Tuesday, December 02, 2008

कवि कह गया है : १ : संजय कुंदन




कविता के बारे में कुछ बेतरतीब बातें

हिंदी कविता के बारे में दो परस्पर विरोधी बातें कही जा रही हैं। एक तो यह कि अब काव्य परिदृश्य में ऐसा कुछ खास नजर नहीं आ रहा जो ध्यान खींचता हो, युवा कवियों ने ऐसा कुछ नया नहीं जोड़ा जिसे रेखांकित किया जा सके। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग बेहद आश्वस्त होकर यहां तक कहते हैं कि यह कविता का स्वर्ण युग है। इतने सारे कवि लिख रहे हैं, यही क्या कम है। एक कवि इन दो तरह के वक्तव्यों को किस रूप में ले ? या उसे इन पर ध्यान देने की कोई जरूरत है भी कि नहीं ?

एक बार एक वरिष्ठ कवि ने मुझसे कहा था कि हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हमारे पाठक हैं या नहीं। तब मुझे यह सवाल बहुत दिनों तक परेशान करता रहा था कि क्या कवि अपनी एक स्वायत्त दुनिया में बंद होकर चुपचाप कविता लिखता रहे, किसी गुह्य या रहस्यमय साधना की तरह ? क्या हमें उनकी अपेक्षाओं और शंकाओं से मुंह फेर कर बैठ जाना चाहिए, जिनके लिए हम लिखने का दावा करते हैं ? क्या हमें उनसे यह कहना चाहिए कि मैं जो लिख रहा हूं लिखता रहूंगा तुम्हें समझना है तो समझो वरना भाड़ में जाओ। हमें तुम्हारी परवाह नहीं।

क्या कवि इस बात की चिंता बिलकुल न करे कि वह जो लिख रहा है, उसका आखिरकार क्या होने वाला है ? या वह काव्य परिदृश्य में अपनी भूमिका और कविता की स्थिति या भविष्य पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करे ? कविता की सार्थकता और कवि के सरोकार का मामला मुझे रह-रहकर परेशान करता है। यह सवाल हर बार नए रूप में सामने आ खड़ा होता है। मेरे कई साहित्यिक मित्र (जो नियमित-अनियमित रूप से कविता पढ़ते हैं ) यह शिकायत करते रहते हैं कि आज की कविता बिलकुल एक जैसी लगती है। सभी कवि एक तरह से लिख रहे हैं। मैं पहले इसे उनका साहित्यिक अज्ञान मान कर खारिज कर देता था लेकिन अब इसे गंभीरता से लेता हूं और खुद को कठघरे में खड़ा पाता हूं। मेरे उन मित्रों की आपत्ति पूरी तरह सही न भी हो, तो भी हिंदी कविता की वर्तमान भाषा या उसके ढांचे को लेकर गंभीर बहस की गुंजाइश जरूर है।

सच कहा जाए तो हिंदी कविता कहीं न कहीं ठहराव का शिकार होती जा रही है। पिछले दो दशकों में इसकी भाषा में, कहने के अंदाज में कोई अहम बदलाव नहीं आया है। इस अवधि में मोटे तौर पर दो तरह की भाषा प्रचलित रही है। एक तो केदारनाथ सिंह की भाषा, जो कुछ हद तक अपनी संरचना में प्रगीतात्मक लगती है और दूसरी रघुवीर सहाय की नाटकीय भाषा जो गद्य के बेहद करीब है। इन दोनों के बाद उभरे ज्यादातर कवियों ने इन्हीं दो भाषा रूपों को अपनाया। किसी के ऊपर एक का ज्यादा प्रभाव है तो किसी में इन दोनों का मिला-जुला रूप दिखता है। इन दोनों से हटकर एकदम अलग तरह से लिखने का कोई महत्वपूर्ण प्रयास अब तक सामने नहीं आया है। शायद इसीलिए आज की कविता के बारे में कहा जाने लगा है कि हरेक कविता एक ही कवि की लिखी हुई प्रतीत होती है।

गद्य में निहित काव्यात्मक संभावना को विष्णु खरे ने एक उत्कर्ष पर पहुंचाया है। आज कई कवि उसका अनुसरण कर रहे हैं। उसी तरह केदारनाथ सिंह ने अपने भाषा-शिल्प को क्लाइमेक्स पर पहुंचा दिया है। कई युवा कवियों में उसका दोहराव ऊब पैदा करता है। जब भाषा का कोई चौखटा बन जाए तो उनमें कई नए विषयों, संवेदनाओं और अनुभवों के प्रवेश की गुंजाइश कम हो जाती है। शायद इसलिए हिंदी कविता में विषयों-प्रसंगों का भी दोहराव हो रहा है। हालांकि इसकी एकमात्र वजह यही नहीं हो सकती। यह कवियों के अनुभव संसार की सीमा या उनकी वर्गगत सीमा हो सकती है, जिस पर अलग से बहस की जरूरत है।

