सबद
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कोठार से बीज : 2 : त्रिलोचन

1:48 am
( यह दुखद है कि हमें अपने दिवंगत मूर्धन्य जयंतियों पर याद आते हैं । यों तो हम डग-डग पर उनकी उन्हीं चंद बातों को कोट करते हुए बखूबी, 'यशवर्धन बज़रिये नाम-जाप' की परम्परा को पुष्ट करने की अपनी निर्ल्लज कोशिशों में लगे रहते हैं, हमने कभी यह परवाह नहीं की कि उनका लिखा कहाँ और किस हालत में है। ' कोठार से बीज' नामक स्तंभ की शुरुआत शमशेर के गद्य से की थी। कहना न होगा कि उनकी वह गद्य पुस्तक एक बार छप कर प्रकाशकों के लिए कम से कम किसी मसरफ का न रही। शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन सरीखे ऐसे कई कवि-लेखक हैं जिनकी अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों को पाठकों की आगामी पीढ़ियों के लिए सच पूछिए तो जमींदोज किया जा रहा है। इस बार, ''कोठार से बीज'' में त्रिलोचन जी की ऐसी दो लुप्तप्राय पुस्तकों से ही कुछ शब्द। पहली पुस्तक, ''अरघान ''नामक कविता संग्रह है जिसे यात्री प्रकाशन ने १९९४ में छापा था। कविता उसी से ली गई है। दूसरी पुस्तक त्रिलोचन जी की १९५० में लिखी गई डायरी है जिसे बहुत बाद में इलाहाबाद से किसी साहित्यवाणी नाम के प्रकाशक ने ,''रोजनामचा'' नाम से छापा था। इनका क्या महत्व है, ये आप ही बतलाएंगी।)

क्या-क्या नहीं चाहिए

कल तुम्हारी प्रतीक्षा थी।

सोच बैठा, कौन जाने लहर मन में उठे और यों ही चली आओ।
बात कुछ ऐसी है कि कल अंतहीन शून्य मन में भर गया था।
नाड़ी सुस्त हो गई थी। बाहर भी भीतर का शून्य घिरा देखता था।
ऐसे में हारा मन तुम्हारी शरण जा पहुँचा। पल-भर भी मैंने यह नहीं
सोचा, मेरी जैसी दशा तुम्हारी भी हो सकती है। खुशियों की लहरें आ
जाती हैं और चली जाती हैं और हम पड़े रह जाते हैं।

आज ज़रा चिंता के समुद्र से सर बाहर निकला है और तुम्हें देख
कर आवाज़ जो हृदय से उठी उसे अक्षरों में रख रहा हूँ। तुम्हें भी ज्ञात
हो जाए कि मैं सदा-सर्वदा प्रसन्न नहीं रहता और यह जान सको कि
तुमने एक जीवित हृदय का स्पर्श किया है, ऐसे हृदय का जो देश काल के
प्रभाव लेता है, बिल्कुल जड़ नहीं है। मेरे इस हृदय को अच्छी तरह जान लो
और फिर जैसा तुम्हें जान पड़े वैसा करो।

प्यार, घृणा, उदासीनता, सहानुभूति ....मुझे क्या-क्या नहीं चाहिए ।

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रोज़नामचे में एक रोज़

पौने पाँच पर जगा। नामवर, केदार के साथ गोविन्द लौज से गंगा की ओर गया। राजदेव सिंह का अंडरवियर नामवर को नहाने के लिए लिया। स्नान हुआ। बालेश्वर और तुलसी नारायण सिंह के साथ लगभग आधी गंगा तैरा। वास पर आसन और व्यायाम किया। नामवर ने भी व्यायाम किया। यहाँ से वे लोग उदयप्रताप कॉलेज के लिए चले। उन्हें शम्भुनाथ के यहाँ भी रुकना था। मैंने विद्यापीठ पर नौ पर पहुँचने की बात दी। ठीक समय पर पहुँचा। शरबत पिया। साहित्य पर बात। शम्भुनाथ की पत्नी थीं। नामवर ने किवाड़ बंद किया। शायद मैं ही एक मात्र वह जन था जिससे इस सुरक्षा की आवश्यकता थी। बातों में शम्भुनाथ को परदा पसंद नहीं। फिर उनकी पत्नी को ही शायद पसंद हो। उनकी पसंद इस बात से होती है कि बिना बुर्का ओढे, ओहार डाले एक बार साहित्य सहकार के द्वारदेश तक गई थीं और शहर में यह आना-जाना होता ही रहता है। मगर सुरक्षा का यह दिखावा हमारी दुमुही सभ्यता है।

केदार और नामवर के साथ स्टेशन के दूसरी ओर पुल से होकर साइकिल लिए पैदल गया। एक्का करके नामवर केदार चले। उन दोनों में मज़ाक होता रहा। ग्यारह पर प्राचीन छात्र भवन। सत्तू मांग कर खाया गया। आम की चटनी। दिन में नामवर सोए। केदार छः में गए और मैंने धर्मवीर भरती का प्रगतिवाद, हजारीप्रसाद द्विवेदी का साहित्य के साथी देखा। दोनों पुस्तकों को संतोषजनक पाया। कॉलरिज की बायोग्रैफिया लिटरेरिया देखी। लेने का निश्चय किया। चार बजे नामवर को प्रभु जी कार पर ले गए। कहा था, नामवर सिंह आप बड़े आदमी हो गए हैं क्या। मुझ से कहा, आप प्रकृति का आनंद उठाइए। यह अहमक लड़का, बेसाख्ता बदतमीज़। चार बजे जय से मिला। उसे डेढ़ रुपये मैंने, आठ आना केदार ने दिया।

शाम को केदार, रामकिशोर और नामवर के साथ,''समाधी'' का दूसरा खेल देखा। बहुत अच्छा नहीं लगा। नलनी जयवंत अच्छी लगी। सब प्राचीन छात्र भवन ( लौटे )। केदार ने कहा, किस खाट पर सोऊं। नामवर से कहा, आपकी छोटी है। नामवर ने कहा, छोटी तो नहीं है। दोनों सोए। डेढ़ हो गए थे। सोया। खेल में टिकट के पाँच रुपये मैंने दिए थे। रघु जी से रामेश्वर, राममूर्ति सिंह, नारी आदि पर बातें।

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कवि की संगत कविता के साथ : 2 : गीत चतुर्वेदी

2:19 am

( हालाँकि अब यह बात हर दूसरे कवि के लिए कही जाती है कि उसकी कविता सबसे अलग है और बाज़ दफा इस कथन के समर्थन में आसानी से वे तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं जो कविता और कवि के मह्त्व-रेखांकन की बजाय उसमें एक हास्यास्पद नुक्ता ही जोड़ता है, गीत चतुर्वेदी और उनकी कविताओं के बारे में ऐसा दृढ़कथन इसके बावजूद किया जाना चाहिए। वह इसलिए कि संवेदना के जिस धरातल पर गीत कविता संभव करते हैं, जैसी रेंज उनके पास है ( फिर वह भाषा की हो या थीम की ), जितना उनकी कविता ने अपनी पूर्ववर्ती कविता से मेलजोल रखा है, जैसी संजीवनी वह सहोदर कलाओं से पाती रही है और जितना संयमित और सजग उसका अपना काव्य-विधान है, वह अभी लिखी जा रही युवा कविता में दुर्लभ नहीं तो इतना समर्थ ज़रूर है कि कविता को उसका मौलिक स्वर और कवि को उसकी खास पहचान दे। अकारण नहीं उन्हें युवा कविता का प्रतिष्ठित,''भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार '' मिला है। गीत ने कई बार आग्रह दुहराने के बाद अपना आत्मकथ्य लिखा। दो नई कविताएं भेजी। एक कविता,''असम्बद्ध'' हम अपनी तरफ से दे रहे हैं। सबद का इतना मान रखा उन्होंने, उनका आभार ! कवि की संगत कविता के साथ स्तंभ की यह दूसरी प्रस्तुति है। इससे पहले आप चंद्रकांत देवताले को पढ़ चुके हैं। )

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आत्मकथ्य

ख़तरे की घंटी बादशाह के पास है

कई बार मुझे लगता है कि रचना प्रक्रिया कवि की रसोई होती है। और ज़्यादातर रसोइयों में मानक के अनुरूप स्वच्छता नहीं होती। उड़ता हुआ आटा, बिखरी हुई सब्जि़यां, किसी कोने में बह-बहकर जम गया पानी, तवे पर जलकर बिखरा पलथन, हल्दी के दाग़ और चूल्हे के पास पतीले से बाहर गिरा हुआ चावल, गर्मी, रसोइये का पसीना, अचानक आई हुई खांसी या छींक जिस समय वह अपनी तल्लीनता के कारण मुंह पर हाथ रखना भूल गया हो... रसोई से बाहर निकला खाना स्वादिष्ट, पौष्टिक और भला लगे, इससे ज़्यादा उसका कोई मक़सद नहीं होता। कविता के साथ भी ऐसा ही होता है। किसी के साथ जाने-अनजाने किया गया छल, मुस्कराकर कहा गया एक झूठ, किया और झेला गया अन्याय, कुछ अच्छी और बहुत सारी बुरी चीज़ें जो कि इस समय में एक के साथ दो मुफ़्त मिल जाती हैं... ये सब इस रसोई में पड़े होते हैं।

कविता कवि की शरणगाह होती है, उसका कन्फेशन बॉक्स होती है। कवि इस रसोई से निकलता है और कविता में आकर आत्मशुद्धि करता है। मनुष्यगत कमज़ोर‍ियों से निकलने की छटपटाहट में अपने मनुष्य होने के और क़रीब होता है। कविता आपको झुंझलाहट में एक छोटी बच्ची के गाल पर बेबात थप्पड़ मारने से नहीं रोक पाती, लेकिन जब वह रो रही होती है, तो उसके साथ बैठकर थोड़ी देर रो लेने का शऊर और शक्ति ज़रूर देती है। रुदन का वह क्षण कविता का क्षण होता है।

एदुआर्दो गैल्यानो के एक निबंध में ज़िक्र किया है, ''कुछ बच्चे शरारत करते हुए चींटियों की बांबियों में माचिस की जलती तीली फेंक रहे थे। चींटियां मर रही थीं। उन्हें नहीं पता था कि वे मौत का कितना गंदा खेल खेल रहे हैं। उनमें से एक लड़का कह रहा था कि देखो, जब ये चींटियां मरती हैं, तो एक-दूसरे पर लद जाती हैं, जैसे ये बांहों में बांहें डालकर मर रही हों। देखो, ये मरते समय दोस्ती कर लेती हैं।' बच्चे तीली फेंकना छोड़कर मरी हुई चींटियों की दोस्ती देखने लगते हैं और उन्हें जलाना छोड़ एक-दूसरे का हाथ पकड़कर गोल घेरा बनाकर दोस्ती का दूसरा खेल खेलने लगते हैं। जिस बच्चे ने चींटियों की हत्या और मृत्यु के बीच उनका एक साथ हो जाना, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर मित्रता के साथ मृत्यु में प्रवेश करने के दृश्य को बिंबित किया होगा, यक़ीनन वही कवि है।''

इसे
पढ़ने के बाद मुझे हमेशा लगता है कि समाज में कवि की भूमिका कमोबेश ऐसी ही होती है। वह जाने-अनजाने उन लोगों के साथ खड़ा हो जाता है। इसी समाज का हिस्सा होने के कारण वह हत्यारों के बीच भी रहता है, तो वह उन्हें इशारा करके इतना बताता है कि देखो, इस मृत्यु से थोड़ा पसीजो, इनका भावजगत तुम्हारे जैसा ही है। और उम्मीद करता है कि हत्यारे उस भावजगत को देखकर मनुष्यता के जेस्चर देंगे और पीछे हटेंगे। हमारे समय की सत्ता, शासक, अत्याचारी और हत्यारे इन बच्चों की तरह भोले नहीं हैं, इसलिए जितनी आसानी से कवि बच्चे के कहने पर बाक़ी बच्चे अपना खेल रोक देते हैं, उतनी आसानी से हमारे समय के हत्यारे नहीं। इसलिए हमारे कवि का काम ज़्यादा मुश्किल है।

