Sunday, December 14, 2008

कुंवर नारायण पर असद ज़ैदी

'ईमान का खाता' : कुंवर नारायण और उनकी कविता

असद ज़ैदी

धीरे धीरे टूटता जाता
मेरी ही हँसी से मेरा नाता

कुंवर
नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा है जिसने बहुत ज़माना देखा है। वह अपने तजरुबे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते हैं और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहते हैं। काव्यशास्त्रीय नज़र से देखेंतो कह सकते हैं उनके लहजे ही में सब कुछ है। उनको पढ़ते हुए लगता है किउनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता है--यही उनकी तर्ज़ है। बुफ़ों के शब्दों में : 'द स्टाइल इज़ द मैन'।

पर यह कहना असंगत न होगा कि स्टाइलिस्टों से कुलबुलाते काव्य-परिदृश्य में वह एक महत्वपूर्ण स्टाइलिस्ट-भर नहीं हैं। वह मूलतः नैतिक और सामजिकरूप से अत्यन्त सावधान और प्रतिबद्ध कवि हैं। हिन्दी के अव्वलीन नागरिक-कवि का कार्यभार और अधिकार अब उन्हीं के पास है। एक ज़माना पहले, 1960 के दशक के आरंभिक वर्षों में, मुक्तिबोध ने उन्हें अपने समीक्षात्माक लेख में 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' का कवि कहा था। कुंवर नारायण ने हरदम मुक्तिबोध की इस निशानदेही का मान रखा और कभी भी पहचान के इस घेरे से बाहर नहीं गए।

उनकी शाइस्तगी, संतुलन, नर्म-मिज़ाजी और धैर्यशील तबियत की वजह से उन्हें मध्यममार्गी विचारधारा का प्रतिनिधि कवि माना जाता है। यह कोई ग़लत धारणा भी नहीं है पर यह उनके मूल स्वभाव का ठीक से अहाता नहीं करती। वह एक बेचैन, नाराज़ और मेहनती इंसान भी हैं। अपने समय के गंभीर मानवीय सवालोंपर--वे राजनीतिक हों या सांस्कृतिक--वह पोज़ीशन लेने से नहीं बचते। वह अपनी वज़ेदारी या मुरव्वत-पसंदी को बेशतर अपने ईमान के आड़े नहीं आने देते। उनकी तबियत ही को उनकी शख्सियत और काम का समानार्थक मान लेना उन्हें एक पहले से बने खांचे में ढालना है।

यूँ भी आम विमर्शों में 'मध्यम मार्ग' का बहुत भ्रामक अर्थों में इस्तेमाल होता रहता है। अव्वल तो एक ऐसे मुल्क और ज़बान में जहाँ मध्यममार्ग आम तौर पर लद्धड़पन और विकल्पहीनता का ही दूसरा नाम होता है, उसे एक उस्तादाना आत्मविश्वास के साथ आकर्षक, रचनात्मक और नैतिक रूप सेविश्वसनीय बनाना कोई आसान काम नहीं है। दूसरे, कुंवर नारायण का मध्यममार्ग कोई 'सेफ़' या आसान मार्ग भी नहीं है।

उनकी प्रगतिशीलता या गतिशीलता और रैडिकलिज़्म इस बात में है कि वह मध्यममार्ग की ओट में यथास्थितिवाद से समझौता नहीं करते, बल्कि बार बारयथास्थिति की विडंबनाओं और अतियों को ही निशाना बनाते हैं। वह विकल्प कोसम्भव और प्रतिरोध को ज़रूरी मानते हैं। वह उस सिनिसिज़्म को अपने पास नहीं फटकने देते जो सत्ता और प्रतिरोध के दरम्यान, यथास्थिति और विकल्प के दरम्यान, लगातार नैतिक बराबरी खोजता रहता है। नैतिक समतुल्यता की तलाश , बल्कि चाह, हमारे मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी जगत का प्रिय शग़ल है जो कि सामाजिक प्रतिक्रियावाद का ही एक रूप है। यह वह लिबास है जोमध्यवर्गीय बौद्धिकों की उरियानी को ढकता है। ऐसा नहीं है कि कुंवर नारायण की नज़र वैकल्पिक राहों के ख़तरों और गड्ढों पर नहीं रहती : वह उनको लेकर ख़ुद को और दूसरों को आगाह और तैयार भी करते हैं, पर किसी हाल में यथास्थिति में रिलैप्स नहीं करते।

