एक ही भाषा नहीं
व्योमेश शुक्ल
मलयाली कवि के. सच्चिदानंदन समसामयिक हिंदी कविता के अनूठे दोस्त हैं। उनकी कविता की अंतर्वस्तु, प्रतिक्रिया करने की पद्धतियाँ, मुख्यधारा की राजनीति के पतन का हिस्सा बन जाने को लालायित वामपंथी भटकन के प्रति उनकी चिढ़, और फिर भी मार्क्सवाद को एकमात्र विकल्प मानने की अक्सर अदृश्य और कभी-कभी ज़ाहिर ज़िम्मेदारी उनके साथ आज की हिंदी कविता के रिश्ते को एक आदर्श तनाव में स्थापित कर देती है। हालाँकि, इसके अलावा आप मलयाली जीवन-संस्कृति की अनेक खुश और उदास, बेबस और प्रचंड , अतिसाधारण और असामान्य फिल्में भी उनके यहाँ देख सकते हैं। इस कविता में स्मृतियों, जगहों , लोगों प्रकृति और लगावों का ऐसा वैभव मुमकिन हुआ है जिसमें डूबकर मुग्ध, विस्मृत या आत्महीन नहीं हुआ जा सकता। सच्चिदानंदन की कविता कभी भी ऐसी सहूलियत ख़ुद को या अपने पाठकों को नहीं देती।
उनकी कविताएं सरलता लगभग हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं और एक आश्चर्यजनक उमंग के साथ मिथकों, पुराकथाओं, मनुष्येतर प्रकृति के उपेक्षित नायकों के शरीर और आत्मा में दाख़िल होकर वहीं से कुछ उनकी, कुछ अपनी बातें कहने लगती हैं। उनके उदबोधनों का यह स्थाई नैसर्गिक मंच है। यहीं से वह सभ्यता और जिंदगी को सेलिब्रेट करते हैं, पतनशील राज्य की भर्त्सना करते हैं और ज़रूरत होने पर नंदीग्राम के हत्यारों तक को बेनकाब कर डालते हैं।
साहित्य संसार के कुछेक मूर्धन्यों के मन में जब इसी बात पर भ्रम और संशय है कि सिंगूर और नंदीग्राम के असल खलनायक कौन हैं; और वे वंचित मनुष्यता के हक़ के लिए किसी भी हद तक जाकर प्रतिकार करने वाली महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर जैसी शख्सियत पर शक करने के प्रस्ताव कर रहे हैं, सच्चिदानंदन की खुली, साफ, निर्भ्रान्त और उत्तेजित पक्षधरता हमें बहुत दूर तक राहत पहुँचाती है। ऐसी कविताएं पाठक को अपने गांव-कस्बे, अपने जनपद अपनी दुनिया का नागरिक बना लेती हैं और भूमंडल को जगह आईने में देखने की पेशकश करती हैं। सच्चिदानंदन की कविताएं पढ़ते हुए यह तथ्य भी एक विलक्षण बोध से आपको संपन्न करता हुआ सामने आता है कि लौकिक रूप से इतर भाषा में लिखी जाकर भी यह हमारी समस्याओं, हमारे समाधानों की कविता है और किसी भी तकलीफ की एक ही भाषा नहीं होती।
कविताएं
शाकुंतलमहर प्रेमी अभिषप्त है
भूल जाने को, कम से कम कुछ देर के लिए
अपनी स्त्री को : जैसे विस्मरण की नदी
अपने ही प्यार पर बाढ़ ला दे
हर प्रेमिका अभिशप्त है
तब तक भुला दिए जाने को जब तक उसका रहस्य
स्मृति के जाल में फँस नहीं जाता
प्रत्येक शिशु अभिशप्त है
पितृहीन बड़ा होने को
शेर के मुँह में अपना हाथ डालकर
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हिन्दू
मैं एक श्रेष्ट हिन्दू हूँ
मैं कुछ नहीं जानता
कोणार्क या खजुराहो के बारे में
मैंने कामसूत्र को छुआ तक नहीं है
मैं उल्टी करने लगूंगा अगर दुर्गा या सरस्वती को
नग्न देख लूँ हमारे देवी देवता कामहीन हैं
जो कुछ भी उनका था
हमने चढ़ा दिया काशी और कामाख्या पर
कबीर के राम को हमने कैद कर लिया
अयोध्या में, और गाँधी के राम को,
उनके अपने जन्मस्थल पर ज़िंदा जला दिया
भगवा ध्वज से अपनी आत्मा को बदल डालने के बाद
हरेक भिन्न रंग मुझे पागल कर देता है
निकर के नीचे मेरे पास....एक चाकू है
औरतों के सिर चूमने के लिए नहीं
काट डालने के लिए होते हैं
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राष्ट्र
राष्ट्र ने मुझसे कहा
तुम मेरे ऋणी हो
हवा के लिए जिसमें तुम साँस लेते हो
पानी के लिए जो तुम पीते हो
खाने की रोटी के लिए
चलने-फिरने की सड़क के लिए
बैठने की ज़मीन के लिए
मैंने राष्ट्र पूछा
तब जवाब कौन देगा ?
