Wednesday, July 30, 2008

बधाई : निशांत

( कविता के लिए वर्ष २००८ का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार युवा कवि निशांत को दिया जाएगा। किसी एक कविता को आधार बना कर दिए जाने वाले इस पुरस्कार के लिए समकालीन भारतीय साहित्य के जुलाई-अगस्त २००७ के अंक में प्रकाशित उनकी कविता, ''अट्ठाइस साल की उम्र में '' को चुना गया है। इस वर्ष के निर्णायक नामवर सिंह थे। निशांत और उनकी कविता के बारे में उनका यह कथन उल्लेखनीय है कि बड़बोलेपन से बचते हुए यह कवि अपने आस-पास के जीवन से सीधे साक्षात्कार करता है। आगे यह कि काव्य-भाषा पर भी कवि का अच्छा अधिकार है। निशांत की कविताएं पत्र -पत्रिकाओं में एक लंबे अरसे से आ रही हैं। पहले वे अपने घरु नाम मिठाईलाल से कविताएं लिखते थे। बाद में इसे कवि-आलोचक अशोक वाजपेई के सुझाव पर बदल दिया और निशांत नाम से कविता करने लगे। वैसे उनका पढू नाम विजय कुमार साव है। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, '' जवान होते हुए लड़के का कुबूलनामा '' भारतीय ज्ञानपीठ की युवा पुरस्कार योजना के तहत शीघ्र प्रकाश्य है। हमें खुशी है कि उन्होंने हमारे आग्रह पर पुरस्कृत कविता के साथ-साथ दो नई कविताएं भी सबद पर प्रकाशन के लिए भेजी। यह अवसर उनकी कविताओं की ओर ध्यानाकर्षण का है। पर फिलहाल तो हम यहाँ उसके मूल्यांकन का लोभ संवरण कर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देकर ही संतोष करते हैं। )

पुरस्कृत कविता

अट्ठाइस साल की उम्र में

सचमुच यही उसके प्रेम करने की सही उम्र है
जहाँ उसके सपनों में लहलहा रहा हो
एक पवित्र सुर्ख लाल गुलाब

इसी उम्र में दिल से निकलती है सच्ची प्रार्थना
जिसे कबूल करने से हिचकिचाता है समाज
इसी उम्र में खुलते हैं डैने जिससे तौलना पड़ता है सारा आकाश
इसी उम्र में पैर में लग जाते हैं चक्के
जिससे नापनी पड़ती है सारी पृथ्वी

यह बहुत ही महत्वपूर्ण उम्र होती है
जहाँ सबसे ज़रूरी होता है एक अनुभवी प्रेमी का अनुभव
पर अफ़सोस अपने अनुभव को सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र बताते हुए
हम ठगे जाते हैं
कभी-कभी हम जीत जाते हैं और जश्न मनाते हुए
रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं अपने अन्दर ही

यहाँ तन हावी नहीं होता मन पर
मन बहुत ही हल्का पारदर्शी और पवित्र होता है इस उम्र में
तन की बात ही नहीं करता मन

ऐसी स्थितियों से गुजर चुका हूँ मैं
जहाँ सिर्फ़ दो आखें और दो बातें ही महत्वपूर्ण होती हैं
इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है
सपने में लहलहा रहे सुर्ख पवित्र गुलाब का लहलहाते रहना
पर क्या करूँ
जब सुबह उठता हूँ रात में भंभोड़ दिए गए
एक जंगली जानवर के पंजों तले अपने क्षत-विक्षत शव के लिए
तब लगता है बिना तुम्हें पाए तुम्हें प्रेम करना एक नाटक करना है

कई बार सोचा तुम्हें कहूँ
प्रेम की अन्तिम परिणति दो रानों के बीच होती है
हर बार बीच में आ गई
तुम्हारी दो आंखों में दिपदिपाती हुई पवित्रता
लहलहाता हुआ सुर्ख गुलाब
और ऐसा क्यूँ लगता कि गंगा से नहाकर माँ के साथ लौट रहा हूँ घर
शायद तुम्हारे अंदर मेरी माँ भी है

एक बार इसी पवित्रता से डरकर
एक और पवित्रता की खाल ओढे तुम्हें निमंत्रित कर बैठा था
-- '' चलो शादी कर लें। ''
-- " नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद ''
तुम्हारे सामने अंदर का जानवर न जाने क्यों शांत ही रहता है
उस दिन उस समय भी शांत रहा
जबकि रात में बिस्तर पर एक बार और वह हिंसक हो उठा था
मैं मजबूर- लाचार हो 'प्यार' 'पवित्रता' जैसे शब्दों से क्षमा-याचना मांगता रहा
अपने को भंभोड़वाते हुए

तुम क्या जानो
एक अट्ठाइस साल की उम्र के लड़के की ज़रूरत
जो अपनी उम्र चौबीस साल बतला रहा हो
आख़िर तुम्हारी उम्र कम है
और इस उम्र से मैं भी गुजर चुका हूँ

****
दो नई कविताएं

इकतीस की उम्र में

आकाश इतनी बड़ी शुभकामनाएं
और पृथ्वी इतना बड़ा प्यार

मुझे मालूम है दोस्त !
इकतीस की उम्र में
नौकरी पाने का
हताशा और ऊब से ऊपर उठने का आनंद

' इतना पढ़ के क्या किए ! '
जैसे जुमलों से आहात हुए शरीर का घाव
कितनी आसानी से भर जाता है
एक नौकरी के मलहम से

माँ खुश होती है
चौड़ा हो जाता है पिता का सीना
भाई की आखों में आ जाती है चमक
प्रेमिका की आखों में बैठी कोमलता
उद्दाम सांसों में तब्दील हो जाती है
बहन गर्व से बतलाती है सहेलियों के बीच
ये हैं मेरे बड़े भाई साहब
जो ' फलां ' जगह ' फलां ' होकर गए हैं...

एक नौकरी
और कितना-कितना आराम
घर तो घर
मोहल्ले से होकर भगवान तक की आंखों में
आ जाती है दीप्ति
आत्मा में शान्ति
और क्या ... क्या ...

पढ़ाई पर छिड़ी सारी बहस
चली जाती है चूल्हे-भांड में
और कोई कारोबार करने की
धीमी आंच में पकती हुई विचारधारा
तब्दील हो जाती है एक शानदार मुहावरे में
' भगवान के घर देर है अंधेर नहीं '

याद आती है तुम्हारी बहस
नौकरी बेरोजगारी प्रेम सिक्षा आरक्षण जनसंख्या
फ़िल्म पत्रिकाएं कविता कहानी उपन्यास पुरस्कार
और न जाने कितने मुद्दों पर
आंखें लाल किए और मुट्ठी ताने
दुनिया को बदल डालने के स्वप्न के साथ
' जला दोमिटा दो ' की भाव-भंगिमा के साथ
' एक धक्का और देते ' के नारों के साथ
शायद हम एम ए में थे उन दिनों
देश के सबसे उत्तर-आधुनिक विश्वविद्यालय में
' लाल सलाम-लाल सलाम ' और ' हल्ला बोल-हल्ला हल्ला बोल ' कहते हुए

उम्र कम थी
और नहीं जानते थे
इकतीस की उम्र में नौकरी पाने का सुख

आकाश इतनी बड़ी शुभकामनाएं
और पृथ्वी इतना बड़ा प्यार

आज पहली बार दोस्त !
आज पहली बार ...

****
पौने दो घंटे

आधा घंटा
चुरा लिया है मैंने सुबह के समय में
समाचार पात्र पढने के लिए

एक घंटा चुरा लिया है मैंने
दोपहर की कार्यावधि के बीच से
कहानियो को पढने के लिए

पन्द्रह मिनट और चुरा लिए हैं मैंने
अपनी नींद से
कविताओं के लिए

इस तरह
पंखे की तरह दौड़ती हुई ज़िन्दगी में से
प्रतिदिन चुरा लेता हूँ मैं
पौने दो घंटे किताबों के लिए

इन पौने दो घंटे ही
रहता हूँ मैं मनुष्य
बाकी समय पंखा, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कंप्यूटर
और ई-मेल में तब्दील रहता हूँ
एक गंतव्य से दूसरे
और दूसरे से फिर-फिर पहले की तरफ
दौड़ लगाते हुए

****

Friday, July 25, 2008

दूर देश में हिन्दी


हालांकि हिन्दी का सृजन-संसार दूसरी भाषाओँ में अनुवादों के जरिए व्यक्त-विन्यस्त होता रहा है, हमारे तईं अक्सर बॉलीवुड फिल्मों के आनंद-महोत्सव के लिए भी जानी जाने वाली डच नगरी एम्सटरडम से जब हिन्दी कविताओं का कोई संचयन आए तो सुखद अचरज होना स्वाभाविक ही है। ik zag de stad ( इक ज़ाग दि स्ताद ) यानी मैंने शहर को देखा नामक इस संचयन में शहर पर केंद्रित आधुनिक हिन्दी कविता के पंद्रह कविओं की अट्ठाईस कविताएं शामिल हैं। संचयन को संभव किया एम्सटरडम स्थित इंडिया इंस्टीट्यूट के हिन्दी प्रेमी-प्राध्यापक डिक प्लुकर और समाजशास्त्री लोदवैक ब्रुंट ने। प्लुकर और ब्रुंट वर्षों से भारत आते रहे हैं और उन्होंने भारतीय कविता और समाज का बहुत गहराई से अध्ययन किया है। उनकी इस अध्ययनशीलता को हिन्दी के वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे का भी संबल मिला जिन्होंने न सिर्फ़ उन्हें अनेकों हिन्दी कविओं की कविताएं उपलब्ध कराई, बल्कि उन कविताओं के जटिल अनुवाद और चयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। त्रिलोचन से लेकर कात्यायनी तक की चयनित कविताओं में गांव और शहर के बीच का जीवन, उसका वैविध्य और तनाव तरह-तरह से व्यक्त हुआ है। शहर का भूगोल, उसमें आदमी की बसावट और बेचैनी को समझने में ये मददगार कविताएं हैं। हम बानगी के तौर पर इनमें से कुछ कविताओं को यहाँ साभार दे रहे हैं। संचयन में ये कविताएं वरीयता क्रम में दी गईं हैं। इस प्रस्तुति में क्रम-भंग से भी कुछ बात बनती है शायद। क्योंकि बकौल कुंवर नारायण, '' सवाल अब आदमी की ही नहीं / शहर की ज़िन्दगी का भी है ''।

कविताएं

आदमी की गंध
त्रिलोचन

आदमी को जब तब आदमी की ज़रूरत होती है। ज़रूरत होती है, यानी, कोई
काम अटकता है। तब वह एक या अनेक आदमियों को बटोरता है।
बिना आदमियों के हाथ लगाये किसी का कोई काम नहीं चलता।

गांव में ही मैंने अपना बचपन बिताया है। जानता हूँ लोग अपना काम
सलटाने के लिए इनको उनको भैया, काका या दादा आदि आदर के
स्वर में बुलाते हैं। कुछ मज़ूर होते हैं कुछ कुछ थोड़ी
देर के लिए सहायक होते हैं। जो सहायक होते हैं उनके यहाँ ऐसे ही
मौकों पर ख़ुद भी सहायक होना पड़ता है; इसमें यदि चूक हुई तो
मन भीतर-ही-भीतर पितराता है। जिसकी ओर चूक हुई उसकी ओर
लोग बहुधा आदत समझ लेते हैं।

गांवों का काम इसी तरह चला करता था और अब भी चलता है। पहले के
गांव अब बहुत बदल गए हैं। कामों का ढंग भी बदला है। खेती
सिंचाई-पाती और घरबार का रूप रंग और ढंग बदला है। गांवों में
अब जिनका पेट नहीं भरता वे शहर धरते हैं। शहरों में बड़े-बड़े
कार-खाने होते हैं। गांवों के लोग इन्हीं में से किसी एक में जैसे-तैसे
काम पता जाते हैं। कोई साइकिल-रिक्शा किराये पर चलते हैं।

शहरों में आदमी को आदमी नहीं चीन्हता। पुरानी पहचान भी बासी होकर
बस्साती है। आदमी को आदमी की गंध बुरी लगती है। इतना ही
विकास, मनुष्यता का, अब हुआ है।
****

शहरबदल
केदारनाथ सिंह

वह
एक छोटा-सा शहर था

जिसे शायद आप नहीं जानते
पर मैं ही कहाँ जानता था वहां जाने से पहले
कि दुनिया के नक्शे में कहाँ है वह।

लेकिन दुनिया शायद उन्हीं छोटे-छोटे शहरों के
ताप से चलती है
जिन्हें हम-आप नहीं जानते।

जाने को तो मैं जा सकता था कहीं भी
क्या बुरा था भैंसालोटन ?
हर्ज़ क्या था गया या गुंटूर जाने में

पर गया मैं गया नहीं
( वैसे भी संन्यास मैंने नहीं लिया था )
कलकत्ते से मिला नहीं छंद
जयपुर जा सकता था
पर गलता के पत्थरों ने खींचा नहीं मुझे
शहर अनेक थे जिनके नामों का ज़ादू
उन युवा दिनों में
प्याज़ की छौंक की तरह खींचता था मुझे

पर हुआ यों कि उन नामों के बारे में
सोचते-सोचते
जब एक दिन थक गया
तो अटैची उठाई
और चप्पल फटकारते हुए
चल दिया पडरौना -- उसी शहर में
जिसके नाम का उच्चारण
एक लड़की को लगता था ऊँट के कोहान की तरह

अब इतने दिनों बाद
कभी-कभार सोचता हूँ
मैं क्यों गया पडरौना ?
कोई क्यों जाता है कहीं भी
अपने शहर को छोड़कर --
यह एक ऐसा रहस्य है
जिसके सामने एक शाम ठिठक गए थे ग़ालिब
लखनऊ पहुंचकर।