कुंवर नारायण ने अपने कृतित्व में जितना ध्यान देखने, सुनने और बोलने में लगाया है उससे ज़्यादा जानने, जज़्ब करने और समझने में सर्फ़ किया है। उनके जैसी अध्ययनशील और मननशील कविता अपने लिए काफ़ी जगह और अवकाश मांगती है। फिर उसे एक दिलकश सादगी, विनम्रता, सम्प्रेषणीयता और लुत्फ़ के साथपेश होना होता है। यहाँ भी इसके पीछे की जो मशक़्क़त और उधेड़बुन है वह दिखाई नहीं देती, अपने कारख़ाने को वह ओझल ही रखते हैं। वहाँ निहित ऊर्जा भी अपनी ओर ध्यान नहीं खींचती।

ऐसा किफ़ायत-शुआर कवि जब कहता है 'अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा' तो यह एक बहुत बड़ा वक्तव्य बन जाता है, एक साथ विश्वसनीय और लगभग पौराणिक। कुंवर नारायण का हुनर यही है : उन्हें मालूम है कि उनकी सामर्थ्य का बिन्दु कब और कहाँ आ रहा है। उन्हें उसे पाने के लिए ज़ोरआज़माईश नहीं करनी पड़ती। जब वह कहते हैं कि 'इन गलियों से / बेदाग़ गुजर जाता तो अच्छा था' तो पिछले बीस तीस साल का भारतीय इतिहास ही नहीं, साराका सारा भारतीय दुखांत आंखों के सामने घूम जाता है। इन दो पंक्तियों में क्या नहीं है ? कुंवर जी के काव्य में दर्दमंदी तो है ही, 'अपने ही सिरहाने बैठकर' अपने को देखने की बेदर्द कोशिश भी है।

उनकी
कविता में कई ज़बानों, कई वक़्तों, और कई साहित्यिक संस्कृतियों का संगम है। उन्हें पढ़ते हुए अक्सर कवाफ़िस और लुई बोर्खेस की याद आती है जो उन्हीं जैसे गुणग्राहक और पारखी कवि थे। और उनकी दिलचस्पियों का घेरा भी काफ़ी बड़ा है : इतिहास, पुरातत्व, सिनेमा, संगीत, कला, क्लासिकल साहित्य, आधुनिक विचार, समकालीन विश्व साहित्य, संस्कृति विमर्श। उर्दू की क्लासिकी कविता तो उनकी प्रेरणा का स्रोत रही ही है।

इन
सब चीज़ों पर और बहुत सी बातों पर सोचते हुए जिस एकमात्र हिन्दी कवि की बार-बार याद आती है वह हैं उनके पुराने साथी रघुवीर सहाय, जिन्हें गए अब क़रीब बीस साल हो जाएँगे। दोनों एक ही परम्परा के जुड़वां वारिस हैं, दोनों की अपनी-अपनी ज़मीन है--कुंवर नारायण का इलाक़ा ज़्यादा बड़ा है, उनके यहाँ ज़्यादा चीज़ें, ज़्यादा आवाज़ें, ज़्यादा भाषाएँ और ज़्यादा स्वीकार है। वह कम मध्यवर्गीय और कम परेशान हैं। पर न सिर्फ़ उनके काम एक-दूसरे के पूरक हैं, बल्कि दोनों की खामोशियाँ और नाराज़ियाँ एक ही तरह की हैं। अपनी चुप्पी और फ़िक्रमन्दी में वे बिल्कुल एक हैं। दोनों के शाइर नासिख़ नहीं ग़ालिब ठहरते हैं, और दोनों अनीस से ज़्यादा मीर की महफ़िल में दिखाई देते हैं। उर्दू में जिसे 'देहलवियत' कहा जाता है, हिन्दी कविता में वह चीज़ और वह तर्ज़ लखनऊ के इन दो हिन्दी कवियों में पाई जाती है। वह शोखी से बचते हैं पर अपनी ज़राफ़त दिखाते हुए कहते हैं : 'लगता है कोई भीषण दुर्व्यवस्था / हमारी रक्षा कर रही।'

