शम'अ हर रंग में
2:02 am( प्रख्यात कथाकार कृष्ण बलदेव वैद की डायरियों को क्रमशः राजपाल और राजकमल प्रकाशन ने छापा है । )
और भी ग़म हैं
8:22 pm
आगामी
3:11 pm
वाजश्रवा के बहाने
5:42 pmमेरे युवजन मेरे परिजन
1:10 pmहमारे यहाँ पत्रों को उसके दस्तावेजी महत्व के बावजूद इस लायक नहीं माना गया कि गंभीर सोच-विचार के दायरे में लाकर उसके ज़रिये व्यक्त सचाई को इतिहास सम्मत साचाइओं से मिलाकर देखा-परखा जाए। यह जानने की कोशिश की जाए कि उनमें खुबा व्यक्ति मन किस कदर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी रचने के लिए उद्धत और व्यग्र रहा है। या यह सहज कौतुक ही कि रचना की ओट में रचनाकार की दुनिया और उसमें उसका होना-जीना कैसा रहा है। अपने रचनाकारों के प्रति जिज्ञासा का ऐसा भाव पश्चिम में बहुत उत्कट रहा है और वहाँ ऐसे ढेरों उदाहरण मिलते हैं जब पत्र , डायरी और स्मृतलेख का सहारा लेकर न सिर्फ साहित्येतिहास को गत्यावरोध से उबारा गया बल्कि रचनाकार और उसके बाहर-भीतर के ज्ञात सत्य में भी कुछ नया और सार्थक जोड़ने की कोशिश की गई।
इधर जब हिन्दी के बड़े कविओं में से एक मुक्तिबोध को लिखे पचास कवि-लेखकों के करीब तीन सौ पत्रों का संकलन,''मेरे युवजन मेरे परिजन'' नाम से देखने में आया तो लगा कि उन पर हुए पर्याप्त लेखन के बावजूद ऐसा बहुत-कुछ है जो हमसे अनजाना रहा आया था और वह हम शायद कभी न जान पाते यदि अव्वल तो अपनी रचनाओं के रख-रखाव के प्रति लापरवाह मुक्तिबोध ने इसे सुरक्षित न रखा होता; तिस पर उनके पुत्र रमेश मुक्तिबोध और कवि अशोक वाजपेई ने उनके देहावसान के तैंतालीस वर्षों बाद उसके महत्व को जान कर उसे प्रकाशित न कराया होता। यह पूरा सच नहीं है कि मुक्तिबोध को काव्य-परिदृश्य पर मरणोत्तर मूर्धन्यता मिली और उनके कवि-कर्म का प्रभाव भावी कविता और कविओं पर उसके बाद ही पड़ा। इसके ठीक उलट पत्र इस बात की पुरजोर तसदीक करते हैं कि उनके तीस अत्यन्त सक्रिय, सर्जनात्मक और संघर्षमय वर्षों के दौरान भी एक बड़े और महत्वपूर्ण लेखक-पाठक समूह में उनकी पूछ और प्रतिष्ठा थी। और तो और जीते जी अपना कोई प्रकाशित कविता-संग्रह न देख पाने वाले इस कवि को लोग ''दूसरा निराला'' तक मानते थे। इन मायनों में यह पत्र-संकलन नई कविता की पृष्ठभूमि पर भी नए सिरे से रोशनी डालता है। कई मूल्यवान संदर्भों के अलावा उस समय की पत्रिकाओं का श्रमसाध्य प्रकाशन, लेखकों, उनका सृजन, सौमनस्य और दुरभिसंधियों की भी बानगी इन पत्रों में मिलती है। सजग पाठकों को इनमें मुक्तिबोध को मुक्तिबोध बनाने वाली जीवनास्थितियों के सूत्र भी मिल जाएंगें। साथ ही उस करुण अंतर्कथा का अता-पता भी जिसमें मरणासन्न मुक्तिबोध के लिए साहित्य जगत की चिंता और उन्हें बचाने की ज़द्दोजहद शामिल है।
हिन्दी में यह देर से शुरू हुई कवायद है। हालांकि पत्र-संकलन वगैरह छपते रहे हैं, पर बेध्यानी का आलम वैसे का वैसा ही है। अकादमिक जगत इस बारे में कुछ करेगा, ऐसा सोचना मात्र एक दुराशा होगी। लिखने-पढ़नेवाला समुदाय यदि जागरूक रहा तो इस तरह भी वह अपने मूर्धन्य लेखकों को लक्षित कर समझ की रूढियों से परे उनके बारे में कुछ नया और महत्व का प्रस्तावित कर सकता है।
रचने का अचरज
2:30 pm
