Monday, November 17, 2008

ज़बां उर्दू : २ : सफ़िया अख्तर

जाने अज़ीज़,

कैसे
हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।
जब सोचती हूं तो समझ में नहीं आता कि मेरी गैरमौजूदगी में ज़िन्दगी को किन मशागिल (कामों) से पुर करते होगे ? फातिमा बहन बेचारी मजदूर आदमी, वक्त पर चल देती होगी, फिर घर पर अकेले क्या करते होगे, वक्त कैसे कटता होगा ? घबराओ नहीं, मैं भी तुम्हारे पास हूं, अलबत्ता ये और बात है कि ऐसे में मीना (शराब ) भी आ जाती हो और मुझे उस बज़्म से निकाला मिल जाता हो।
तुम कब आओगे ? मुझे बुलाना या ख़ुद आना। मार्च के पहले हफ्ते में जयपुर जाना तय करो और मुनासिब समझो तो मुझे भी ले चलो। औन के यहां ठहरेंगे और उनकी शाने-मेज़बानी भी देखेंगे। वैसे तुम अपनी मर्ज़ी पर रखो। ये शौक तो महज़ तुम्हारी हमसफरी की ख्वाहिश में उछला बकिया कुछ नहीं। खैर।
हां, और सुनो। आज यूनिवर्सिटी बंद रही। कोई तालिबेइल्म इत्तेफाकिया रेल से कुचलकर मर गया था रात को। तबियत पर तकद्दुर (उदासी) सा रहा गो कि मौसम बहुत ही रंगीन रहा।
आज दोपहर कोई तीन घंटे सोई। ये नींद गोया वो क़र्ज़ मयसूद ( ब्याज सहित ऋण) है जो तुम्हारे पहलू और बाजुओं पर वाजिब था।
आज एक बहुत ही 'देर हज्म' किस्म की किताब पढ़ने के लिए उठाई है। अपने को तुमसे बहस करने के लिए मुसल्लह (तैयार) करना चाहती हूं। लड़ने के लिए तो मेरी फितरत ने मुझे मुसल्लह करके भेजा था पर बहस की ज़रूरत यूं आन पड़ी तुमसे लड़े बगैर बहस छिड़े, मुमकिन ही नहीं है।
तुम्हारी सलाहकार नहीं बनना चाहती। बनूं भी क्योंकर और दावा भी करूं तो किस बिरते (आधार) पर जबकि अपने को बेशतर चीज़ों में तुमसे कमतर पाती हूं। हां, छेड़ की खातिर फिर लिख रही हूं कि मेरे पीछे मुझ से 'तर्के वफ़ा' न बरतना कि अपने को मुझसे अलेहदा करके ख़ुद परेशानियों के दौरे डालो और कहो कि मैं सफिया के साथ ये न कर सका और ये न कर सका।
यकीन करो अख्तर कि ये एहसास ही मेरी ज़िन्दगी के अक्सर लम्हों को कतई सुकून बख्श देता है कि मैं तुम्हारी हूं। अब तक मैं किसी कि भी न थी और न समझ सकती थी कि अपने को क्योंकर संभालकर रखूं और किसके लिए ? मेरी वफाओं का, मेरी उबलती हुई आरजुओं और तमन्नाओं का मर्कज़ कोई नहीं था। मेरे ख्वाबों का पसमंज़र (परिदृश्य) बिल्कुल सियाह था और मेरे अरमानों की दुनिया यकसर ( बिलकुल) सूनी।
ऐसी उजड़ी हुई दुनिया को एकाऐकी जगमगा देने का सेहरा तुम्हारे सर होगा, इसका यकीन भी न था। पिछली बातें ऐसी पिछली बातें बन चुकी हैं कि उनके हकीकी ( सच) होने में भी शुब्ह (शक) है। फिर ऐसे में भी तुम ये करते हो कि मेरे पीछे मेरी इसे दुनिया को ठुकराकर उस दुनिया में जा बसते हो जो तुम्हारे लिए गुजरी बात बन चुकी है और फिर अक्सर ऐसी बातों पर मग्मूम ( दुखी) होते हो जिन पर ग़म करने का अब तुम्हें कोई हक नहीं रहा मेरे दोस्त !
आओ, प्यार कर लूं तुम्हें। न मालूम किन नज़रों से इन सतरों को पढ़ रहे हो। इस तसव्वुर को ज्यादा मज़बूत नहीं करना चाहती वरना मेरे हाथ थरथराने शुरू होंगे शिद्दते-ज़ज्बात से और फिर मुझसे कुछ भी तो न लिखा जाएगा।
तुमसे मिलने को हर मिनट जी चाहता है। इस ज़ब्ते-नफ़्स (भावना पर नियंत्रण) का कुछ सवाब भी है या नहीं, ये तुम बताना। हां सुनो ! इस जुमे को सलमा देहली जा रही हैं, सईदा भी। सलमा को कपड़े खरीदने हैं, दुल्हन बनने के लिए। मेरी राय और मेरा इंतेखाब ( चुनाव) बहुत अहम् है इस मुआमले में, चुनांचे मुझे साथ ले जा रही हैं, चली जाऊं ? तुम्हारी आप शाहिदा से भी मुलाकात होगी, तुम्हारे मजाज़ से भी।
मुझे मुफस्सिल सा ख़त लिखना। महज़ प्यार की बातें लिखकर ताल देते हो मुझे। ये भी लिखना कि कैसे रहते हो और क्या करते हो ?
देहली से क्या मंगाते हो अपने लिए ? न बताओ मैं ख़ुद ही अपनी मर्ज़ी से ले आउंगी उलटी-सीधी चीज़ें, फिर उन्हें बरतना ही पड़ेगा तुम्हें।
आओ मेरे करीब , प्यार कर लूं तुम्हें। शब बखैर...