पर जो सच है वह सीधा-सा
सादा-सा सच है कि एक सुबह मैं उठा
बनारस को कहा राम-राम
और चल दिया उधर
जिधर हो सकता था पडरौना --
वह गुमनाम-सा शहर
जहाँ एक दर्ज़ी कि मशीन भी इस तरह चलती थी
जैसे सृष्टि के शुरू से चल रही हो उसी तरह
और एक ही घड़ी थी
जिससे चिड़ियों का भी काम चलता था
और आदमी का भी

और समय था कि आराम से पड़ा रहता था
लोगों के कन्धों पर
एक गमछे की तरह।

पर शहर की तरह
उस छोटे-से शहर का भी अपना एक संगीत था
जो अक्सर एक पिपिहिरी से शुरू होता था
और ट्रकों के ताल पर चलता रहता था दिन भर
जिसमें हवा की मुर्कियाँ थीं
और बैलगाड़ियों की मूर्च्छना
और धूल के उठते हुए लंबे आलाप
और एक विलम्बित-सी तान दोपहरी-पसिंजर की
जो अक्सर सूर्यास्त के देर बाद आती थी

इस तरह एक दुर्लभ वाद्यवृन्द-सा
बजता ही रहता था महाजीवन
उस छोटे-से शहर का
जिसकी लय पर चलते हुए
कभी-कभी बेहद झुंझला उठता था मैं
कि वे जो लोग थे उनके घुटनों में
एक ऐसा विकट और अथाह धीरज था
कि शाम के नमक के लिए
सुबह तक खड़े-खड़े कर सकते थे इंतज़ार

नमस्कार ! नमस्कार !
मैं कहता था उनसे
उत्तर में सिर्फ़ हँसते थे वे
जिसमें गूंजता था सदियों का संचित हाहाकार...
****

गुमशुदा
मंगलेश डबराल

शहर
के पेशाबघरों और अन्य लोकप्रिय जगहों में

उन गुमशुदा लोगों की तलाश के पोस्टर
अब भी चिपके दीखते हैं
जो कई बरस पहले दस-बारह साल की उम्र में
बिना बताये घरों से निकले थे
पोस्टरों के अनुसार उनका कद मंझोला है
रंग गोरा नहीं गेहुंआ या सांवला है
हवाई चप्पल पहने है
चेहरे पर किसी चोट का निशान है

और उनकी माँएं उनके बगैर रोती रहती हैं
पोस्टरों के अंत में यह आश्वासन भी रहता है
कि लापता की ख़बर देनेवाले को मिलेगा
यथासंभव उचित ईनाम

तब भी वे किसी की पहचान में नहीं आते
पोस्टरों में छपी धुंधली तस्वीरों से
उनका हुलिया नहीं मिलता
उनकी शुरूआती उदासी पर
अब तकलीफ़ें झेलने की ताब है
शहर के मौसम के हिसाब से बदलते गए हैं उनके चेहरे
कम खाते कम सोते कम बोलते
सरल और कठिन दिनों को एक जैसा बिताते
अब वे एक दूसरी दुनिया में हैं
कुछ कुतूहल के साथ
अपनी गुमशुदगी के पोस्टर देखते हुए
जिन्हें उनके परेशान माता-पिता जब-तब छपवाते रहते हैं
जिनमें अब भी दस या बारह

लिखी होती है उनकी उम्र
****

संयोग
अरुण कमल

जब सूरत में महामारी फैली
तब जो हज़ारों लोग वहां से लदफद भागे
उनमें हरिनंदन भी था
जो रास्ते भर भगवान् की कृपा पर चकित रहा
कि कैसे छूटते-छूटते उसे यह गाड़ी मिल गई
और वह गाड़ी एक हज़ार सात सौ छप्पन किलोमीटर
चलने के बाद एक मालगाड़ी से टकराई
और एक बार फिर हरिनंदन भगवान् कि असीम कृपा के सम्मुख
नतमस्तक था कि वह बाल बाल बच गया

और बचकर अपने गांव के स्टेशन लहलह दुपहरिया उतरा
और रास्ते के धूप और धूल भरे चौर में
लुटेरों से घिर गया
और अब तीसरी बार वह भगवान् की लाख लाख कृपा पर चकित था
कि लुटेरों ने उसकी संदूक तो छीन ली जिसमें कुल सात सौ तेईस
रुपये थे और एक जोड़ी कपड़ा पर लाख रुपये की जान बख्श दी
और यही सोचते सोचते वह कच्चे घर के आँगन में
झोलंग खात पर पड़ा तो तारे ताकता सो गया
और उसी रात एक गोतिया ने पुश्तैनी दुश्मनी में मौका पा
उसका काम तमाम कर दिया।

कुछ दिनों बाद घोषणा हुई कि सूरत में जो महामारी थी
वह वास्तव में महामारी नहीं थी।
****

रात के संतरी की कविता
कात्यायनी

रात को
ठीक ग्यारह बजकर तैंतालीस मिनट पर
दिल्ली में जी. बी. रोड पर
एक स्त्री
ग्राहक पटा रही है।
पलामू के एक कसबे में
नीम उजाले में एक हकीम
एक स्त्री पर गर्भपात की
हर तरकीब अजमा रहा है।
बाड़मेर में
एक शिशु के शव पर
विलाप कर रही है एक स्त्री
बम्बई के एक रेस्तरां में
नीली-गुलाबी रोशनी में थिरकती स्त्री ने
अपना आखिरी कपड़ा उतार दिया है
और किसी घर में
ऐसा करने से पहले
एक दूसरी स्त्री
लगन से रसोईघर में
काम समेट रही है।
महाराजगंज के ईंट भट्टे में
झोंकी जा रही है एक रेजा मजदूरिन
ज़रूरी इस्तेमाल के बाद
और एक दूसरी स्त्री चूल्हे में पत्ते झोंक रही है
बिलासपुर में कहीं।
ठीक उसी रात उसी समय
नेल्सन मंडेला के देश में
विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के लिए
मंच सज रहा है।
एक सुनसान सड़क पर एक युवा स्त्री से
एक युवा पुरूष कह रहा है --
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।

इधर कवि
रात के हल्के भोजन के बाद
सिगरेट के हल्के-हल्के काश लेते हुए
इस पूरी दुनिया की प्रतिनिधि स्त्री को
आग्रहपूर्वक
कविता की दुनिया में आमंत्रित कर रहा है
सोचते हुए कि
इतने प्यार, इतने सम्मान की,
इतनी बराबरी की
आदि नहीं,
शायद इसीलिए नहीं आ रही है।
झिझक रही है।
शरमा रही है।
****

( संचयन के अन्य कवि : कुंवर नारायण, गुलज़ार, कुमार विकल, विष्णु खरे, अशोक वाजपेई, जावेद अख़तर, नीलाभ, अनीता वर्मा, अनामिका और सविता सिंह )

Wednesday, July 23, 2008

सृजन- संवाद : गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़

( किसी ऐसी पुस्तक को जिसे पढ़ने-पाने की चाह मन में वर्षों से दबी हो, अगर अचानक मिल जाए तो उस मिलन की खुशी और पठन के रोमांच को शब्दों में बयां करने की असफल कोशिश करने की बजाय यह ज़रूरी लगा कि उसके कुछ हिस्से आपके सामने लाए जाएं। दिलचस्प यह है कि विश्व के महानतम कथाकारों में शुमार गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ से उनके अंतरंग पत्रकार मित्र प्लीनियो आपूलेयो मेन्दोज़ा का ''फ़्रैगरेन्स ऑफ़ गुआवा'' नामक पुस्तकाकार इस अनूठे संवाद ने, जिसमें मारकेज़ के कथा-लेखन की पटभूमि और जीवन के कई अजाने पहलू शामिल हैं, उनके उपन्यासों जितना ही न सिर्फ़ ख्याति अर्जित की, बल्कि इसे उस लेखन से उपजे विभ्रम और महत्व को समझने में गाइड-बुक जैसी अहमियत भी मिली। हमें अशोक पांडे का आभारी होना चाहिए जिन्होंने इस गुम होती किताब को हिन्दी में स्पैनिश से सीधा और पूरा अनूदित करने का महत उद्यम किया। इस अनुवाद के कई अंश पत्रिकाओं में पहले छप चुके हैं। सबद पर इसका आना उनके स्नेह का ही परिचायक है, काम तो उनका हम सब जानते-सराहते हैं ही। ये अनुवाद पुस्तकाकार शीघ्र ही संवाद प्रकाशन से छप कर आएंगे। )

पहला वाक्य किताब की प्रयोगशाला हो सकता है

लिखना मैंने इत्तेफाक से शुरू किया, संभवतः एक दोस्त के आगे यह सिद्ध करने के लिए कि मेरी पीढ़ी लेखक पैदा करने में सक्षम है। उसके बाद मैं मज़े के लिए लिखने के जाल में फंसा और उसके बाद ही असल में मैं जान पाया कि दुनिया में लिखने से अधिक प्रिय मुझे कुछ नहीं था।

* तुमने कहा कि लिखने में आनंद है। तुमने यह भी कहा था कि यह विशुद्ध यातना है। यह है क्या ?

दोनों बातें सच हैं। शुरू में जब मैं अपना शिल्प शीख रहा था, मैं बहुत खुशी-खुशी, क़रीब-क़रीब गैरजिम्मेदारी के साथ लिखा करता था। मुझे याद है, उन दिनों, एक अख़बार में सुबह दो या तीन बजे अपना काम ख़त्म करने के बाद मैं आराम से चार, पाँच, यहाँ तक कि दस पन्ने लिख लिया करता था। एक दफे, एक ही सिटिंग में मैंने एक छोटी कहानी पूरी कर ली थी।

* और अब ?

अब अगर मैं किस्मत वाला हुआ तो दिन भर में एक अच्छा पैराग्राफ लिख पाता हूँ। समय बीतने के साथ लेखन कार्य बहुत दर्द भरा हो गया है।

* क्यों , सोचा तो यह जाता है कि जितना अच्छा आपका शिल्प होगा, लेखन उतना ही आसान हो जाता है ?

होता बस यह है कि आपकी जिम्मेदारी का अहसास बड़ा हो जाता है। आपको लगने लगता है कि आपके लिखे हर शब्द में अधिक वज़न होता है और वह कहीं अधिक लोगों को प्रभावित करता है।

* संभवतः यह प्रसिद्धि का परिणाम है, क्या तुम्हें इससे खीझ होती है ?

मुझे इससे चिंता होती है। एक ऐसे महाद्वीप में जो सफल लेखकों के लिए तैयार न हो, साहित्यिक सफलता में कोई दिलचस्पी न रखने वाले व्यक्ति के साथ सबसे खराब बात यह हो सकती है कि उसकी किताबें धड़ाधड़ बिकने लगें। मुझे सार्वजनिक तमाशा बनने से नफरत है। मुझे टेलीविजन, गोष्ठियों और गोलमेज़ों से नफरत है।

* साक्षात्कार ?

हाँ, उनसे भी। मैं किसी को भी सफल होने की दुआ नहीं दूँगा। यह एक ऐसे पर्वतारोही जैसा है जो जान की बाज़ी लगाकर चोटी पर पहुँचता है। वहां पहुँचने के बाद वह क्या करे ? नीचे उतरे या जितना संभव हो उतनी गरिमा बनाए रखते हुए नीचे उतरने का प्रयास करे।

* जब तुम युवा थे और दूसरे काम करके अपनी रोटी चलातेथे, तुम रात को लिखा करते थे और बहुत सिगरेट पीते थे।

दिन में चालीस।

* और अब ?

अब मैं सिगरेट नहीं पीता हूँ और सिर्फ़ दिन में काम करता हूँ।

* सुबह के समय ?

नौ बजे से दोपहर तीन बजे तक एक शांत, काफ़ी गर्म कमरे में। आवाजों और ठण्ड से मेरा ध्यान बंट जाता है।

* क्या ख़ाली पन्ने को देखकर तुम्हें भी वैसी ही निराशा होती है जैसी दूसरे लेखक महसूस करते हैं ?

''क्लास्ट्रोफोबिया'' के बाद यह मुझे सबसे निराशापूर्ण चीज़ लगती है। लेकिन इस बारे में मैंने हेमिंग्वे की एक सलाह पढ़ने के बाद चिंता करना छोड़ दिया। उसने कहा है कि आपने अपना काम तब छोड़ना चाहिए जब आपको मालूम हो कि आप अगले दिन क्या करना चाहते हैं।

* किसी पुस्तक के लिए तुम्हारा प्रस्थान बिन्दु क्या होता है ?

एक विज़ुअल इमेज। मेरे विचार से दूसरे लेखकों के लिए एक किताब का जन्म किसी विचार या सिद्धांत से होता है। मैं हमेशा एक इमेज से शुरू करता हूँ। ''ट्यूज्डे सियेस्ता'' , जो मेरे ख्याल से मेरी सर्वश्रेष्ठ छोटी कहानी है, का जन्म एक स्त्री और एक लड़की को देखकर हुआ था जो काले कपड़े पहने, काला छाता ओढे तपते सूरज के नीचे एक वीरान शहर में टहल रही थीं। ''लीफ स्ट्रोम'' में यह एक बूढ़े की इमेज है जो बारान्कीया के बाज़ार में एक लांच का इंतज़ार कर रहा है। वह एक तरह की ख़ामोश चिंता के साथ इंतज़ार कर रहा था। वर्षों बाद मैंने पेरिस में ख़ुद को एक चिट्ठी -- संभवतः -- मनी ऑडर -- की प्रतीक्षा करते पाया -- उसी चिंता के साथ, और मैंने तब स्वयं को उस व्यक्ति से स्मृति से जुड़ा हुआ जाना।

* ''वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सालीट्यूड'' में तुमने किस विसुअल इमेज का इस्तेमाल किया है ?