( किसी रचना की जड़ें कब और किन परिस्थितियों में लेखक के मन में फूटती हैं, इसके बारे में बता पाने में स्वयं लेखक को कठिनाई महसूस होती है। अपनी कालजयी कहानी 'परिंदे' के बारे में प्रसिद्ध कथाकार निर्मल वर्मा का कहना था कि वह एक बड़ी हास्यास्पद-सी परिस्थिति में शुरू हुई थी : एक बार जब वे शाम के झुटपुटे में एक गर्ल्स हॉस्टल के सामने से गुजर रहे थे और लड़कियां बारजे पर खड़ी हँस रही थीं, उसी दरमियान इस कहानी का ख़याल उनके मन में आया। बहरहाल, हम यहाँ कुछ नामचीन लेखकों की वे संक्षिप्त टीपें प्रकाशित कर रहे हैं, जिनमें उन्होंने रचने के अचरज को अपने तईं समझने-समझाने की कोशिश की है। इन अंशों का अनुवाद कथाकार राजी सेठ ने हमारे लिए किया है। उनके प्रति आभार ! साथ में दी गई तस्वीर गूगल से। )
गैब्रिअल गार्सिया मार्क्वेज
कॉलेज के दिनों में एक रात किसी दोस्त ने फ्रान्ज़ काफ्का की कहानियों की एक किताब लाकर दी। मैं अपने ठिकाने पर लौटा और 'मेटामोर्फोसिस' पढ़ने लगा। पहले वाक्य ने ही मुझे जैसे पलंग से नीचे पटक दिया। मैं बहुत हैरान-परेशान हो गया। पहली पंक्ति थी,''जैसे ही ग्रेगर समसा, बेचैन सपनों वाली रात के बाद सुबह सोकर उठा, उसने अपने को एक बहुत बड़े कीड़े में रूपांतरित होते देखा''। इस पंक्ति को पढ़ते ही मैंने सोचा, मैं नहीं जनता था कि ऐसा कुछ लिखने की भी लेखक को छूट होती है। यदि मैं जनता होता तो बहुत पहले से मैंने लिखना शुरू कर दिया होता, और मैंने तभी से कहानियाँ लिखना शुरू कर दी।
हेनरी मिलर
हर किसी का अपना-अपना तरीका है। वस्तुतः सारा लेखन तो आप टाइपरायटर पर करते हैं। इसके अलावा चाहे आप सैर कर रहे हों या हजामत बना रहे हों, या किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हों जिसमें आपकी कोई गहरी दिलचस्पी न भी हो, आप तब भी व्यस्त हैं, आपका दिमाग किसी गहरे स्तर पर सक्रिय है। रचनाकार आख़िर है कौन ? एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास एंटेना है, जो वातावरण में, ब्रह्माण्ड में प्रवाहित तरंगों को देखने और पकड़ने की क्षमता रखता है। मौलिकता भी आख़िर है क्या ? वह सब कुछ जो हम सोचते या करते हैं, वह तो सृष्टि में पहले से मौजूद है। हम मात्र मध्यस्थ हैं जो हवा में मौजूद चीजों को पकड़ते हैं। ऐसा कैसे संभव होता होगा कि बहुत से विचार या बड़े-बड़े वैज्ञानिक अन्वेषण संसार के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ प्रकट होते दिखाई देते हैं। कविता, उपन्यास या किसी दूसरी रचना के अवतरण का यही मर्म है, यानी कि जो तत्व ब्रह्माण्ड में मौजूद तो हैं, पर जिन्हें अभिवाक्ति मिल गई है, उन्हें व्यक्त करने के लिए एक व्यक्ति, या एक व्याख्याता की ज़रूरत होती है।
इतालो कालविनो
मैं अपने काम को शुरू करने के मामले में बहुत ढीला हूँ। मेरे मन में अगर किसी उपन्यास को लेकर कोई विचार चल रहा है, तो उसे शुरू करने का हर संभव कारण मेरे पास मौजूद रहता है। अगर मैं कहानियों की किताब पर या गद्य के छोटे-छोटे टुकडों पर काम कर रहा हूँ तो उनका अलग समय है। लेखों तक की शुरुआत मैं देर से कर पाता हूँ।अख़बारों के लिए लेख लिखने में भी मुझे इसी कठिनाई से गुजरना पड़ता है। एक बार शुरू हो गया तो फ़िर मैं तेजी से लिखता चला जाता हूँ। दूसरे शब्दों में, मैं बहुत द्रुत गति से लिखता हूँ, पर लेखन में एक से दूसरे खेप के बीच खूब लंबे-लंबे अंतराल होते हैं। मेरी स्थिति उस चीनी चित्रकार की तरह है जिसे एक बार किसी सम्राट ने केकडे का चित्र बनाने के लिए कहा था। चित्रकार ने उत्तर दिया,'' इसके लिए मुझे दस वर्ष का समय, एक बड़ा मकान और बीस नौकर चाहिए'' । दस वर्ष बीत गए तो सम्राट ने केकडे के चित्र के बारे में पूछा। चित्रकार ने कहा,'' मुझे दो वर्ष का समय और चाहिए''। इसके बाद भी उसने एक सप्ताह का समय और माँगा। अंतत: उसने तेजी से अपनी तूलिका उठाई और क्षण भर में ही केकडे का चित्र बना डाला।