तुम्हारी सफ्फो


( सफ़िया अख्तर मशहूर शायर जांनिसार अख्तर की पत्नी थीं। जांनिसार के नाम लिखे उनके पत्रों का हिन्दी में पुस्तकाकार अनुवाद कथाकार-नाटककार असगर वजाहत ने कुछ अरसा पहले 'तुम्हारे नाम' शीर्षक से किया था। यह अनुवाद उसी पुस्तक से साभार लिया गया है। कहना न होगा कि अदब और अदीबों की दुनिया में ना-कुछ की हैसियत रखनेवाली सफ़िया का ख़त उर्दू नस्र का बेजोड़ नमूना है। इस स्तंभ के अंतर्गत इससे पहले आप फ़िराक़ गोरखपुरी को पढ़ चुके हैं।)

11 comments:

ravindra vyas said...

पिछली बातें ऐसी पिछली बातें बन चुकी हैं कि उनके हकीकी ( सच) होने में भी शुब्ह (शक) है।

अनुरागजी, तबियत कुछ ऐसी है कि कुछ बातें अोस की तरह रूह पर गिरती महसूस हो रही हैं...
कितना प्यारा खत है।
या अल्लाह, मुझे ऐसी ज़बान बख्श दे...

Parul said...

पोस्ट के लिये आभार
सीखने के दौर मे हम भी हैं कहीं-सो दाग़ का एक शेर याद आ गया-
"नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़ुबां आते आते"

sanjay patel said...

अनुराग भाई,
ये किताब मेरे दिल के बहुत पास है और बताती है कि दो इंसान किस शिद्दत से एक दूसरे से मुहब्बत कर सकते हैं.पूरी किताब पढ़ें तो समझ में आता है कि किस क़िस्म का अभाव इन लोगों ने झेला था फ़िर भी अपनी सलाहियतें नहीं खोई.

आपने बड़ा नेक काम किया इसे अपने ब्लॉग पर शाया कर.दुआएं.

महेन said...

जांनिसार को जितना भी जाना बज़रिये मंटो जाना। उसमें कहीं सफ़िया का ज़िक्र नहीं था।
लगता है पूरी किताब ही खरीदनी पड़ेगी।

rachana said...

padh de bahut achchha laga khat hai sunder shabdon ka jamghat aap ka dhanyava
saader
rachana

नीरज गोस्वामी said...

बेहतरीन किताब है ये...बताती है की कितनी जद्दो जहद करनी पढ़ती है अदीबों को दो वक्त की रोटी और घर की जुगाड़ में...पल पल जानिसार के लिए तड़पती साफिया के ख़त लाजवाब हैं...और इसमें हमारे आज के जावेद अख्तर साहेब के कारनामे भी हैं जिन्हें वो जादू कह कर बुलाती थीं...शुक्रिया आप का इस किताब का ये ख़त दुबारा पढ़वा कर...
नीरज

ravindra vyas said...

पारूल, यह सिर्फ़ भाषा की बात नहीं है।

शिरीष कुमार मौर्य said...

अच्छा चयन !
अच्छी पोस्ट अनुराग !!

khadija said...

Bohat khushqismat hote hain wo log jinhein unki muhabbat mil jati hai ta-umr k liye!!!!!!!
post behad saada hai or hamesha ki tarah....
mujhe boht pasand aya...
"DIL CHHU GAYA"
Or kya likhun........

Madhuri said...

Maine kafee pahle kuchh khat padhe the Dainik Bhaskar ke sunday edition Rasrang me..yahan padhkar bahut achchhha laga.

Madhuri said...

काफ़ी अरसा पहले कुछ ख़त दैनिक भास्कर के रसरंग में पढ़े थे..रसरंग आज भी मेरे पास सुरक्षित है..यहाँ पढ़कर बेहद ख़ुशी हुई..