एक बच्चे को सर्कस में प्रर्दशित की जा रही बर्फ़ दिखाने ले जा रहा एक बूढा आदमी।

* क्या वे तुम्हारे नाना थे ?

हाँ।

* क्या कोई ऐसा वाकया हुआ था ?

ठीक वैसा ही नहीं, पर इसकी प्रेरणा एक वास्तविक कारण से मिली थी। मुझे याद है, जब मैं आराकाटाका में एक नन्हा बच्चा था। मेरे दादाजी मुझे सर्कस में एक कूबड़ वाला ऊँट दिखने ले गए थे। एक दिन जब मैंने उनसे कहा कि मैंने सर्कस में बर्फ़ नहीं देखी तो वे मुझे बनाना कंपनी के इलाके में ले गए। वहां उन्होंने कंपनी के लोगों से जमी हुई मुलेट मछलिओं का एक क्रेट खुलवाया और मुझसे अपना हाथ भीतर डालने को कहा। ''वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सालीट्यूड'' पूरा का पूरा इस एक इमेज से शुरू हुआ था।

* तो तुमने दो स्मृतियों को जोड़कर उस किताब का पहला वाक्य लिखा था ? क्या था वह ?

'' बहुत सालों बाद, फायरिंग-स्क्वाड के रु-ब-रु कर्नल आरेलियानो बुएनदीया को वह सुदूर दुपहरी याद आनी थी, जब उसके पिता उसे बर्फ़ की खोज करवाने ले गए थे।''

* किताब के पहले वाक्य को तुम आम तौर पर बहुत महत्व देते हो। एक बार तुमने मुझे बताया था कि कई बार तुम्हें पहला वाक्य लिखने में पूरी किताब लिखने से ज्यादा समय लगा है, क्यों ?

क्योंकि पहला वाक्य किताब की शैली, संरचना और उसका आकार जांचने की प्रयोगशाला हो सकता है।

Sunday, July 20, 2008

एक कवि एक कविता : 3 : श्रीकांत वर्मा

( यह सबद के लिए युवा कवि-लेखक यतीन्द्र मिश्र की कविता पर श्रृंखलाबद्ध लिखी जा रही टिप्पणियों की तीसरी कड़ी है। उनके अध्यवसाय और पाठकीय प्रतिक्रियाओं से यह लगता है कि कविता कुछ और पास अपने आई है। प्रस्तुत टिप्पणी हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा की कविता, ''कलिंग'' पर है जिसका अर्थाशय मननीय है। कविता संलग्न है। इसे हम राजकमल प्रकाशन से छपे कवि की प्रतिनिधि कविताओं से साभार दे रहे हैं। अगली टिप्पणी रघुवीर सहाय की कविता, ''तोड़ो'' पर होगी। )

कलिंग का कव्याभिप्राय

यतीन्द्र मिश्र

सम्राट अशोक के ऐतिहासिक चरित्र के बहाने ‘कलिंग’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविता में श्रीकान्त वर्मा, समाज में मौजूद मनुष्य की असहायता, लाचारी, दर्प और मोहभंग को अत्यन्त बेधक दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। यह सर्वविदित है कि अशोक के साम्राज्य विस्तार की लोलुपता का अन्त कलिंग युद्ध के उपरान्त ही माना जाता है, जब अनगिनत हताहतों व शवों को देखकर उसका हृदय परिवर्तन होता है।

इस ऐतिहासिक तथ्य के आधार पर यहाँ कविता में ध्यान देने वाली बात यह है कि कलिंग युद्ध की विभीषिका से उपजे आत्मचिन्तन से किस प्रकार अशोक जैसा सम्राट जूझ रहा है। कविता की मात्र तेरह संक्षिप्त पंक्तियों के माध्यम से मनुष्य के अन्दर चल रहे नैतिक युद्ध के समानान्तर बाहर हो रहे राजनैतिक युद्ध के विलोम को बहुत निर्लिप्तता के साथ यहाँ प्रश्नांकित किया गया है। ‘कलिंग’ का कथानक एक बड़े कथा-प्रवाह की तरह इस बात को भी रचने में पूर्णतया सक्षम रहा है कि दरअसल सम्राट के लिए जो युद्ध उसकी सेना लड़ रही थी, वह उनका ऐसा अभियान था, जिसमें किसी प्रकार की क्षोभ, पीड़ा, छटपटाहट या पश्चाताप नहीं है। यह समकालीन अर्थों में भी एक व्यंग्य से कम नहीं कि किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के इशारे पर लड़ने वाली उसकी अनुशासित सेना या कार्यकारिणी न सिर्फ अपने विजय अभियान के बाद विजेता की तरह मदमस्त चलती है, बल्कि बेहद नृशंस ढंग से हारी हुई जनता की चीखों पर हँसते-हँसते दोहरी हुई जाती है।

श्रीकान्त वर्मा की यह कविता इन्हीं सन्दर्भों में अपने काव्याभिप्राय के स्तर पर उत्कर्ष पाती है, जब युद्ध की विभीषिका का परिणाम रचते हुए वे स्वयं के भीतर चलने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण, जोखिम भरे और निर्णायक युद्ध की भी प्रतिश्रुति रच देते हैं। इस कविता में अशोक का प्रतीक मात्र एक विजेता के प्रतीक या किसी सम्राट की महत्त्वाकाँक्षा का प्रतीक न बनकर, मनुष्य की सामान्य व सहज अन्तःप्रक्रियाओं का विस्तार बन जाता है, जहाँ इस बात की गुंजाइश भी छिपी मिलती है कि किस तरह एक व्यक्ति अपने स्वान्वेषण द्वारा समानानुभूति (एम्पैथी) हासिल करता है।

‘कलिंग’ मनुष्य के आत्मद्रोह को रेखांकित करने वाली मानवीय स्वातंत्र्य के प्रश्न की एक आदर्श कविता है। इस अर्थ में यह एक बड़ी कविता है कि वह अपने कथ्य व शिल्प दोनों में ही नैतिकता के प्रश्न को सर्वोपरि मानती है। अपनी धीमी लय में शुरू होने के बावजूद कलिंग एक शोर करती हुई मार्मिक कविता बन पड़ती है, जिसकी शिनाख़्त उसकी पहली पंक्ति से ही शुरू हो जाती है, जब कविता में यह स्थिति बनाई जाती है कि सिर्फ अशोक लौट रहा है। अशोक का यह लौटना, सच्चे अर्थों में मनुष्यता की राह पर लौटना है, जिसका अन्त इन सबसे सुन्दर पंक्तियों में होता है- केवल अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं।

कविता की ऊँचाई यहाँ आकर स्पष्ट शब्दों में व्यक्त हुई है कि सारे नैतिक-अनैतिक प्रश्नों से लड़कर, दुनिया के तमाम भूभाग पर अपना कब्जा जमाने की कयावद और सब प्रकार के ऐश्वर्य जुटाकर उसके सर्वोच्च शिखर पर बैठने के बाद भी एक मनुष्य अपने अन्दर की आवाज़ से कभी जीत नहीं सकता है। जिस तरह तमाम प्रपंचों से गुजरकर अशोक अहिंसा व सत्य के मार्ग पर आगे जाता है, उसी तरह यह कविता इतिहास के गलियारों से निकलकर राजसी सेना के कोलाहल एवं पागलपन की हद तक पहुँच चुकी सैनिकों की खिलखिलाहट के रास्तों को पार करके नैतिकता के पक्ष में जाकर समाप्त होती है।

श्रीकांत वर्मा की कविता

कलिंग

केवल अशोक लौट रहा है
और सब
कलिंग का पता पूछ रहे हैं

केवल अशोक सिर झुकाये हुए है
और सब
विजेता की तरह चल रहे हैं

केवल
अशोक के कानों में चीख
गूँज रही है
और सब
हँसते-हँसते दोहरे हो रहे हैं

केवल
अशोक ने शस्त्र रख दिये हैं
केवल अशोक
लड़ रहा था।

Friday, July 18, 2008

सबद विशेष : कुंवर और अपूर्व नारायण


यह अपूर्व अंकन

हिन्दी के किसी महत्वपूर्ण कवि की कविताओं का ऐसा द्वैभाषिक चयन पहली बार पुस्तकाकार सामने आया है। यह गौर तलब है कि अंग्रेजी, जिसके माध्यम से विश्व-साहित्य, फिर चाहे वह किसी भी भाषा में क्यों न रचा गया हो, दुनिया भर के साहित्य-प्रेमियों को सुलभ होता रहा है। हिन्दी ने अपने खैरख्वाहों के अहमन्न्य दावों के बावजूद यह दुर्भाग्य ही अर्जित किया है कि उसके हिस्से विश्व-पटल पर ऐसी सहज-उपलब्धता न आने पाए। बहरहाल, इस दुर्भाग्य पर मर्सिया पढ़ने से बेहतर है फिलहाल अपूर्व के इस अपूर्व अंकन की चर्चा की जाए।

अपूर्व नारायण, जो इन १०० कविताओं के अनुवादक और चयनकर्ता भी हैं, ने ''नो अदर वर्ल्ड'' नाम के इस चयन के लिए उन कविताओं को छोड़ने का लोभ-संवरण किया है जिससे कुंवरजी की हिन्दी में परिचित कवि-छवि गढ़ी गई है। ''आत्मजयी'' और ''वाजश्रवा के बहाने'' सरीखे उनकी कीर्ति का आधार माने जाने वाले प्रबंध-काव्य तक को इसमें शामिल नहीं किया गया है। इससे पहले जो प्रातिनिधिक चयन आए वे निश्चय ही इतने सावधान नहीं थे। इस प्रकार से कविताओं का चयन करते हुए अपूर्व ने कुंवरजी की उस सर्वथा अलक्षित कवि-छवि पर रोशनी डाली है जो इन काव्यों की मुग्ध-प्रशंसा और असंगत आलोचना की छाया में कहीं दब-ढँक गई थी। यह सचमुच प्रीतिकर है कि जिस कवि की काव्य-रचना का काल पाँच दशकों से ज़्यादा रहा हो और जिसकी कविता को समझने की परिचित रूढियां निरंतर विकासमान हों, एक पराई भाषा में एक अनुवादक-अध्येता उसे अपनी दृष्टि और मेधा से पुनराविष्कृत करे। यह पुनराविष्कार असल में उस काव्य-चेतना के पुनः संयोजन से संभव हुआ लगता है जिसमें ''तत्वदर्शी देखता है एक मरीचिका की अवधि में/ प्यास को अथाह हो जाते एक बूँद की परिधि में'' और जहाँ उसका काव्य-पुरुष अपने सम्पूर्ण वैविध्य और एकत्व में उपस्थित होता है। अकारण नहीं अपूर्व ने कुछ कविताओं को उसके काव्य-स्वभाव की एकता के कारण एक जगह रखा है और यही काव्य-खंडों की बसावट का भी मूलाधार है।

करीब दस परिश्रमी वर्षों में संभव हुए इन अनुवादों की विशिष्टता यह नहीं है कि ये लक्ष्य भाषा में जाकर उस जैसी ही हो गई हैं। यदि ऐसा होता तो संभवतः यह कविता के साथ अनुवादक का सबसे ख़राब सलूक माना जाता। कुंवरजी के शब्द, वाक्य, कहन और इन सबके मेल-जोल से वो जैसा शब्द-संगीत पैदा करते हैं, वह इन अनुवादों में अपनी स्वाभाविकता में उतर आया है। यही अनुवादक के उद्यम का पता भी देता है। कुंवर-अपूर्व के पिता-पुत्र संबंधों के कारण इन अनुवादों को अंतरंग कहना भी युक्तियुक्त होगा। पुस्तक की भूमिका में अपूर्व ने अपने सर्जक पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व का जो निकट आकलन किया है, उसका विशेष महत्व है। ऐसा रचनात्मक साहचर्य और निभाव कम से कम हिन्दी में तो विरल ही है।

कुछ बानगी

ये पंक्तियाँ मेरे निकट

ये पंक्तियाँ मेरे निकट आईं नहीं
मैं ही गया उनके निकट
उनको मनाने,
ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को
पास लाने :
कुछ दूर उड़ते बादलों की बेसंवारी रेख,
या खोते, निकलते, डूबते, तिरते
गगन में पक्षियों की पांत लहराती :
अमा से छलछलाती रूप-मदिरा देख
सरिता की सतह पर नाचती लहरें,
बिखरे फूल अल्हड़ वनश्री गाती...
... कभी भी पास मेरे नहीं आए :
मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,
गैर को अपना बनाने :
क्योंकि मुझमें पिण्डवासी
है कहीं कोई अकेली-सी उदासी
जो कि ऐहिक सिलसिलों से
कुछ संबंध रखती उन परायी पंक्तियों से !
और जिस की गांठ भर मैं बांधता हूं
किसी विधि से
विविध छंदों के कलावों से।

THESE LINES CLOSE TO ME

These lines never came close to me
it is I who went close to them
to coax them dear,
to bring their wilful wanton vagaries
a little near :
Tousled outlines of clouds flying far,
or the waving rows of birds in the sky,
which come out, drown in, get lost, float along :
splashing from the moon, drunk on beauty,
tides that dance on the river in glee,
scattered flowers that sing a forest song...
...never came close to me :
I went close to them to call them near,
to make the alien dear :
for somewhere some lonely melancholy
resides in me
that far from the world's affairs
bonds with those alien lines instead !
And whose knot alone i tie
somehow with some method
and varied verse for sacred thread.
****
बाकी कविता

पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ
पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है।
जीवन को पूरी तरह पाने
और पूरी तरह दे जाने के बीच
एक पूरा मृत्यु-चिह्न है।

बाकी कविता
शब्दों से नहीं लिखी जाती,
पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह
कहीं भी छोड़ दी जाती है...