तुर्की कवि आकग्यून आकोवा की एक पंक्ति है, ''कविता चींटियों की बांबी में लगी ख़तरे की घंटी है।'' मुझे रघुवीर सहाय की एक पंक्ति ठीक इसी के सामने याद आती है,'' ख़तरे की घंटी बजाने की अधिकार सिर्फ़ बादशाह के पास है।'' कविता में हम वही अधिकार वापस लेने का संघर्ष करते हैं या एक वैकल्पिक घंटी बना रहे होते हैं, जिसकी आवाज़ बादशाह की घंटी की आवाज़ से ज़्यादा साफ़ और ईमानदार हो। और ऐसे समय में, जब बादशाह मनोरंजन के लिए ख़ुद कविता करता हो, कविता को विज्ञापन फिल्मों की कैचलाइन में बदल देता हो, दर्द की एक धुन और आंसू के एक बड़े फोटो के साथ, गुडि़या छीनकर बच्चों के हाथ में बंदूक़ का खिलौना पकड़ा देता हो, कविता की भाषा में आपसे जेब ढीली करने की मनुहार करता हो, रूढि़यों, भ्रांतियों और पूर्वाग्रहो के विखंडन के बजाय परमाणु विखंडन पर ख़ज़ाना खोल देता हो, जो बच्चों को चॉकलेट न मिलने पर घर से भाग जाना सिखाता हो, मुक्ति के नाम पर स्त्री की देह को सिसकारियों से छेद देता हो, जो बीच राह रोककर पुरुष की मैली शर्ट, फटे जूते और ख़ाली बटुए का मख़ौल उड़ाता हो, और यह सब जानबूझकर, योजना बनाकर, विज्ञापनों में, कविता की भाषा में करता हो, वह समय कितना ख़तरनाक होगा, अंदाज़ा नहीं लगा सकते। जब बादशाह यह मनवा दे कि मृत्यु और तबाही दरअसल भूख, ठंड, बारिश, बाढ़, रोग, महामारी से नहीं, बल्कि एलियंस, साइबोर्ग्स, नामुराद उल्काओं और रहस्यमयी उड़नतश्तरियों से होती हैं, तो उस समय की भयावहता की कल्पना कर सकते हैं हम। अचरज है कि ये सब कविता की भाषा में भी हो रहा है।

कविता के लिए भी कठिन समय है यह। कवि के लिए उससे ज़्यादा। लगातार अविश्वसनीय होती अभिव्यक्तियों के बीच एक कवि को अपनी कविता के लिए वह भाषा खोजनी होगी, जो सबको समझ में भी आ जाए और सत्ता के प्रवचन को फ़ाश भी करे। भ्रम, लालच, चकाचौंध, ग़फ़लत, गलाज़त, लुच्चई और मक्कारी से भरे इस समय में कवि को सयाना होने से बचना होगा। उसे अपने भीतर वह बच्चा बचाए रखना होगा, जो मरती हुई चींटियों को देखकर सबको बता सके कि उनकी दोस्ती दरअसल जीवन की हक़दार है। कविता के भीतर ऐसी ही कोशिश करना चाहता हूं मैं।
*

तीन कविताएं

असम्बद्ध

कितनी ही पीडाएं हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हुबहू किसी दृश्य में नहीं बंधती

ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की ज़िम्मेदारी उस पर है
शाम झांकती है बारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है
धूप धीरे-धीरे जमा होती है
कमीज़ और पीठ के बीच की जगह में
रह-रहकर झुलसाती है

माथा चूमना
किसी की आत्मा को चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्मा के गालों को सुर्ख़ होते

दुःख के लिए हमेशा तर्क तलाशना
एक ख़राब किस्म की कठोरता है
****

फीलगुड

कोशिश करता हूँ किसी भी अभिव्यक्ति से
किसी को भी ठेस न पहुंचे

जिस पेशे में हूँ मैं
वहां किसी गुनाह की तरह
कठिन शब्दों को छाँट देता हूँ
कठिन वाक्यों को बना देता हूँ सरल
जबकि हालात दिन-ब-दिन और कठिन होते जाते
मैं समय का संपादन नहीं कर पाता

कितना खुशकिस्मत हूँ
एक जीवन में कितनी स्त्रियों का प्रेम मिला
कितने मित्रों कितने बच्चों का
प्रेम के हर पल में जन्म लेता हूँ
पल-बढ़कर प्रेम की ही किसी आदिम गुफा में
छिप जाता हूँ धीरे-धीरे मृत होता

कंधे झिड़क कहता हूँ ख़ुद से
एक जीवन और चाहिए पाया हुआ प्रेम लौटने को

घृणा
की वर्तनी में कोई ग़लती नहीं होती मुझसे
नफ़रत में नुक्ता लगाना कभी नहीं भूलता
****

काया

तुम इतनी देर तक घूरते रहे अंधेरे को
कि तुम्हारी पुतलियों का रंग काला हो गया
किताबों को ओढा इस तरह
कि शरीर कागज़ हो गया

कहते
रहे मौत आए तो इस तरह
जैसे पानी को आती है
वह बदल जाता है भाप में
आती है पेड़ को
वह दरवाज़ा बन जाता है
जैसे आती है आग को
वह राख बन जाती है

तुम
गाय का थान बन जाना
दूध बनकर बरसना
भाप बनकर चलाना बड़े-बड़े इंजन
भात पकाना
जिस रास्ते को हमेशा बंद रहने का शाप मिला
उस पर दरवाज़ा बनकर खुलना
राख से मांजना बीमार माँ की पलंग के नीचे रखे बासन

तुम
एक तीली जलाना
उसे देर तक घूरना
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मंगलेश डबराल की डायरी

7:38 pm

( हिन्दी के अग्रणी कवि मंगलेश डबराल की डायरियों की ये प्रविष्टियां उनकी शीघ्र प्रकाश्य गद्य पुस्तक,''कवि का अकेलापन'' से ली गई हैं। मंगलेशजी ने इन्हे प्रीतिपूर्वक हमें छापने की इजाज़त दी। हम उनके कृतज्ञ हैं। डायरी के पन्ने कवि सुंदर चन्द ठाकुर ने तत्परता से मुहैया कराया। उनका आभार। हम वक्त-वक्त पर कवि-लेखकों की डायरी या जर्नल वगैरह प्रकाशित करते रहेंगे। )


कविता में कभी अच्छा मनुष्य दिख जाता है या कभी अच्छे मनुष्य में कविता दिख जाती है। कभी-कभी एक के भीतर दोनों ही दिख जाते हैं। यही एक बड़ा प्रतिकार है। और अगर यह ऐसा युग है जब कविता में बुरा मनुष्य भी दिख रहा है तब तो कविता में अच्छा मनुष्य और भी ज्यादा दिखेगा। लेकिन क्या ऐसा भी समय आ सकता है कि अच्छे साहित्य की चर्चा ही न हो ? सिर्फ़ दोयम दर्जे की कविता-कहानी को महान, अभूतपूर्व, युगांतकारी मानाजाने लगे ?कोई बहुत अच्छी कविता कहीं छपे और लोग उस पर कोई बात न करें और चुप लगा जाएं। यह कितना भयानक होगा। लेकिन समय की विशाल छलनी भी तो कुछ छानती रहती है। चुपचाप।
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नेता, इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए, सूचना तकनीक के माहिर लोग, सॉफ्टवेयर निर्माता, पत्रकार, प्रशासक, नौकरशाह, चित्रकार, संगीतकार, नृत्यकार वगैरह प्रायः राज्य, सत्ता, बाज़ार और ग्लोबलाइजेशन के अनुरूप ही सोचते हैं। वे यथास्थिति के विरोध में नहीं जाते। प्रायः कवि-लेखक-बुद्धिजीवी हैं जो सत्ताओं के प्रतिकूल सोचते हैं। इसके अपवाद ज़रूर हैं, इसलिए हम उन्हें हमेशा याद रखते हैं। माइकलएंजेलो वेटिकन के पोप को अपने से बड़ा नहीं समझता, इकबाल बानो पकिस्तान में याह्या खान की हुकूमत के ख़िलाफ़ फैज़ की नज़्म गाती हैं, जर्मनी में कई कलाकार हिटलर के ख़िलाफ़ पेंटिंग करते हैं, बीठोफेन नेपोलियन के विरोध में उसे पहले समर्पित की हुई अपनी सिंफनी फाड़ डालता है...

पोलैंड के महान पियानोवादक लिस्त के बारे में एक कहानी प्रसिद्द है कि एक बार उसके संगीत कार्यक्रम में रूस के ज़ार निकोलस सपरिवार अगली कतार में बैठे हुए थे। पोलैंड तब रूस के अधीन था। लिस्त बजा रहे थे और ज़ार परिवार बातों में मशगूल था। उन्हें बातें करते देख लिस्त ने पियानो बजाना बंद कर दिया, लेकिन ज़ार ने उनसे कहा कि बजाते जाइए। यह क्रम तीन बार चला। चौथी बार लिस्त ने पियानो बंद किया और व्यंग्य से कहा कि जब ज़ार बोल रहे हों तो हर चीज़ को खामोश हो जन चाहिए।

ऐसे कलाकार अमर हैं, क्योंकि वे कला का नैतिक मूल्य समझते हैं और बादशाहों-तानाशाहों को कुछ नहीं समझते। अब्दुल हलीम शरर की किताब, '' गुज़िश्ता लखनऊ '' में नवाब हैदर खां का किस्सा कितना मशहूर है। इस किस्से को स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाया जन चाहिए।
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राजनैतिक कविता के नाम पर ज़्यादातर जो कुछ दिखाई देता है वह शायद किसी बड़ी कविता को निर्मित कर सकनेवाला कच्चा माल है। यह हम मार्क्सवादी कविओं की एक खामी है कि हम कविता की सामग्री को कविता की तरह पेश करते रहते हैं और गैर-कलावादी बनते हैं। हम अपनी कविता के रसोईघर को ही कविता मान लेते हैं, ताकि भोजन की असलियत भी पता चल जाए। हम अपनी किचन आपको पूरा क्यों दिखाएं ? थोड़ा-बहुत दिखाएंगे, लेकिन यह भी बताएंगे कि बहुत कम चीज़ों से हम बहुत अच्छा खाना बनते हैं। यही हमारी कला है। और कला हमारी ही है, किन्हीं कलावादियों की नहीं।
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क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि इधर मैंने जितनी कविताएं लिखी हैं उनमें से कई मृतकों के बारे में हैं--भुला दिए गए नामों को संबोधित, उनसे संवाद या उनके प्रति श्रद्धांजलि या फिर उनकी ओर से कोई वक्तव्य ? शायद यह, ''गुजरात के मृतक का बयान'' से से शुरू हुआ। फिर करुणानिधान, मोहन थपलियाल, गोरख पांडेय, मुक्तिबोध, शमशेर या माँ के बारे में। और पहले की कुछ कविताओं के पात्र केशव अनुरागी, गुणानंद पथिक, अमीर खां भी तो जीवित नहीं हैं। क्या जीवितों की तुलना में मृतकों से संवाद आज ज़्यादा संभव और ज़्यादा सार्थक हो गया है?

इन्हें लिखते हुए--खासकर गुजरात के मृतकों और मोहन थपलियाल पर--मुझे बहुत पीड़ा हुई, कभी रोया भी, लेकिन लिख चुकने के बाद लगा जैसे मेरा कोई बोझ उतर गया है, मैं भारहीन-सा हो गया हूँ और वह एक नैतिक मूल्य मुझमें भी समां गया है जिसका प्रतिनिधित्व ये प्रतिभाएं करती हैं। इस तरह मृतक मेरे, ''कन्सायन्स-कीपर'' हैं। मृतकों का अपना जीवन है जो शायद हम जीवितों से कहीं ज़्यादा सुंदर, उद्दात और मानवीय है। इतने अद्भुत लोग, और जिंदगी में उन्होंने कितना कुछ झेला और वह भी बिना कोई शिकायत किए। जो नहीं हैं मैं उनकी जगह लेना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ वे मेरे मुहं से बोलें।
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कला का आलोक : १ : हकु शाह

4:28 pm

स्वभाव से अन्तर्मुखी व मितभाषी युवा लेखक, सम्पादक, अनुवादक व संस्कृतिकर्मी पीयूष दईया का जन्म 27 अगस्त 1973, बीकानेर (राज.) में हुआ। आप हिन्दी साहित्य, संस्कृति और विचार पर एकाग्र पत्रिकाओं ''पुरोवाक्'' (श्रवण संस्थान, उदयपुर) और ''बहुवचन'' (महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा) के संस्थापक सम्पादक रहे हैं और लोक-अन्वीक्षा पर एकाग्र दो पुस्तकों ''लोक'' व ''लोक का आलोक'' नामक दो वृहद् ग्रन्थों के सम्पादन सहित भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर की त्रैमासिक पत्रिका ''रंगायन'' का भी बरसों तक सम्पादन किया है। पीयूष ने हकु शाह द्वारा लिखी चार बाल-पुस्तकों के सम्पादन के अलावा अंग्रेज़ी में लिखे उनके निबन्धों का भी हिन्दी में अनुवाद व सम्पादन किया है। हकु शाह के निबन्धों की यह संचयिता,''जीव-कृति'' शीघ्र प्रकाश्य है। ऐसी ही एक अन्य पुस्तक पीयूष चित्रकार अखिलेश के साथ भी तैयार कर रहे हैं। काव्यानुवाद पर एकाग्र पत्रिका ''तनाव'' के लिए ग्रीक के महान आधुनिक कवि कवाफ़ी की कविताओं का हिन्दी में उनके द्वारा किया गया भाषान्तर चर्चित रहा है। वे इन दिनों विश्व-काव्य से कुछ संचयन भी तैयार कर रहे हैं।

( हकु शाह चित्रकारों की उस विरल परम्परा के प्रतिनिधि हैं जिसमें रचने के साथ-साथ विचारने की एक सरल-सूक्ष्म और मनोग्राही प्रक्रिया भी लगातार चलती रही है। पीयूष दईया की उनके साथ की गई बातचीत से जो सामने आया है वह इसका सुंदर नमूना है कि कैसे एक कलाकार की संगत हमारे पहले से देखे-भाले अनुभव-संसार को खामोशी से बदल देता है। बातचीत के कई टुकड़े सुधि पाठकों ने पत्रिकाओं में पढ़ा है। वेब दुनिया के पाठक इसके कुछ अंश www.raviwar.com पर पढ़ चुके हैं। यहाँ बातचीत के कुछ प्रसंग और। शीघ्र ही यह बातचीत पुस्तकाकार, '' मानुष '' नाम से प्रकाशित होगी । हकु शाह की तस्वीर रविवार से साभार और पीयूष की तस्वीर संतोष पासी के सौजन्य से । )