मेरी माँ को जिनका गला घोंट दिया गया
मेरी बहन को जिसने ज़हर पी लिया
दादी को जो भीख माँगती भटकती रही
मेरे पिता को जो भूख से मर गए
मेरे भाई को जो तुम्हें आज़ाद कराता हुआ जेल चला गया
मैं किसी खेमे की नहीं हूँ, हवा ने कहा
कोई मेरा मालिक नहीं, पानी ने कहा
मैं ज़मीन से पैदा हुई, रोटी बोली
मैं सीमाओं की परवाह नहीं करती, सड़क ने कहा
घास का कोई दोष नहीं होता, ज़मीन ने कहा
तब प्यार के साथ
राष्ट्र ने मुझे ऊपर उठा लिया
गोद में और कहा
अब क्या तुम मानते हो कि राष्ट्र सचाई है ?
लहुलुहान गर्दन से गिरता ख़ून ज़मीन पर फैल गया
' राष्ट्र की जय हो '
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नन्दी
वे आए
सुनिश्चित चाल और लाल झंडों के साथ
हमारे अपने अपने कॉमरेड
उन्होंने हमें दी ज़मीन, पानी, बादल, आत्मवत्ता
वे फिर आए
काली बंदूकों और डगमगाते क़दमों के साथ
हमारे अपने शत्रु
उन्होंने छीन ली हमसे हमारी
ज़मीन, पानी, बादल, आत्मवत्ता
झंडे यों भी लाल कर दिए जाते हैं
हँसिया स्वस्तिक में बदल जाती है
हथौड़ा भी वहां करने लग सकता है खूनी पंजों को
सितारा दूसरे झंडों पर भी सवार हो सकता है
लेनिन-लेनिन का उद्घोष
सलीम-सलीम के जयकारे में परिणत हो सकता है
उक्रेन, प्राग, ब्रातिसलेवियारूमानिया
रूमानिया, कम्पूचिया, अल्बानिया
उन बड़ी मूंछों की बाढ़
अभी तक थमी नहीं है
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पेड़
कोई कभी कह नहीं सकता
कि कब पेड़ चलना शुरू कर देंगे
और कहाँ के लिए
उनके पैर खास तत्पर हैं और
उनके हाथ झूम ही रहे हैं
उन्हें याद हैं
वे जगहें जो उन्होंने छोड़ीं
और मालूम है पता वहां का
जहाँ पहुँचाना है
चिडियाएँ चढ़ती-उतरती भर
नहीं हैं पेड़ों पर
पेड़ उन्हें अपनी शाखों
के इशारे से बुलाते हैं
और उन्हें उनके नामों से पुकारते हैं
पेड़ों के ऊपर लगा फलों का मेला
उन्हें निमंत्रित करना बंद कर देता है
तब भी कुछ कृतज्ञ पक्षी
ढांपे रहते हैं उन्हें
सर्दियों में गर्म रखने के लिए
पेड़ न अस्तित्ववादी हैं
न आधुनिकतावादी
फिर भी उनके पास विचार तो हैं
ये वो बात है जिसे हम कलियों के तौर पर देखते हैं
उन्क्की कामनाएं फूल हो जाती हैं
जितनी दूर तक उनके पास वसंत कि याद है
वे बुढ़ापे कि शिकायत नहीं करते
जब स्मृति का अवसान होने लगता है
वे छोड़ देते हैं दुनिया
अपनी पत्तियां गिराते हुए
जब मृत्यु आती है
वे चुपके-चुपके झुक जाते हैं आगे की ओर
जैसे वे गिलहरियों के लिए झुकते हैं
जैसे ही वे गिरते हैं वे भेजते हैं
एक अवशेष धरती के जरिये
अपनी अनावृत जड़ों से
एक नवांकुर
अपने बालसुलभ आश्चर्य में धरती को टकटकी लगाकर देखता है
सूर्य उसे आशीष देता है
