Saturday, December 06, 2008

किस तरह से लिखूं मैं / निवेदिता / कि लगे/ तुम / हो ?



( वक्त-वक्त पर सबद में नए कविओं को वरिष्ट कवि-लेखकों के समान ही महत्व देकर प्रकाशित किया जाता रहा है। उसी कड़ी में इस बार विपिन कुमार शर्मा की कविताएं दी जा रही हैं। विपिन की कविताएं यों पत्र-पत्रिकाओं में आती रही हैं और वे इतने भी अजाने और नए नहीं हैं कि उनकी कवि-पत्री बांची जाए। पर यह ज़रूर है कि जैसा उनकी कविताओं से किसी काव्य-मुद्रा के असर में न होकर लिखने का पता चलता है, उसी तरह व्यवहार में कवियशःप्रार्थी न होने की वजह से वे अलक्षित होते रहे हैं। ऐसे कई युवा और महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी किसी दरबार में हाजिरी नहीं है और वे अपनी कविताओं के बूते सुधि पाठकों की निगाह में बने हुए हैं। सबद इन कवि-लेखकों का सच्चा सखा बनने की आकांक्षा रखता है। विपिन ने अपनी जो कविताएं दी थीं उनमें से चार कहीं भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं, जबकि पांचवीं कविता पूर्व प्रकाशित है। )

नई कविताएं

सुकवि की मुश्किल

बहुत तड़पकर हाथ मलता है कवि
जब उसे पता चलता है
कल रात
साड़ी दुनिया का प्रेम ओढ़कर
जब वह लिख रहा था प्रेम कविता
ठीक उसी वक्त
पड़ोस की एक लड़की
उसको मदद के लिए पुकार रही थी
किया जा रहा था उसका बलात्कार
लगभग उसी समय
चंद रुपयों के लिए
दबाया जा रहा था गला
एक वृद्ध का
जो परदेस में पसीना बहा रहे
दो मजदूरों का पिता था

और भी जाने कितनी बुरी खबरें लेकर
आया था वह दिन

कवि सोचता है
अगर उस रात
उसने नहीं लिखी होती कविता
तो सुन सकता था वह इन सबकी गुहार
और कुछ न कुछ करता ज़रूर

शर्मसार हो जाता है वह
और चाहता है फाड़कर फ़ेंक दे उस कविता को
फिर कुछ सोचकर रह जाता है

कल रात
कुछ प्रेमी ज़रूर ही लिख रहे होंगे
प्रेम-पत्र
और कुछ प्रेमी रोते रहे होंगे
पूरी रात
इबादत की मुद्रा में
उन सब तक पहुंचानी होगी यह कविता
जीवन जहाँ से बच सके
बचाना होगा
इन दुखों से
पार तो पाना होगा
****
पाषाण युग

सुनते हैं
सभ्यता के विकास-क्रम में
जब आग की खोज अधूरी थी
तो मनुष्य
कच्चा ही चबा जाता था जानवरों को
( इंसानों को नहीं )

फिर जानवर कम होने लगे
इंसानों में बढोतरी होने लगी
फिर भी खाने की समस्या नहीं थी
खाने की चीजें इफरात में थीं
लेकिन
आग नहीं थी

फिर लोगों ने एक अद्भुत तरकीब निकाली
( यह चकमक पत्थर से पहले की बात है )
वे आपस में ही टक्कर मारने लगे
उनके टकराने से
कभी-कभी चिनगारी भी निकल आती
जिससे वे जला लेते आग
उसमें भून लेते खाने को कुछ
इससे खाने की समस्या भी कम हुई
और इंसान भी कम होने लगे

हालाँकि
यह चकमक पत्थर से पहले की बात है
तब मनुष्य
आज की तरह सभ्य नहीं था।
****
किताब के बहाने से : एक

तुमने पढ़कर लौटा दी किताब
आज मेरे पास काम ही काम है

पहले हरेक पृष्ठ
फिर परिच्छेद
और अब एक-एक शब्द को
टटोल रहा हूँ
कहाँ छुपी हुई हो तुम
कहीं से तो निकलो

हरेक शब्द को स्नेह से छूता हूँ, पर
कहीं नहीं मिलती तुम्हारी
कैसी भी पहचान
हारकर, बेसहारा-सा
किताब से आँखें ढँक कर
रो रहा हूँ...