अनचिन्हा आपा

एक छोटी-सी बात पानी की , केंकड़े की , फूल की , एक मानुष की।

मुझे याद पड़ता है कि पिछली सदी के साठवें दशक में जब मैं और मेरे जर्मन नृतत्वशास्त्री मित्र डॉ. एबहार्ड फिशर , रातड़ी ( सौराष्ट्र में पोरबंदर से लगभग बीस मील दूर मेर जाति के लोगों का एक गांव ) में काम कर रहे थे तब मैं वहीं गांव की एक सुन्दर नाम वाली महिला--वा’लीआई--की सहायता से गुदड़ी को समझने के सिलसिलों में डूबा रहता था। उनके पास उनके पति अक्सर बैठे हुए मिलते थे। वे एक मितभाषी व चुप्पा शख्स थे--वहीं एक कोने में बैठ कर मिट्टी से बनी चिलम में तम्बाखू भर कर उसे धीरे धीरे फूंक देते थे। उनकी चिलम से उठता धुआं बरामदे में ऐसे फैलने लगता था मानो उनकी हस्ती की याद दिला रहा हो। मेरे लिए वह धुआं नहीं बल्कि रूपों का सागर था। वे गुदड़ी बनाने के लिए यदा-कदा कपड़े धोने व उन्हें अलग करने में वा’लीआई की मदद करते थे। वहां उनका उठना-बैठना-घूमना मुझे एकमात्र पात्र की माफ़िक लगता था। वे सचमुच एक पात्र की तरह थे। मुझे हमेशा महसूस होता था कि वे वहां ऐसे थे गोया वे वहां नहीं थे।

एक मौन उपस्थिति। एक यात्री ! उनका नाम था सांगाआता।

सांगाआता में बढ़ती मेरी दिलचस्पी के पीछे कई कारण थे। सबसे पहले यही कि वे वा’लीआई के पति थे। यह जानने का मन बराबर बना रहता था कि वहां रहते हुए वे क्या क्या कर रहे हैं क्योंकि उस पूरे माहौल से उनकी ख़ामोश मौजूदगी के सम्बन्धों में एक खास तरह की पर्दादारी-सी थी। उन्हें मैंने कभी ज़रा-सा जोर से बोलते तक सुना नहीं हालांकि मैं घंटों और पूरा पूरा दिन वहां बैठा रहता था। उनकी आवाज़ के बजाय मैंने या तो उनका चिलम पीना देखा या उसका धुआं या उनकी छोटी-सी तेजस्वी आंखें या माथे पर बंधा रहता उनका जीर्ण-शीर्ण फेंटा। मानो कोने में सांस लेता एक पोटला रखा है जो ज़िन्दा है। शून्यवत् रीति-शैली का बिम्ब !

आखिरकार एक दिन मैंने उन्हें यह पूछ ही लिया कि सांगाआता क्या आपके साथ मैं कुछ बात कर सकता हूं ? पहले वे बोले नहीं , बस, ''हां'' में मुंह हिलाया। फिर थोड़ा ठहर कर कहा,'' कल सुबह जल्दी आ जाइए। अपने दोस्त से मिलवाऊंगा।''

सांगाआता और वा’लीआई दोनों एक झोंपड़ी में रहते थे। एक ऐसी मामूली-सी झोंपड़ी जिसमें इन दम्पति के सिवा कुछ और भी हो , यह लगता नहीं था। यह झोंपड़ी और वह बरामदा मानो मंच थे और ये दो पात्र ! शांति , गति ,व्यवहार से खिसकते व कुछ करते दो प्राणी। मानो न जाने किस पिछली सदी में जीने वाले दो जीव यहां टपक पड़े हों !

सांगाआता का रूपचित्र बहुत आकर्षक था। सुबह जब झोंपड़ी की सूराखों में से सूरज की किरणें प्रवेश करतीं थीं, उनकी चमकीली आंखें और चमकीली हो जाती थी। उनकी छोटी दाढ़ी , मूंछ, व भौहों के बाल चिलम के धुएं से और सफ़ेद बन कर इसे एक रूपचित्र की मानिन्द लेने का लालच देते थे। मैं आज भी उन प्रकाश-किरणों में उनके भौहों के सफ़ेद बाल गिनने की कोशिश कर रहा हूं।

आम आदमी की व्याख्या कई दिनों से करता रहा हूं। सांगाआता सचमुच जन थे।

उनके कहे मुताबिक अगले दिन सुबह ज़रा जल्दी मैं उनके घर पहुंचा जहां वे पहले से तैयार खड़े थे। मानो एक पात्रमय शिल्प। सांगाआता ने अपने मेर लोगों वाली पोशाक पहनी हुई थी--मोटे सूत वाले कपड़े की ; ऊपर केडिया और नीचे चूड़ीदार पायजामा व सिर पर बंधा हुआ एक छोटा-सा फेंटा। उनकी उम्र करीब पिच्यासी-नब्बे साल के आसपास रही होगी। उनका बेटा बहुत बरसों से कहीं बाहर रहता था--झोंपड़ी में अकेले वे दोनों ही रहते थे बस , पति-पत्नी/अला-अली।

यह सुनने में आया था कि पूरा गांव सांगाआता को जानता है। गांव के लोगों से जब पूछा कि,''भला क्यों , क्यों जानता है ?'' पता चला कि सांगाआता अपने युवा दिनों में राजाओं के लिए लड़कियां भगाने का काम करते थे। काठियावाड में पहले अलग-अलग छोटे राज थे। सबसे दिलचस्प बात यह लगी कि सारे गांव वाले यह जानते हैं कि यह सांगाआता है। लोगों ने मुझसे कहा,''जानते हैं या नहीं यह हमें नहीं मालूम लेकिन उन दिनों सांगाआता जब दूसरे गांव से ऊंट पर बैठे हुए एक दो मील की दूरी पर आने वाले होते, कुछ दोहे की आवाज़ आतीं। वे आ रहे हैं।'' ( लोगों को लगता था। ) यही संदेसा था। यूं पहले से ही सबको पता लग जाता कि वे आने वाले हैं। तब सांगाआता गाना गाते थे--अपने प्रिय धोळो नाम के ऊंट पर बैठ कर। धोळो का ज़िक्र छिड़ते ही मानो कोई जन्मजन्मान्तरों के दोस्त की याद आ गयी हो जिससे वे इतना खुश हो जाते थे कि उनकी आंखें और चमकने लगती थी। वे धोळो के बारे में बोलने-बताने व कहानी सुनाने लग जाते थे। धोळो की स्मृति व सम्मान में उन्होंने अपने दोनों कंधों पर ऊंट का एक गोदना भी बनवाया हुआ था। वे बताते थे कि उनका धोळा पहाड़ जितना ऊंचा और अण्डे जैसा सफ़ेद था। उन्होंने पचासों ऊंटों की सवारी की थी लेकिन धोळा उन सबमें सबसे अच्छा था--आदमी से भी ज़्यादा बेहतर व समझदार। धोळो किसी तरह सरक कर उनकी झोंपड़ी में भी आ जाता था , उसे वे बिठा कर अंदर ले लेते थे। उन दिनों अक्सर रात को वे धोळो पर बैठ कर भागते थे , इधर से उधर। दोनों साथी ! दोनों संगाथी !

बहरहाल।

उस दिन सुबह हम दोनों उनके दोस्त से मिलने निकल चले। अपने मन में कहीं मैं यह जानता था कि उनके साथ होना-मात्र अपने में एक अनुभव होगा। रातडी एक छोटा-सा गांव था हम जिससे धीरे धीरे बाहर आये। सांगाआता पर मुझे बहुत विश्वास था। मैंने यह पहले से ही सोच रखा था कि वे जहां भी , जैसे भी ले जाएंगे मैं उनके साथ बिना पशोपेश में पड़े जाऊंगा। हालांकि सुना था कि वे बहारवटिया कौम से है। वे जब साथ में चलते थे, लगता था मानो कोई पशु-पक्षी या मानव की ऐसी हस्ती साथ दे रही हो जो मार्गदर्शक , वत्सल , मौन , निर्दोष व गुरू जैसी हो।

वे ले जा रहे थे।

चलते-चलते हम इतना दूर निकल आये कि एक आदमी तक कहीं नज़र नहीं आ रहा था--गांव कबका पीछे छूट चुका था। तभी अचानक वे बहुत धीरे से बोले-- '' ये फूल आपके जानने लायक है। वैसे है ये फूल।'' वहीं रास्ते में कहीं ज़मीन से निकले हुए वे दो फूल थे--बिलकुल ताज़ा व दोशीज़ा। तब सारा संसार भूरा व गुलाबी था और यहां अरगजी पीले फूल दीख पड़े थे , पांव के पास नीचे--पीले रंग के दो बहुत सुंदर व छोटे-से अच्छे फूल। उन्होंने बताया कि इन फूलों को हीहोरिया कहते हैं। ''मेर'' औरतें अपने कान में पूरी सोने से बनी हीहोरिया/डूल पहनती हैं , ये फूल भी बिलकुल उन सरीखे ही दिखते हैं।

मैं उनके दोस्त के बारे में सोच रहा था और अभी मिले ये दो फूल।

एक फूल से एक गहने के इस अद्भुत सादृश्य से विस्मयविभोर मैं उनके साथ यह सोचता हुआ आगे चलता गया कि ऊपर से इतना मामूली व एकाकी लगता यह आदमी कितना विलक्षण है। कौन जाने यह अपनी आत्मा में एक फ़लसफ़ेकार हो। ऊपर से अळगारी-सा दिखता। मगर वे ज़रूर जानते थे। वे जन थे।

चलते-चलते चारों ओर ऐसे खुले मैदान आने लगे थे जहां किसी प्राणी का कोई आभास तक नहीं मिल रहा था सिवाय कुदरत के जो ज़मीन थी या रेत थी या कहीं कहीं झाड़-झंखाड़ या कहीं इक्का-दुक्का कोई पक्षी या पशु और अक्षत क्षितिज। यह कहीं मैं जानता था कि सांगाआता के संग मौन रहना--अकथ--ही बड़ी बात होगी--जितना मैं मुंह बंद रखूंगा उतना ही मुझे जानने को मिलेगा।

और वैसा ही हुआ था।

मैदान पार करते-करते चढाव आया , ऊपर उठती ढलान। ढलान ऊपर की ओर चढ़ती चली गयी। वहीं आगे चलते चलते हम उधर पहुंचे जहां रेत में एक छोटा विवर-सा था जिसे देखकर सांगाआता बोले,''क्या आप जानते हैं यह क्या है ?'' मेरा जवाब था--''नहीं।'' मैं कुछ जानता भी नहीं था। वे फ़ौरन बोले, यहां केंकड़ा रहता है। अभी बाहर घूमने गया है।'' अचरज में मेरे मुंह से निकला,''ऐसा है।'' उनको यह पता चल जाता था कि वह ढंका , न ढंका विवर कैसा है जिसमें केंकड़ा नहीं है--उनकी सूझबूझ इस मामले में बिलकुल सटीक थी कि कहां केंकडा है और कहां नहीं है। आगे चलने पर एक दूसरा छोटा विवर आया जिसे देखकर वे बोले,''इसमें केंकड़ा है।'' और वहीं एकदम से नीचे रेत पर लेट उन्होंने विवर में से केंकड़ा निकाल कर बाहर उछाला। मैं फिर अचरज में भर बोला,''केंकड़े ने आपको काटा नहीं ?'' वे बोले,''हम जानते हैं कि केंकड़े को कैसे पकड़ना होता है। पहले हाथ में खूब रेत भर लेते हैं और उससे फिर पकड़ते हैं तब केंकड़े का काटा हमें रेत के हिसाब से लगता नहीं। हाथ की रेत हमें बचा लेती है।'' मुझे लगा कि इन दोनों विवर की उनकी पहचान के पीछे जो गहरा ज्ञान काम कर रहा है वे उसके अच्छे ज्ञाता है हालांकि बाहर से मुझे दोनों ही विवर लगभग एक जैसे ही लग रहे थे। विवर में केंकड़े की उपस्थिति व अनुपस्थिति का पता उन्हें विवर पर बिछी रेत की हल्की परत से चलता था जैसा कि मैंने उनसे ही जाना था।

यूं मैं उनके संग रोज़ बैठता था लेकिन मालूम नहीं था कि वे कितनों के दोस्त है , कि उनके भीतर कितनी बातें छिपी हैं। जैसे पहले फूल मिले, अब यह केंकड़ा।

बहरहाल, हम फिर आगे चले लेकिन इस बार--जैसे कि हम तथाकथित लोग जो जितना ही पढ-लिख जाते हैं उतना ही शंकाशील व असहिष्णु हो जाते हैं --मैं पूछ ही बैठा--''आप मुझे अपने दोस्त के पास ले जा रहे हैं।'' वे बोले , ''हाँ, आपको अपने दोस्त के पास ही ले जा रहा हूं।'' मैं बोला--''यहां कोई दिखता ही नहीं है।'' उन्होंने जवाब दिया--''आप चलिए।'' हम आगे चले। आगे चलते चलते जहां ढलान पूरा हुआ वहीं हमने अपने को रेत के एक विशाल-पट पर खड़े पाया। विस्मयविभोर मेरे दिल से निकला--ओह !