पक्षी उसकी मंगलकामना में गीत गाते हैं
जन्म की खुशी मनाने के लिए
बिस्मिल्ला खां अपनी शहनाई बजाते हैं
सातवें आसमान से
****
नागफनी
कांटे मेरी भाषा हैं
मैं अपने होने का उद्घोष करता हूँ
एक रक्तिम स्पर्श के साथ
कभी ये कांटे फूल थे
मैं दगाबाज प्रेमियों से नफरत करता हूँ
कविओं ने मरुस्थल से कन्नी काट ली है
बगीचों की ओर लौटने में
सिर्फ यहाँ ऊँट बचे, और व्यापारी
जो रौंद डालते हैं मेरी लाली को धूल में
पानी की हर दुष्प्राप्य बूँद के लिए एक काँटा
मैं तितलियों को नहीं ललचाता
कोई चिड़िया मेरी प्रशंषा में गीत नहीं गाती
मैं अकाल नहीं उपजाता
मैं एक भिन्न सौन्दर्य रच लेता हूँ
चंद्रमा की रोशनी के पार
सपनों की ओर
एक तीखी, भेदक
प्रतिभाषा
****
घोंघा
तुम कहाँ घिरे हुए हो
तुम्हारा घर तुम्हारी पीठ पर
और तुम्हारे नन्हें सींग सतर्क
किस यात्रा के लिए
गीली लकड़ी पर फूल
काई के सफ़ेद आशिक
शिथिल दार्शनिक
मनुष्यों के उन्मत्त संसार की जो खिल्ली उड़ाता है
क्या ये तुम्हारा बाहर है जिसे हम देखते हैं
या तुम्हारा भीतर ?
तुम हमारे लड़ाई-झगड़ों को चुनौती देते हो
और त्वचा के नीचे तक उतर गए हमारे भेदभाव को
तुम जामे रहते हो हमारे दिनों और यादों पर
शुरू से आखिर तक
लेकिन हम
हम प्यार तक हड़बड़ी में करते हैं
हम दुनिया बदलने के लिए भी भागमभाग करते रहते हैं
तुम कहते हो हमसे : समय अंतहीन है
धीमे-धीमे तुम फुसफुसाते हो
तुम्हारी चिपचिपी चेतावनी
चुपचाप आह्वान करती है
उस संसार का जिसे हमने गंवा दिया है
एक पृथ्वी जो धीरे-धीरे चक्कर लगाती है
एक सूर्य जो धीरे-धीरे उगता है
एक चंद्रमा जो धीरे-धीरे पृथ्वी की परिक्रमा करता है
धीरे बारिश
धीरे संगीत
धीरे जीवन
धीरे मृत्यु
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जब हाथी नहाता है
जब हाथी नहाता है
हम देखते हैं सिर्फ
एक घना अँधेरा पर्दा छाते की तरह और
एक उतुंग सूंड पाइप की तरह
अब मछलियाँ नाचने लगती हैं चारों ओर
उसके पैरों के, घासें
उसकी नाम देह को गुदगुदाती हैं
जंगल अपने शेरों, भेड़ियों
और पक्षियों के साथ अपनी तंग आँखों को तृप्त कर लेता है
उसके पृष्ट पर लगी हुई धूल
तांबें में सने सोने की तरह चमकती है
कीचड़प्लावित तालाब लहराने लगता है
एक जंगली सोते की तरह
जब हाथी नहाता है
हमारे त्योहार
व्याकुल कर देने की हद तक
तुच्छ दिखाई देते हैं...साजोसामान
से प्रसन्न नहीं होता हाथी
आप उसे रोते देख सकते हैं
पर्वों की शोभायात्राओं में
हाथियों और मनुष्यों की नियति पर विलाप करते हुए
जब हाथी नहाता है
गर्मी उस सूँड में से होती हुई गम हो जाती है
और मानसून आ जाता है
वन्य चांदनी उन आखों में
समा जाती है
पानी गाता है हिंडोल