आख़िर कहीं तो मिलोगी तुम !
****
किताब के बहाने से : दो

मैंने कहा ,
'' कितना कुछ है इस कहानी में
अजब-सा प्रेम और आवेग !''
तुमने कहा,
'' ऐसा तो कुछ भी नहीं
निरी भावुकता !''


मैं ऊपर-ऊपर हंस देता हूँ -
'' यों ही कहा था मैंने
तुमने सच कहा
ऐसा तो बिल्कुल नहीं है
इस कहानी में।''

तुम भी खुलकर मिला देती हो
मेरी हँसी में
अपनी हँसी
मगर इतनी-सी बात पर
छलक आए हैं मेरे आंसू

रोना
क्या अकेले ही होगा ?
****
पुराना चावल

किस तरह से

मूल्य बन चुका है
अविश्वास
इस युग का !
कुछ भी विश्वसनीय नहीं
न शब्द
न अर्थ
न भाषा
न लिपि

मैं कैसे लिखूं ''प्यार''
कि उसका अर्थ
घृणा न हो
द्वेष न हो
छल न हो
केवल प्यार हो ?

किस तरह से लिखूं मैं
निवेदिता
कि लगे
तुम
हो ?
****

13 comments:

vijay gaur/विजय गौड़ said...

अच्छी कविताएं हैं। पढवाने के लिए आभार।

Anonymous said...

bahut sundar rachnayen. badai

शिरीष कुमार मौर्य said...

विपिन जी को बधाई और तुम्हें भी !
नए कवियों को सामने लाना सचमुच अच्छा काम है।

सुभाष नीरव said...

जब भी नेट पर बैठता हूँ तो अपने पंसदीदा ब्लॉगों/वेब पत्रिकाओं को एक बार अवश्य क्लिक करके देखता-पढ़ता हूँ, उनमें "सबद" भी एक है। "सबद" पर नये-पुराने कवियों की कविताएं पढ़ने को मिलती हैं और मन में कहीं सुकून होता है कि अच्छी कविताओं की कमी नहीं है। विपिन कुमार शर्मा की कविताएं उसी सुकून को बनाए रखती हैं। आप इंटरनेट की दुनिया में अपने ब्लॉग के माध्यम से अच्छी कविता को दुनिया भर में पहुँचाने का जो महत्वपूर्ण काम समर्पित भाव से कर रहे हैं, वह प्रशंसनीय है।

Parul said...

aabhaar ..kaafi kuch naya milta hai yahaan..

एस. बी. सिंह said...

जीवन जहाँ से बच सके
बचाना होगा

बहुत अच्छी कवितायें । पढवाने के लिए आभार।

Sattu Patel said...

yar bipeen bhai kavitaye to aapakee achchhee hain, lekin main kai dinon se apakee prem kavitayen hee padhata aa raha hun, ab aage badho, kuchh aour muddon ko pakadho bahut kuchh hai prem ke alava bhi likhane ko
satyanarayan patel
indore

Anonymous said...

बहुत अच्छी कविताएं लिखते हैं विपिनजी. मुबारक!
आनन्द पाण्डेय
राष्ट्रीय प्रवक्ता, एनएसयूआई
९८६८४७४१२५

Pramod said...

Vipinji PREM ko (aur Zahir hai jeevan ko bhi, ye alag kaise hain?)bilkul uske kache roop me prastut kerte hain. ekdum aam bolchal ki bhasha me aur yahi in kavitaon ki khasiyat hai ya kahen vipinpan hai. apni is visheshata ko bachaye rekhne ke lie Vipinji ko Badhai, haan ab NIVEDITA se aage barhne ki CHESTA keren to jyada khushi hogi. HARDIK BADHAI

PRAMOD KUMAR TIWARI

Anonymous said...

बहुत ही अच्छी कवितायेँ हैं मन को छूने वाली ..आप के शब्दों की तरलता मन को गीला कर जाती है

वन्दना said...

मन के विभिन्न भावो का सुन्दर समन्वय किया है विपिन जी ने………बधाई।

kavilok said...

bipin aur aapko badhai...!

प्रदीप जिलवाने said...

विपिन जी की कविताएं पसंद आई.. बधाई