THE REMAINING POEM

The meaning of water falling on leaves
is not the meaning of leaves falling on water.
Between getting life fully
and giving it fully
a full death mark is there.
The remaining poem
is not written with words,
drawing the full existence like a full stop
it is left anywhere...
****
लापता का हुलिया

रंग गेहुआं ढंग खेतिहर
उसके माथे पर चोट का निशान
कद पांच फुट से कम नहीं
ऐसी बात करताकि उसे कोई गम नहीं।
तुतलाता है।
उम्र पूछो तो हजारों साल से कुछ ज्यादा बतलाता है।
देखने में पागल-सा लगता-- है नहीं।
कई बार ऊंचाइयों से गिर कर टूट चुका है
इसलिए देखने पर जुड़ा हुआ लगेगा
हिन्दुस्तान के नक्शे की तरह।

DESCRIPTION OF THE MISSING ONE

Wheatish-complexion, rustic ways,
on his brow the scar of a wound,
height not under five feet,
talks as if he has never known grief.
Stutters.
his age ? Somewhat more than many thousand years, he says.
Looks a bit crazed -- but isn't.
Has often fallen off heights and got all broken up
Hence, when seen, will look pieced together
like the map of India.
****
( ''नो अदर वर्ल्ड'' नामक इस पुस्तक को रूपा, नई दिल्ली ने छापा है। )

Tuesday, July 15, 2008

कवि की संगत कविता के साथ : 3 : असद जैदी


( यह स्वाभाविक ही था कि एक अपेक्षाकृत लोकतांत्रिक और पारदर्शी माध्यम में जब कविता के साथ वहशियाना सुलूक किया गया, इसके लिए व्यापक चिंता प्रकट की गई। इससे और किसी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए या नहीं, माध्यम -- जिसे हम-आप ब्लॉग कहते हैं -- ज़रूर दूषित हुआ। इसके आदी और इसके लिए फिक्रमंद लोगों ने फिर भी रचनाशीलता को ही महत्वपूर्ण जाना, उन अनर्गल प्रलापों को नहीं जिससे यह दूषण प्रायोजित हुआ। यही वजह है कि असद जैदी ने लाखों के बोल सहने के बावजूद अपनी नई कविताएं हमें भेजी। हमारे आग्रह पर वक्तव्य भी लिखा। हम ''कवि की संगत कविता के साथ'' शीर्षक इस स्तम्भ की तीसरी प्रस्तुति में उनकी एक पुरानी पर सर्वथा प्रासंगिक कविता, ''संस्कार'' भी दे रहे हैं। इस कविता की कभी कवि मंगलेश डबराल ने बहुत सटीक व्यख्या की थी। हम यहाँ उसका संपादित अंश दे रहे हैं। मंगलेश जी ने अपने अनुभव-सत्य को हमें कविता के पक्ष में इस्तेमाल करने की इजाज़त दी। हम उनके शुक्रगुजार हैं। उम्मीद है यह प्रस्तुति उस धुंध को कुछ हद तक छांटने में कारगर साबित होगी जो दृश्य पर बेजा फैलती गई है। )

आत्मकथ्य

कविता महज़ एक शरणस्थल नहीं

मेरी उम्र के लोग एक ऐसे वक्त से गुजर रहे हैं जिसमें फिसलन और खराबी तो बहुत है पर सहारा देने वाली चीजें पहले से कम हो गई लगती हैं। यह स्वाभाविक है कि इन हालात में कविता एक तरह की उम्मीद और सहारे की तरह दिखाई दे। पर यही सूरते हाल इस बात की भी मांग करती है कि हम अपनी कविता को होशमंदी का बदल या विकल्प न मानने लगें। कविता महज़ एक शरणस्थल या पसंदीदा मकाम ही नहीं, एक ज़िम्मेदारी और चुनौती की भी जगह है : यह जानना उन लोगों के लिए तो ज़रूरी है ही जो कला की स्वायत्तता और प्रकारांतर से काल-निरपेक्षता में आस्था रखते हैं, उन लोगों के लिए भी यह कम ज़रूरी नहीं है जो कला को सामाजिक और परिवर्तनकारी कर्म और नागरिक कर्तव्य से जोड़ते हैं, क्योंकि महज़ वैचारिक प्रतिबद्धता या अपनी कला-दर्शन सम्बन्धी मान्यताएं दर्ज कर लेने से कलाकर्म रचनात्मक कर्म नहीं बन जाता। आज कविता लिख लेना आसान है पर कविता को जानना, उसका अच्छा पाठक और साथी होना, ज़्यादा ध्यान और मेहनतका काम है। यह काम ऐसा है जो बहुत से कविओं से भी नहीं किया जाता। कविता हर दौर की तरह आज भी 'टोटल एंगेजमेंट' की मांग करती है। कोई भी रचनात्मक काम और सच्चा कलाकर्म हमें मुश्किल और आसान, सीधे और पेचीदा, व्यक्ति और समष्टि, समाजोन्मुखता और समाज-निरपेक्षता के बीच चयन का मौका नहीं देता -- जिस वक्त जो कुछ हमारे चारों तरफ़ और सामने और पीछे है उससे रु-ब-रु हुए बिना, सारे के सारे जंजाल से उलझे बिना, कोई चारा नहीं। जो यह समझते हैं कि वे चुन सकते हैं और अपने हिसाब से रचना कर सकते हैं, दरअसल निर्जीव चीजों का अम्बार लगा रहे होते हैं। कला और कला-नुमा के इस फर्क को गहराई से जानना और समझना ही अहले-नज़र या सहृदय होने की निशानी है।


कविताएं

शल्यचिकित्सा
( विष्णु खरे के लिए )

एक नास्तिक जो अधेड़ भी है और कविहृदय भी
अभी शल्यचिकित्सा के बाद अस्पताल में पड़ा है
उसे अभी अस्पताल के ख़र्च का अन्दाज़ा नहीं
उसकी पत्नी ने कर डाले हैं कई दूरगामी फ़ैसले
तकलीफ़ और खुमार के दरम्यान पड़ा हुआ
सोचता है वह डॉक्टर सहाय की वजह से नहीं ज़िन्दा है
उसे ज़िन्दा रखे हुए है एक बनफ़्शे का फूल

नाक से लगी नली हटी देखकर उधर से गुजरती हुई नर्स कहती है
अरे इसे क्यों निकाल दिया
एक और नर्स आकर नली को वापस जोड़ जाती है
बोलती है दुबारा ऐसा न करना
बरामदे में स्टूल पर बैठी बेटी दौड़कर आती है : क्या हुआ पापा
और उसका सर सहलाती है

तुम्हें क्या बताऊँ मुल्क पर अपराधी गिरोह छा गए हैं छोटी
और उम्मीद की दहलीज़ है एक उम्र दूर

और ग्रहों पर ज़िन्दगी होती तो पता नहीं कैसी होती बसर
नक्षत्रों की दुनिया ख़ुद से रहती है अनजान
अंत में ब्रह्माण्ड का भी कुछ नहीं बचेगा
वे काले सुराख़ भी ख़त्म हो जाएंगे बस रहेगी एक बुदबुद
जैसे कि धरती पर कभी थी सांय सांय

क्या मालूम मेरी घड़ी कब से बिगड़ी पड़ी है
अगर किसी तरह चलती भी है तो ग़लत वक्त बतलाती है
एक उम्र आती है जब समय का भान दूसरे लोगों की चाल-ढाल से
चेहरे-मोहरे देखकर उनकी बातें सुनकर होने लगता है
घड़ी से और धूप-छाँहसे नहीं अपने ही शरीर से बातें करते हुए
नर-नारी जानने लगते हैं अपना वक़्त

कितनी चीज़ें हैं जो दिखाई देती हैं पर हैं नहीं
उन तारों की तरह जो कभी के गायब हो चुके हैं
पर उनकी झिलमिलाहट पहुँचती है आज तक
सन १९८९ ईस्वी धरती पर क्या कर गया
पर फ़िलहाल उधर धूल ही धूल दिखाई देती है रोशनी नहीं
विचार कितने दिन बाद चमकने लगते हैं खो जाने के बाद
और लुप्त हो चुकी व्यवस्थाएं क्या किवाड़ बंद करके
लुप्त प्रजातियों की तरह
लुप्त होने के कारोबार में लग जाती हैं

अपनी माँ से पूछो अब आगे का क्या प्लान है
यहाँ से कब मुझे छुड़ाकर ले जाएगी

अरे
तुम्हें पता है मैं परसों जैसे मर ही गया था
उन्होंने मुझसे मेरे सारे कपड़े उतरवा लिए
जब मैं अपना बनियान और अंडरवियर उतार रहा था
तो लगता था मुझे अपने बच्चों से अलग किया जा रहा है
अब पता नहीं मैं कहाँ जा पडूँगा
नरक तो कोई जगह है नहीं और यह जो महबूब वतन है अपना
ऐसे ही धधका करेगा मेरे बिना।


असील घराना

आल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम में
कई उस्तादों और पंडितों को बिठाकर
विज्ञ संगीतज्ञ रोशनलाल सक्सेना चर्चा चलाए हुए थे
पता नहीं क्यों हर कोई उन्हें डॉक्टर साहब कह रहा था
बात घरानों, शैलियों और बारीकियों की थी
नमूने के तौर पर कुछ टुकड़े भी सुनाए जा रहे थे

इतने गायकों के बीच दबे से खामोश बैठे एकमात्र वादक
दुबले पतले सारंगीनवाज़ उस्ताद ममदू खां
कभी कभी झटके से सर हिला देते थे

सबसे बाद में रोशनलाल जी का रुख़
उनकी तरफ़ हुआ

कई बार खँखारकर सीने में अच्छी तरह साँस भरकर
ममदू खां बोले : अर्ज़ है कि बुज़ुर्ग क्या क्या नहीं दे गए
अजी हम तो किसी पासंग में नहीं ठहरते
अब अपने घराने का क्या बताएं --- बस एक ही खूबी है अपन के यहाँ
कि घराना हमारा बिल्कुल असील है

अब कुछ खामोशी छाई होगी तो वह रेडियो की खरखराहट और
सारंगी की आवाज़ में दब गई
फिर रोशनलाल की शुक्रिया अदायगी भी ठीक से सुनाई न दी

'' हा हा हा ! क्या बात कर डाली ममदू खां साहब ने !''
वाकया
सुनकर बोले उस्ताद विलायत खां
'' अंगूठाटेक हैं पर दिल की दौलत से नवाज़ा है परवरदिगार ने
कम बोलते हैं ममदू पर आह, क्या बात कही ! ज़रा गौर कीजिए
उनके सीधेपन और ईमान पर :
इसी के ज़ोर पर तो वह बजा लेते हैं ऐसी मज़े की सारंगी !''


संस्कार

बीच के किसी स्टेशन पर
दोने में पूड़ी-साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होता है
पेट की मरोड़ की तरह
और फिर छिपाकर फेंक देते हैं कहीं कोने में
अपना दोना।

सोचते
हैं : मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही दरवाज़े से निकलकर नहीं चला आया था।


संस्कार पर मंगलेश डबराल

इस कविता का 'नायक' -- अगर उसे माना जाए तो -- समाज के हाशिये का एक निवासी है। गरीब, दलित या फिर अल्पसंख्यक। कवि के मुस्लिम नाम के कारण यह माना जा सकता है कि यह एक 'अल्पसंख्यक स्थिति' की कविता है। उसका अकेला होना, बीच में होना, साग-पूड़ी खाना, रोना, उसे छिपाना और इस तरह ख़ुद के छिपने की कोशिश करना उसकी 'अल्पसंख्यक अवस्थिति' के कुछ मार्मिक लक्षण हैं। लेकिन सबसे ज़्यादा तकलीफदेह प्रमाण उसकी अन्तिम पंक्तियों में है जहाँ वह अपने अस्तित्व की विडंबनाओं को एक प्रच्छन्न क्रोध के साथ एक नैतिक अस्वीकार में बदल देता है। और तभी इस देश में विकृत-बुद्धि सांप्रदायिक हिन्दूवादियों की ओर से मुसलमानों के प्रति गढे गए और प्रचारित 'स्टीरियोटाइप्स' और पूर्वग्रहों की एक फिल्म ही दिमाग में घूम जाती है जिनमें से एक यह भी है कि मुसलमान माँ के पेट नहीं, किसी दूसरे रास्ते से पैदा हुए हैं। ऐसे मनुष्य-विरोधी, अश्लील और अपमानजनक पूर्वग्रहों का प्रतिरोध कबीर के पदों में बहुत प्रखरता से मौजूद है -- '' जे तू हिंदू का जाया / आन बात तें क्यों न आया / जे तू तुर्कन का जाया / अन्दर खत्तन क्यों न कराया''। असद जैदी की कविता एक निरावेग-सी भाषा में ऐसी भ्रांतियों- दुष्प्रचारों के इतिहास की भी याद दिलाती हुई उनका एक शालीन प्रतिरोध उपस्थिति करती है। यही उसकी महानता है, यही उसकी सच्ची जनवादिता है। हम लिखने-पढ़ने वाले लोगों में से अधिसंख्य शायद कई बार अपने को ऐसी 'अल्पसंख्यक स्थिति' में पाते होंगे और अपनी दुरावस्था या अपमान का आंतरिक रुदन या रघुवीर सहाय के शब्दों में 'एक दर्जा नीचे रहने का दर्द' छिपाते हुए ऐसा सोचते होंगे कि हमें भी सभी मनुष्यों की तरह माँओं ने जन्म दिया है।