ओक्तावियो पाज
हर कविता अलग होती है। अक्सर पहली पंक्ति सदा उपहार जैसी लगती है। पता नहीं यह ईश्वरप्रदत्त है या उस रहस्यमय शक्ति का करिश्मा जिसे 'प्रेरणा' कहते हैं। अपनी कविता ''सनस्टोन'' का उदाहरण देता हूँ। उसके पहले तीस हिस्से मैंने ऐसे लिखे जैसे कोई चुपचाप खामोशी में मुझसे लिखवाता जा रहा है। मैं उस प्रवाहमानता से चकित था जिसके चलते एकाद्शाक्षर पंक्तियाँ एक के बाद एक उतरती चली आईं थीं। फ़िर अचानक ही यह प्रवाह रुक गया। तब मैनें अपने लिखे हुए को पढ़ना शुरू किया। पर मुझे उसमें कुछ भी जोड़ने-घटाने जैसा नहीं लगा। कुछ दिन बाद, मैनें फ़िर से लिखना शुरू किया। अचेत तरह से नहीं, बल्कि पंक्तियों को सँवारने और प्रवाह को तारतम्य देने की गरज से। मैंने तीस या चालीस पंक्तियाँ और लिखीं, फ़िर रुक गया। बाद में मैंने अपने रचित को फ़िर से देखना शुरू किया। उस दौरान मैं धीरे-धीरे कविताओं की अंतर्वस्तु का अन्वेषण कर पाया। समझ पाया कि वे मुझे किस दिशा में ले जा रहीं थीं। यह एक प्रकार से मेरे जीवन का पुनरावलोकन था - मेरे अनुभवों का, मेरे सरोकारों, मेरी असफलताओं , मेरी ग्रस्तताओं का पुनर्सृजन। मुझे लगा कि मैं अपनी युवावस्था के अन्तिम छोर पर हूँ और यह कविता मेरे लिए एक साथ आरंभ और अंत दोनों है।
इयान मैकवान
इस प्रक्रिया में सारा आनंद तो उस हाथ लगे आश्चर्य में है, चाहे वह कितना ही छोटे से छोटा- संज्ञा को क्रिया से जोड़ता कोई उपयुक्त शब्द मात्र ही क्यों न हो। याकि पूरा दृश्य, याकि अनियोजित रूप से किसी वाक्य में से उठ खड़ा हुआ कोई चरित्र। साहित्यालोचना, शब्दों के पीछे के अर्थ का उत्खनन करते यह कभी नहीं समझ सकती कि कुछ चीजें इस तरह पृष्ठों पर आन बैठी है और वे लेखक को खूब गहरा सुख दे रही हैं। एक लेखक, जिसकी सुबह निर्विरोध हो, जिसकी वाक्य-संरचना संतोषदायक रूप से चल रही हो, वह अपने भीतर कितने शांत, निजी आह्लाद को महसूस कर रहा होता है। ऐसे आह्लाद में से मुक्तता की जो अनुभूति उसके हाथ लगती है, वही विचार की समृधि को जन्म देती है। तब ऐसे सुखद आश्चर्यों का जन्म होता है। लेखक ऐसे क्षणों, ऐसी बैठकों के लिए तरसता है।यदि मैं ''एटोन्मेंट'' का दूसरा पृष्ठ उधृत करते हुए कहूँ कि पूरे प्रोजेक्ट में यही उच्चतम किस्म की परिपूर्णता है। कोई खुशगवार लंच पार्टी, श्रुतिपाठ के लिए ठसाठस भरे हुए हाल, प्रशंसापूर्ण आलोचनाएं भी उस संतोष का मुकाबला नहीं कर सकतीं।
****
रिल्के पर राजी सेठ
1:02 pm
(सबद उन लेखकों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है जिन्होंने इसे अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए उपयुक्त स्थान माना और शीघ्रता से अपनी रचनाएँ उपलब्ध कराई। लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन की शुरुआत हमने वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की कविताओं से की थी। अब इसी क्रम में हमें हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार राजी सेठ का सहयोग प्राप्त हुआ है। राजी का रिल्के प्रेम जग ज़ाहिर है। उन्होंने जितनी लगन और काव्यात्मक सूझबूझ से महान जर्मन कवि रिल्के को हिन्दी में गृहस्त बनया है वह अपने-आप में प्रतिमान सरीखा है। उनका रिल्के के पत्रों का अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित-प्रशंषित हो चुका है। यहाँ हम रिल्के पर लिखा उनका लेख पहली दफा छाप रहे हैं।)अंतरालों का अन्वेषक - रिल्के
