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डायरी : २ : कृष्ण बलदेव वैद


( कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के कथा परिदृश्य में अपनी विरल उपस्थिति के कारण जाने जाते हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ उन्हीं अर्थों में कथा कृतियाँ नहीं हैं जिनकी चिर-परिचित छवि हमारे मन में परम्परित कथाकृतियों को पढ़ कर बनी है। वैद ने अपने फॉर्म और कंटेंट को लेकर लगातार प्रयोग किया है और अब भी उनमें प्रयोगशीलता और जोखिम उठाने का माद्दा कम नहीं पड़ा है। कहना न होगा कि हिन्दी में अपनी इस प्रयोगवृत्ति के कारण उन्हें लेकर एक नासमझी का भी माहौल बना है जो प्रकारांतर से उसकी क्षीण पड़ती आलोचनात्मक मेधा का ही परिचायक है। हालाँकि वैद और उनके जैसे लेखकों की अब तो एक बड़ी जमात ही है, पर वैचारिक असहमतियों आदि का बहाना बना लोग अब भी ऐसे लेखकों की कृतियों पर विचारने-बतियाने से कतराते हैं। होना यह चाहिए कि इस ओर एक सच्चा और निर्भीक आलोचनात्मक उद्यम के लिए हम एक माहौल बनाएं। इसके लिए यह आवश्यक है कि अवसर और औचित्य की चिंता किए बगैर इस करुण तथ्य की ओर इशारा किया जाए। यहाँ भी यही करने की मंशा है।
आगे आप वैद साहब की तीसरी डायरी, '' डुबोया मुझको होने ने '' के अंश पढ़ेंगे जिसे ज्ञानपीठ ने हाल ही में प्रकाशित किया है। इससे पहले सबद पर उनकी पिछली डायारियों के बारे में आप पढ़ चुके हैं। इस बार उनसे और प्रकाशक की इजाज़त से हमने उसके एक महत्वपूर्ण अंश को छापने का निर्णय लिया है। यह अंश जितना वैद के अंदाजे-बयां से तार्रुफ कराता है उतनी ही शिद्दत से मूर्धन्य भारतीय चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन से अपने लगावों और उनके बहुरंगी व्यक्तित्व के बारे में भी बताता है। दी गई चित्र कृति स्वामी की ही है। सबद पर इससे पूर्व आप कवि मंगलेश डबराल की डायरी भी पढ़ चुके हैं।



आज सुबह (२५.४.९४ ) स्वामीनाथन चल बसा। अचानक।

हम पाली और आशा के साथ नाश्ता कर रहे थे और उसके समधियों के घर जाने को तैयार बैठे थे कि अशोक का फ़ोन आया कि कुछ ही देर पहले उन्हें खबर मिली कि स्वामी बेहोश हो गया है। मैंने स्वामी के घर फोन किया तो कालीदास ने बताया कि स्वामी बचेगा नहीं। हम उसी वक्त स्वामी के घर को चल दिए। पता नहीं मैंने गाड़ी कैसे चलाई। हमारे वहां पहुँचने से पहले ही स्वामी जा चुका था। जब हम ऊपर पहुंचे तो स्वामी की लाश उस बड़े कमरे में पड़ी हुई थी जिसमें वह काम किया करता था। धोती, दाढ़ी, मुंह खुला, बाल दीवान के सिरे से नीचे लटक रहे थे। मनजीत बावा उसके हाथ पकड़े उसके पास यूँ बैठा था जैसे उसके जाग उठने का इंतज़ार कर रहा हो। मैंने स्वामी को छुआ और छूते ही मैं फूट पड़ा, मनजीत मेरे साथ।

रिश्तेदार और चित्रकार दोस्त आ रहे थे। भिवानी की हालत ख़राब थी। स्वामी की बहनें चुपचाप रो रही थीं। कालिदास और हर्षा इधर-उधर डोल रहे थे। स्वामी सबसे बेखबर और दूर था।

शाम। कुछ ही देर पहले श्मशान घाट से लौटे। जब स्वामी की लाश पर लकडियां रखी जा रही थीं तो रामू मेरे साथ खड़ा था। उसका ग़म बातों में बह रहा था, मेरा खामोशी में। अशोक भी ऐसे अवसरों पर खामोश नहीं रह पाते।

कल रात नींद कई बार टूटी।

स्वामी के चाहने वालों को उसके दोष भी उसके गुण नज़र आते थे -- मसलन उसका न नहाना, उसकी बदपर्हेजियाँ, उसके आत्मालाप, उसका अंहकार। वह बिलाशक एक असाधारण बल्कि विलक्षण शख्स था। डॉक्टरों से वह डरता था। वह अपना डॉक्टर आप था। अपनी नब्ज़ टटोलता रहता था, अपने लिए दवाइयाँ भी खुद ही तजवीज़ करता रहता था। दांत का दर्द हो या दिल का, अपना इलाज वह खुद ही कर लिया करता था। धार्मिक नहीं था, आध्यात्मिक था। उसकी आवाज़ में हरारत और मुस्कराहट में शरारत थी।
एक बचकाना-सी सादगी।

स्वामी एक बहुत बड़ा अभिनेता या नेता भी हो सकता था। लेकिन वह अदंर से एक मस्तमौला, फक्कड़ और एक निहायत मौलिक कलाकार ही था।

उसे अपने परिवार से अथाह प्यार था। बातें करते-करते वह खो जाता था और खोया-खोया सजग हो उठता था।

स्वामी की आँखों की गहराइयों में लोग अक्सर खो जाया करते थे।

पी कर वह पीरोमुरशिद भी हो सकता था और गुस्सैल भेड़िया भी।

उसके घर की बेसरोसामानी में भी एक विलक्षण सलीका था।

गुस्सा और गमगुसारी। अतिभावुकता और अतिसंयत समझ-बूझ। बज़्मआराई और एकान्तप्रियता। लगन और अलगाव। खुदी और बेखुदगी। जलवत और खिलवत।

शामों का शहंशाह। पीरेमुगां। रिन्दाना बांकपन।
अपना मज़ाक उड़ाने की क्षमता। अपनी गलतियों को कबूल कर लेने की क्षमता। बेगर्जी की क्षमता।

शाम। अभी-अभी स्वामी के घर से लौटे हैं। मनजीत वहीं था। कुछ देर बाद अशोक भी आ गए। कालिदास अजीजाना अंदाज़ में मेरे पास बैठा रहा। कल शोक सभा है।

कल शाम त्रिवेणी में स्वामी की याद में हम सब इकट्ठे हुए। हाल भर गया। बोलने वालों में मैं भी था। बाद में हर्षा ने धीमे से मेरे कान में कहा -- आप जो बोले वह सबसे अच्छा था। हॉल से बहार निकलते ही मैं ठोकर खाकर बुरी तरह गिरा। बच गया लेकिन दोनों टांगें छिल गईं। रास्ते में आईआईसी में रुके। जब बाकी लोग चले गए तो रामू बहुत उदास नज़र आया, इसलिए हम कुछ देर उसके साथ बैठे रहे। जब हम चलने लगे तो रामू बोला कि अगर वह हमारे साथ हमारे घर चले तो हमें कोई एतराज़ तो नहीं होगा। हमने पुरतापाक तरीके से उसे साथ ले लिया। वह बंगाली मार्किट वाले अपने कमरे में उस रात अकेला नहीं सोना चाहता था। हम आधी रात घर पहुंचे। स्वामी कि याद में एक-एक जाम और लिया, खाना खाया, स्वामी को याद किया, और दो बजे सोए।
जब मैं बोल रहा था तो मेरी नज़र कृष्णा और अमजद अली खाँ पर बार-बार जा टिकती रही। जब-जब मेरी आवाज़ में उर्दू का रंग आया तब-तब अमजद का सर सराहना में हिला।

अभी-अभी कालिदास से बात हुई। भिवानी के बारे में बात हुई। डॉक्टर उसे वेलियम देना चाह रहा है। कालिदास ने बताया कि स्वामी कोई वसीयत नहीं छोड़ गया है, इसलिए कई कानूनी झमेले उठेंगे। गेलरी वाले भी बेईमानियाँ कर रहे हैं। बैंक में जो पैसा है उसे हाथ नहीं लगाया जा सकता।

स्वामी का मातम कर रहा हूँ इसलिए काम नहीं हो रहा। बार-बार मृत स्वामी कि बंधी हुई दाढ़ी सामने आ जाती है। उसके जबड़ों को बंद करने के लिए उन्हें बांधना पड़ा था। उसके माथे का ठंडा स्पर्श मुझे याद है, और उसके सरहाने बैठी उसकी बहन का झुका हुआ चेहरा। उसके जाने के बाद अब कृष्णा के सिवा मेरा कोई समकालीन दोस्त बाकी नहीं रहा।
****
5 comments:

शायद यह संयोग है कि कल भोपाल में मेरे चित्रों की नुमाइश के दौरान मैं और अखिलेशजी चित्रकला पर बात कर रहे थे तो अखिलजी ने बहुत गहराई से स्वामीजी को याद किया। वैद साहब ने मार्मिकता के साथ उन्हें याद किया। स्वामीजी की पेंटिंग मैंने भोपाल में मंत्रमुग्ध होकर देखी थीं। वैद साहब को पढ़ते हुए वह सब याद आ रहा है।


अनुराग जी, "सबद" मैं निरंतर देखता और पढ़ता रहता हूँ। प्रतिक्रिया देने में आलस्य कर जाता हूँ। साहित्य और साहित्यकारों से जुड़े हिन्दी में अच्छे ब्लॉग न के बराबर हैं। "सबद" इस कमी को महसूस नहीं होने देता। "सबद" की हिन्दी ब्लॉग्स में एक पृथक पहचान है, आशा है आप इसे बनाये रखेंगे।


कृष्ण बलदेव वैद ne jis शिद्दत से मूर्धन्य भारतीय चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन ko yaad kiya hai. wah वैद ke prem ka tarika hai shayad. humne to is maut ke aalekh mein जगदीश स्वामीनाथन ki Zindgi ke baare mein jaana.

Thanks AV is aalekh ko hamare liye jutane ke liye.


Bhai, ye kitab yanee diary maine padhee. main to niraash hi hua. han, is mandlee ke khokhlepan ke chitra zaroor mile. aap kaise ho, badhiya kaam kar rahe ho beshak


ये "एक ज़िद्दी धुन" बहुत साफ़ बात कहती है और सही भी ...मै सहमत हूं इस बात से.
आपका काम भी अपनी जगह है अनुराग !
सार्थक और सधा हुआ !


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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