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Showing posts from October, 2008

सबद विशेष : ५ : के. सच्चिदानंदन की कविताएं

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एक ही भाषा नहीं

व्योमेश शुक्ल

मलयाली कवि के. सच्चिदानंदन समसामयिक हिंदी कविता के अनूठे दोस्त हैं। उनकी कविता की अंतर्वस्तु, प्रतिक्रिया करने की पद्धतियाँ, मुख्यधारा की राजनीति के पतन का हिस्सा बन जाने को लालायित वामपंथी भटकन के प्रति उनकी चिढ़, और फिर भी मार्क्सवाद को एकमात्र विकल्प मानने की अक्सर अदृश्य और कभी-कभी ज़ाहिर ज़िम्मेदारी उनके साथ आज की हिंदी कविता के रिश्ते को एक आदर्श तनाव में स्थापित कर देती है। हालाँकि, इसके अलावा आप मलयाली जीवन-संस्कृति की अनेक खुश और उदास, बेबस और प्रचंड , अतिसाधारण और असामान्य फिल्में भी उनके यहाँ देख सकते हैं। इस कविता में स्मृतियों, जगहों , लोगों प्रकृति और लगावों का ऐसा वैभव मुमकिन हुआ है जिसमें डूबकर मुग्ध, विस्मृत या आत्महीन नहीं हुआ जा सकता। सच्चिदानंदन की कविता कभी भी ऐसी सहूलियत ख़ुद को या अपने पाठकों को नहीं देती।

उनकी कविताएं सरलता लगभग हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं और एक आश्चर्यजनक उमंग के साथ मिथकों, पुराकथाओं, मनुष्येतर प्रकृति के उपेक्षित नायकों के शरीर और आत्मा में दाख़िल होकर वहीं से कुछ उनकी, कुछ अपनी बातें कहने लगती हैं। उनके उदबोध…

डायरी : २ : कृष्ण बलदेव वैद

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( कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के कथा परिदृश्य में अपनी विरल उपस्थिति के कारण जाने जाते हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ उन्हीं अर्थों में कथा कृतियाँ नहीं हैं जिनकी चिर-परिचित छवि हमारे मन में परम्परित कथाकृतियों को पढ़ कर बनी है। वैद ने अपने फॉर्म और कंटेंट को लेकर लगातार प्रयोग किया है और अब भी उनमें प्रयोगशीलता और जोखिम उठाने का माद्दा कम नहीं पड़ा है। कहना न होगा कि हिन्दी में अपनी इस प्रयोगवृत्ति के कारण उन्हें लेकर एक नासमझी का भी माहौल बना है जो प्रकारांतर से उसकी क्षीण पड़ती आलोचनात्मक मेधा का ही परिचायक है। हालाँकि वैद और उनके जैसे लेखकों की अब तो एक बड़ी जमात ही है, पर वैचारिक असहमतियों आदि का बहाना बना लोग अब भी ऐसे लेखकों की कृतियों पर विचारने-बतियाने से कतराते हैं। होना यह चाहिए कि इस ओर एक सच्चा और निर्भीक आलोचनात्मक उद्यम के लिए हम एक माहौल बनाएं। इसके लिए यह आवश्यक है कि अवसर और औचित्य की चिंता किए बगैर इस करुण तथ्य की ओर इशारा किया जाए। यहाँ भी यही करने की मंशा है। आगे आप वैद साहब की तीसरी डायरी, '' डुबोया मुझको होने ने ''के अंश पढ़ेंगे जिसे ज्ञानपीठ ने हाल ही में …

सृजन : तुषार धवल की लंबी कविता

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( हिंदी में लंबी कविताओं के लेखन की अत्यंत समृद्ध परंपरा है। उन कविओं की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने कविता के इस विधान को साध कर सार्थक रचनाएं दीं। युवा कवि तुषार धवल की यह सद्यः लिखित कविता उसी सार्थक सृजन की एक कड़ी है जिसमें हम अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं से साक्षात होते हैं। अच्छी बात यह है कि इस विद्रूप अंकन के बाद भी कवि के पास मनुष्यों के लिए जीवनदायनी आस्था बच रहती है और कविता में उसकी पुनर्प्रतिष्ठा इन लंबी कविताओं के ज्ञात इतिहास में भी प्रीतिकर विलोम है। प्रसंगवस जोड़ दूँ की सबद पर यह तुषार की दूसरी लंबी कविता पहलेपहल प्रकाशित हो रही है। )


काला राक्षस

तुषार धवल

समुद्र एक
शून्य अंधकार सा पसरा है।
काले राक्षस के खुले जबड़ों से
झाग उगल-उचक आती है
दबे पाँव घेरता है काल
इस रात में काली पॉलीथिन में बंद आकाश

संशय की स्थितियों में सब हैं
वह चाँद भी
जो जा घुसा है काले राक्षस के मुंह में

काले राक्षस का
काला सम्मोहन
नीम बेहोशी में चल रहे हैं करोड़ों लोग
सम्मोहित मूर्छा में
एक जुलूस चला जा रहा है
किसी शून्य में

कहाँ है आदमी ?

असमय ही जिन्हें मार दिया गया
सड़कों पर
खेतों में
जगमगाती रोशनी के अ…

कोठार से बीज : ४ : रघुवीर सहाय

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( हिन्दी के जिन कविओं का अपने समय और बाद की कविता पर बहुत सीधा, निर्णायक और सार्थक असर रहा, रघुवीर सहाय उनमें से एक थे। उन्होंने कविता को इस योग्य बनाया कि उसकी तरफ उम्मीद से देखा जा सके : उसकी ज़रूरत महसूस हो। उनकी ऐसी अनेक स्मरणीय कविताएं हैं जिनसे इस अंधेर समय में रोशनी के कल्ले फूटते हैं। मसलन यही : कुछ तो होगा / कुछ तो होगा / अगर मैं बोलूँगा / न टूटे / तिलस्म सत्ता का / मेरे अदंर / एक कायर टूटेगा / टूट मेरे मन / अब अच्छी तरह से टूट / झूठ मूट मत अब रूठ। इसीलिएरघुवीर सहाय को याद करना कभी-कभी निराशा का कर्तव्य भी लगता है। कोठार से बीज में इस दफा गद्यकार रघुवीर सहाय। आगे दिए गए गद्य के टुकड़े सुरेश शर्मा द्वारा संपादित रघुवीरजी के गद्य चयन, '' यथार्थ यथास्थिति नहीं '' से हैं जिसे चयन में से एक और चयन भी कहा जा सकता है। )

जो कविता बचा लेती है

कविता क्या चीज़ें बचा सकती है ? बहुत सोच करके देखूं तो भी मैं उसको कुछ पहचानी जाने वाली शक्लों में नहीं देख पाता -- सिवा इसके कि कुछ चीज़ें हैं जो कि रोज हम अपनी जिंदगी में करते हैं या पाते हैं और हर वक्त एक तरह की भावना से आक्रांत रहत…