Sunday, July 13, 2008

स्वगत : व्योमेश शुक्ल


( व्योमेश शुक्ल ने यह वक्तव्य १३ जुलाई को पांचवें अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार ग्रहण करने के अवसर पर दिया है। यह एक अवसरानुकूल दिया जाने वाला वक्तव्य न होकर कई मायनों में इधर की युवा रचनाशीलता और उस पर पड़नेवाले अनेकानेक परिवेशगत दबावों और चुनौतियों का सैद्धांतिक विवेचन है। उम्मीद है यह उस रचनाशीलता का संबल बनेगा जिसके हम हिमायती और रहबर हैं। व्योमेश ने सबद को पहलेपहल यह वक्तव्य छापने दिया, उनका आभार। वक्तव्य आंशिक संपादनों से गुजरा है। एक बार पुनः हम व्योमेश को उनकी इस आरंभिक पर महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बधाई देते हैं।)

इस दौर में स्मृति और अनुभव की सर्वाधिक क्षति हुई है

व्योमेश शुक्ल

मैं जनता हूँ कि यह मेरी ज़िन्दगी का एक बेहद ज़रूरी मौका है, जो थोड़े से आगामी समय में संपन्न होकर मेरी स्मृति में बार-बार और आपकी स्मृति में कभी-कभी इसी शक्ल में, कभी शक्ल बदलकर लौटा करेगा। लेकिन इस अवसर पर कुछ पुराने सवाल, कुछ आदिम संशय फिर से मेरे सामने हैं ; मसलन मैं कौन हूँ -- यह सवाल सुदूर बचपन से मेरा पीछा कर रहा है ; और भी ऐसे कई सवाल हैं -- मसलन कविता क्या होती है, कोई कविता क्यों लिखता है, हम जिस समय और समाज में रह रहे हैं उसमें कविता लिखने का क्या मतलब है, या हमारी कवताएँ कौन पढ़ता है। इन सवालों के जवाब बहुत पहले से अब तक ढूंढें और दिए जाते रहे हैं और अब के बाद भी दिए जाते रहेंगे, इसलिए कोई ज़रूरी नहीं की ये सवाल अभी ही उठाए जाएं और इनके जवाब तुंरत ही मांगे जाएं। लेकिन इतना तय है कि वृहत्तर समाज एक कविताविहीन समाज है और अपनी जीवन-व्यावहारिकताओं में वह कविता के तर्क, कविता की संभावना और कविता के अस्तित्व के दुश्मन की तरह पेश आता है। वह पाठ्यक्रमों के अलावा कहीं भी, कभी भी कविता नहीं पढ़ता। आधुनिकतम कविताओं से वह निहायत अपरिचित है। जबकि कविता की दुनिया के नागरिक, कविता से प्यार करने वाले, उसकी ताक़त से जीवन और कर्म के स्तर पर प्रतिकृत होने वाले लोग बेहद कम हैं, लेकिन अप्रत्याशित हैं।

ऐसे में, यह जानना और भी रोचक है कि वे कौन से लोग हैं जो कविताएं लिखने, पढने और उन पर बात करने के गोपनीय अभियान में शामिल हैं। मशहूर स्पेनी लेखक ख्वान रामोन खिमेनेस ने अपनी एक किताब ऐसे लोगों को समर्पित की है। उनकी किताब में समर्पण के शब्द यों हैं --'' टू दी इमेंस माइनोरिटी'' -- अर्थात, '' अपार अल्पसंख्यकों के लिए''। यानी कविता पढ़ने वाले अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन अपार हैं। उन्हें गिनती में सिमित नहीं किया जा सकता। वे कविता से रिश्ता न रखने वाले बहुसंख्यकों से कम ज़रूर हैं, लेकिन परिमेय नहीं हैं। कविता से ख़ुद को और ख़ुद से कविता को बदलने वाले वे लोग लगातार हैं लेकिन भूमिगत और चुप्पा हैं। वे इस तरह छिपे हुए बिखरे हुए गुमशुदा और सतह के निचे हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती। दरअसल, इस आत्मलिप्त और सतही संसार में कविता की सक्रियताएं एक खास तरह की अंडरग्राउंड एक्टिविटी हैं।

मेरी बात का यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि हम वृहत्तर समाज में कविता के लिए कोई स्पेस या रियायत मांग रहे हैं। हम ऐसी स्थिति से क्षुब्ध ज़रूर हैं, लेकिन मुख्यधारा का हीनतर अनुषंग बन जाने के लिए कभी कोई कोहराम नहीं मचा रहे हैं। हम उस समाज के अधुनातन स्पंदनों की, उसके उत्थान और पतन की, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य की मीमांसा करने वाला गद्य लिखना चाहते हैं, जिसका हम ख़ुद एक बहुत छोटा हिस्सा हैं ; और यह मीमांसा भी कविता का सम्पूर्ण कार्यभार नहीं है, एक तात्कालिक दायित्व है। एक विषम, दारुण और बेतरह विस्तृत यथार्थ हमारे स्नायुतंत्र पर मौजूद है। यह यथार्थ अब इतना विशाल है कि अपने आप में सम्पूर्ण सृष्टि, एक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की तरह पेश आता है। नव्यतम प्रसंग, लोग, तथ्य और दृश्य इस यथार्थ की गति और स्थिति में इजाफा करते जाते हैं। इस विराट वस्तुसत्य को धारण करने योग्य मनःस्थिति का निर्माण करना हमारा सबसे ज़रूरी काम है। मुक्तिबोध ने कहा था कि सच्चा लेखक हमेशा स्वयं के साक्षात्कार-सामर्थ्य की तुलना वस्तुसत्य की विशालता से करता रहेगा, विषय-वस्तु की गहराई और व्यापकता के बरक्स ख़ुद को हीन अनुभव करता रहेगा और मानता रहेगा कि जो कुछ भी उसने वस्तुतः संपन्न किया है, उससे अच्छा किया जा सकता था।

पूँजी और दूसरी बाज़ारू चीज़ों की चंचल
ताएं और व्याप्ति हमारे समय का अनिवार्य और बीहड़ चरित्र-लक्षण हैं। पैसे और प्रसिद्धि का तंत्र कलाओं को हजम कर लेने पर आमादा है। तमाम कलारूप ख़ुद को तबाह करते हुए मुनाफाखोरों के काम आ रहे हैं। कला के नैतिक मूल्य को उसकी बाज़ारू कीमत अपदस्त कर रही है। साहित्य और विचार को सर्वाधिक खतरा इस विचारहीन, आत्महीन और दिशाहीन आर्थिक प्रक्रिया से है। यह प्रक्रिया आदमी नाम की चीज़ को नहीं पहचानती और एक अंधी-बहरी यांत्रिकता के साथ धंधेबाज कृत्य करती रहती है। अच्छाई और बुराई में किसी एक को चुनना उसे नहीं आता और अपने लाभ के अलावा उसके पास कोई पैमाना नहीं है। इसलिए कलाएं और विचार उसके लिए शत्रु से कम नहीं हैं।

ऐसे
वर्तमान में आपादमस्तक लिप्त हमारे इस दौर में स्मृति और अनुभव की सर्वाधिक बर्बादी हुई है। कविता को इस त्रासद दृश्य का प्रतिकार बनना होगा, जो वह पहले से भी है। फिलहाल उसे और समावेशी, और उदात्त, और युयुत्सु, और संश्लिष्ट और कठिन बनते जाना है। बीते दो दशकों में बहुत सी सामाजिक अच्छाइयों को कुचलते हुए मनोरंजन दृश्य के केन्द्र में आ गया है, उसके दवाब की वजह से विचारों, मूल्यों, सचाइयों और कलाओं और सरल होने की अतर्क्य मांग बढ़ती गई है, अर्थात अब हमारा नागरिक ज़िन्दगी की तरह कविता के भी मजे लूटना चाहता है। मज़ा लूटने के इसी वर्तमान माहौल के भीतर सर्जनात्मक्ताओं को रोज़मर्रा के सामानों की तरह हलके-फुल्के ढंग से लेने और उत्कृष्टता के लिए होने वाले कलात्मक समर को क्षीण कर देने वाली प्रवृतियों को पोषण मिलता है। इसी के भीतर से निकलने वाली आवाज़ें बीती लड़ाइयों को भुला देने और योद्धाओं की खिल्ली उडाने की मूर्ख और आत्मघाती कोशिशें करती हैं।

लेकिन वक्त गवाह है कि ऐसी चीजें दूर तक नहीं जा पातीं, और ज़ाहिर हो जाती हैं। वैसे अनश्वर तो कुछ भी नहीं है। सत्य और सौन्दर्य भी एक समय के बाद नष्ट हो जाते हैं, लेकिन अपूर्व जगमगाहट के इस दौर में मृत्युबोध की भी हवा निकल गई है। मध्यवर्ग का अनियंत्रित उल्लास देख कर लगता है कि उसे किसी पारलौकिक सत्ता से अजर और अमर होने की गारंटी मिल गई है। कविता को मध्यवर्गीयता के इस झूठे उत्सव का वस्तुपरक विरोध करना है और जीवन के विभिन्न स्तरों पर मध्यवर्गीय संकीर्णताओं और रूढ़ियों की पहचान करनी है। किसी दुःस्वप्न में भी समकालीन हिन्दी कविता को मध्यवर्गीय सौंदर्याभिरूचि और मध्यवर्गीय राजनीतिक सरोकारों का कैदी नहीं बनने दिया जा सकता।

हमने बीते २० वर्षों में अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ढाँचे को प्रतिक्रियावाद की चपेट में आते देखा है। चेतनाएं इस बीच लगातार प्रतिक्रियाओं से भरती गई हैं और बदला लेना एक मूल्य की तरह स्थापित होता जा रहा है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस से शुरू होकर बदले का यह सिलसिला गुजरात नरमेध से होता हुआ अब तक जारी है।। कविता प्रतिक्रिया की इस बर्बर पद्धति को बदल देना चाहती है और इस बदलाव की खातिर उसने ख़ुद को बेहद अप्रत्याशित और सर्वोत्तम रूपों में अभिव्यक्त किया है। समकालीन कविता ने आजाद भारत के प्रमुख मुद्दों और प्रसंगों से जुड़ी हुई उलझनों को अपने आत्मसंघर्ष की शक्ति से हल करने की कोशिश की है और उसका पक्ष निर्भ्रांत ढंग से जनपक्षधरता का अप्रतिम कलात्मक उदाहरण है।

कोई भी काव्येतर सत्ता कभी भी कविता के लिखे जाने के तरीकों और कविता से पैदा होने वाले असर का नियमन नहीं कर सकती। कोई भी किसी भी शर्त पर अपनी रचनात्मकता के बहार पड़ने वाली संस्था या व्यक्ति के प्रत्यक्ष-परोक्ष दवाब में कविता नहीं लिख सकता, कविता के नाम पर कुछ और भले ही लिख ले। रघुवीर सहाय ने अर्सा पहले कहा था कि सच्ची कविता लिखने वाले वहीं से निकलेंगे जहाँ कविता का मूल्यांकन करने वाला तंत्र नहीं होगा। ताक़त की सर्वव्याप्त श्रेणियों और संरचनाओं की साहित्य संसार में खोज, इन संरचनाओं की निर्भीक आलोचना और उनसे हमेशा अलग और दूर रहने के दायित्व का निर्वाह हमारी अपरिहार्य ज़रूरत है।

आज और हमारे भविष्य की कविता को सामाजिक आस्वाद में एक बड़ा विचलन पैदा करना होगा। उसे काव्यरचना की पारंपरिक सहूलियतों और शैलियों को विखंडित करना होगा। उन्हें नया बनाना होगा। यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि हम एक स्वीकृत और सुपाच्य किस्म की कविता से ग्रस्त हो रहे हैं और अद्वितीयताओं को स्वीकार या अस्वीकार करने की प्रणाली का हमारे बीच प्रायः अभाव है। बीते दिनों में जब भी साहित्यिक यथास्थिति का उल्लंघन करनेवाली कोई बड़ी रचना सामने आई, हिन्दी साहित्य संसार का बड़ा हिस्सा किसी अघोषित नियम का पालन करते हुए चुप हो गया या नाराज़ होकर झूठे आरोप लगाने लगा। इस बिन्दु पर ये क्यों न मान लिया जाए कि ऐसे सर्जनात्मक हस्तक्षेपों की सैद्धांतिकी तैयार करने की इंटेलेक्चुअल सामर्थ्य हमारे भीतर नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति से भयभीत होकर रचनाशीलता सरलीकरणों की शरण में नहीं चली जाएगी, बल्कि वह अपनी जिदों पर और आग्रह के साथ अडी रहेगी।

हाशिया...