एक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत से नगर और नागरिक और वस्तुएं देखनी-जाननी चाहिए। बहुत से पशु और पक्षी ...पक्षियों के उड़ने का ढब , नन्हें फूलों के किसी कोरे प्रात: में खिलने की मुद्रा , अज्ञात प्रदेशों ...अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। अप्रत्याशित से मिलन। कब से अनुमानित बिछोह। बचपन के अनजाने दिनों के अबूझ रहस्य , माता-पिता जिन्हें आहत करना पड़ा था , क्योंकि उनके जुटाए सुख उस घड़ी आत्मसात नहीं हो पाए थे। आमूल बदल देनेवाली छुटपन की रुग्नताएं। खामोश कमरों में दुबके दिन। समुद्र की सुबह। समुद्र ख़ुद। सब समुद्र । सितारों से होड़ लगाती यात्रा की गतिवान रातें। नहीं , इतना भर ही नहीं । उद्दाम रातों कि नेह भरी स्मृतियाँ ...प्रसव पीड़ा में चीखती औरत । पीली रोशनी । निद्रा में उतरती सद्य: प्रसूता । मरणासन्न के सिरहाने ठिठके क्षण । मृतक के साथ खुली खिड़की वाले कमरे में गुजारी रात्रि और बाहर बिखरा शोर ।
नहीं, इन सब यादों में तिर जाना काफी नहीं ; तुम्हें और भी कुछ चाहिए ....इस स्मृति -सम्पदा को भुला देने का बल । इनके लौटने को देखने का अनंत धीरज .....जानते हुए कि इस बार जब वह आएगी तो यादें नहीं होंगी । हमारे ही रक्त ,मुद्रा और भाव में घुल चुकी अनाम धप-धप होगी , जो अचानक ,अनूठे शब्दों में फूटकर किसी घड़ी बोल देना चाहेगी , अपने आप ।
यह रिल्के है। इन पंक्तियों को जब पढ़ा था तो यह बात ज्ञात नहीं थी। किसी पत्रिका में छपे एक लेख में एक उद्धरण कि तरह ये पंक्तियाँ पढ़ने में आई थीं। पंक्तियों ने इतना उद्वेलित किया था कि लगभग अभिमंत्रित-सी स्थिति में मैंने इसका बरबस अनुवाद कर डाला था। एक आंतरिक लय जैसी अनुवाद में स्वत: गुंथती चली गई थी। तब यह भी ज्ञात नहीं था की यह के रिल्के एकमेव उपन्यास का कोई खंड है, कविता नहीं । उसी समय याद आया कि एक बार पहले भी ऐसे अनुभव से गुजरना हो चुका है। रिल्के के शब्दों की टंकार ऐसी ही प्रतिक्रिया जगा चुकी है। वर्षों पहले किसी यात्रा में सहयात्री द्वारा पढी जाती गुजरती पत्रिका और उस लेख में अंग्रेजी में उधृत ये पंक्तियाँ जिसका अर्थ कुछ-कुछ ऐसा था कि धीरे-धीरे डूब रहा हूँ अपने ही घाव में जो कभी नहीं भरते, इसलिए खड़ा रहता हूँ अपने ही रक्त में। रक्त स्नात यातना में...पंक्तियों का क्रम उतना याद नहीं, प्रतिक्रिया याद है। लगा था, संवेदन की सघनता ने आवेग को इतना प्रवाही बना दिया है कि पाठक के मन में प्रवेश कि सुविधा एकाएक उपलब्ध हो गई है।