वहां एक बहुत बड़ा समुद्र-तट था। समुद्र था।
समुद्र की ओर हाथ करते हुए सांगाआता धीमे से बोले--''यह ही है मेरा दोस्त।''

जब समुद्र देखा, लगा कि इतने विशाल विश्वरंगमंच पर हम दो और वह समुद्र कितना अच्छा लग रहा है। गो कि वहां आकाश और विशाल पृथ्वी--समुद्र के रूप को जगाने व उभारने में यूं मदद कर रही थी मानो दो रूप मिलकर समुद्र के रूप को निखार रहे हो। क्षितिज क्या होता है , यह पता लगा।

बस इसी रीति से ही चित्र भी रूप लेता है।’’
यह तो बहुत बड़ी बात है सांगाआता। समुद्र आपका दोस्त है। ''
''कैसे ''--मेरे हिसाबी मन ने पूछा।

उन्होंने समुद्र के साथ अपनी दोस्ती की कहानी का विवरण देना शुरू किया और बताया कि वे इस समुद्र-तट पर हर रोज़ करीब पांच-सात मील घूमते हैं। पहले अभी वाली ढलान तक आते हैं फिर तट के बाजू पर घूमते हुए सिपोळियां जमा करते हैं--एक खास तरह की सिपोळियां जो दवाइयां बनाने में काम में ली जाती है--जिन्हें फिर वे अपने साफे को एक पोटली में बदल-बांध कर घर लाकर छांटते हैं और हाट-बाजार में दुकानदार को जाकर इन्हें बेचते हैं। सिपोळियां जमा करते हुए वे वहीं तट के ''खज़ाने'' से भी हर बार कुछ न कुछ चीज़ें अपने साथ ले आते थे--सुफेल , समुद्र-तट की वनस्पतियां, समुद्र द्वारा फेंका हुआ मछली पकड़ने के जाल का कोई टुकड़ा, भांति भांति के धागे सहित न जाने क्या क्या। उनकी पत्नी मज़ाक करते हुए कहती थी कि, ''तुम्हारे मरने पर ये चीज़ें तुम्हारी अर्थी से ही बांध देंगे।'' सांगाआता का कहना था--''समुद्र ही मुझे दे देना। यही मेरा दाता है , असली दोस्त है।''

इस प्रसंग का यद्यपि मेरे अपने चित्र-कर्म से सीधा सम्बन्ध नहीं है लेकिन फिर भी मेरे चित्त पर इसका गहरा असर है। यूं संसार के चित्रों में मैंने न जाने कितनी मनुष्याकृतियां देखी हैं। या जीवन में कोई पात्र या जापान की रेलगाड़ी में ग्रे सूट पहने लोग या मेक्सिको में हेटवाला मछली बेचता आदमी या वहां की नदियां और समुद्र याद आते हैं। साथ में रातड़ी का यह प्रसंग भी याद आता रहा है। लोक या प्रकृति की बात को बाजू में रखे तब भी यहां सांगाआता के प्रसंग ने मुझे गहरे तक आलोडित किया। उनके मुंह की झुर्रियां या बाल या रूपाकृति या शान्त समुद्र के मानस-पट में दबी हुई रचना ने शायद मेरी रचना में भी सहयोग दिया होगा। एक शांत , अफाट , अनन्त , लम्बी , जीवित पानी की रेखा और दूसरी ओर हिलता-चलता , अपने में डूबा लगता यह छोटा-सा महामानव ! मेरे चित्रकर्म का एक रूप-टुकड़ा हो सकता है ?

अपना यह संस्मरण मुझ लागणीवाले को बहुत आनन्द देता है और गहरी सिखावन भी।

शायद मम व ममेतर के सम्बन्धों का एक उदात्त रूपक भी है। मनुष्य या कलाकार के नाते से यह हमारे स्वधर्म का ही एक बहुत ज़रूरी विवरण बन जाता है कि हमें यह जानने-समझने का निरन्तर यत्न करते रहना है कि हम अपने चारों ओर के साथ किस तरह का सम्बन्ध बना रहे हैं। आप प्रकृति को ही लें। प्रकृति में एक छोटी सी चीज़ भी एक अपने रूप में वार्ता है जिसे हमें सुनना है। अपने सत्तर-अस्सी सालों के जीवन के बाद भी यह हमसे अनदेखी व अनसुनी रह जाती है। हमारा पोत पल पल की प्रक्रिया से बनता है। हममें से हरेक में सौन्दर्य की एक नैसर्गिक वृत्ति है। इसीलिए अपनी इन्द्रियों को धारधार रखना अपने में एक मानवधर्म है बल्कि मुझे हर वह व्यक्ति नसीबदार लगता है जो अपनी इन्द्रियों को लगातार जागरुक व पैना बनाये रखता है। हर रचनात्मक व्यक्ति को पहचानने की एक पैमाइश यह भी रखी जा सकती है कि वह भोंथरे को धारदार बनाने का काम कितनी दूर व कितनी गहराई तक जारी रख सका है। जीवन का प्रत्येक पल हमारा व्यक्तित्व बनाता है। हर क्षण अपना एक संस्कार लाता है और इन्हीं क्षणों के जोड़ से हमारा चरित्र बनता है। कला का भी।

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पूर्वरंग : हृषीकेश सुलभ

10:34 am
( हृषीकेश सुलभ पिछले बरस एक लंबे अन्तराल के बाद जब अपनी नाट्य-कृति ''बटोही'' लेकर आए थे तो हममें से शायद ही किसी को अंदाजा था कि वे इतनी जल्दी एक और कृति के साथ सामने होंगे। पर अब ऐसा लगता है कि उनके नाटककार ने एक नई करवट ली है और वे उत्तरोतर उन चरित्रों और युग-सन्दर्भों से अपनी कृतियों में गहरे जुड़ रहे हैं जिनसे हमारा संबंध यूँ तो अटूट होना चाहिए था पर अपनी अहंमन्यता और विस्मृति के आत्मघाती रवैये से हममें जुड़ाव का वह उत्कट बोध तक जाता रहा है। उत्तर सुलभ (!) का यह उद्यम उम्मीद है हममें वह बोध पुनर्जागृत करेगा। पूर्वरंग के तहत हम महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित उनके नाटक धरती आबा की उनके द्वारा लिखी गई पटभूमि से कुछ शब्द दे रहे हैं। प्रसन्नता है कि सबद के लिए उन्होंने आगामी दिनों में नाटक पर अपना स्तंभ लिखने का हमारा आग्रह भी स्वीकार कर लिया है। उनके इस योगदान से सबद और समृद्ध होगा। )

धरती आबा

हृषीकेश सुलभ

''लौटकर आऊंगा मैं, ...जल्द ही लौटूंगा मैं अपने जंगलों में, अपने पहाड़ों पर। ...मुंडा लोगों के बीच फिर आऊंगा मैं। ...तुम्हें मेरे कारण दुःख न सहना पड़े इसलिए माटी बदल रहा हूँ मैं। ...उलगुलान ख़त्म नहीं होगा। आदिम खून है हमारा। ...काले लोगों का खून है यह। भूख...लांछन...अपमान...दुःख...पीड़ा ने मिल-जुलकर बनाया है इस खून को। इसी खून से जली है उलगुलान की आग। यह आग कभी नहीं बुझेगी ...कभी नहीं। ....जल्दी ही लौटकर आऊंगा मैं''।

बिरसा मुंडा का यह संवाद नाटक ''धरती आबा'' का मुख्या कथ्य है। ''धरती आबा'' मुंडा जनजाति के नायक बिरसा मुंडा के जीवन-प्रसंगों पर आधारित है। छोटानागपुर के जंगलों में मुंडा, हो, उराँव, संथाल आदि जनजातियाँ युगों से निवास करती रही हैं। ये प्रकृति के सहचर रहे हैं। प्रकृति से इनके आत्मीय संबंध ने इनके जीवन-बोध को निश्छल मानवीय संवेदनाओं से पूरित किया है। अपनी परम्पराओं, विश्वासों, आस्थाओं और अपनी सहज-सरल जीवन-पद्धति के कारण इन्होंने धरती को माँ की तरह पूजा है और धरती की सम्पदा की रक्षा की है। इसके बावजूद इन्हें लगातार तथाकथित सभ्य समाज के प्रपंचों का शिकार होना पड़ा है। इस तथाकथित सभ्य समाज ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए इनके जीवन की निजता को नष्ट किया और इनकी सम्पदा को लूटा। देखते-देखते इन जनजातियों का जीवन संकटग्रस्त हो गया। बाहरी लोग, जिन्हें ये आज भी दिकू कहते हैं, मालिक और जमींदार बन बैठे। अंग्रेज आए और उन्होंने भी इन दिकुओं-जमींदारों-महाजनों के साथ मिलकर दमनचक्र को तेज किया। अंग्रेजों और देसी जमींदारों की दुरभिसंधियों ने जनजातियों को उनके जंगलों, उनकी धरती, उनके वनोपजों और उनके पशुधन से बेदखल कर दिया। इस अन्याय के विरुद्ध सिधु-कानू, तिलका मांझी और बिरसा मुंडा जैसे नायकों ने संघर्ष किया और अपनी जातीय चेतना, परम्परा, धरती और मनुष्य की गरिमा को स्थापित किया।

बिरसा का जीवन संघर्ष का पर्याय है। पहले वह अपने मिशन स्कूल में मुंडाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों का विरोध करता है और स्कूल छोड़ देता है। जंगल के निवासियों के जीवन के दुःख उसे लगातार परेशान करते हैं और वह मुंडाओं को नई जीवन-पद्धति तथा नई सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था की ओर ले जाता है। धीरे-धीरे वह मुंडाओं के भीतर गुलामी से लड़ने के लिए साहस और भूख पैदा करता है। पहले से चला आ रहा सरदार मुंडाओं का आंदोलन भी बिरसा के आंदोलन के साथ हो जाता है। धरती और जंगल पर अधिकार वापसी के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन विदेशी शासन से मुक्ति के संघर्ष में बदल जाता है। सूखा, अकाल, भूख, महामारी से जूझते हुए ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देनेवाले मुंडाओं के नायक बिरसा की मृत्यु जेल में होती है। तमाम सरकारी अभिलेखों में दर्ज़ तथ्यों पर आज भी जनता विश्वास नहीं करती। बिरसा की बीमारी से मृत्यु का झूठ और अस्वाभाविक मृत्यु का सच विश्वास की तरह आज भी कायम है।

''धरती आबा'' नाटक बिरसा मुंडा के वक्तित्व और उलगुलान आंदोलन के माध्यम से हमारे स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के कई ऐसे पन्नों को खोलता है, जिनमें समाज के अंतिम कतार में खड़े मनुष्य की चेतना शामिल है। यह नाटक बिरसा वह दावे जीवन संघर्षों पर केंद्रित है। बिरसा के संघर्ष भरे जीवन में मुंडाओं के लिए स्वप्न हैं। जनजातीय समाज के नायक बिरसा मुंडा पूरे भारतीय समाज के नायक के रूप में उभरते हैं और गुलामी के कठिन जीवन से मुक्ति के लिए आंदोलन आरम्भ करते हैं।
बिरसा मुंडाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों के कारण मिशन स्कूल ही नहीं छोड़ देते, बल्कि जनजातीय देवताओं और प्रचलित हिंदू देवताओं से संबंधित कर्मकांडों के प्रति अनास्था भी प्रकट करते हैं। वह धर्म के महत्व और स्वरुप की अपनी निजी व्याख्या करते हैं और एक ऐसे धर्म की स्थापना करते हैं, जहाँ भय नहीं विस्वास है और साथ ही नए स्वतंत्र जीवन की चाहत है। वह मुंडाओं को संगठित करते हैं और नई सामाजिक व्यवस्था तथा आज़ादी के लिए लड़ते हैं। पहली बार की गिरफ्तारी और जेल की सज़ा काट कर लौटने के बाद वह मुंडाओं को नए सिरे से संगठित कर आंदोलन करते हैं।