क्या ऐसा नहीं लगता कि आज काव्यभाषा को एक बड़े झटके की जरूरत है ताकि कविता के लिए कुछ नए रास्ते खुलें, उसका एक नया तेवर, नया मिजाज सामने आए ? लेकिन यह बदलाव क्या होगा, कैसा होगा इस बारे में किसी तरह का अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके बारे में कोई बना-बनाया सिद्धांत भी नहीं है।

कई बार नए रास्ते की तलाश के लिए पीछे मुड़कर देखना होता है। अक्सर भाषा-शिल्प का रिवाइवल भी होता है। मुमकिन है हर कवि अपने स्तर पर इस सवाल से जूझ रहा हो और अपने तरीके से हाथ-पैर भी मार रहा हो। लेकिन यह कुल मिलाकर एक जोखिम है जिसे स्वीकार करना आसान भी नहीं है। सच कहा जाए तो कवियों में इससे बचने की प्रवृत्ति ज्यादा रही है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आम तौर पर भाषा संबंधी प्रयोग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। इसकी एक वजह यह है कि हिंदी में एक खास तरह का सौंदर्यशास्त्र हावी है। उसी के तहत लिखने वालों को प्रोत्साहन-पुरस्कार आदि मिलता है। एक युवा कवि एकदम नए रास्ते अपनाकर गुमनाम होने की बजाय प्रचलित काव्यरूढि़ का दामन थामकर तुरंत-फुरंत कवि होने का तमगा हासिल कर लेना बेहतर समझता है।

असल दिक्कत यह है कि कविता के संसार में पाठकी दखल कम से कम है। कवि को पहचान वरिष्ठ कवियों या आलोचकों से मिलती है न कि पाठकों से। अब यहां यह सवाल सामने आता है कि क्या हिंदी कविता की नियति एक छोटे से क्लब में सीमित हो जाने में है या उसका हिंदीभाषी जनता से भी कुछ लेना-देना है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह समय ही कविता के ड्राइंग रूम में बंद हो जाने का है ? फिर हम उस काव्य परंपरा का क्या करें जो हमें नागार्जुन-त्रिलोचन जैसे कवियों से मिली है ?
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( संजय कुंदन जाने-माने कवि-कथाकार हैं। उनके दो कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। कविता के लिए उन्हें वर्ष १९९८ का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल सम्मान मिल चुका है। सबद में संजय जी का लिखना लंबे अरसे से टल रहा था। पर जब उन्होंने अपना यह पर्चा लिख कर दिया तो लगा इस देरी की एक तरह से भरपाई हुई। उन्होंने अपने पर्चे में जोखिम लेकर कुछ बहुत ज़रूरी सवाल उठाये हैं। ऐसे सवालों का सामना न करने में ही कई बार हम अपनी सुरक्षा महसूसते हैं और गर सामना करना ही पड़े तो अक्सर किसी बौद्धिक तैयारी के बगैर पिष्टपेषण करते हैं। )

9 comments:

Anonymous said...

sanjay kundan ne kavita ki maujuda vyadhi par thhk ungli rakhi hai. is par bahas ki jaroorat hai.par jo paathkon ki parwah kiye bina likhe jaa rahe hain unka kya kiya jay? sanjay ki tippni par badhayi--

om nishchal

Tushar Dhawal Singh said...

कविता का सीधा सरोकार पाठकों से है, होना भी चाहिए. मेरी समझ यही कहती है कि कविता एक सीमित क्लब या फिर बौद्धिकों के ड्राइंग रूम में अगर सिमट रही है, तो यह पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है. संजय भाई, आपने जो प्रश्न उठाया है बिल्कुल ज़रूरी है और इसके लिए आप साधुवाद स्वीकारें. रही बात भाषा और लहजे की, तो मुझे लगता है कि इस दिशा में कुछ लोगों ने कोशिशें भी शुरू की हैं. हाँ मुकम्मल तौर पर अभी भी धुंध बनी हुवी है. आज का समय अपने पिछले सभी काल से ज्यादा हिंसक और बड़बोला समय है ऐसे में मानव मन अपनी भीतरी तहों में मोटे तौर पर दो तरह से प्रतिक्रिया करता है. एक तो वह गुम सुम और depressed हो जाता है, यह फिर ज़ोर ज़ोर से कह कर इन तमाम आवाजों के बीच अपनी आवाज़ भी दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश करता है. लिहाज़ा, कविता का उभरता नया स्वर या तो अंतर्मुखी वाकचेतना का हो रहा है, या फिर rhetoric की तरफ़ मुड रहा है. मेरे एक मित्र मुझ से कह रहे थे कि यूरोप की आज की कविताओं में अपनी जड़ (परम्परा भी ) की तरफ़ लौटने और rhetoric को अपनाने की प्रवृत्ति देखी जा रही है. हमारे यहाँ भी आज के कुछ कवियों में यह बात दिख रही है और ना पसंद भी की जा रही है. लेकिन मुझे लगता है कि यह rhetoric आलोक धन्वा या फिर धूमिल के rhetoric से अलग है और लफ्फाजी से भी बचने कि कोशिश करती है क्योंकि संवेदन हीन होते हमारे समय में संवेदन को जगाये रखने के लिए ज़ोर तो लगना होगा ही. एक कोशिश ईमानदार सी यही रहे कि हम अपनी आवाज़ को उसी के मूल रूप में ही लिखने की कोशिश करें यह भूल कर कि उसकी आलोचना होगी. आलोचना पिछले का आकलन करती है, रचना नई ज़मीन तलाशती है. भाषा में, मुझे भी लगता है, नए प्रयोग नही के बराबर हो रहे हैं. शायद अपने स्वर की इमानदार अभिव्यक्ति, भाषा के स्तर पर भी कुछ तोड़ फोड़ करे. मुझे बहुत उम्मीद है कि सब अच्छा ही होगा.
तुषार धवल