दोनों उद्धरणों को साथ रख कर देखने में एक अजीब विरोधी-सी अनुभूति हुई थी। एक में अनुभव की समावेशिता का इतना निरंकुश आग्रह, दूसरे में अपने ही घावों में डूबे रहने की आत्मरत नियतिबद्ध पीड़ा। कौन-सा रिल्के सच है ? तब इस बात पर ध्यान नहीं गया था कि पंक्तियाँ नहीं पकड़ रहीं (क्योंकि पंक्तियाँ तो लेखक के पास अनंत होती हैं और उनमे से 'कुछ' में सारा सत्वा समाया नहीं होता), पंक्तियों के पीछे की उत्कटता पकड़ रही है, जो रिल्के का अकाट्य यथार्थ है। उत्कटता रिल्के के लिए अनिवार्य है। वही उसकी सघनता का आत्मीय आयाम है। वह जब भी कुछ कहने को उद्हत होता है, उसी मनाग्रता को छूने के लिए लपकता है, जहाँ आवेग अपनी सृष्टि का पूरापन रच सके। अपनी ऊर्जा से उसका आदि-अंत ढूंढ ले। उसका बाहरी यथार्थ से कोई संबंध हो या न हो. शायद इसीलिए यथार्थ की वास्तविकता यहाँ अलग किस्म की है।
अपने यथार्थ की विराटता का भी हमें ज्ञान होना चाहिए। अब तक की अजानी लगभग हर चीज को उस ज्ञान में शामिल होना चाहिए। अंतत: हमें अपने भीतर इसी प्रकार के साहस की ज़रूरत है - अजनबी, असाधारण, अव्याख्येय अनुभवों का सामना करने का साहस। जीवन को समझने के लिए लोगों की तंगदिली ज़्यादा बाधक होती है।
रिल्के के आतंरिक रुझानों की बात तब ज़्यादा स्पष्ट हुई जब रिल्के की एक छोटी सी पुस्तक पढने का अवसर मिला। पुस्तक का नाम था- लेटर्स टू अ यंग पोएट। इस पुस्तक ने रिल्के की संवेदना के चरित्र को अदबदाकर खोल दिया। यह पुस्तक रिल्के के दस पत्रों का संकलन है जो मिलिट्री अकादमी (जहाँ स्वयं रिल्के की दीक्षा हुई थी), में दीक्षारत एक युवक फ्रान्ज़ जेवियर काप्पुस को लिखे गए थे। वस्तुतः काप्पुस कवि बनने का आकांक्षी था और अपनी कविताओं पर कवि की राय जानना चाहता था। इस सन्दर्भ में पत्राचार चार वर्षों (१९०३-१९०८) तक का लंबा सिलसिला चल निकला। उन दोनों की भेंट कभी नहीं हो पाई थी। यह बात उल्लेखनीय है कि तब रिल्के की आयु सत्ताईस वर्ष और काप्पुस की बाईस वर्ष थी। उस आयु में जैसी तीव्र परिपक्व विराटोन्मुख तड़प के दर्शन हुए हैं, वह असाधारण है। रचनात्मक साहित्य के प्रारूपों में जो समानुभूति रुक-रुक कर व्याख्या करते उद्घाटित होती है, वह यहाँ सीधे प्राप्त हो गई है। इसका एक कारण तो पत्र विधा की हार्दिकता है। दूसरा, इस पुस्तक में काप्पुस के पत्र शामिल नहीं हैं, अतः रिल्के की मानसिकता का शुद्ध रूप पाठक को उपलब्ध हो गया है। यह निर्बाध उद्वेलन उसके निहायत जटिल, दुरूह और उद्दीप्त रचानारूपों से अलग किस्म का नहीं है। इनसे गुजरते समय ऐसा लगता है कि संदर्भ का सहारा पाते ही रिल्के अपने आप से बोलने लगता है। प्रश्न का छोटापन उस संबोधन में पिचक कर रह जाता है। उत्प्रेरित रचना की एक स्मृति चित्त में रह जाती है जो अपनी उत्कटता के चलते पवित्र और खरा प्रभाव छोड़ती है। इन पत्रों में रिल्के अपने ही रक्त की रिसती बावड़ी में खड़ा दिखाई देता है। चूँकि सृजनात्मकता का मुद्दा केन्द्र में है, इसलिए वह उस आत्यान्तिकता तक गया है।
एक ही काम है जो तुम्हें करना चाहिए - अपने में लौट जाओ। उस केन्द्र को ढूंढो जो तुम्हें लिखने का आदेश देता है। जानने की कोशिश करो कि क्या इस बाध्यता ने तुम्हारे भीतर अपनी जड़ें फैला ली हैं ? अपने से पूछो कि यदि तुम्हें लिखने की मनाही हो जाए तो क्या तुम जीवित रहना चाहोगे ?...अपने को टटोलो...इस गंभीरतम ऊहापोह के अंत में साफ-सुथरी समर्थ 'हाँ'' सुनने को मिले, तभी तुम्हें अपने जीवन का निर्माण इस अनिवार्यता के मुताबिक करना चाहिए।
या फिर