तालाब में उसके एक डबाक पर
समग्र जंगल की खुशबू
एक फूल में
लोगों को दीवाना कर देती है
प्यार बंदिशें तोड़ देता है खुद की
आज़ादी बिगुल बजाती है
और अक्षर उसकी सूंडों को उठा देते हैं ऊपर
वसंत के स्वागत में।
****
( प्रख्यात मलयाली कवि सच्चिदानंदन ने हमारे विशेष आग्रह पर अपनी मलयाली कविताओं का स्वयम अंग्रेजी में अनुवाद करके भेजा था। इसके आधार पर ही युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने इन्हें अनूदित किया है। व्योमेश के हेराल्ड पिंटर के अनुवाद को लोगों ने पहले भी पसंद किया है। हम इन दोनों कविओं के सहयोग के लिए आभारी हैं। )

Thursday, 23 October, 2008
जब हाथी नहाता है, शाकुंतलम और हिन्दु तो अद्भुत कविताएँ हैं। अनुवाद भी बेहद खूब।
Friday, 24 October, 2008
सच्चिदा की एक और महत्वपूर्ण, स्मरणीय कविता अभी यहां भोपाल में सप्ताह भर पहले कवि मुख से सुनने को मिली थी। ये कविताएं भी बहुत अच्छी हैं। सच्चिदा जी भारतीय कविता का प्रतिनिधित्व करनेवाले कवि हैं। व्योमेश, आप और सच्चिदा तीनों को बधाई। सक्रियता के लिए शुभकामनाएं।
Friday, 24 October, 2008
सच्चिदानंदन जी की इन कविताओं में एक नयी आवाज़ है जो उनकी ही किसी पुरानी और विस्मृत आवाज़ से जाकर मिल गई है. 'हिन्दू', 'राष्ट्र', 'नंदी' कविताएँ बाहर निकलकर और आगे बढ़कर लिखी गईं हैं. इनके अन्दर झनझनाता हुआ दुःख और साहस काबिले-दीद है. कविताओं के साथ दी गयी परिचयात्मक टिप्पणी भी अच्छी है.
Friday, 24 October, 2008
अच्छी कविताएं - अच्छे अनुवाद !
महान सच्चिदानंदन!
- अच्छा व्योमश और उनता ही अच्छा अनुराग!
Sunday, 26 October, 2008
जेनुइन कविताएं। विचारोत्तेजक और साहसी स्वर...बधाई दोस्त।
Tuesday, 28 October, 2008
तुम कहते हो हमसे : समय अंतहीन है
धीमे-धीमे तुम फुसफुसाते हो
तुम्हारी चिपचिपी चेतावनी
चुपचाप आह्वान करती है
उस संसार का जिसे हमने गंवा दिया है
एक पृथ्वी जो धीरे-धीरे चक्कर लगाती है
एक सूर्य जो धीरे-धीरे उगता है
एक चंद्रमा जो धीरे-धीरे पृथ्वी की परिक्रमा करता है
धीरे बारिश
धीरे संगीत
धीरे जीवन
धीरे मृत्यु
यही कवि की ही आंख हो सकती है जो घोंघे के जरिये हमारा एक बड़े मार्मिक सत्य से साक्षात्कार कराता है। हाथी और नागफनी भी ऐसी ही मार्मिक कविताएं हैं। पढ़ते हुए लगा नहीं कि यह अनुवाद है।
Wednesday, 29 October, 2008
bade kavi ki badi kavitayen.....
ham hindiwale aisa kuchh kab tak likh paayenge ?
Monday, 23 July, 2012
बहुत बढ़िया अनुवाद !
Friday, 05 April, 2013
इतना अच्छा ब्लाग, इतनी जानकारी मन प्रशन्न हो गया।
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