धानी जनजातीय संघर्षों का पारंपरिक सूत्र है और बिरसा की कथा को उसके मध्यम से मंच पर नाटकीय विस्तार दिया गया है। कर्मी बिरसा की माँ है, पर वह धरती का प्रतीक बन जाती है। प्रचलित कथाओं के अनुसार बिरसा ने स्वयं को भगवान घोषित किया और मुंडाओं के बीच समतामूलक नए धर्म की स्थापना भी की। उन्होंने अपने आंदोलन को उलगुलान नाम दिया। उनके इस आंदोलन ने अंग्रेजों की प्रभुता को चुनौती दी तथा गैर-बराबरी पर आधारित तत्कालीन समाज-व्यवस्था, न्याय-व्यवस्था और सरकार की जड़ें हिला दीं। इस लड़ाई में मिली पराजय और जेल में बिरसा की मौत के बाद भी उनके आंदोलन उलगुलान की आग सुलगती रही, जिसने बाद में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति दी। बिरसा के जन्म स्थान और तिथि के बारे में कई दावे हैं, पर यह तै है कि उनका जन्म उन्नीसवीं शती के आठवें दशक (सन्१८७२ से सन् १८७६ के बीच) में हुआ और ९ जून सन् १९०० को अल्पायु में जेल में उनकी मृत्यु हुई। भगवान और धरती के आबा (पिता) के रूप में उनका संघर्ष आज भी हमारे जीवन को प्रेरित करता है। बिरसा मुंडा का नायकत्व मनुष्य के मुक्ति-संघर्ष का धवल प्रतीक है। ''धरती आबा'' नाटक में तत्कालीन शासन और अंग्रेजों द्वारा बिरसा के सन्दर्भ में फैलाई तथा सरकारी अभलेखों में दर्ज़ की गई रूढ़ियों से परे जाकर भी बहुत कुछ रचने का प्रयास किया गया है।

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एक कवि एक कविता : 2 : कुंवर नारायण

9:36 pm
( एक कवि एक कविता शीर्षक स्तंभ की यह दूसरी प्रस्तुति है। यह स्तंभ युवा कवि यतीन्द्र मिश्र ने वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की कविता , ''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर'' पर टिप्पणी लिख कर शुरू की थी। इस बार उन्होंने वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की महत्वपूर्ण कविता,''अमीर खुसरो'' को टिप्पणी के लिए चुना है। हम पहले की तरह ही चयनित कविता भी साथ-साथ दे रहे हैं। हमें आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी। आप हमें कवि और कविता के चयन संबंधी सुझाव भी दे सकते हैं। अगली टिप्पणी श्रीकांत वर्मा की कविता ''कलिंग'' पर । )

इतिहास के धरातल पर कुछ नैतिक प्रश्न

यतीन्द्र मिश्र
इतिहास की सबसे गौरवशाली ख़ानकाहों में से निकलने वाली अप्रतिम आवाज़ों में एक आवाज़ अमीर खुसरो की भी है, जिसने कई शताब्दियों के बाद भी अपनी उपस्थिति का निर्मल आलोक बचाया हुआ है। यह रोशनी तब और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब कुँवर नारायण जैसा संवेदनशील एवं वैचारिक रूप से सजग कवि अमीर खुसरो को अपनी कविता के दायरे में शामिल करता है।

‘अमीर खुसरो’ जैसी रचना इस तथ्य को जानने जनता सन्दर्भ में एक पेचीदा पहल है कि हम मिथक और यथार्थ, संवेदना और इतिहासबोध तथा शिल्प और विचार की शर्तों पर किसी कविता को कितना समय निरपेक्ष बना पाते हैं। एक विशेष कालखण्ड में घटने के बावजूद इस कविता का कथानक यदि सार्वकालिक महत्त्व का बन पाया है, तो उसका सबसे सार्थक पहलू यही है कि यहाँ कवि, अमीर खुसरो की ऐतिहासिकता से नहीं, बल्कि उसमें मौजूद उन संवेदनात्मक अवधारणाओं से सीधे बावस्ता है, जो उसके व्यक्तित्त्व निर्माण की नियति तय करते हैं। यहाँ इतिहास एक प्लेटफार्म है, जिस पर कविता के आत्मदर्शन को खरादा गया है। कुछ-कुछ उसी तरह, जिस तरह एक कोरे कैनवास पर कोई चित्रकार अपने विचार और भावनाओं की ढेरों आत्मीय रेखाएँ और मार्मिक रंग उकेरता है। कविता में कुँवर जी जहाँ वैचारिकता के तटस्थ झरोखे से इसके कथानक एवं चरित्र को देखते हैं, वह उनका निहायत आजमाया हुआ क्षेत्र है, जिससे गुजरकर वह पहले भी ढेरों महत्त्वपूर्ण इतिहास कविताएँ लिखते रहे हैं। मसलन- इब्नेबतूता, सरहपा, अभिनवगुप्त, चन्द्रगुप्त मौर्य एवं आजकल कबीरदास जैसी अविस्मरणीय कविताएँ।

‘मानवीयता’, ‘नैतिक आग्रह’ एवं ‘संघर्ष की जिजीविषा’- ये कुछ प्रत्यय ऐसे हैं, जो कुँवर नारायण की कविता का ताना-बाना तय करते रहे हैं। साथ ही, हमें आसानी से उनकी बड़ी काव्य-यात्रा में जो निर्णायक सूत्र बराबर से मिलता रहा है, वह यही है कि भाषा, शिल्प, कला और विचार सभी के बीच में से निकलकर मनुष्य की निजता का भरा-पूरा मानवीय दायरा ही उनकी रचना का अभीष्ट बनता है। शायद इसी कारण वे खुसरो के साथ अपनी आत्मीय व वैचारिक गुफ्तगू में बड़ी आसानी से निज़ामुद्दीन औलिया, गोपाल नायक, देवलरानी एवं पद्मिनी को भी शरीक कर लेते हैं।

यह कविता संवाद की शक्ल में एक सूचना के साथ शुरू होती है और अपनी समाप्ति पर जिस विचारवान आकलन में तब्दील होती हुई नज़र आती है, वहाँ ढेरों छोटे-छोटे प्रश्नचिन्ह भी बिखरे मिलते हैं; जो इतिहास को चमत्कारिक ढंग से समकालीनता में विन्यस्त कर देते हैं। अमीर खुसरो में कुँवर जी उन्हीं बेधक प्रश्नचिन्हों के सहारे हमारे निजी सरोकारों पर ही नहीं, बल्कि अपनी महान् परम्परा पर भी उँगली उठाते हैं। जैसे- उस संगीत में दरअसल किसकी जीत हुई थी ? यह तुगलकनामा बस अब और आगे क्यों नहीं ? उन दिनों संगीत या कलाओं के बरक्स कैसे आतंक ही विजयी माना जाता था और एक कलाकार की किसी राजदरबार या सामंती व्यवस्था में या एक नृशंस समय में कितनी स्वायत्तता होती है ? ज़ाहिर है ऐसे प्रश्नों से लबरेज कुछ नैतिक सरोकारों को टटोलने के प्रयास में ‘अमीर खुसरो’ जैसी कविता असाधारण भावाभिव्यक्ति उत्पन्न करती है।

यह अलग बात है कि हम इतिहास और वर्तमान की संधिरेखा पर मिलते हुए भी अकसर जीवन की खुली आवाजाही को तरजीह नहीं देते, बल्कि विकृतियों और अन्तर्विरोधों से आँख चुराते हुए स्वयं की अस्मिता का निषेध करते रहते हैं। ऐसे ही मौकों पर बार-बार कुँवर जी की कविता कालजयी बनती है, जो हमें एक बार फिर से बताती है कि समय के शाही खेल तमाशों में संगीत, कलाएँ या उद्दात्त मानवीय सरोकार भी नहीं जीत पाते। हर युग में वह भी हारते हैं, भले ही वह काल को अतिक्रान्त करता हुआ अमीर खुसरो जैसे विवेकवान कलाकार का ऐतिहासिक समय ही क्यों न हो?

कुंवर नारायण की कविता

अमीर खुसरो

हाँ ग़यास, दिल्ली के इसी डगमगाते तख्त पर
एक नहीं ग्यारह बादशाहों को
बनते और उजड़ते देखा है ।
ऊब गया हूँ इस शाही खेल तमाशे से
यह 'तुगलकनामा' - बस, अब और नहीं।
बाकी ज़िन्दगी मुझे जीने दो
सुल्तानों के हुक्म की तरह नहीं
एक कवि के ख़यालात की तरह आज़ाद
एक पद्मिनी के सौंदर्य की तरह स्वाभिमानी
एक देवलरानी के प्यार की तरह मासूम
एक गोपालनायक के संगीत की तरह उस
और एक निज़ामुद्दीन औलिया की तरह पाक।

ग़यास एक स्वप्न देखता है, '' अब्बा जान
उस संगीत में तो आपकी जीत हुई थी ?''

''नहीं बेटा, हम दोनों हार गए थे।
दरबार जीता था।
मैंने बनाये थे जो कानून
उसमें सिर्फ़ मेरी ही जीत की गुंजाइश थी।
मैं ही जीतूँ
यह मेरी नहीं आलमपनाह की ख्वाहिश थी।''

खुसरो जानता है अपने दिल में
उस दिन भी सुल्तानी आतंक ही जीता था
अपनी महफिल में।
भूल जाना मेरे बच्चे कि खुसरो दरबारी था।
वह एक ख्वाब था -
जो कभी संगीत
कभी कविता
कभी भाषा
कभी दर्शन से बनता था
वह एक नृशंस युग की सबसे जटिल पहेली था
जिसे सात बादशाहों ने बूझने की कोशिश की !

खुसरो एक रहस्य था
जो एक गीत गुनगुनाते हुए
इतिहास की एक कठिन डगर से गुजर गया था।


( ''इन दिनों '' नामक कविता-संग्रह से साभार )
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सेवेंटीएमएम

11:39 pm
(विनोद अनुपम हिन्दी की मुख्यधारा की फिल्मों पर लंबे समय से आलोचनात्मक लेखन करते आ रहे हैं। उन्होंने उद्भावना के प्रसिद्ध फिल्म विशेषांक का संपादन भी किया है। विनोद उन गिने-चुने लोगों में से हैं जो हिन्दी फिल्मों के प्रति कटु होने के बावजूद जिम्मेदारी और लगाव से लिखते हैं। सबद के लिए उन्होंने फिल्मों पर सेवेंटीएमएम नामक स्तंभ लिखना स्वीकार कर एक बड़ी कमी पूरी की । गैरज़रूरी पर इन अवसरों साझा कर लेनेवाला तथ्य यह भी है कि उन्हें उनके लेखन के लिए वर्ष २००२ में सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है।

कवि संगत कविता के साथ स्तंभ की आरंभिक टिप्पणी की ओर कुछ लोगों का ध्यान गया। यह कविता के लिए शुभ है कि उसे लेकर बहसतलब बातें करने की ज़रूरत लोग अब भी महसूस करते हैं। यह प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। इससे बातें कुछ और साफ़ होंगी। हमने पहले ही कहा था, फिर इसरार करते हैं कि प्रकाशित रचनाओं पर वाद-विवाद-संवाद की गुंजाइश हम सदैव बरकरार रखेंगे। संयोगवश ही सही, विनोद का स्तंभ भी इसी ओर इशारा कर रहा है।)

निन्दक नियरे राखिए

विनोद अनुपम
सत्यजीत रे कहते थे, मैं सिनेमा अपने लिए बनाता हूं। बावजूद इसके सिनेमा पर जितना उन्होंने लिखा, शायद ही किसी भारतीय फिल्मकार ने लिखा हो। जाहिर है, उनका सिनेमा पर लिखना, कहीं न कहीं अपने सिनेमा के लिए दर्शक तैयार करने की कोशिश थी। कुछ वैसी ही कोशिश जो अपने शुरूआती दौर में निराला को करनी पड़ी थी। रामाविलास शर्मा, रामविलास शर्मा नहीं हो पाते यदि निराला के इस दर्द का अहसास उन्हें नहीं हो पाता कि एक कवि आखिर क्यों कर छद्म नाम से अपनी ही आलोचना लिखने को बाध्य हो रहा है। निराला को पता था, कविताएं लाख समृद्ध क्यों न हों , लेकिन जब तक आलोचकीय दृष्टि से उसकी व्याख्या न हो जाए , लोकप्रिय भले हो सकती हैं, प्रतिष्ठित नहीं।

यह एक भोला भ्रम है कि आलोचना कृति को खारिज ही करती है। बहुत कुछ यह आलोचना के नाम पर राग-द्वेष से प्रेरित लेखन की उपज है जिसमें कृति का वास्तविक गुण ओझल हो जाता है। दरअसल आलोचना कृति को सहज-संप्रेष्य बनाती है। ऐसा सत्यजीत रे भी मानते थे, दादा साहब फाल्के भी। आलोचना के महत्व के प्रति सजग दादा साहब फाल्के एक ओर भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ की तैयारी में लगे थे, तो दूसरी ओर सिनेमा पर लगातार लेखन भी कर रहे थे। हिन्दी सिनेमा के परवर्ती फिल्मकारों ने फिल्म-निर्माण तो उनसे सीखा, लेकिन अपनी कला विधा के प्रति चिन्ता करना नहीं सीखा। दादा साहब फाल्के के बाद यह प्रवृत्ति ढलान पर उतरती चली गई। बाद के फिल्मकारों के लिए सिनेमा से ज्यादा महत्वपूर्ण सिनेमा के जरिए होनेवाली आय हो गई। महबूब खान से लेकर गुरूदत्त तक और फिर सुभाष घई-करण जौहर तक, फिल्में लगातार बनती रहीं। सैंकड़ों अच्छी और गंभीर फिल्में बनीं, लेकिन किसी फिल्मकार ने यह चिन्ता नहीं की कि उसकी फिल्म को कोई जानने की कोशिश भी करे। उसे एक कलाकृति की तरह देखे-पढ़े-समझे। किसी फिल्मकार ने अपनी फिल्मों को लेकर दर्शकों से संवाद स्थापित करने की ख़ुद तो कोशिश नहीं ही की, संवाद के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी नहीं किया।