ज़रूरी नहीं कि हर बार मूर्खताएं हास्यास्पद और इसलिए उपेक्षणीय भी हों। असद जैदी जैसे कवि और उनकी कविताओं के साथ किया जा रहा सलूक दरअसल एक शरारतपूर्ण सोच और वयस्क मूर्खता की उपज है, इसलिए इसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए। इतना स्पष्ट है कि उनकी कविता को समझने-बूझने की सलाहियत ऐसे लोगों में न के बराबर है जो खुद को अन्यथा कविता-प्रेमी और प्रथमतः साम्प्रदायिकता का विरोधी भी मानते हैं। उनके ऐसे दावों की पोल तभी खुल जाती है जब वे कविता और कवि के प्रति अपने उदगार प्रकट कर रहे होते हैं। दूसरे, सारे हो-हल्ले में कविता में ज़ज्ब उस तकलीफ को अनसुना कर दिया गया जिसकी ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए था। १८५७ वाली कविता का हवाला देकर बारहा कहा गया है कि इसमें हमारे पूज्य साहित्यकारों को कटघरे में खड़ा किया गया है ( मैं अब भी नहीं कहूँगा कि गरियाया गया है ! )। हिन्दी का हर सजग पाठक जानता है कि उसके विकास में इन साहित्यकारों का कितना बडा योग है। लेकिन जहाँ ये वेध्य हैं, वहाँ इनकी व्याज स्तुति क्यों कर ? आप उस प्रधानमन्त्री के बारे में एक लम्हा सोचिए, '' जो आज़ादी की हर लड़ाई पर/ शर्मिंदा है और माफ़ी मांगता है पूरी दुनिया में/ जो एक बेहतर गुलामी के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए कुछ भी/ कुरबान करने को तैयार है''। शोचनीय यह नुक्ता है, वह नहीं जिसकी ओर इशारा करके इतनी हाय-तौबा मचाई जा रही है। जिनके मालूमात कम हैं वे पता कर लें असद की पहले की कविताओं को पढ़कर, वे आज नहीं, शुरू से ही अहो-अहो वाली शाबाश कविता नहीं लिखते। उनकी कविताएं विचलित करती है, समझ की रूढियों पर सवाल खड़े करती है, उन पर लिखने में बहुतों को दुविधा-असुविधा होती है और इन्हीं चन्द वजहों से उनकी और उनकी कविताओं की अनिवार्यता बनी रहती है। यह अनिवार्यता जो हिन्दी को पिछले तीसेक वर्षों से सुलभ है उसे किसी उन्माद में लांछित करने से पहले उसके महत्व को समझने की एक विनम्र चेष्टा तो करें।

Saturday, July 12, 2008

सेवेंटीएमएम : 2


संसद
और सिनेमा

विनोद अनुपम

सिनेमा और संसद में कोई सीधा सरोकार नहीं रहने के बावजूद दोनों के स्वभाव में आश्चर्यजनक समानता देखी जा सकती है। आजादी के बाद शुरूआती दौर में जब संसद अपनी जनता के प्रति जवाबदेह थी, तो सिनेमा भी उसी तेवर के साथ सामने आ रहा था। एक तरफ संसद में नेहरू और पटेल थे तो दूसरी तरफ राजकपूर और वी. शांताराम। दोनों के समानुपातिक तेवर पर गौर इसी से किया जा सकता है कि बाद के दिनों में जैसे-जैसे संसद ने जन सरोकारों से अपना मुंह फेरना शुरू किया, सिनेमा भी आम जनता से दूर होती चली गई। अब दोनों के इस समानुपातिक संबंध का विश्लेषण तो अपनी जगह है , लेकिन दोनों के संबंधों में जो घालमेल हुआ वह शायद इस संबंध की नियति थी।

गौरतलब है कि जब तक दोनों जनता के प्रति जवाबदेह रहे, अपनी-अपनी पहचान के साथ संतुष्ट ही नहीं, बल्कि उसकी बेहतरी में भी जुटे रहे। लेकिन जैसे-जैसे संसद और सिनेमा जनता से दूर होते गए उनकी आपसी निकटता बढ़ती चली गई। आज हिन्दी सिनेमा में ऐसे कलाकारों को ढूँढना मुश्किल है जो सांसद, भूतपूर्व सांसद या फिर संसद के भावी उम्मीदवार के रूप में नहीं गिने जा सकते। उसी तरह ऐसे सांसद ढूँढना कठिन है जो सिनेमा के माध्यम से अपनी छवि निखारने की कोशिश में नहीं जुटे हैं। लालू प्रसाद तो इस माध्यम के पुराने खिलंदड़े रहे हैं। अमर सिंह और उमर अब्दुल्लाह की पैठ के बारे में हर कोई जनता है।

सवाल
यह नहीं कि कौन और कितने लोग सिनेमा में आ रहे हैं या सिनेमा से जा रहे हैं। सवाल है ऐसा क्यों ? क्यों गोविंदा या धर्मेन्द्र को लगता है कि वे अभिनय से से ज़्यादा बेहतर राजनीति कर सकते हैं ? क्यों लालू प्रसाद को बड़े-छोटे परदे अपनी जनता के प्रति प्रतिबद्धता से ज्यादा जरूरी लगने लगते हैं ? वास्तव में आज कलाकारों को भरोसा ही नहीं कि वे जिस कला की सेवा में लगे हैं वह एक बेहतर समाज की अनिवार्यता भी है। उन्होंने अपने कला-माध्यम को ही ऐसा बना छोड़ा है जिसमें अब किसी राजकपूर और गुरूदत्त की गुंजाइश नहीं। उधर राजनीतिज्ञों ने अपनी दुनिया इतनी गंदी कर ली है कि अब उन्हें अपनी ही राजनीतिक पहचान से खीझ होती है। सिनेमा के परदे पर दिखना और बाहर सिने-कलाकारों की फौज खड़ी कर जनता के बीच अपनी साख बचाने की उनकी कोशिश कितनी अश्लील है, इसका शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं। कुछ माह बाद जब चुनावी समय शुरू होगा, नेता-अभिनेता का एक विशाल और बेमेल गठजोड़ आप देखेंगे ही !

Wednesday, July 09, 2008

कला का आलोक : 2 : हकु शाह


( पिछले पन्नों में आपने कला का आलोक स्तंभ के तहत चित्रकार हकु शाह से पीयूष दईया की बातचीत पर आधारित गद्य पढ़ा है। पेश है उसकी एक और कड़ी। कहना न होगा कि हकु शाह ने यहाँ एक मामूली स्त्री के गैरमामूली कला-उद्यम पर जो कहा है वह साधारण की महिमा की प्रतिष्ठा के अलावा दूसरों के कला-कर्म में विनम्र पैठ और उसके महत्व-स्थापन की ओर स्वयं उनके और प्रकारांतर से पीयूष के उद्यम का भी अप्रतिम नमूना है। ऊपर हकु शाह की एक चित्रकृति लगी है। )

धूळि

सन् 1964 के आसपास जब मेरा बच्चा--पार्थिव--बहुत छोटा था तब एक औरत खिलौनों की एक टोकरी अपने सिर पर उठाए उन्हें बेचने अहमदाबाद की गलियों में घूमती थी। हमारे घर आती थी। वह मिट्टी और काग़ज़ से बनी डुगडुगी को बजाते हुए आती थी। सभी पहचान जाते थे कि खिलौना बेचने वाली आई है। उसके खिलौनों में घंटी , घोड़ा , पालना , खटिया , हाथी वग़ैरह मुख्य होते थे जिन्हें वह मिट्टी से बनाती थी और सफे़द चूने या मिट्टी में भिगो कर फिर हल्के बैंगनी व लाल ,नीले व पीले जैसे कच्चे रंगों से उन्हें अलंकृत करती थी। वह जब अपने उजले खिलौने लेकर आती थी तब लोग इन खिलौनों को पांच-दस पैसे में या चपाती के बदले खरीदते थे। उसके आते ही सारे बच्चे इकठ्ठा हो जाते थे। ''डमक डमक'' की आवाज़ आते ही पूरा मोहल्ला जान जाता था कि वह अपने खिलौने लेकर आ रही है--उसका नाम बहुत अच्छा था--धूळि। धूळि का अर्थ है--धूल , डस्ट। धूळि के लिए धूल--मिट्टी--ही देवता थी।

धूळि का मझोला कद क़रीब पांच फीट दो इंच का रहा होगा। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें बहुत उजली व चमकदार थी। उम्र क़रीब बाइस-तेइस की रही होगी। अपने चिथडा-से घाघरा-चुन्नी पहने वह बहुत सुंदर लगती थी। रंग गेहुंआ व नाक-नक्श बहुत अच्छे व हल्का तीखापन लिए थे--मेहनतकश थी वह। स्वभाव से वह वाचाल नहीं थी--ऐसा नहीं होता था कि वह अपने दुख-सुख का पिटारा खोल कर बैठ जाती हो और गप्प लगाने लगती हो। उन दिनों धूळि के अलावा कुछ और लोग भी इसी तरह के खिलौने लेकर आते हों , ऐसा खयाल नहीं पड़ता। वह आती थी, किसी फेरीवाले की तरह ऊंचे स्वर में नहीं बल्कि अपने ड्रमनुमा खिलौने--डुगडुगी-- को बजाते हुए। उसके साथ उसका क़रीब डेढ़-दो साल का बच्चा भी आता था। बहुत सालों तक वह आती रही। हमारी बातों से प्रेरणा लेते हुए बीच बीच में उसने विभिन्न प्रकार के मां-बच्चा और पनिहारिन भी बनाए और फिर वह इन्हें ख़ूब बनाने लगी थी। मुझे इनमें धूळि को देखना बहुत पसंद था। ऐसे धीरे-धीरे उसके खिलौनों के प्रकार भी बढ़ते चले गए।

खिलौनों के आकार लम्बाई में पांच-छः इंच और चैड़ाई में तीन-चार इंच के होते थे। उसने जो रूप बनाए उसमें तकनीक , विधि व रचना-सामग्री तथा सरल-सादा हुनर का कमाल मुख्य था। इन खिलौनों को बनाए आज लगभग चालीस साल हो गए हैं लेकिन फिर भी--कच्ची मिट्टी से बने हुए होने के बावजूद--ये सलामत हैं; हालांकि ये बच्चों द्वारा खेलने व तोड़ने व इससे आनन्द लेने के लिए ही बने थे। इन खिलौनों की पूरी गढ़त में अद्भुत कल्पनाशीलता व गहरी समझ-बूझ है। किसी भी महान आधुनिक शिल्प के बरक्स इन्हें रखा जा सकता है।

इन खिलौनों के रंग अद्भुत दिखते थे और उनकी रूपाकृति--रूप के भीतर रूप जैसे हेनरी मूर के मूर्तिशिल्प और यह खिलौना। क्या आपको नहीं लगता कि चंडीगढ़ के ला कार्बुज्ये के हाथ और यह खिलौना साथ में रखे जा सकते हैं ? और टेराकोटा के वे हाथ जिन्हें आदि-वासी लोग देव को अर्पित करते हैं ? धूळि के खिलौने उतने ही आला दर्जे के हैं जितनी की ये कृतियां।

धूळि की मां भी ये खिलौने बनाती थी या नहीं, मैं नहीं जानता। हो सकता है कोई स्त्री किसी गांव में हमेशा ऐसे खिलौने बना रही हो... वह एक गरीब समुदाय,''वाघरी'' की थी। मूलतः वह मेहसाणा के पास लोलाड नामक गांव में रहती थी। यहां आने पर वह इधर अहमदाबाद में एक जगह है--ढोर बाजार , उधर वह अपने पति के साथ एक झोंपड़ा बनाकर रहती थी--साल के उन दिनों के लिए जब वह फसल कटने के बाद गांव से यहां खिलौने बेचने आती थी। बारिश के बाद जब मेलों के दिन आते हैं क्योंकि तब खेतों में काम ख़त्म हो जाता था। साल में एक बार धूळि का फेरा पड़ने पर कुछ समय तक चलता था--वह बच्चों की छुट्टियों वाले दिन ज़्यादा आती थी ताकि उसके खिलौने ज़्यादा बिक सकें। सुबह क़रीब दस-ग्यारह बजे के आसपास उसका फेरा लगता था। उसका पति टिन के डिब्बे बनाता व मरम्मत करता था। कभी कभी वह आता था--अपनी खास आवाज़ के संग ही : डाबडा बनवा लो , डाबडा बनवा लो : की पुकार सुनाई पड़ जाती थी। धूळि और उसके पति को मैंने कभी साथ आते जाते नहीं देखा--वह अलग गलियों में जाता था, धूळि अलग मोहल्लों में।

इन खिलौनों को मैंने अपने दफ्तर की मेज़ के ऊपर भी रख रखा था। वहां इन खिलौनों को देखकर चार्ल्स इम्स ने इन्हें बहुत पसंद किया व सराहा था। इसी तरह एक दिन स्टेला क्रमरिश जब हमारे घर पर थीं तब उन्हें भी ये खिलौने इतने पसंद आए कि उन्होंने इन खिलौनों को,''अननोन इंडिया'' नामक प्रदर्शनी में रखना चाहा। इस प्रर्दशनी का क्यूरेटर मैं था। स्टेला की इच्छा थी कि धूळि,''विवाह'' पर एकाग्र खिलौने बना दे, जो फिर धूळि ने बहुत सुंदर तरह से बनाए--ये खिलौने आज भी फिलेल्डेल्फिया संग्रहालय में हैं। यह बात बहुत सहज तरह से बनी थी। धूळि ने,''विवाह-श्रृंखला'' पर एकाग्र बीस-पच्चीस खिलौने बनाए। उसके मन में शायद उन खिलौनों के अमेरिका--परदेस--जाने से भी ज़्यादा हमारे प्रति अहोभाव था। यह खयाल करके मुझे बहुत अच्छा लगता व संतोष होता था कि धूळि के खिलौने एक बड़ी प्रदर्शनी में हिस्सेदारी करने वाले हैं। मेरी इस ख़ुशी में ही वह अपनी ख़ुशी देख रही थी। उसका आनन्द इन खिलौनों को बनाने का और उन्हें हमें भेंट देने में छिपा था। हालांकि इन खिलौनों के लिए उसे पर्याप्त राशि दी गई थी लेकिन वहां केन्द्र में रूपया नहीं बल्कि अपनी रचनात्मकता का साझा व प्रेम था।

धूळि अलग अलग मौसमों में हमारे घर आती रही लेकिन फिर अचानक उसने आना बंद कर दिया--मुझे नहीं मालूम क्यों--वह नहीं आ रही थी। उसका पति , अपने बच्चे के साथ, हमारे यहां कभी कभी धूळि का समाचार लेकर आता था। कुछ देर बैठता , चाय-पानी पी कर चला जाता। एक दिन अचानक वह आया और हमें एक बड़ी राखी देते हुए कहा कि यह राखी धूळि ने अपने भाई--यानी मेरे लिए--भेजी है। यह सचमुच एक मार्मिक संबंध बन गया था। हमने राखी रख ली, कुछ उपहार भेजा।