SANJEEV K JHA said...

kavita ke bare me sanjay ji betartib baaten padhi. achha laga ki kuchh gambhi saval uthaye gaye. ye kafi ahem sawaal hain.lekin mai ek baat kehna chahunga... bhasha me prayog ki jo baat hai vo yojna ke tehat nahi hoti balki ek kavi ya kahanikaar ki bhasha uske vishaye ke anurup banti chali jati hai. haan, kavita main nirasta zarur aai hai. lekin yah svikaar karna hoga ki lekh me uthaye gaye kai sawal ahem hain, jinka jawab dhundhna hoga. likhne ke liye badhai swikaren !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

संजय के प्रश्न सामयिक हैं. आज की अधिकाँश कवितायें या तो अखबारों की कतरनें लगती हैं या फ़िर उनमें ज़बरदस्ती बिठाए हुए शब्द और ले होती है अन्यथा निस्सार तुकबंदी. एक और ट्रेंड है ग़ज़ल का जिसमें मक्ता, मतला, रदीफ़, बहार आदि तो होता है मगर ग़ज़ल नापैद रह जाती है. यह सच है कि पाठक के बिना कविता, कविता नहीं हो सकती है. स्तरीय साहित्य के अभाव में कुछ साहित्यकारों का जमघट बैठकर एक दूसरे की पीठ बहुत दिनों तक नहीं खुजला पायेगा. धन्यवाद!

एस. बी. सिंह said...

कविता क्या अखबार और फिल्मी गासिप को छोड़ कर हिन्दी की किसी पठनीय चीज शायद ही पाठक की रूचि हो संजय भाई।

ragini said...

कवि कह गया है ! शीर्षक से ऐसा लग रहा है कि कह कर गुज़र गया है। वैसे जहां तक मै जानती हूं खुद संजय जी भी युवा कविता का ही एक चेहरा हैं और लेख उन्होंने किसी दूसरी डाल पर बैठकर लिखा है। वे अच्छे कवि हैं। यदि उन्होंने आत्ममूल्यांकन भी इस लेख किया है तो अच्छा, वरना ऐसी उपदेशात्मक मुद्राएं हिंदी की युवा कविता के लिए नई नहीं हैं।
अगर आप अच्छे सम्पादक हैं तो मेरी इस टिप्पणी को प्रकाशित कीजिए

prabhat ranjan said...

kundanji khari baat karte hain aur unki ye shaili achhi lagti hai. unhone kuchh aise sawaal uthaye hain jinse aajkal kavi bachte firte hain.

Vishwanath said...

apni baat rakhne ki gustakhi karte hue yeh jodna chahta hoo kundan ki chinta smuche sahitya se judi hai. kavita hi nahi kahaniyon aur laghu kathao ki halat kamovesh aisi hi hai. kai sahityakar swantah sukhaya ki bawna se likhe ja rahe hai. magar kahi bhi kam ho rahe pathak aur sahitya mein kam ho rahi ruchi ke vishay men sochne ke liye kaun aayega? doosri baat yeh hai ki aah rachnakar sahityik mancho ke alawa aam reader ke paas jana pasand nahi karte. Rachanakar pahle hi maan lete hain ki falan reader meri rachna ka sahi study nahi kar sakta. Is intellectual discrimination ki sthiti sahitya ko aruchikar banane ke liye kafi hai.

अविनाश वाचस्पति said...

कविता तो होती ही बेतरतीब है। वहां पर जो तरकीब काम करती है, वो अन्‍य किसी विधा में लागू नहीं होती।