यह
कहने में कतई संकोच नहीं किया जा सकता कि हिन्दी सिनेमा के पास आलोचक नहीं है। हिन्दी सिनेमा आज जिन्हें अपने आलोचक के तौर पर स्थापित कर रही है, वे मूलतः पत्रकार हैं, जो देय तथ्यों पर रपट बनाते हैं। असल में, आलोचक की जरूरत उस विधा को होती है जिसका विकास गुणात्मक रूप से होता है। हिन्दी सिनेमा की यह त्रासदी रही कि वह इसके प्रति कभी चिंतित-सजग नहीं रही। उसके लिए अनिवार्य बाजार का विकास रहा और इसके लिए जरूरत पत्रकारों की थी। आश्चर्य नहीं कि नेत्रसिंह रावत, कुंवर नारायण, विष्णु खरे, प्रभु नाथ सिंह आजमी जैसे आलोचक हाशिए पर चले गए। हिन्दी सिनेमा को फर्क नहीं पड़ता था कि उसके दर्शक उसे कितनी गंभीरता से लेते हैं। उसके लिए इतना काफी था कि वे उसे पैसे दे जाते हैं।

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कवि की संगत कविता के साथ : चंद्रकांत देवताले

4:00 am
( अपनी कविता में एक जगह चंद्रकांत देवताले ने कहा है,'' आग हर चीज़ में बताई गई थी / पानी-पत्थर-अन्न / और घोड़ों तक में / अग्नि का वास बताया गया था / मनुष्यों में तो आग होती ही और होनी ही थी / पर आज आग का पता नहीं चल रहा है / जीवित आत्माएं बुझी हुई राख या भूसे की तरह नाटक देख रही हैं ''। उनके भीतर की आग और गुस्सा ७३ की वय में भी कमा-थमा नहीं है। उन्होंने इधर फिर दुहराया है,''मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा / कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा / और मैंने उन लोगों पर यकीन नहीं किया / जो घृणित युद्ध में शामिल हैं / और सुभाषितों से रौंद रहे हैं / अजन्मी और नन्हीं खुशियों को''। यूं तो हिन्दी की गुस्सैल कविता और बड़े बोल बोलने वाले कवियों की एक लम्बी लिस्ट बनाई जा सकती है, पर देवताले और उनकी कविता इन सबसे इसलिए भिन्न है क्योंकि वहाँ यह गुस्सा अनर्जित या बलात, किसी नाटकीय मुद्रा के बतौर नहीं आया है। दूसरी बात यह कि अकविता के प्रभाव में लेखन की शुरुआत करने के बावजूद उनकी कविताओं का भूगोल क्रमशः विस्तृत होता गया है और वह वहाँ तक पहुँच सकी है जहाँ तकलीफ/ गुस्से को एक सार्थक काव्य मर्म मिलता है। परिवार और प्रेम के परिसर में उसकी उपस्थिति, ''माँ पर नहीं लिख सकता कविता'' या ''स्त्री के साथ'' जैसी क्लैसिक कविता के रूप में दर्ज है। उनके पास आग के बारे में अभी कुछ और कहने को है। यह हमने तब जाना जब सबद के लिए उनसे नई कविताओं के साथ आत्मकथ्य भी लिख भेजने का आग्रह किया। हमें प्रसन्नता है कि उन्होंने नए माध्यम के पाठकों का सम्मान करते हुए हमारे लिए यह लिखना-भेजना मंज़ूर किया। हम कवि की संगत कविता के साथ नामक यह स्तंभ उन्हीं की रचनाओं से शुरू कर रहे हैं। )

आत्मकथ्य

एक लम्बी चीख की तरह...

यहाँ डाकुओं के मरणोत्तर स्मारक /हत्यारों के जीते जी अभिनंदन /पाखण्ड का रंगीन उत्सव /और भूख बेबसी के बारे में / धूर्त चेहरों के बेशर्म उदगार /...फिर भी यहाँ बुद्धिजीवी खोपडियों में /अक्सर चलती धुंधली अटकलबाज़ियाँ /कला की खोपड़ी में तैरती ठंडी आज़ादी /कि पता नहीं कैसी गूंगी परछाइयाँ /डरते-घबराते-शरमाते हैं /चीख से - चीखने से - चीखते रहने से / शायद आड़े आ जाती है /बटन टूट जाने के भय की भद्रता....
लगभग दो दशक पूर्व लिखी कविता,''गुंटर ग्रास को पत्र'' की ये पंक्तियाँ आज देश-दुर्दशा की और भयावह स्थितियों में धंस गई हैं। करोड़ों लोगों की तकलीफ और धरती के घावों से विमुख होकर कोई भी संवेदनशील कवि भाषा के ज़खीरे में हाथ नहीं डाल सकता। मुल्कव्यापी अन्याय - पाखण्ड, झूठ और फरेबों भरा सत्ता पर काबिजों का आचरण इस समय के लेखक की सबसे बड़ी चिंता होगी। जनता को इस तरह गुमराह किया जा रहा है दसों दिशाओं से कि लगता है यह जनता विहीन जनतंत्र है। आतंक बाहर-भीतर और इतनी असुरक्षा-दहशतगर्दी। प्रतिरोध और मुकाबला करने के लिए राजनीति और विश्व-पूँजी के बाज़ार में मुश्किल से जगह। रफ़्तार में साँस भर वक्त और भाषा भी निढाल होती हुई। चुनौती भरा बुलडोज़र समय। जो देवतुल्य आकाशगंगावासी होंगे, वे ही कहेंगे इसे अखबारी यथार्थ। अब लेखक-कवि उस जगह हैं तो भीतर तक देखते हैं। अपनी-अपनी बेचैनी और अनुभव-भाषा सम्पदा के बूते उनकी आवाज़ सिर उठाती है। निजी और सार्वजनिक में फांक नहीं बचती।

जब सौ जासूस मरते होंगे, एक कवि पैदा होता है। मेरे जैसे के भीतर तो कविता का कारखाना कभी बंद नहीं होता। न अवकाश, न हड़ताल। मैं पूरे वक्त का कवि हूँ। संकोची इसे बड़बोलापन समझेंगे तो मुझे कोई आपत्ति न होगी। इसका यह मतलब नहीं है कि कविताओं का ढेर लगता हूँ। उत्पाद वाला कारखाना नहीं यह। कविताएं बेहद उधेड़बुन और हड़बड़ी में आती हैं। कविता लिखते हुए मैं घिरा हुआ महसूस करता हूँ। उस मुसाफिर कि तरह जो यादों, सपनों और अपने यथार्थ के ज़ख्मों का असबाब लिए प्लैटफॉर्म छोड़ चुकी ट्रेन पकड़ने दौड़ता है और जैसे-तैसे सवार हो जाता है।

सबकुछ को बार-बार कहना, जबकि उजागर है वह चिथड़ा-चिथड़ा होकर चमकते हुए इस महोत्सव में, अजीब लगता है। जैसे अपने जीवनानुभवों की नदी को कविता की नाव में लाद कर ले जाना कठिन है, वैसे ही है यह। पर यह भी लेखक की नियति है। निस्सहाय गवाही देते ख़ुद को भी गुनाहगार की तरह देखता हूँ। सुनता हूँ अपने को उत्सवों-गुणगान-कीर्तन के बोगदे में एक लम्बी चीख की तरह...

दो कविताएं

आग

पैदा हुआ जिस आग से
खा जाएगी एक दिन वही मुझको
आग का स्वाद ही तो
कविता, प्रेम, जीवन-संघर्ष समूचा
और मृत्यु का प्रवेश द्वार भी जिस पर लिखा -
''मना है रोते हुए प्रवेश करना''

मैं एक साथ चाकू और फूल आग का
आग की रौशनी और गंध में
चमकता-महकता- विहँसता हुआ

याद हैं मुझे कई पुरखे हमारे
जो ताज़िन्दगी बन कर रहे
सुलगती उम्मीदों के प्रवक्ता
मौजूद हैं वे आज भी
कविताओं के थपेड़ों में
आग के स्मारकों की तरह

इन पर लुढ़कता लपटों का पसीना
फेंकता रहता है सवालों की चिंगारियाँ
ज़िन्दा लोगों की तरफ़

तुम्हारी आँखें

ज्वार से लबालब समुद्र जैसी तुम्हारी आँखें
मुझे देख रही हैं
और जैसे झील में टपकती है ओस की बूँदें
तुम्हारे चेहरे की परछाई मुझमें प्रतिक्षण

और यह सिलसिला थमता ही नहीं

न तो दिन खत्म होता है न रात
होंठों पर चमकती रहती है बिजली
पर बारिश शुरू नहीं होती

मेरी नींद में सूर्य - चंद्रमा जैसी परिक्रमा करती
तुम्हारी आँखें
मेरी देह को कभी कन्दरा, कभी तहखाना, कभी संग्रहालय
तो कभी धूप-चाँदनी की हवाओं में उड़ती
पारदर्शी नाव बना देती है

मेरे सपने पहले उतरते हैं तुम्हारी आंखों में
और मैं अपने होने की असह्यता से दबा
उन्हें देख पाता हूँ जागने के बाद

मरुथल के कानों में नदियाँ फुसफुसाती हैं
और समुद्र के थपेड़ों में
झाग हो जाती है मरुथल की आत्मा

पृथ्वी के उस तरफ़ से एकटक देखती तुम्हारी आँखें
मेरे साथ कुछ ऐसे ही करिश्मे करती हैं
कभी-कभी चमकती हैं तलवार की तरह मेरे भीतर
और मेरी यादाश्त के सफों में दबे असंख्य मोरपंख
उदास हवाओं के सन्नाटे में
फडफडाते परिंदों की तरह छा जाते हैं
उस आसमान पर जो सिर्फ़ मेरा है

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कोठार से बीज : शमशेर

3:42 am
( इस स्तंभ के तहत हम उन रचनाओं/रचना-अंशों का प्रकाशन करेंगे जिनका बदलते युग संदर्भों में भी एक विशेष महत्व है। इसमें कोई भाषिक बंधन नहीं है। कोशिश हिन्दी और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं से लेकर सृजन की हर भाषा और विधा का यत्किंचित मूल्यवान सामने लाने की है। इसी कड़ी में पेश है हिन्दी के विलक्षण कवि शमशेर बहादुर सिंह की डायरियों के कुछ टुकड़े। इन टुकड़ों को उन्हीं की डायरीनुमा क्लैसिक कविता,''टूटी हुई बिखरी हुई'' नाम दिया है। इन्हें कई बरस पहले संभावना प्रकाशन ने, शमशेर के विरल संगतकार मलयज के संपादन में उनकी अन्य गद्य रचनाओं के साथ ही छापा था। )

टूटी हुई, बिखरी हुई

मेरे कमरे पर, इसकी चटाई और दीवारों और अख़बारों और कागज़ों और धूप और सायों पर जो एक मनहूस-सी दुखी रूह खामोश अपराधी की तरह बैठ गई थी...उसका चेहरा खिल कर सुबह के फूलों की तरह खालिस पवित्र खुशी से मुस्करा उठा और हर चीज - दीवार पर धूप और साए की नक्काशियाँ और किताबों और अख़बारों के ज़िन्दा बारीक इशारे और चटाई की बुनावट के तह-ब-तह खाने और मेरी जेबें और मेरे पायजामें और रूमाल और तह्बंद सब मिलकर एक बहुत पवित्र हलकी-फुलकी मुबारकबाद-सी मुझे देने लगे। मुझे यकीन हो गया कि मोहब्बत का जज़्बा हमेशा एक बहुत पाक हस्ती अपनी जगह पर है, और जिस सीने में वह जोरों से धड़कने लगता है, उसको आपसे-आप एक नई ज़िन्दगी बख्शता है।

आर्टिस्ट बच्चा ही होता है। यही उसकी कॉमेडी और यही उसकी ट्रेजडी है।


बादल गरजा, मुँह पर तौलिया या रूमाल रख कर ; ताकि लोगों को बुरा न मालूम हो।
शरीफ़ बादल। बारिश ने ज़ोर ज़रा-सा - बस, ज़रा - और बढ़ा दिया। जैसे भाषण देने वाला एक खास पॉइंट पर पहुँच कर मौज में आकर करता है। जैसे बारिश ने अच्छी-सी चाय पी ली हो और अब देर तक जागने के लिए तैयार हो।

शाम सेंदुर या गेरू या टेसू के रंग से धुली हुई शाम यानि शाम के बादल। बादलों का एक लंबा ढाल। हलकी ढलुवां हंसती हुई पहाड़ी - और हँसता हुआ खुश-खुश कुछ गहरा-सा ऊदा नीला आसमान।

नभ की सीपी जो रात्रि की कालिमा में पड़ी थी, धीरे-धीरे ऊषा की कोमल लहरों में धुलती और निखरती जा रही है।

तसवीर अपनी ग़लत तो नहीं। शायद कि ग़लत है। मैं कोई बेहद शरीफ़, बेहद सच्चा, अच्छा इन्सान तो नहीं। न ईश्वर को ही उस तौर से मानता हूँ , मगर मध्यम वर्ग का ईश्वर मेरा भी है, भारत के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी का ईश्वर : वही शायद कहीं मेरी-तुम्हारी सीमाएं करीबतरीन करता है। अगर्चे वह एक खामोशी, एक प्रार्थना का सुकून है जो चुपचाप मुझे वहाँ बाँध-सा देता है। अगर्चे कोई चीज़ बज़ाहिर मुझे बांधती नहीं : सिवाय शायद कला की सच्चाई के। ज़िंदगी को मैं शायद उसी के सहारे, उसी की परतों में टटोलता, समझता, झेलता चला आ रहा हूँ। ज्यों-त्यों। बहरकैफ़।

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रिल्के पर एक बढ़त : गिरिराज किराडू

11:40 am
( कुछ दिनों पहले सबद में जर्मन कवि राइनर मारिया रिल्के पर राजी सेठ का लेख छपा था। इस प्रकाशन से युवा कवि और प्रतिलिपि के सम्पादक गिरिराज किराडू को रिल्के पर लिखी अपनी एक रचना की याद हो आई और उन्होंने तत्परता से उसे प्रकाशन के लिए हमें भेज दिया। सबद उनका स्वागत करता है। रचनाओं का ऐसा सखा पाठ बहुत महत्वपूर्ण है। लेखकों की इस पहल का हम खुले मन से स्वागत करेंगे। )

रिल्के का कृति जीवन - विलाप एक मित्र के लिए

गिरिराज किराडू*

और ठीक इसी छवि में मैंने तुम्हे पाया है सदैव--आईने के भीतर,
बहुत भीतर जहाँ तुम स्वयं को रखती हो--इस संसार से दूर, बहुत दूर

फ़िर क्यूं आई हो ऐसे अपने आप को मिथ्या करते हुए,
फ़िर क्यूं मुझे विश्वास दिलाना चाहती हो कि
जो पंख तुमने पहने थे अपनी आत्मछवि में उनमें वो थकान थी
जो नहीं हो सकती अपने आईने के शांत, मंद्र आकाश में ?