धूळि के बनाए खिलौने कच्ची मिट्टी के थे। धूळि के खिलौने देखकर लगता है मानो ये परम्परा का एक भाग हैं। भारत में गुजरात राज्य के मेहसाणा गांव की एक औरत --जिन्हें हम पिछड़ा मानते हैं--वह खिलौने बनाती है। न मालूम कैसे उसने सीखा होगा। दो बातें फिर भी स्पष्ट है--एक यह कि धूळि को इन्हें बनाने में रस आता होगा। दूसरा यह कि यह खिलौने उसकी आजीविका का साधन रहे , जिन्हें वह बेचती थी। सारे भारत में अगर देखें, खिलौने बहुत अलग अलग प्रकार से बनते रहे हैं जिनमें मिट्टी , स्क्रैप व स्थानीय साधन-सामग्री से बनने वाले खिलौने सम्भवतः सबसे ज़्यादा हैं। धूळि के बनाए खिलौनों में मुझे शिल्प-सा आनन्द आता था। इन खिलौनों में क्या जान है यह बता पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है लेकिन इन से मिट्टी की पहचान , धूळि का उससे लगाव , इन्हें बनाने की रीत/ढंग , और यह कि बच्चों का मन उनमें रमता था।

बतौर कलाकार जो बात खास तौर से मेरा ध्यानाकर्षण करती है वह है मिट्टी का लचीलापन और रंगों का पहनावा व आकृतियों की बनावट। ये खिलौने मुझे उस संस्कृति का हिस्सा लगते हैं जो, ''सिग्नेचर की अवधारणा'' से दूषित नहीं है। आजीविका का साधन होने के बावजूद ये तथाकथित बाज़ार के बजाय साझे की भावना से प्रेरित हैं। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बजाय अपनी रूचि के अनुसार चीजें बनाने की रचनात्मकता से ओतप्रोत हैं। भारत में ऐसे कई सौ कलाकार आज भी विद्यमान होंगे। मैंने कच्छ में भी ऐसे ही खिलौने बनाने वाले देखे थे। कभी एक फ़िल्म भी बनाई थी--''स्क्रैप''। यहां वे लोग तोता ही बनाते थे , कुछ और नहीं। उन तोतों में भी धूळि के खिलौनों जैसी ही जान थी। इन खिलौनों की गुणवत्ता के कारण बहुत से हैं: अपना खेत--अपनी मिट्टी से लगाव, बच्चे, जीवन के ही एक भाग के रूप में कला, सादगी--सहजता, अन्तर्दृष्टि, बनाने की रीत व तकनीक संग उसकी आवडत साझा और इनमें से निकलते हुए कला-संस्कार जिन्हें असल में मैं हरेक मानव में एक नैसर्गिक वृत्ति के रूप में देखता हूं।

जन से मेरा नाभिनाल संबंध रहा है। मेरे लिए सबसे बड़ा है जन। यह सच है कि पूरा का पूरा एक बड़ा मनुष्य तक अन्ततः पानी की एक बूंद जितना ही होगा लेकिन जन में जो शक्ति है वह अमाप है। आप कहेंगे कि उसके भी दो हाथ है लेकिन नहीं , वह असंख्य हाथों से बना है। मेरे लिए यह इतना विराट हो जाता है कि अवर्णनीय है।समाज में , जीवन में जो बदलाव आ रहे हैं उन्हें भी ये बहुत ही सहज तरह से स्वीकार कर अपने साथ ले लेते हैं। इस बदलाव को अपने कला-संस्कार से जोड़ते हैं। एक तरह से ये एक बच्चे की बाल-सहजता जैसी बात है। लेकिन परिवर्तन निरन्तर बहता हुआ पानी है।

Monday, July 07, 2008

अनकहा कुछ : 2 : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

( यह प्रभात रंजन के स्तंभ की दूसरी प्रस्तुति है। शुरुआत उन्होंने ने शेक्सपिअर से की थी। हेमिंग्वे पर उनका लिखना हालाँकि अवसरानुकूल है, यह तथ्य है कि हम हेमिंग्वे जैसे लेखकों के होने-लिखने-बीतने के बावजूद हमारी स्मृति और समय में उसके संग-साथ के बारे में हर पल कुछ-न-कुछ जानने -महसूसने की कोशिश करते हैं। प्रभात की कोशिश में हमारा साझा यहाँ इसी तरह से है। )

मिस्टर परफेक्शनिस्ट : अर्नेस्ट हेमिंग्वे

प्रभात रंजन

जुलाई का महीना विश्व के दो महान लेखकों के जन्म का महीना है -- फ्रांज काफ्का और अर्नेस्ट हेमिंग्वे। हेमिंग्वे के जीवन के संदर्भ में जुलाई का विशेष महत्त्व है। 21 जुलाई को जन्मे हेमिंग्वे ने इसी महीने की 2 तारीख को आत्महत्या कर ली थी। प्रसंगवश, काफ्का का जन्म 3 जुलाई को हुआ था। दोनों लेखकों में एक समानता और ढूँढी जा सकती है। वह यह कि बीसवीं शताब्दी के साहित्य पर इनका युगांतकारी प्रभाव पड़ा। हेमिंग्वे ने लिखा है कि जीवन के बारे में लिखने से पहले आपको उसे जीना अवश्य चाहिए। यही कारण है उनका लेखन और जीवन दोनों विविधतापूर्ण रहा।

1917 में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ाई में उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। उनके डॉक्टर पिता चाहते थे कि हेमिंग्वे उच्च शिक्षा प्राप्त करें, मगर हेमिंग्वे ने जीवन की पाठषाला को शिक्षा के लिए अधिक माकूल पाया। उन्होंने एक लोकप्रिय समाचारपत्र में संवाददाता के रूप में काम करना आरंभ किया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान हेमिंग्वे ने बड़ी कोशिश की कि उन्हें सैनिक के रूप में युद्ध में शामिल होने का मौका मिल जाए। उनकी आंखें कमजोर थीं, इसलिए सैनिक बनने की उनकी हसरत तो पूरी नहीं हो पाई, मगर इस युद्ध को करीब से देख पाने की उनकी इच्छा जरूर पूरी हुई। रेडक्रास संस्था को इस युद्ध में एम्बुलेंस चलाने के लिए बड़े पैमाने पर ड्राइवरों की ज़रूरत पड़ी और ड्राइवर के रूप में युद्ध से जुड़ने का उनको मौका मिल गया।

युद्ध के दौरान वे बुरी तरह घायल हुए। एक नर्स की सुश्रुषा से उनकी जान बची। उससे उनको प्यार भी हुआ। यह उनका पहला असफल प्यार था। हेमिंग्वे के अत्यंत प्रसिद्ध उपन्यास फेयरवेल टु आर्म्स को समझने के लिए उनके इस जीवन-संदर्भ को समझना आवश्यक है। एम्बुलेंस चालक और नर्स की इस प्रेमकथा के विषय में कहा जाता है कि युद्ध और प्रेम को आधार बनाकर अमेरिका में जितने उपन्यास लिखे गए हैं, इसका स्थान उनमें अन्यतम है। आज भी युद्ध को संदर्भ बनाकर लिखे गए उपन्यासों के प्रसंग में इस उपन्यास का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसके प्रकाशन के समय हेमिंग्वे की उम्र महज 27 साल थी। वैसे इस उपन्यास के प्रकाशन के पूर्व द सन ऑल्सो राइजेज नामक उपन्यास के प्रकाशन के साथ हेमिंग्वे अमेरिका में नई पीढ़ी के संभवनाषील उपन्यासकार के रूप में अपनी पहचान दर्ज करवा चुके थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जवान होने वाली पीढ़ी को ध्यान में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के साथ साहित्य में लॉस्ट जेनरेशन का मुहावरा प्रचलित हुआ। लॉस्ट जेनरेशन यानी वह पीढ़ी जिसके सपने और उम्मीदें युद्ध की भेंट चढ़ गए।

युद्ध हेमिंग्वे के लिए जीवन भर आकर्षण का कारण बना रहा। स्पेन का गृहयुद्ध पत्रकार के रूप में उन्होंने बहुत करीब से देखा। चीन पर जापान के अतिक्रमण की घटना के वे गवाह बने। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्होंने बतौर एम्बुलेंस ड्राइवर हिस्सा लिया था। द्वितीय विश्वयुद्ध की वीभिषिका को उन्होंने वार कॉरसपौंडेंट के रूप में कवर किया। स्पेन के गृहयुद्ध के दौरान हेमिंग्वे वहां चार बार गए। गृहयुद्ध के अनुभवों को आधार बनाकर उन्होंने फॉर हूम द बेल टौल्स जैसा उपन्यास लिखा। कुछ आलोचक इसे उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं। द ओल्ड मैन एंड सी के बाद हेमिंग्वे का यह सबसे अधिक बिकने वाला उपन्यास है। स्पेन की बुलफाइटिंग को केंद्र में रखकर उन्होंने डेथ इन द आफ्टरनून नामक उपन्यास लिखा जिसके बारे में यह कहा जाता है कि बुलफाइटिंग पर अंग्रेजी भाषा में लिखी गई यह सर्वश्रेष्ठ कृति है।

हेमिंग्वे का औब्शेसन केवल युद्ध तक ही सीमित नहीं था। वे शिकार-यात्राओं के हद दर्जा शौकीन थे। अफ्रीका के जंगलों में की गई शिकार-यात्राओं को आधार बनाकर जब उन्होंने ग्रीन हिल्स ऑफ़ अफ्रीका नामक उपन्यास लिखा तो उसकी भूमिका में दर्ज करना न भूले कि इस उपन्यास की घटनाएं और पात्र काल्पनिक नहीं हैं। उनकी कई कहानियों में जंगल के जीवन का चित्रण है। ताउम्र हेमिंग्वे एक ऐसे लेखक की मिसाल बने रहे, सक्रियता जिसके जीवन का महत्वपूर्ण आयाम थी। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा जिसका जीवन में उन्होंने अनुभव न किया हो। मछली का शिकार हेमिंग्वे के जीवन का सबसे बड़ा खब्त था। कहते हैं कि क्यूबा में हवाना शहर के सीमांत पर एकांत में उन्होंने इसलिए घर बनवाया था ताकि मछली का षिकार करने में किसी तरह की बाधा न आए। प्रसंगवश, हेमिंग्वे का सबसे लोकप्रिय उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी माना जाता है। इसी उपन्यास के प्रकाशन के बाद उनको साहित्य का नोबेल पुरस्कार (1954) मिला। उपन्यास में एक मछुआरे के अदम्य साहस और जिजीविषा की कहानी कही गई है।

हेमिंग्वे के उपन्यासों की छाया में अक्सर उनकी कहानियों की चर्चा कम होती है। लेकिन एक प्रसिद्ध अमेरिकी आलोचक का मानना है कि अगर हेमिंग्वे ने इतने जबर्दस्त उपन्यास न भी लिखे होते तो भी अपनी कहानियों की बदौलत साहित्य में उनको हमेशा याद किया जाता। वास्तव में हेमिंग्वे की कहानी कला ने दुनिया भर के लेखकों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया। द किलर्स, द शॉर्ट हैप्पी लाइफ ऑफ़ फ्रांसिस मैकंबर, ए क्लीन वेल लाइटेड प्लेस, हिल्स लाइक वाइट एलिफैंट, द स्नो ऑफ़ किलिमंजारो जैसी उनकी प्रसिद्ध कहानियों की विशेष शैली को बाद में आलोचकों ने हिडेन फैक्ट की संज्ञा दी। इस शैली में कहानी में अक्सर उस बात की कोई चर्चा नहीं होती, कहानी जिस घटना के बारे में होती है। कहा जाता है कि हेमिंग्वे की सर्वश्रेष्ठ कहानियां वे हैं जिनमें मानीखेज चुप्पियां हैं।

अपने जीते-जी हेमिंग्वे एक मिथकीय व्यक्तित्व बन चुके थे। मगर अपार लोकप्रियता और सफलता के बावजूद वे अवसाद और निराशा के मरीज बन गए। जीवन को लेकर उनके मानक बहुत उंचे थे। जीवन भर वे किसी और बेहतर जीवन की तलाश करते रहे। उनके एक जीवनीकार ने लिखा है कि वे एक साथ सब कुछ पा लेना चाहते थे और उसी क्षण उनकी इच्छा कुछ भी न पाने की होती थी। उन्होंने चार विवाह किए, असंख्य प्रेम किए और मरने के बाद अपने गुप्त जीवन की अनेक किंवदंतियां छोड़ गए। उनके साहित्य की तरह ही उनके जीवन के प्रति भी पाठकों का आज तक आकर्षण बना हुआ है। हेमिंग्वे के बारे में कहा जाता है कि वे अपने लेखन में आला दर्जे के परफेक्शनिस्ट थे। जीवन में भी इसी पूर्णता की तलाश उन्हें थी।शायद अपने मानकों के आधार पर उस पूर्णता को न पा सकने के कारण ही उन्होंने आत्महत्या का मार्ग चुना। अपने जीवन और साहित्य से पूर्णता की उम्मीद रखने वाले हेमिंग्वे मृत्यु को भी पूर्णता में पाना चाहते थे।

कहते हैं कि 2 जुलाई 1961 को कनपटी में गोली मारकर आत्महत्या करने से पहले पहले करीब एक साल तक उन्होंने कनपटी में खाली पिस्तौल सटाकर गोली चलाने का अभ्यास किया था। मृत्यु के करीब 50 सालों के बाद भी हेमिंग्वे के लेखन और उनके जीवन के प्रति लोगों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। इंटरनेट के दौर में हेमिंग्वे के चाहने वालों ने हेमिंग्वे डॉट कॉम बनाया। हर हफ्ते करीब 12 हजार लोग इस वेबसाइट पर हेमिंग्वे के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के उद्देश्य से आते हैं। यह हेमिंग्वे की लोकप्रियता का प्रमाण है और उस प्रभाव का भी जिसके कारण उनकी गणना बीसवीं षताब्दी के महानतम लेखक-व्यक्तित्वों में की जाती है। वे एक ऐसे लेखक थे जिनके लिए जीवन ही साहित्य था।

