Tuesday, December 09, 2008

सिगरेट छोड़ने के बहाने : ओरहन पामुक

लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं

ओरहन पामुक

मुझे सिगरेट छोड़े हुए २७२ दिन हो गए। अब आदत हो गई है। मेरा तनाव कम हो गया है और मुझे अब ऐसा नहीं लगता कि मेरे शरीर का कोई हिस्सा टूट रहा है। पर ऐसा असल में है नहीं । सचाई यह है कि एक अभाव की भावना से मैं अब तक नहीं छूटा हूँ। मैं इस सोच की ज़द में रहा कि मुझे मेरे स्व से अलग कर दिया गया है। और ज्यादा सही यह कहना होगा कि अब मुझे ऐसे जीने की आदत हो गई है। निष्ठुर सत्य को मैंने स्वीकार कर लिया है।

अब मैं फिर कभी सिगरेट पीऊंगा। कभी नहीं।

ऐसा कहते हुए भी मैं दिवास्वप्न देखता हूँ कि मैं सिगरेट पी रहा हूँ। अगर मैं कहूँ कि ये दिवास्वप्न इतने भयानक और गोपनीय हैं कि उन्हें हम अपने आपसे भी छिपाते हैं... समझते हैं ? वैसे भी, यह बात ऐसे ही एक दिवास्वप्न के दौरान होगी और उस क्षण जो भी खिचड़ी मैं पका रहा होऊँगा, जैसे-जैसे मैं इस फिल्म यानी कि अपने सपने को शिखर तक जाता देखता हूँ, मुझे उतनी ही खुशी मिलती है जितनी कि पीने के लिए एक सिगरेट जलाने से मिलती है।

तो सुख-दुख, आकांक्षा और हार, उदासी और उल्लास, वर्त्तमान-भविष्य के अनुभव को धीमा कर देना और हर दो तस्वीरों के बीच नई राहें और नए शार्टकट ढूँढना; मेरे जीवन में सिगरेटों का यही मुख्य उद्देश्य था। जब ये संभावनाएँ नहीं रहतीं, आदमी खुद को नंगा जैसा महसूस करने लगता है। कमज़ोर और असहाय।

एक बार मैं एक टैक्सी में बैठा, ड्राइवर एक के बाद एक सिगरेट पी रहा था। गाड़ी के अंदर गहरा धुआँ भरा हुआ था। मैं साँस के साथ धुआँ अंदर खींचने लगा।
'माफ कीजिएगा' उसने कहा। वह खिड़की खोलने लगा था।
'नहीं,नहीं, 'मैंने कहा, 'बंद रखो। मैंने सिगरेट छोड़ दिया है।'
मैं देर तक बिना सिगरेट की चाहत के जी सकता हूँ, पर जब पीने को जी चाहता है तो यह चाहत अंदर गहरे कहीं से आती है।

फिर
मुझे अपना भूला हुआ आपा याद आता है, जो दवाओं, जोड़तोड़ और स्वास्थ्य की चेतावनियों से बँधा हुआ स्व है। मैं वह वापस बनना चाहता हूँ, वह ओरहान जो मैं कभी था, सिगरेट पीने वाला, जो शैतान का सामना करने में कहीं ज्यादा काबिल था।

पुराने ओरहन के बारे में सोचते हुए सवाल यह नहीं उठता कि मैं तुरंत सिगरेट जलाऊँ। पुराने दिनों की वह रासायनिक जुगुप्सा अब नहीं होती, बस अपना पुराना आपा बहुत याद आता है, जैसे कि कोई खोया दोस्त या चेहरा याद आए। बस यही मन होता है कि मैं वापस वह बन सकूँ जो कि मैं कभी था। ऐसा महसूस होता है कि मुझे ऐसे कपड़े पहना दिए गए हैं, जिन्हें मैंने नहीं चुना। जैसे कि उन्हें पहनकर मैं ऐसा कुछ बन गया हूँ जो मैं कभी नहीं था। अगर मैं फिर सिगरेट पी सकूँ तो मुझे फिर पहले जैसे रातों के तीखे अहसास होंगे, उस व्यक्ति के आतंक वापस आ जाएँगे, जो कि मैं खुद को मानता था ।

जब मैं अपने पुराने ओरहन तक लौटना चाहता हूँ, मुझे याद आता है कि उन दिनों मुझे शाश्वत जीवन की बेतरतीब सूचनाएँ आती थीं। उन पुराने दिनों में, जब मैं सिगरेट पीता था, वक्त रुक जाता था। मुझे कभी ऐसा चरम सुख मिलता या कभी इतनी तीव्र पीड़ा होती कि मुझे लगता कहीं कुछ बदलेगा नहीं। मैं मजे से सिगरेट के कश लेता और दुनिया अपनी जगह खड़ी होती।

फिर मुझे मौत से डर होने लगा। कागज़ात में यह गहराई से समझाया हुआ था कि सिगरेट पीता वह आदमी कभी भी गिर कर मर सकता है। ज़िंदा रहने के लिए मुझे धुएँ के नशेड़ी को छोड़ना पड़ा और मैं कुछ और बन गया। ऐसा करने में मैं सफल हुआ। अब मेरा त्यागा हुआ स्व शैतान से जा मिला है और मुझे वापस उन दिनों में लौटने को कहता है जब वक्त हमेशा के लिए रुका हुआ था और कोई मरता नहीं था।

उसकी पुकार से मैं डरता नहीं हूँ।

क्योंकि जैसे कि आप देख सकते हैं, लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं।

*****

( पामुक किसी परिचय के मुहताज नहीं। २००६ में नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए तुर्की के इस पहले साहित्यकार की कथाकृतियों से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। ऊपर पामुक की कथेतर गद्य के चयन ''अदर कलर्स'' से एक अंश दिया गया है। इसका अनुवाद हमारे आग्रह पर कवि-लेखक लाल्टू ने किया है। हम इसके लिए उनके अत्यंत आभारी हैं। हिन्दी के वाक्य-विन्यास आदि को ध्यान में रख कर गद्य के इस टुकड़े में अनुवाद से पुनरीक्षण तक आंशिक बदलाव किए गए हैं। हम आगे भी इस तरह के अनुवाद प्रकाशित करेंगे। )

6 comments:

ravindra vyas said...

बहुत दिलचस्प और मार्मिक। एक आम-सी आदत से निकलता कथाकार का जीवन दर्शन।

Geet Chaturvedi said...

शिबोशिब.
सुधर गया ये भी.

Mired Mirage said...

बहुत ही सजीव चित्र है एक छोटी सी आदत को छोड़ने की पीड़ा का जो जब तक छोड़ो न तो छोटी सी है और जब छोड़ना चाहो तो विकराल ! छूट जाए तब भी किन्हीं मधुर यादों सी पीछा नहीं छोड़ती ।
घुघूती बासूती

अशोक कुमार पाण्डेय said...

et too pamuk!!

bahadur patel said...

bahut achchha hai.

डॉ .अनुराग said...

लगा जैसे हर स्मोकर के मान की बात कही है