फ़िर क्यूं ऐसे खड़ी हो कि अपशकुन मंडराता दिखे मुझे तुम्हारे सिर पे,
फ़िर क्यूं अपनी आत्मा के अक्षरों को ऐसे पढ़ रही हो जैसे कोई पढ़ रहा हो हाथ की रेखाओं को
यूँ कि मैं भी न पढ़ पाऊँ उन्हें तुम्हारी नियति के सिवा किसी और तरह से ?

और इससे भयभीत न रहो कि मैं अब समझता हूँ इसे--तुम्हारी नियति को,
यह मुझमें व्याप रही है; कोशिश कर रहा हूँ इसे जकड़ने की,
मुझे जकड़ना ही होगा इसे चाहे मैं मर जाऊं अपने ही पाश में,
जैसे कोई नेत्रहीन महसूस करता है वस्तुओं को वैसे महसूस करता हूँ तुम्हारी नियति,
भले इसे कोई नाम नहीं दे पा रहा मैं

आओ विलाप करें इसका कि किसी ने खींच लिया है तुम्हे तुम्हारे आईने की गहराइयों से,
बाहर आओ विलाप करें एक साथ ....एक साथ...पर क्या तुम रो सकती हो अब भी?

नहीं मैं देख सकता हूँ--तुम नहीं रो सकती, अब तुमने अपने आँसुओं के सत को बदल लिया है
इस उदास, घूरती , भरी पूरी नज़र में; नहीं, तुम नहीं रो सकती अब

आओ विलाप करें--एक साथ, मिल कर

क्या तुम जानती हो कैसे अनमने ढंग से, अनिच्छा से लौटा तुम्हारा रक्त तुम्हारे भीतर
अपने अतुल प्रवाह से बिछडकर जब तुमने पुकारा उसे लौटने के लिए?

कितना शंकित था वह--तुम्हारा रक्त--फ़िर से संकरे गलियारों में लौटते हुए,
कैसी हैरानी, कैसे अविश्वास से लौटता हुआ भीतर, अपने घर और वहीं पूरा हो गया

पर तुमने धकेला उसे फ़िर से आगे की तरफ़, घसीटा उसे--अपने रक्त को, वेदी की ओर
जैसे घसीटता कोई कातर पशु को बलि के लिए

यही चाहती थी तुम तुम्हे खुशी चाहिए थी--किसी भी तरह, यह सब करके भी

और अंततः तुमने उसे बाध्य कर ही लिया--अपने रक्त को, और वह भी प्रसन्न हो गया,
दौड़ने लगा और समर्पण कर दिया तुम्हारे सम्मुख

* मैंने २००५ की गर्मियों में, 'उन गर्मियों में' इसे लिखा था। अंशतः यह अनुवाद है, अंशतः प्रेरणा,
अंशतः सह अनुभूति की उस कविता के साथ जिस पर यह आलम्बित है।

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अनकहा कुछ : शेक्सपियर

12:37 am
( वादे के मुताबिक हम अपना दूसरा स्तम्भ शुरू कर रहे हैं। इसे युवा कहानीकार प्रभात रंजन ने हमारे आग्रह पर लिखना स्वीकार किया है। अनकहा कुछ नामक यह स्तम्भ उन अप्रतिम रचनाकारों पर एकाग्र है जिनके लेखन के अलावा जीवन में भी हमारी गहरी और असमाप्य दिलचस्पी रही है। इसके लिए हमें इन लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकों, आत्मकथा, डायरी, पत्र, संस्मरण और इनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर उपलब्ध सुशोधित पुस्तकों को प्रमाणिक आधार बनाना उपयुक्त लगा ताकि बातें वस्तुनिष्ठ हों और लेखन महत्व का बने। आगे तो आप ही तय करेंगे कि हम अपने प्रयासों में कितने सफल रहे। यह जरूर है कि शुरू करने के लिए हमें शेक्सपियर से बेहतर कोई दूसरा लेखक न मिला। )

शेक्सपियर के इर्द-गिर्द

प्रभात रंजन

बोर्खेज कि एक कहानी है जिसमें मृत्यु के बाद शेक्सपियर से जब यह पूछा जाता है कि तुम कौन हो, तो जवाब में शेक्सपियर कहते हैं कि इसी प्रश्न का उत्तर जानने का प्रयत्न तो मैं जीवन भर करता रहा। मेकबेथ, जुलियस सीजर, हैमलेट जैसे अनेक पात्र गढ़ता रहा। इसके बावजूद मैं जीवन भर यह नहीं समझ पाया कि मैं कौन हूँ। विलियम शेक्सपियर सचमुच अंग्रेजी के ऐसे लेखक हैं जिनके जीवन और कृतित्व को समझने के जितने प्रयास आज भी हो रहे हैं, उतने शायद ही किसी अन्य लेखक को लेकर किए गए हों। शेक्सपियर क्वार्टरली जर्नल के मुताबिक हर वर्ष पुस्तकों, लेखों और शोध निबंधों की शक्ल में शेक्सपियर से संबंधित चार हजार महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाश में आती हैं।

क्रम में इधर छ्प कर आई अमेरिकी-ब्रिटिश लेखक बिल ब्रायसन की पुस्तक शेक्सपियर: द वर्ल्ड एज स्टेज में शेक्सपियर के जीवन, उनके कृतित्व से जुड़े तथ्यों और उनके बारे में फैले तमाम भ्रमों की रोचक प्रस्तुति एक महत्व का प्रकाशन है। लेखक ने पुस्तक के पहले अध्याय में ही पाठक के मन में उठनेवाले इस सहज प्रश्न का उत्तर दे दिया है कि शेक्सपियर पर उपलब्ध प्रचुर सामग्री के बावजूद वह यह पुस्तक क्यों लिख रहा है। ब्रायसन का उद्देश्य महज इतना है कि इन प्रचुर सामग्रियों के आधार पर मिथक में तब्दील होते जा रहे इस लेखक की बिलाखिर छवि कैसी बनती है ।

बहुत कुछ मध्यकालीन संत-कविओं की तरह लगभग दस लाख शब्दों का साहित्य पीछे छोड़ने वाले अंग्रेजी के इस महानतम नाटककार विलियम शेक्सपियर के जीवन और लेखन से संबंधित प्रमाणिक साक्ष्य कम ही मौजूद हैं। ब्रायसन की मानें तो लंदन में बसने और मशहूर नाटककार होने से पूर्व उनके जीवन के बारे में इतिहास में केवल चार प्रमाणिक साक्ष्य मिलते हैं - बचपन में हुए बपतिस्मा के अलावा विवाह और दो बच्चों के जन्म इसका भी कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं मिलता कि वे देखने में कैसे लगते थे। इसी कारण समय-समय पर यह प्रमाणित किए जाने के प्रयास भी किए जाते रहे कि विलियम शेक्सपियर के नाम से इंग्लैंड के स्ट्रेटफोर्ड कसबे के जिस व्यक्ति को जाना जाता रहा है, वह वास्तव में उन महान नाटकों का रचयिता था ही नहीं।

हाल ही में एक शोध सामने आया है जिसके अनुसार शेक्सपियर के छद्म नाम से एक यहूदी महिला गुप्त रूप से लिखती थी। उसके छद्म नाम से लिखने का कारण यह था कि एलिजाबेथकालीन लंदन में कोई महिला अपने नाम से रचना प्रकाशित नहीं करवा सकती थी। ब्रायसन की पुस्तक इस तथ्य को भी सामने लाती है कि ऐसा माननेवालों की एक लम्बी परम्परा रही है कि विलियम शेक्सपियर के नाम से प्रचलित नाटक वास्तव में उन्होंने नहीं किसी और ने लिखे हैं। सिर्फ़ इस बात को सिद्ध करने के लिए अब तक पाँचेक हजार पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं।

इस तरह के विवादों कि शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हुई। सबसे पहले यह कहा गया कि इन नाटकों के असल लेखक फ्रांसिस बेकन थे। अनेक विद्वानों का यह मानना था कि शेक्सपियर की रचनाओं में कुछ गुप्त कोड छिपे हैं जिनके माध्यम से उसके वास्तविक लेखक का पता लगया जा सकता है। लेकिन जैसा कि शेक्सपियर के विद्वान जोनाथन बेट ने लिखा है कि न तो शेक्सपियर के जीवन काल में, न ही उसकी मृत्यु के करीब दो सौ साल बाद तक किसी ने उसकी लेखकीयता पर प्रश्नचिह्न लगाया।

शेक्सपियर का जीवन ही नहीं, उनके नाटकों को भी ब्रायसन ने उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर परखने का प्रयास किया है। शेक्सपियर को भले अंग्रेजी भाषा की महान प्रतिभाओं में गिना जाता हो, पर अंग्रेजी में इस विषय पर पर्याप्त शोध हुए हैं कि उनकी भाषा कितनी त्रुटिपूर्ण थी। यह भी कहा जाता है कि अपने नाटकों के लिए उन्होंने पहले से प्रचलित कथाओं को ही आधार बनया। ब्रायसन ने उनके नाटकों से जुड़े कथा-संदर्भों की ओर इशारा करते हुए यह बताया है कि अ मिडसमरनाइट्स ड्रीम, लव्स लेबर इज लॉस्ट, द टेमपेस्ट जैसी कुछ कॉमेडी ही उनकी मौलिक रचनाएँ कही जा सकती हैं।

बातें हजार हैं, पर सचाई यह है कि एक महान लेखक किसी स्थानीय कथा को विराट संदर्भों से जोड़ कर उसे एक अविस्मरणीय कृति में बदल देता है। अंग्रेजी भाषा में शेक्सपियर ने यही काम किया। उनकी भाषा के भ्रष्ट होने के सम्बन्ध में चाहे कितने प्रमाण पेश किए जाएं, यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने अंग्रेजी को दो हजार से अधिक शब्दों और सैंकडों मुहावरों का अनुपम उपहार दिया। जब तक मनुष्य जीवन है, उसमें त्रासदी और कॉमेडी की गुंजाइश है, तब तक मिथ में बदलते रहने के बावजूद हम शेक्सपियर का अपने इर्द-गिर्द होना महसूस करते रहेंगे।

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एक कवि : एक कविता : केदारनाथ सिंह

3:42 pm
( जब सबद की शुरूआत हुई थी तब इस स्नेह-सौजन्य की कल्पना तक मन में न थी जो इतने कम दिनों में इसे मिल रहा है। इसके दो बहुत साफ कारण थे। पहला और प्रमुख तो यही कि इस माध्यम से किसी न किसी प्रकार से जुड़ा हुआ और इससे अपना बहुतेरे कामकाज निपटाने वाला पाठक-वर्ग भी इसे अपने लिए गंभीर पाठ्य-सामग्री, जैसा उसे पत्रिकाएं आदि मुहैया कराती रही हैं, उपलब्ध कराने वाला स्रोत नहीं मानता। दूसरे, हिन्दी में जो-कुछ ब्लॉग के नाम पर परोसा जा रहा है और उसकी वजह से जैसी इसकी छवि लोगों के मन में बन गई है, उससे अच्छी तरह वाकिफ होने के बाद भी यहाँ ऐसा कुछ शुरू करना निरा जोखिम का काम था। स्वीकार करना चाहता हूँ कि यह सुविचारित था। परवाह बस इस बात की थी कि हमारे समय में शब्द-कर्म में संलग्न लेखकों का सहयोग सबद को प्राप्त हो सकेगा अन्यथा नहीं। पर अब जब हर तरफ से आश्वासन और सहयोग मिल रहा है तो सिवाय उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार कर आगे बढ़ने के अलावा मेरी कोई भूमिका यहाँ नहीं है। मुझमें यह अहसास गहरा गया है कि सबद निरंतर रहेगा.....आज इसमें एक महत्वपूर्ण योग युवा कवि-लेखक यतींद्र मिश्र करने जा रहे हैं। यह उन्हीं का सुझाव था कि बात कविता के बहाने की जाए। तय हुआ कि किसी एक महत्वपूर्ण कवि की एक कविता को, जिसमें उसका आत्यांतिक काव्य-गुण भी प्रकट हो, इसका आधार बनाया जाए। प्रसन्नता है कि एक कवि एक कविता नामक यह स्तम्भ हिन्दी के अत्यन्त महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह की कविता बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर से शुरू हो रहा है। पाठकों की सुविधा के लिए कविता साथ-साथ दी जा रही है। )