Friday, July 04, 2008

एक ज़रूरी कविता : एमानुएल ओर्तीज़


( कम ही सही, हमारे कला-अनुभव में ऐसे दुर्लभ क्षण आते हैं जब कोई कलाकृति हमारे आस्वाद के ढंग को ही नहीं, विचार-क्षमता और मूल्य-निर्णय के विवेक को भी गहरे प्रभावित करती है। यह ज़्यादा कहना होगा कि वह इन्हें आमूल बदल भी देती है, लेकिन उसका कुल असर हम पर इतना ज़रूर छूटता है कि हम सामने के समय और यथार्थ को उसकी जटिलता और समग्रता में देखने-समझने के हामी हो जाते हैं। ऐसा करने के लिए वह कुछ कमतर कला होना भी शायद खुशी-खुशी मंज़ूर कर लेती है और भाषा और शिल्प की बहुधा अनुलंघ्य चौहद्दी के परे बड़ी सहजता से चली जाती है। कला के इस ज़ोखिम से पेंटिंग में एक दफा पिकासो के हाथों गुएर्निका संभव हुई थी, कविता में ऐसी ही कृति एमानुएल ओर्तीज़ ने संभव की। गुएर्निका की प्रतिकृति ऊपर है, ओर्तीज़ की कविता आगे। इस कविता का प्रशंसनीय हिन्दी अनुवाद हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ कवि असद जैदी ने किया जिसे पहल ने कोई साल भर पहले छापा था। यह कविता सबद पर आए, ऐसा मंगलेशजी चाहते थे। इस बाबत असदजी से आग्रह करने पर इस लंबी कविता की पीडीएफ़ फाइल मिल गई। ज्ञानरंजनजी से हमने इसे पुनर्प्रकाशित करने की इजाज़त मांगी जो उन्होंने हमें खुशी-खुशी दे दी। इन सबके प्रति हार्दिक आभार के साथ अब कविता की संगत कीजिए। )


कवितापाठ से पहले एक लम्हे का मौन

इससे पहले कि मैं यह कविता पढ़ना शुरू करूँ
मेरी गुज़ारिश है कि हम सब एक मिनट का मौन रखें
ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन में मरे लोगों की याद में
और फिर एक मिनट का मौन उन सब के लिए जिन्हें प्रतिशोध में
सताया गया, क़ैद किया गया
जो लापता हो गए जिन्हें यातनाएं दी गईं
जिनके साथ बलात्कार हुए एक मिनट का मौन
अफ़गानिस्तान के मज़लूमों और अमरीकी मज़लूमों के लिए

और अगर आप इज़ाजत दें तो

एक पूरे दिन का मौन
हज़ारों फिलस्तीनियों के लिए जिन्हें उनके वतन पर दशकों से काबिज़
इस्त्राइली फ़ौजों ने अमरीकी सरपरस्ती में मार डाला
छह महीने का मौन उन पन्द्रह लाख इराकियों के लिए, उन इराकी बच्चों के लिए,
जिन्हें मार डाला ग्यारह साल लम्बी घेराबन्दी, भूख और अमरीकी बमबारी ने

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ

दो महीने का मौन दक्षिण अफ़्रीका के अश्वेतों के लिए जिन्हें नस्लवादी शासन ने
अपने ही मुल्क में अजनबी बना दिया। नौ महीने का मौन
हिरोशिमा और नागासाकी के मृतकों के लिए, जहाँ मौत बरसी
चमड़ी, ज़मीन, फ़ौलाद और कंक्रीट की हर पर्त को उधेड़ती हुई,
जहाँ बचे रह गए लोग इस तरह चलते फिरते रहे जैसे कि जिंदा हों।
एक साल का मौन विएतनाम के लाखों मुर्दों के लिए --
कि विएतनाम किसी जंग का नहीं, एक मुल्क का नाम है --
एक साल का मौन कम्बोडिया और लाओस के मृतकों के लिए जो
एक गुप्त युद्ध का शिकार थे -- और ज़रा धीरे बोलिए,
हम नहीं चाहते कि उन्हें यह पता चले कि वे मर चुके हैं। दो महीने का मौन
कोलम्बिया के दीर्घकालीन मृतकों के लिए जिनके नाम
उनकी लाशों की तरह जमा होते रहे
फिर गुम हो गए और ज़बान से उतर गए।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ।

एक घंटे का मौन एल सल्वादोर के लिए
एक दोपहर भर का मौन निकारागुआ के लिए
दो दिन का मौन ग्वातेमालावासिओं के लिए
जिन्हें अपनी ज़िन्दगी में चैन की एक घड़ी नसीब नहीं हुई।
४५ सेकिंड का मौन आकतिआल, चिआपास में मरे ४५ लोगों के लिए,
और पच्चीस साल का मौन उन करोड़ों गुलाम अफ्रीकियों के लिए
जिनकी क़ब्रें समुन्दर में हैं इतनी गहरी कि जितनी ऊंची कोई गगनचुम्बी इमारत भी न होगी।
उनकी पहचान के लिए कोई डीएनए टेस्ट नहीं होगा, दंत चिकित्सा के रिकॉर्ड नहीं खोले जाएंगे।
उन अश्वेतों के लिए जिनकी लाशें गूलर के पेड़ों से झूलती थीं
दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम

एक सदी का मौन

यहीं इसी अमरीका महाद्वीप के करोड़ों मूल बाशिन्दों के लिए
जिनकी ज़मीनें और ज़िन्दगियाँ उनसे छीन ली गईं
पिक्चर पोस्ट्कार्ड से मनोरम खित्तों में --
जैसे पाइन रिज वूंडेड नी, सैंड क्रीक, फ़ालन टिम्बर्स, या ट्रेल ऑफ टियर्स।
अब ये नाम हमारी चेतना के फ्रिजों पर चिपकी चुम्बकीय काव्य-पंक्तियाँ भर हैं।

तो आप को चाहिए खामोशी का एक लम्हा ?
जबकि हम बेआवाज़ हैं
हमारे मुँहों से खींच ली गई हैं ज़बानें
हमारी आखें सी दी गई हैं
खामोशी का एक लम्हा
जबकि सारे कवि दफनाए जा चुके हैं
मिट्टी हो चुके हैं सारे ढोल।

इससे पहले कि मैं यह कविता शुरू करूँ
आप चाहते हैं एक लम्हे का मौन
आपको ग़म है कि यह दुनिया अब शायद पहले जैसी नहीं रही रह जाएगी
इधर हम सब चाहते हैं कि यह पहले जैसी हर्गिज़ न रहे।
कम से कम वैसी जैसी यह अब तक चली आई है।

क्योंकि यह कविता ९/११ के बारे में नहीं है
यह ९/१० के बारे में है
यह ९/९ के बारे में है
९/८ और ९/७ के बारे में है
यह कविता १४९२ के बारे में है।*

यह कविता उन चीज़ों के बारे में है जो ऐसी कविता का कारण बनती हैं।
और अगर यह कविता ९/११ के बारे में है, तो फिर :
यह सितम्बर ९, १९७१ के चीले देश के बारे में है,
यह सितम्बर १२, १९७७ दक्षिण अफ़्रीका और स्टीवेन बीको के बारे में है,
यह १३ सितम्बर १९७१ और एटिका जेल, न्यू यॉर्क में बंद हमारे भाइयों के बारे में है।

यह कविता सोमालिया, सितम्बर १४, १९९२ के बारे में है।

यह कविता हर उस तारीख के बारे में है जो धुल-पुँछ रही है कर मिट जाया करती है।
यह कविता उन ११० कहानियो के बारे में है जो कभी कही नहीं गईं, ११० कहानियाँ
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जिनका कोई ज़िक्र नहीं पाया जाता,
जिनके लिए सीएनएन, बीबीसी, न्यू यॉर्क टाइम्स और न्यूज़वीक में कोई गुंजाइश नहीं निकलती।
यह कविता इसी कार्यक्रम में रुकावट डालने के लिए है।

आपको फिर भी अपने मृतकों की याद में एक लम्हे का मौन चाहिए ?
हम आपको दे सकते हैं जीवन भर का खालीपन :
बिना निशान की क़ब्रें
हमेशा के लिए खो चुकी भाषाएँ
जड़ों से उखड़े हुए दरख्त, जड़ों से उखड़े हुए इतिहास
अनाम बच्चों के चेहरों से झांकती मुर्दा टकटकी
इस कविता को शुरू करने से पहले हम हमेशा के लिए ख़ामोश हो सकते हैं
या इतना कि हम धूल से ढँक जाएँ
फिर भी आप चाहेंगे कि
हमारी ओर से कुछ और मौन।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रोक दो तेल के पम्प
बन्द कर दो इंजन और टेलिविज़न
डुबा दो समुद्री सैर वाले जहाज़
फोड़ दो अपने स्टॉक मार्केट
बुझा दो ये तमाम रंगीन बत्तियां
डिलीट कर दो सरे इंस्टेंट मैसेज
उतार दो पटरियों से अपनी रेलें और लाइट रेल ट्रांजिट।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन, तो टैको बैल ** की खिड़की पर ईंट मारो,
और वहां के मज़दूरोंका खोया हुआ वेतन वापस दो। ध्वस्त कर दो तमाम शराब की दुकानें,
सारे के सारे टाउन हाउस, व्हाइट हाउस, जेल हाउस, पेंटहाउस और प्लेबॉय।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो रहो मौन ''सुपर बॉल'' इतवार के दिन ***
फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई के रोज़ ****
डेटन की विराट १३-घंटे वाली सेल के दिन *****
या अगली दफ़े जब कमरे में हमारे हसीं लोग जमा हों
और आपका गोरा अपराधबोध आपको सताने लगे।

अगर आपको चाहिए एक लम्हा मौन
तो अभी है वह लम्हा
इस कविता के शुरू होने से पहले।

( ११ सितम्बर, २००२ )

फ़ुट नोट :
* १४९२ के साल कोलम्बस अमरीकी महाद्वीप पर उतरा था।
** टैको बैल : अमरीका की एक बड़ी फास्ट फ़ूड चेन है।
*** ''सुपर बॉल'' सन्डे : अमरीकी फुटबॉल की राष्ट्रीय चैम्पियनशिप के फाइनल का दिन।
इस दिन अमरीका में गैर-सरकारी तौर पर राष्ट्रीय छुट्टी हो जाती है।
**** फ़ोर्थ ऑफ़ जुलाई : अमरीका का ''स्वतंत्रता दिवस'' और राष्ट्रीय छुट्टी का दिन।
जुलाई १७७६ को अमरीका में ,''डिक्लरेशन ऑफ इंडीपेंडेंस'' पारित किया गया था।
***** डेटन : मिनिओपोलिस नामक अमरीकी शहर का मशहूर डिपार्टमेंटल स्टोर।

कवि की पत्री : एमानुएल ओर्तीज़ मेक्सिको-पुएर्तो रीको मूल के युवा अमरीकी कवि हैं। वह एक कवि-संगठनकर्ता हैं और आदि-अमरीकी बाशिन्दों, विभिन्न प्रवासी समुदायों और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए सक्रिय कई प्रगतिशील संगठनों से जुड़े हैं।

Wednesday, July 02, 2008

बधाई : व्योमेश


( पुरस्कार यों तो हर बार विवाद का विषय बन जाते हैं, युवा कविओं को मिलनेवाला, ''अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार'' जब इस बार बनारस के व्योमेश शुक्ल को देने की घोषणा हुई तो प्रायः सबने इस निर्णय को खुले मन से सराहा। व्योमेश जैसे कविओं के साथ हिन्दी कविता एक जटिल और लगातार अजनबी होते समय को बहुत संवेदनशीलता से ज़ज्ब और व्यक्त कर रही है। हमारे आग्रह पर उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं भेजी। हम उनके आभारी हैं और उनके सुदीर्घ कृति जीवन की कामना करते हैं। )


यह भी संभव

मैं आठ से ग्यारह साल का था और मेरी शादी नहीं हुई थी
चिढ़ाने और डराने के लिए बाइस साल का बदनाम हट्टाकट्टा श्याम सुंदर
सामने आकर गाने लगता था--''जिसकी बीबी मोटी उसका भी बड़ा नाम है''
मैं मोटा नहीं था अम्मा स्वस्थ थीं यानी
इस कूटभाषा में बीबी का मतलब माँ था

मुझे सुनाने के लिए बार बार इसे तब गाया गया

धुनों और उपमाओं का इस्तेमाल इस तरह भी संभव है

****

आर्केस्ट्रा

पतली गली है लोहे का सामान बनता है
बनाने वाले दृढ़ ताली निश्चित लय में ठोंकते हैं
हथौड़ी की उंगली
लोहे का ताल
धड़कनों की तरह आदत है समय को यह
समय का संगीत है
ठ क ठ क ठ क ठ क
या
ठकठक ठकठक ठकठक ठकठक

और भी लयें हैं सब लगातार हैं
लोगों को आदत है लयों का यह संश्लेष सुनने की
हम प्रत्येक को अलग-अलग पहचानते हैं
और साथ-साथ भी

एक दिन गली में लड़का पैदा हुआ है और
शहनाइयां बज रही हैं
पृष्ठभूमि में असंगत लोहे के कई ताल
एक बांसुरी बेचनेवाले बजाता हुआ बांसुरी
गली में दाखिल है और
बांसुरी नहीं बिकी है शहनाई वाले से अब बात हो रही है
वह बातचीत संगीत के बारे में नहीं है पता नहीं किस बारे में है
एक प्राइवेट स्कूल का ५०० प्रति माह पाने वाला तबला अध्यापक
इस दृश्य को दूर से देख रहा है

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