ज्ञानपीठ सम्मान हिन्दी कविता की इस महान, पर अपेक्षाकृत ख़ामोश, लखनवी परम्परा का सम्मान है।
ज्ञानपीठ पुरस्कार ने भी, जो बीच बीच में बुरी तरह लड़खड़ा जाता है, कुंवर नारायण के बहाने कुछ विश्वसनीयता और प्रासंगिकता वापस पाई है।

( कुंवरजी को हाल में वर्ष २००५ का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई है। यह लेख उसके बाद ही दैनिक ''आज समाज'' के लिए लिखा गया था। हम असदजी के आभारी हैं जिन्होंने इसे सबद में पुनः प्रकाशित करने की अनुमति दी। इससे पहले सबद में ही कुंवरजी पर क्रमशः पंकज चतुर्वेदी, गीत चतुर्वेदी, गिरिराज किराडू और प्रभात रंजन लिख चुके हैं। )

6 comments:

giriraj kiradoo said...

कभी मैंने लिखा था, असद जैसे टिप्पणीकार तुम्हारे यहाँ बार बार आते रहे. तब उन्होंने तुम्हारी पोस्ट पर टिपण्णी की थी. इस बार की पोस्ट उन्हीं की लिखी हुई है. मध्यवर्गीय/बुर्जुआ बौद्धिकों की जीवन/लेखन कशमकश मुक्तिबोध से मलयज तक में दिखती हैं (हालाँकि दोनों मध्यवर्ग से 'एक दर्जा नीचे' ही रहे सारी ज़िन्दगी) अब उससे लगभग किनाराकशी कर ली गई है. ये मान लिया गया है कि 'सही' राजनीति की 'बात करना' भर अपने आप में डी-क्लास होने या अपने वर्गीय, जातीय, धार्मिक पूर्वग्रहों से ऊपर उठ जाने के बराबर है. समाज और सामाजिकता को सहज उपलब्ध मान लिया गया है. जबकि उसे अर्जित करना पड़ता है जानलेवा आत्म-शंका और आत्म-संघर्ष से खासकर एक मध्यवर्गीय बौद्धिक/लेखक को . असदजी ने इस टिप्पणी में जिस तरह बार बार हिन्दी लेखकों की मध्यवर्गीयता का ज़िक्र किया है उसे कुछ और चलन में आना चाहिए.

Ek ziddi dhun said...

`एक साथ विश्वसनीय और लगभग पौराणिक...`
`दर्दमंदी तो है ही,अपने ही सिरहाने बैठकर' अपने को देखने की बेदर्द कोशिश भी है...`
`वह अपनी वज़ेदारी या मुरव्वत-पसंदी को बेशतर अपने ईमान के आड़े नहीं आने देते...`
'अपने ही सिरहाने बैठकर' अपने को देखने की बेदर्द कोशिश भी है...`
अरसे बाद नेट नसीब हुआ और कुंवरनारायण पर असद जैदी की यह टिप्पणी नसीब हुई। रघुवीर सहाय पर मनमोहन की एक टिप्पणी पढ़कर अरसे पहले बहुत अच्छा लगा था, वैसा ही अहसास यह पढ़कर हो रहा है। किसी को उठाने-गिराने की कोशिश के बगैर कम ही लिखा जाता है।

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

अच्छा लेख, टिप्पणी या विचार कभी भी पढ़ लीजिए, अपना असर छोड़ ही जाते हैं. असद जी का किया यह मुख्तसर मूल्यांकन मूल्यवान है. इस ब्लॉग की सामग्री मुझे हमेशा स्तरीय लगती रही है.

शिरीष कुमार मौर्य said...

गिरिराज ने काफी सुलझी हुई टिप्पणी की है। मैं उसकी बात से सहमत हूं।

डॉ .अनुराग said...

किस शख्स को कम शब्दों में समेटना शायद सबसे मुश्किल काम है ,खास तौर से जब वो शब्दों के बीच बसर करता इंसान हो....यहाँ मगर काफ़ी नजदीक से कोलाज़ समेटा है

Uday Prakash said...

कुंवर जी पर इतनी अच्छी टिप्पणी और इतनी लगभग मुकम्मल-राय मेरे देखने में कहीं और नहीं आयी। असद अपने सिर्फ़ लिखने भर से कविता ही नहीं, काव्य समीक्षा को भी कुछ और सीढियां ऊपर पहुंचाते हैं। यह एक बेहतरीन कवि का एक बेहतरीन कवि पर लिखना हुआ।
असद से और भी लिखवाएं। यह मूल्यवान होगा।