देश-देशांतर के रिश्तों को बचाने की जद्दोजहद

यतींद्र मिश्र

वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह की एक मार्मिक व प्रासंगिक कविता है,''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर''। आज के निहायत क्रूर व अराजक समय में सिर्फ़ कविता ही हमारा ऐसा अर्जित प्रदेश बचती है, जिसके भूगोल में जाकर हम समय, समाज, देश एवं आपसी रिश्तों के संवेदनात्मक सूत्रों की रेशा-रेशा पड़ताल कर सकते हैं। केदार जी इस कविता की अंतर्वस्तु को इतनी सहज निर्लिप्तता के साथ रेखांकित करते हैं कि कविता जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वह मर्मस्पर्शिता का उत्कर्ष प्राप्त करने के साथ ही प्रश्नों और जिज्ञासाओं की असंख्य टिमटिमाती उर्मिओं में बदल जाती है।
इस कविता में, जब कवि कहता है,''यहाँ हममें से हरेक थोड़ा-थोड़ा हिंद और थोड़ा-थोड़ा पाक'', तब कविता की अर्थछवियाँ एकाएक न सिर्फ़ प्रकाशित हो उठती हैं, बल्कि हमारी सुखद स्मृतियों के शांत ताल में अचानक हरारत पैदा कर देती हैं। बर्लिन की टूटी दीवार के बहाने इस कविता की महफिल में ढेरों ऐसे रूपक मौजूद हैं, जो मनुष्य और उसके आत्मीय दायरे के बारे में अपनी उपस्थिति को और भी अधिक भावप्रवण बनाते हैं। मसलन - एक पागल स्त्री का दीवार के पास लगातार चक्कर लगना, अहमद फ़राज़ के ताज़ा ग़ज़ल में डूबी हुई पुरनम शाम और पूरे उपमहाद्वीप में सन्नाटे और चीख के बीच किसी ग़ज़ल के एक भूले हुए मिसरे का इंतज़ार।

केदारनाथ
सिंह आदमी व उसके देश-देशांतर के साथ बननेवाले हार्दिक दायरे का वृत्त खींचते हुए इस प्रश्न के पास पहुँचते हैं कि आख़िर यह दीवार कब टूटेगी ? उस समय सहसा ये सारे बिम्ब व रूपक अपनी-अपनी काव्य पंक्तियों में रहकर एक लम्बी कराह में तब्दील होते हुए नज़र आते हैं, जिससे यही अर्थध्वनि निकलती है कि हम अपने देश से बाहर रहते हुए, पड़ोसी मुल्क के लोगों के साथ अपनापे से बतियाते हुए भी कहीं न कहीं कुछ ऐसा गँवा देते हैं , जो आसानी से फिर उस यात्रा में हमारा रहगुजर नहीं बन पाता। फिर वह घास पर पड़ा हुआ होंठों से अचानक फिसलकर गिरा चुम्बन हो या एक पागल स्त्री की असंभव पुकार, जहाँ यह पहले से ही तय है कि समय ने उसकी आत्मा में कोई कील ठोंक दी है।

दरअसल
, इस कविता में अहमद फ़राज़ अपनी ही जिस ग़ज़ल का मिसरा भूल रहे होते हैं, वह एक निर्मम चेतावनी है कि हम कहीं न कहीं स्वयं को भूल रहे हैं। अपने अन्दर की उस सहज पुकार को भूल रहे हैं, जो अगर निकल पाती तो शायद हमारे बीच इतनी दूरियां न होतीं। तब शायद वह बर्लिन की दीवार भी न होती। अहमद फ़राज़ के बरक्स अगर यहाँ कबीर या ग़ालिब होते, तो उस पागल औरत के विलाप का सुर भी उतना ही अंतहीन होता, जितना वह फ़राज़ के समय में है।

''बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर'' एक प्रश्न करती हुई कविता है। यह दुःख के रसायन को थोड़ा और संघनित करते हुए एक ऐसी मार्मिक कविता का रूप अख्तियार करती है, जो आपसी रिश्तों के सामंजस्य को बड़े फलक पर विमर्श का हिस्सा बनाती है। केदारनाथ सिंह इस उपक्रम में उतने ही सफल साबित हुए हैं, जितना कि इस कविता की तमाम वे सारी चीजें, जो साथ-साथ रहते हुए भी उदास होने की शर्तों पर सफल साबित हुईं हैं।

( अगली टिप्पणी कुंवर नारायण की कविता ''अमीर खुसरो'' पर )


केदारनाथ सिंह की कविता

बर्लिन की टूटी दीवार को देखकर

तीन दिन हुए
मैंने बर्लिन में देखे नहीं कौए
लेकिन क्यों कौए ?
इस भारतीय कवि को क्यों चाहिए कौए
इस सुंदर शहर में जबकि आसमान उतना ही नीला है
बिन कौओं के भी !

यह एक छोटा-सा होटल है
जहाँ हम कुछ हिंद-पाक लेखक
ठहरे हैं साथ-साथ
और हमारे पासपोर्ट चाहे जो कहते हों
यहाँ हममें से हरेक थोड़ा-थोड़ा हिंद है थोड़ा-थोड़ा पाक
हम साथ-साथ खाते हैं
पीते हैं साथ-साथ
हँसते-हँसते कभी-कभी हो जाते हैं उदास भी

यह साथ-साथ हँसना
उदास होना साथ-साथ
एक दुर्लभ अनुभव है
एक वेदेशी ज़मीन पर

वहाँ बाहर
मेरी खिड़की से दिखते हैं
दो वायुयान जैसे दो कबूतर
दो महायुद्ध - वहाँ बेंच पर बैठे
वृद्धों की स्मृति में ठांय-ठांय करते हुए
एक ताज़ा चुम्बन किन्हीं होंठों से गिरकर
वहाँ घास पर पड़ा हुआ

पर मेरी खिड़की से दिखती है
बर्लिन की टूटी हुई दीवार भी
और देखता हूँ कि उसके चारों ओर
लगा रही है चक्कर एक पागल स्त्री
न जाने कब से।
कहीं कुछ है कील की तरह
उसकी आत्मा में ठुंका हुआ
कि रुकने देता नहीं उसे
और वह बार-बार
आ रही है
जा रही है
उधर से इधर
और इधर से उधर...

इधर एक छोटी सी महफिल में
सुन रहे हैं हम अहमद फ़राज़ को
कोई ताज़ा ग़ज़ल सुना रहे हैं वे
झूम रहे हैं सब
झूम रहा हूँ मैं भी
पर मेरी आँखें खिड़की के पार
बर्लिन की उस टूटी दीवार पर टिकी हैं
जहाँ वह पागल स्त्री ग़ज़ल को चीरती हुई
लगाए जा रही है चक्कर पर चक्कर...

जैसे कोई बिजली कौंध जाए
एक दबी हुई स्मृति
झकझोर जाती है मुझे
और मुझे लगता है कहीं मेरे भीतर भी है
एक पागल स्त्री
जो दरवाजों को पीटती
और दीवारों को खुरचती हुई
उसी तरह लगा रही है चक्कर
मेरे उपमहाद्वीप के विशाल नक्शे में
न जाने कब से

देखता हूँ कि ग़ज़ल के बीच में
कोई मिसरा भूल रहे हैं अहमद फ़राज़
पिछले शेर और अगले के बीच का
एक अजब-सा सन्नाटा
भर गया है कमरे में
पर मुझे लगता है मेरे भीतर की वह पागल स्त्री
अब एक दीवार के आगे खड़ी है
और चीख रही है - ''यह दीवार ...
आख़िर यह दीवार
कब टूटेगी ?''

इतने बरस हुए
ग़ज़लों से भरे इस उपमहाद्वीप में
मुझे एक भूले हए मिसरे का अब भी इंतज़ार है

( कवि के अन्तिम प्रकाशित संग्रह,''तालस्ताय और सायकिल'' से साभार )

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नए कवि....तुषार धवल की लम्बी कविता

11:56 am
( कविता में लंबे समय से गृहस्त तुषार धवल स्वाभाविक संकोच और शिथिलता के कारण छपने से ज्यादा छुपते रहे। लेकिन देर से ही सही, जब उनकी कविताएं प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के माधयम से पाठकों तक पहुँचने लगीं तो एक नए कवि के विषय-वस्तु की रेंज और उस पर उसकी आमूल पकड़ से कुछ अचम्भा ही हुआ। वह शायद इसलिए भी क्योंकि नए कविओं में अधिकतर के पास हरी घास की दूब नहीं, ठूठ थी जिसे वे कविता में रोपने की बेजां कोशिश अब तक कर रहे हैं। तुषार की कविताएं इससे इतर इस अजनबी दौर में मर्माहत मनुष्यता को चिह्न-बुन रही है। उसमें सामने के समय का मोहक आवरण भेदने की दृष्टि और उसे महीन व्यंग्य में व्यक्त करने की सलाहियत है। अनर्जित चीख और गुस्से से उसे गुरेज है। साथ ही वह कोई अवलेह बन जाने की हसरत भी नहीं पालती, ताकि मर्ज़ का इलाज हो सके। उसकी सबसे बड़ी आकांक्षा पाठकों में उस विवेक को उदबुध करने की ही रही है जिससे उनके भीतर मानुस होने का अहसास मुसलसल बना रहे। सबद नए कवि की अपनी सीरीज तुषार धवल से शुरू करने जा रहा है। पत्रिकाओं में तुषार की जो कविताएं अब तक सामने आई हैं, उससे कुछ भिन्न आकार-प्रकार की,''तुम्हें फांसी नहीं होगी'' शीर्षक यह लम्बी कविता उम्मीद है आपको पसंद आएगी। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइएगा....)


तुम्हें फांसी नहीं होगी

मेरी खिड़की पर चिपके हुए हैं
मांस के लोथडे
हवा में जली हुई लाश उड़ रही है
दीवारों पर सूख गई है लहू की धार
कल शाम फिर बम फटा था बाज़ार में
कल शाम फिर एक चाल थी बिसात पर
हंसती हुई कई दुनिया
शिनाख्त में बेपहचान पाई गई
कौन मर गया ?
होगा कोई
अब मुआवजों की काली छाया
हू हू कर नंगा नाचेगी
यह ऐलनों का दौर है
बेहतर है हम मसरूफ रहें

तफ्तीश तबादले जिरह
कई कई अध्याय हैं रंगमंच पर
कोई सिर धुनेगा
बटोरेगा वाहवाही
जालसाजी
जालसाजी

यह लीला है महामानवों की
कुर्सियाँ भयानक मुखौटे लगा कर
सड़कों पर चलती हैं
आतंक का तुम्हारा चेहरा
उसी की आंत से उपजा है
निश्चिंत रहो
तुम्हें फांसी नहीं होगी

2
एक दंगल है
जो चलता ही रहता है
एक जंगल है
जो जलता ही रहता है
हमारे घर उसी में थे
हम बया हैं
हम बकरियाँ हैं
इससे ज्यादा हमें क्या चाहिए
नारे कोई भी रहे
सिर्फ़ हम ही हम उजड़े
तुम्हीं हांकते
हलाल करते हो
हमारे लहू से ही
अंगडाई ले उठता है तुम्हारा ताज

भले ही तुमने
हज़ार हत्याएं की हों
तुम दुलारे तंत्र के
तुम्हें फांसी नहीं होगी
3
एक छत चूती हुई बताई गई थी
तुम उस सुराख से
आकाश ताड़ गए
नंगी हमारी पीठ को झुकाया
सजदे के बहाने
लाद कर नंगों पर नंगी पीठों को
सीढियां आजमाई हुई चढ़ गए
सीढियों के स्मारक बने हैं
सुंदर सुनहरे
देख कर भी नहीं देखा किसी ने
वहाँ हमारे ढेर दफन हैं

बादशाहत में हाथ काटे गए
लोकतंत्र में सिर
धडों की यह आबादी
तुम्हारी व्यक्तिगत क्रांतियों में
कच्चा माल बनी हुई हैं

ये शीशों के टुकड़े
ये आईने लहू के
हमारी काली हथेलियों पर उग रहे हैं

तब तक तुम हंस सकते हो
तब तक
तुम्हें फांसी नहीं होगी

( कवि का पहला संग्रह ''पहर यह बेपहर का'' नाम से राजकमल प्रकाशन द्वारा शीघ्र प्रकाश्य )

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