अगर अपना रोज का जीवन दरिद्र लगे तो जीवन को मत कोसो। अपने को कोसो। स्वीकारो कि तुम उतने अच्छे कवि नहीं हो पाए कि अपनी रिद्धियों-सिद्धियों का आह्वान कर सको। वस्तुतः रचियता के लिए न दरिद्रता सच है, न ही कोई स्थान निस्संग। अगर तुम्हें जेल की पथरीली दीवारों के अंदर रख दिया जाए जो एकदम बहरी होती हैं, और एक फुसफुसाहट तक भीतर नहीं आने देतीं, तब भी तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। तुम्हारे पास बचपन तो होगा...स्मृतियों की अनमोल मंजूषा...एकांत विस्तृत होकर एक ऐसा नीड़ बनाएगा, जहाँ तुम मंद रोशनी में भी रह सकोगे।
यह सब कह कर रिल्के उद्गमों की जांच-पड़ताल और शुद्धता की बात करता है।लेखन कर्म में जुड़ी मंशाओं की आत्मलोचक चीर-फाड़। यह निर्ममता रिल्के में खूब है। जो कुछ उसने इस पुस्तक के माध्यम से कहा है वह आज से पहले कभी इतना ज़रूरी नहीं लगा क्योंकि छपने के साथ- साथ अमरता की महती इच्छा लेखकों की बड़ी जमात को ग्रस चुकती है। पर ऐसा लगता है, इन पत्रों में रिल्के सृजनकर्म की आध्यात्मिक सरहदों को टटोल रहा है।
आध्यात्मिक शब्द का इस्तेमाल आज के बौद्धिक समाज में खतरे से खली नहीं है। हाल ही में एक आलोचक ने साहित्य में आध्यात्मिकता की बात उठाकर सुधी जनसमूह को बर्रे की छत की तरह छेड़ दिया था, पर आध्यात्मिकता भी और सब शब्दों की तरह एक शब्द है - एक निर्मूल्य वाहक। वह हर क्षेत्र को उपलब्ध है।उसकी संदर्भवत्ता उसके इस्तेमाल में है।साहित्य में इस शब्द के इस्तेमाल से बनी लचीली विराट और निहायत निजी ज़मीन है।अतिक्रमण द्वारा जिस स्थूल और प्रकट सरहदों को हम लांघने की बात करते हैं, वह आध्यात्मिकता है।जिस अनुमानिता से लड़ते रह कर हम नए विधागत या भाषागत प्रयोगों में उतारते हैं, वह भी साहित्य की है।जिस विवेक से हम वाग्जाल में से वांगमय की तलाश करते हैं वह भी साहित्य की आध्यात्मिकता है। यह कोई धार्मिकता नहीं है कि धर्म-निरपेक्षता को परिभाषा देने के लिए दूसरे छोर की तरह काम आए। इस पहलू पर विचारणीय मात्र इतना है कि अदृश्य की परिसीमा को महसूस कर पाना क्या सृजनकर्म की अपनी ही कोई अवस्था है या लेखक के अपूर्व संवेदन का कोई असाधारण गुण ? रिल्के को लेकर यह प्रश्न हमारे सम्मुख एकदम तीव्रतम बना रहता है। एकांत और विराटता रिल्के जैसे रचनाकार के लिए एक ही सीध में खड़े हैं। एकांत नकारात्मक नहीं, विराट और समावेशी है। वह अकेलापन या निस्संगता भी नहीं, अपने चैतन्य का गहरा आभास है।अपनी पूर्णता को पाने के लिए अनुपस्थिति का विराट अनुभव : एकांत को अपने भीतर ज़ज्ब होने दो फ़िर कभी तुम्हारे जीवन से नहीं होगा। एक सतत सुनिश्चित अंतर्वाह की तरह तुम्हारे भीतर प्रवाहित रहेगा जैसे हमारे रक्त में घुल-मिल चुका हमारे पुरखों का रक्त...रिल्के का एकांत एक ऐसे निर्दोष,सक्रिय,शांत असीम को पाने का है जहाँ उन चीजों का दखल न हो जो बनते हुए विजन को छोड़ सकें। उसकी हर चिंता, चिंतन के दौरान दूर जाते हुए उसी एक अनिवार्यता तक लौटती दिखती है।प्रेम की परिभाषा भी यहाँ इस रूप में है : जहाँ दोनों एकांत सुरक्षित रहते हुए भी एक-दूसरे का अभिनन्दन कर सकते हों।
