़े की निगरानी कीजिए

****
बम

और कहने
के लिए शब्द बाकी नहीं है
हमने जो कुछ छोड़ा है सब बम हैं
जो हमारे सरो पर फट जाते हैं
हमने जो कुछ छोड़ा है सब बम हैं
जो हमारे खून की आखिरी बूँद तक सोख लेते हैं
जो कुछ छोड़ा है सब बम हैं
जो मृतको की खोपड़ियाँ चमकाया करते हैं

****
गाड ब्लेस अमेरिका

फिर चल पड़े
उनकी सैनिक परेड के झटके
उल्लास के नृत्य में झूमते हुए
जैसे इतने बड़े संसार को फलांगते हुए
अमेरिका के ईश्वर की प्रार्थना करते हुए

गटर मृतकों से मरे हुए हैं
कुछ उनके साथ शामिल न हो सके
बाकियों ने गाने से इन्कार कर दिया
कुछ हैं जो अपनी आवाजें गंवा रहे हैं
कुछ हैं जो धुन भूल गए हैं

सारथियों के पास चाबुक है जो छलनी कर डालता है
तुम्हारा सर बालू में घसीटा जाता है
तुम्हारा सर कीचड़ में एक डबरा है
तुम्हारा सर धूल से बदरंग
तुम्हारे आँखें निकाल ली गई हैं और तुम्हारी तुम्हारी नाक
सिर्फ़ मृत शरीरों की दुर्गन्ध सूँघती है
और समूची मरी हवा जिन्दा है
अमेरिका के ईश्वर की महक में

****
ओझल

रोशनी के आशिक, खोपडियां
झुलसी हुई त्वचा, रात की सफ़ेद
चमक
मनुष्यों की मृत्यु का ताप
हैमस्ट्रिंग और हृदय
एक संगीत कक्ष में तार-तार होते हैं
यहाँ रोशनी की संतानें
यह जानती हुई हैं कि उनका राज आ गया है

****
मैं जगह को जानता हूँ

मैं जगह को जानता हूँ
यह सच है कि हमारा किया सब कुछ
फासले को ठीक करता है
जो मृत्यु और मेरे और तुम्हारे दरमियान है

****
पत्नी को

मर गया था और जिन्दा हूँ मैं
तुमने पकड़ा मेरा हाथ
अंधाधुंध मर गया था मैं
तुमने पकड़ लिया मेरा हाथ

तुमने मेरा मरना देखा
और मेरा जीवन देख लिया

तुम्ही
मेरा जीवन थी
जब मैं मर गया था

तुम्ही
मेरा जीवन हो
और इसीलिए मैं जीवित हूँ

****

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी