Thursday, October 02, 2008

कोठार से बीज : ४ : रघुवीर सहाय



( हिन्दी के जिन कविओं का अपने समय और बाद की कविता पर बहुत सीधा, निर्णायक और सार्थक असर रहा, रघुवीर सहाय उनमें से एक थे। उन्होंने कविता को इस योग्य बनाया कि उसकी तरफ उम्मीद से देखा जा सके : उसकी ज़रूरत महसूस हो। उनकी ऐसी अनेक स्मरणीय कविताएं हैं जिनसे इस अंधेर समय में रोशनी के कल्ले फूटते हैं।
मसलन यही : कुछ तो होगा / कुछ तो होगा / अगर मैं बोलूँगा / न टूटे / तिलस्म सत्ता का / मेरे अदंर / एक कायर टूटेगा / टूट मेरे मन / अब अच्छी तरह से टूट / झूठ मूट मत अब रूठइसीलिए रघुवीर सहाय को याद करना कभी-कभी निराशा का कर्तव्य भी लगता है। कोठार से बीज में इस दफा गद्यकार रघुवीर सहाय। आगे दिए गए गद्य के टुकड़े सुरेश शर्मा द्वारा संपादित रघुवीरजी के गद्य चयन, '' यथार्थ यथास्थिति नहीं '' से हैं जिसे चयन में से एक और चयन भी कहा जा सकता है। )

जो कविता बचा लेती है

कविता क्या चीज़ें बचा सकती है ? बहुत सोच करके देखूं तो भी मैं उसको कुछ पहचानी जाने वाली शक्लों में नहीं देख पाता -- सिवा इसके कि कुछ चीज़ें हैं जो कि रोज हम अपनी जिंदगी में करते हैं या पाते हैं और हर वक्त एक तरह की भावना से आक्रांत रहते हैं कि ये हमें रिआयतों के रूप में मिली हैं, जबकि वे हमारे अधिकार हैं। उन चीज़ों को अगर बचा रखा जा सके तो हम सोच सकते हैं कि कभी-न-कभी हम इनको अपने अधिकार की तरह से बरतेंगे। आप कह सकते हैं कि मैं चाहता हूँ कि इस बात को बचा रखा जाए कि बच्चा अपनी माँ और अपने बाप के साथ एक रिश्ता रखता है। आप कह सकते हैं कि इस बात को बचा रखा जाए कि मैं जब कोई बहुत जायकेदार चीज़ खाता हूँ तो मेरे शरीर में एक संवेदन होता है। वह बचा रखनेवाली चीज़ है।

कविता क्या करती है ?

कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। हर रचना उसे हमेशा एक बेहतर व्यक्ति बनाती है जिसने उसको किया है। रचना कम-से-कम उस व्यक्ति को जो उसे कर रहा है, एक बेहतर इंसान ज़रूर बनाती है, क्योंकि पहले तो वह इन शर्तों का अनजाने पालन करता है कि उसके मन में द्वेष नहीं है। क्रोध हो सकता है, एक तरह की छटपटाहट हो सकती है, मजबूरी हो सकती है, लेकिन हताशा नहीं है और अन्याय भी नहीं है। दूसरे कदम पर वह एक बेहतर इंसान इसीलिए बनता है कि हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है।

इस तरह वह रचना योग्य बना रहता है

यह मैं मान सकता हूँ कि अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैरबराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता। वह एक भी कविता नहीं लिख सकता -- ऐसी जिसको पढ़ कर मैं खुश होऊं कि यह कविता है। इसके उलट अगर आप यह मानें कि जो आदमी इस गैरबराबरी को हटाना चाहता है -- अब वह कैसे भी हटाना चाहता हो, वह अवधारनाओं के द्वारा हटाना चाहता हो, किसी संगठित कार्रवाई के द्वारा हटाना चाहता हो या केवल इसी के द्वारा हटाना चाहता हो कि मैं कम-से-कम नहीं करूंगा और इसकी निस्सारता को भी पहचानता हो कि मेरे अकेले यह न कर देने से होगा नहीं, लेकिन मैं करूंगा नहीं -- तो मैं समझता हूँ कि तीनों-चारों प्रकारों में वह रचना करने में समर्थ और योग्य बना रहता है।

कविता की मृत्यु और अमरत्व

कविता हुई नहीं कि मरी का मतलब सिर्फ़ यह है कि जिस क्षण आप एक कविता को पूरा लिख लेते हैं अर्थात् आप किसी एक जगह से शुरू करके यह जान लेते हैं कि आपने क्या लिखा, उसके बाद कवि के लिए उसका वह महत्व नहीं रह जाता जो कि दूसरों के लिए होता है। इसके साथ यह भी होता है कि जिस सामग्री में आपने रचना कि थी, वह ख़त्म हो जाती है। साथ ही और भी एक बात होती है कि जिस कलात्मक अनुभव को आपने दुबारा से अनुभव और अभिव्यक्त किया वह अनुभव ख़त्म हो जाता है। कभी-कभी यह भी संभव है कि वह पूरी तरह से ख़त्म न हो। तब यह भी मानना पड़ेगा कि वह कविता जो आपने उस समय लिखी है वह भी पूरी तरह से पूरी नहीं हुई।

कविता की ज़रूरत

बार-बार ऐसा वक्त आता है कि कवि को जीने का उद्देश्य समझ में नहीं आ रहा होता है। उसी वक्त कविता की ज़रूरत कवि को होती है। कविता उसे जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। कह सकते हैं कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं बनती : ख़ुद एक जीवन बन जाती है जिसका उदेश्य वह स्वयं होती है। '' कविता ख़ुद एक जीवन बन जाती है '' के क्या माने ? इस जीवन में जो भी है -- रहस्य, बोध, जिज्ञासा, राग, विरक्ति, भय और साहस वह सब कविता में एक दर्जा फर्क हो जाता है -- उसमें से ममत्व छूट जाता है। कविता नामक जीवन में मृत्यु नहीं होती : मृत्यु तो ममत्व का ही दूसरा नाम है। तब क्या उसमें अमरत्व होता है ? अवश्य होता है, परन्तु समझने की बात यह है कि ख़ुद कविता अमर नहीं होती : कविता तो इस जीवन में शायद सबसे अधिक मर्त्य है। वह हुई नहीं कि मरी... वह न जाने कैसा कवि होगा जो अपनी कविता को लेकर लगातार जी सकता होगा।

7 comments:

vikalp said...

रघुवीर सहाय ne कविता ke sahi aarth ko bataya hai
कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है तो वह कविता नहीं है। कविता swantah sukhaya hi nahi atamanushashit bhi karti hai rachiata ko

Is Aalekh ne Satya Se Sakshatkar karwaya hai hum jaise parshichhuon ko.

Geet Chaturvedi said...

कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है तो वह कविता नहीं है।

यही तो सही है.

Ek ziddi dhun said...

`यह मैं मान सकता हूँ कि अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैरबराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता। वह एक भी कविता नहीं लिख सकता -- ऐसी जिसको पढ़ कर मैं खुश होऊं कि यह कविता है।` Beshak Raghuveer Sahay hi Muktibodh ke baad aise kavi hain, jinhone apne samkaleen aur baad ke kaviyon par gahra asar daala. ismein koi hairani nahi honi chahiye ki Asad, Manglesh, Manmohan, Vishnu Nagar aadi samarth kaviyon ki poori jamaat par Sahay ka behad positive asar hai, halanki ye kavi waampanthi vichardhara ke hain aur Sahay is tarh communist nahi the. lekin unki kavitaon ke jo swar hain, ve pro vaam to hai hee. Shayad yahi vajah thee ki jab NAMWAR SINGH aapatkaal mein Indira kee bansi baja rahe the aur pyare Gyanranjan bhi PAHAL main aisa hi kuchh kar baithe the tab UTTARARDH ne aapatkal ke virodh mein RAGHUVEER SAHAY ki kai kavitayen di theen. Sahay ka gady aur unki kavitayen aur kahaniyan bhi sahitya ko bhasha ke jhoothe chhal se mukt kar seedhe kharee saarpoorn baat kartee hain

ravindra vyas said...

कविता तो इस जीवन में शायद सबसे अधिक मर्त्य है। वह हुई नहीं कि मरी... वह न जाने कैसा कवि होगा जो अपनी कविता को लेकर लगातार जी सकता होगा।
पर कवि है कि उसे छाती पर उठाए जिए ही चला जा रहा है...

'उदय' said...

... aabhaar !!!

Prem Prakash said...

कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है तो वह कविता नहीं है...सहाय जी जो कह रहें हैं उसे ही मुक्तिबोध ने "व्यक्तित्वान्तरण" कहा है...!

Brajesh pandey said...

EK achhi prastuti.kavita ke vajood aur uske jarooripan ko vishleshit karte ye note bade hi samayanukul hain.kavita ka samay kb hai aur samay ki kavita kya hai ,janna jaroori bhi hai aur mahatvapurn bhi.