शायद यही कारण रहा हो की रिल्के का अपना एकांत सबंधात्मक जीवन सदा तनाव में रहा।१९१० में क्लैरा से उसका विवाह दो वर्ष से अधिक नहीं चल पाया।एक निस्संग साधक और उत्कट प्रेमी उसके भीतर विरोधी स्थिति में मौजूद रहे।यों देखा जाए तो रचनाधर्मी के लिए यह प्रश्न आज भी उतना ही अनिर्णीत है।इतने छोटे कलेवर में इतनी सघन बातों का संदर्भ बार-बार इसी के निकट ले जाता है कि इन्हें लिखनेवाला आत्मसंबोधन की किसी हार्दिक स्थिति से गुजरता हुआ अपने कर्म की सत्ता और सार्थकता को तलाश रहा है।रिल्के, केवल ५१ वर्ष जिया (१८७५-१९२६, जन्म : प्राग)।उसका बचपन अवसादमय था और उसे आर्थिक संगर्ष भी झलने पड़े।बाद के दिनों में वह अद्वितीय शिल्पी रोदां का घनिष्ठ बना।आजीवन रिश्तों और रचनाओं के बीच लहुलुहान होता रहा।उजाले की हर सतह को छेदती उसकी रचनात्मकता, विराट को मनुष्य की भासा में छू लेने की उसकी उत्कटता...यह सब उसे उस पाए का रचनाकार बनता है जिसका अवतरण भाषा में कभी-कभार ही सम्भव हो पता है।
****
हिन्दोस्तां हमारा
12:09 pmवर्षों पहले उर्दू के मशहूर शायर जां निसार अख्तर ने इसी संग-साथ को उसके तमाम रंगोबू में ''हिन्दोस्तां हमारा'' नाम से दो खंडों में पेश किया था। संकलन की खूबी ये जानिए कि शुरूआती सफों में ही यह हमें इस सरलदिमागी से निजात दिला देता है कि उर्दू, जिसे हम अक्सर मुसलमानों की भाषा मान लेते हैं, दरअसल खड़ी बोली के विकासक्रम में अर्जित एक खालिस भारतीय भाषा है और इसने यहाँ की भाषिक संस्कृति के अनुरूप ही खुले मन से हिन्दी, संस्कृत, फारसी, अरबी और तुर्की ही नहीं, अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली के अलावा उन भाषाओं के शब्दों को भी स्वीकार किया जो ऐतिहासिक कारणों से तब भारत में प्रचलित थीं।
उर्दू-कविता के यूं तो कई मूड्स हैं, लेकिन उसमें राष्ट्रवाद की भी बड़ी प्रखर अभिव्यक्ति मिलती है। उर्दू कविओं की राष्ट्रीयता की एक बानगी इकबाल की इन पंक्तियों में देखिए : ''यूनानो-मिस्रो-रुमा, सब मिट गए जहाँ से / अब तक मगर है बाकी, नामो-निशां हमारा / कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी / सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा''। राष्ट्र के विरूद गायन के अलावा उसकी सभ्यता-संस्कृति,प्राकृतिक सुन्दरता,तीज-त्योहारों, कलाओं और कथाओं आदि का अद्भुत बखान किताब के पहले खंड में है। यह जानना खासा दिलचस्प है कि मीर के यहाँ की होली और मुन्नवर लखनवी के यहाँ कालिदास का कुमारसंभव कैसा है। अपनी-अपनी काव्यगत विशिष्टताओं के लिए लक्षित मीर, मोमिन, ग़ालिब, फिराक, जोश, जिगर और नजीर को तो हम-आप पढ़ते-गुनते ही आए हैं, अख्तर की मेहनत और मेधा से इस संकलन में उन कविओं को भी जगह मिल सकी है जिन्हें लगातार मरकज़ से हाशिये की ओर ठेला जाता रहा। यह क्या अपने-आप में कम बड़े दस्तावेजी महत्व की बात नहीं है।
दूसरे खंड में उर्दू की उन नज्मों को संकलित किया गया है जिससे देश के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों को गति और बल मिलता रहा। इन नज्मों में ग़दर से पहले, दौरान और बाद में गुलामी की मुखालफत और जंगे-आज़ादी के लिए की गई ज़द्दोज़हद का विशद चित्रण मिलता है। इनसे गुजरते हुए एक मशहूर उर्दू लेखक की इस अतिशयोक्ति को भी मान लेने का मन करता है : ''अगर हिंदुस्तान की तमाम तारीखी किताबें ख़त्म कर दिए जाएं, तमाम आंदोलनों के वृत्तांत गुम कर दिए जाएं और सिर्फ़ उर्दू साहित्य बाकि रह जाए तो आप हिंदुस्तान की हर युग की ऐतिहासिक श्रृंखलाओं को जोड़ सकते हैं''।
देवप्रिया
2:37 pmयह एक खेदजनक सचाई है कि अन्यथा रसिक कहलाने वाला हिन्दी का साहित्य-समाज शास्त्रीय कलाओं और कलाकारों के प्रति बेहद उदासीन रहा है। यही वजह है कि इन पर गहरी रीझ-बूझ के साथ हिन्दी में बहुत कम लेखन देखने को मिलता है। इस उदासीन परिवेश में, बजरिये कलाकारों के ही, जिन चंद लोगों ने धीरज और समझ के साथ लिखा है, उनमें युवा कवि यतींद्र मिश्र का नाम उल्लेखनीय है। ''देवप्रिया'' जो प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह पर एकाग्र है, के पहले भी वे सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी पर एक बहुप्रशंसित पुस्तक लिख चुके हैं। देवप्रिया में भी पिछली कृति की तरह ही संवाद और विचारों का सुंदर संयोजन है। दूसरे शब्दों में, इसे एक सहृदय कवि और विचारशील नर्तकी के उत्कट बौद्धिक साहचर्य का प्रतिफल भी कहा जा सकता है।
देवप्रिया संबोधन नर्तकी के लिए है। वह इसलिए कि सारी नृत्यांगनाएँ देवता को प्रिय हैं। यूं भी नृत्य-कला का उद्गम स्थल मंदिर और उसका अर्घ्य देवताओं को समर्पित रहा है। भरतनाट्यम और ओडिसी में समान रूप से दक्ष सोनल मानसिंह ने बातचीत के क्रम में इन प्राचीनतम नृत्य विधाओं की परम्परा, उसमें प्रयोग के स्थल और नवगठन पर बहुत सुचिंतित टिप्पणियां की हैं। नृत्य में देवदासी प्रथा, राज्याश्रय आदि की मूढ़ आलोचना करने वाले सोनल की इन टीपों से गुजरते तो शायद उनमें प्रथा और उसमें समयानुसार आते गए परिवर्तनों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की सलाहियत पैदा होती। बहरहाल, सोनल यहीं नहीं रुकी हैं। उनकी वैचारिकता का दायरा बड़ा है और यतींद्र ने अपने संवाद-कौशल से उसके तमाम कोने-अंतरों में बड़ी सहजता से प्रवेश कर उनसे कला, समाज, साहित्य और राजनीति ही नहीं, वाक्तिगत जीवन और रूचि से जुड़े सवाल भी पूछे हैं। पुस्तक के आधे से अधिक पृष्ठों में फैला यह सरस-संवाद रोचक और पठनीय होने के साथ-साथ हमारी लगभग शून्य-सी पड़ती जा रही शास्त्रीय समझ को भी वसी करता है ।
इसके आखिरी हिस्से में यतींद्र ने सोनल मानसिंह के बहाने नृत्य-कला पर अपने विचार भी प्रस्तुत किए हैं। नृत्य में पगा उनका कवि-मन इस कला और कलाकार की भंगिमाओं का जैसा अप्रत्याशित अंकन करता है, वह भाषा में छीजती रसिकता का पुनर्वास सरीखा है। यतींद्र के इस उद्यम से उम्मीद है दूसरे भी प्रेरित होंगे और हिन्दी में इन कलाओं के मूर्धन्य कलाकारों के बहाने ही सही, अभी कुछ और ऐसा या इससे बेहतर लेखन सामने आ सकेगा। पर फिलहाल तो यह सुसज्जित देवप्रिया ही!
शहरजाद के नाम
10:15 pm****
रंग तेंडुलकर की क्षति !
1:29 pm
कुंवर नारायण की नई कविताएं
12:57 am
इतना कुछ था
इतना कुछ था दुनिया में
लड़ने झगड़ने को
पर ऐसा मन मिला
कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा
और जीवन बीत गया
अच्छा लगा
पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक
अच्छा लगा,
पेड़ की छाया का सुख
अच्छा लगा,
डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन,
''अब चलूँ'' सोचा,
तो यह अच्छा लगा...

आगाज़
5:24 pmहताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
***
[ यह कविता हिन्दी के मूर्धन्य कवि विनोदकुमार शुक्ल की है।
सबद की शुरुआत इन्हीं शब्दों से।
गुफ्तगू उन सबसे है जिनका एक घर सबद निरंतर में भी है।
जरिया सबद है।
गरज इतनी कि लोगों का उससे सम्बन्ध और घना हो।
ख़ुद भी लिखता रहूँगा और कोशिश रहेगी कि समर्थ रचनाकारों की नई-पुरानी रचनाओं को भी सबद के माध्यम से आपके सामने लाऊं, जिनका होना हमें कई तरह से समृद्ध करता है। ]
