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अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : अंतिम किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की यह आखिरी पेशकश है। इस अपेक्षाकृत लंबी पोस्ट को भी रूचि और लगाव से पढ़ा गया है। इसके पीछे जितना काफ़्का और सिताती हैं उससे कतई कम अशोक का उद्यम नहीं है। हम इस पेशकश की समाप्ति पर पुनः उनके सहयोग के लिए अपना आभार प्रकट करते हैं। )

यह रूपान्तरण हमारी आंखों के सामने होता है। शुरू में सास्सा को लगता है कि वह एक ऐसी देह में कैद है जिसे वह उस नैसर्गिकता के साथ काबू या निर्देशित नहीं कर पाता जैसा पहले अपने प्राकृतिक हाथ पैरों के साथ कर पाता था। जब वह बोलने के लिए अपना मुंह खोलता है उसे नीचे कहीं से चिड़िया की सी दर्दनाक आवाज अपने शब्दों के साथ घुलती महसूस होती है और उस प्रतिध्वनि में उसे संदेह होता है कि उसने अपनी आवाज सुनी भी या नहीं। उसे भान होता है कि उसकी देह अकल्पनीय रूप से चौड़ी है। जब वह बिस्तर से उतरना चाहता है उसके पास हाथ पैर नहीं बल्कि कई सारे छोटे छोटे पैर हैं ; अगर वह उन में से एक को मोड़ना चाहता है तो उसे अपने को खींचना होता था और जब वह उसे मोड़ पाता है वह देखता है कि बिना उसके प्रयास किए बाकी सारे पैर भी भीषण दर्दभरी उत्तेजना में हिलने लगते हैं।

उसकी पाशविक प्रवृत्ति जल्द ही और विकसित होती हैः उसकी आवाज जो अब तक आधी मानवीय आधी पशुओं जैसी थी अब पूरी तरह पशुओं जैसी हो जाती है और अब वह उन शब्दों को समझने लगता है जो पहले उसे अजनबी लगे थे। वह अपने नए शरीर को अपनाना शुरू करने का प्रयास करता है। अब उसे अपने असंख्य हिलते डुलते पैरों से भय नहीं लगता ; जब वह फर्श को छूता है वह पाता है कि वे उसकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं और उसे जहां वह चाहे ले जा सकते हैं जैसा वह पहले के पैरों से कर सकता था। और उसे एक शारीरिक बेहतरी का अनुभव होता है और एक तरह की प्रसन्नता का भी मानो वह अभी अभी अपने नए हाथ पैरों में प्रविष्ट हुआ हो। वह अपने एन्टीना का इस्तेमाल करना शुरू करता है। जब वह दूध जो उसे कभी अतिप्रिय था के प्याले में अपना सिर डुबाता है उसे उबकाई आ जाती है : अब एक कीड़े की तरह उसे सड़ी सब्जियां बदबूदार पनीर और फफूंदभरा दूध पसंद है। ऊंची छत वाले कमरे से उसे डर लगता है और उसकी पशुप्रवृत्ति उसे पलंग के नीचे छिपने और कूड़े में टहलने को प्रेरित करती है।

काफ़्का की पैनी निगाहों के सामने ग्रगोर साम्सा धीरे धीरे अपनी सारे मानवीय इन्द्रियों को खोता जाता है जिन्होंने उसके लिए संसार की तमाम चीजों को परिभाषित किया था। शुरू में वह देख और सुन सकता है। कई दयनीय प्राणियों की तरह दृष्टि उसके लिए एक तरह की मुक्ति थी। उसने कई घंटे खिड़की से बाहर देखते हुए बिताए थे और उन दृश्यों से उसे खुद को कहीं खो पाने की उम्मीद बनी रहती थी। अब जब वह एक कुर्सी को खिड़की तक खिसकाता है और उस पर रेंग कर ऊपर चढ़ कर बाहर देखता है चीजों को अलग कर पाने की उसकी क्षमता कम होती जा रही है। अब वह बाहर अस्पताल को साफ नहीं देख पाता था और अगर उसे यह पता न होता कि वह चालोर्टनस्ट्रासे में रहता है तो बाहर देख कर उसे लगता कि वह किसी रेगिस्तान को देख रहा है जहां सलेटी आसमान और धरती एक अस्पष्टता में एक दूसरे से मिलते हैं। वह बस सुन सकता है और अपने कमरे में बन्द सारे अपार्टमेन्ट की आवाजों को सुनना उसके लिए दर्दनाक होता है - कोई नहीं सोचता कि वह उन आवाजों को समझ पाता है। लेकिन अभी उसकी मानवीय संवेदनाएं खत्म नहीं हुई हैं : सपने, कुछ बेढब उम्मीदें, स्मृतियां, उसकी नौकरी, ट्रैवलिंग सेल्समैन के तौर पर की गई उसकी यात्राएं, एक क्षणिक प्रेमसंबंध, उसकी संकरी बन्द जिन्दगी।

उस लिहाज से साम्सा का रूपान्तरण ओविड जितना संपूर्ण नहीं है। ग्रगोर साम्सा कोई तिलचट्टा या कीड़ा नहीं बना है : वह एक बंटा हुआ जीव है आधा पशु आधा आदमी जो पूरी तरह जानवर बन सकता है या वापस आदमी पर पूरे रूपान्तरण के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति नहीं है। बाहरी संसार कोहरे ने मिटा दिया है। सारा विराट बाहरी संसार खिड़की के शीशों पर पड़ रही बारिश की बूंदों में सिमट जाता है जो शरद के कदमों को एक लय प्रदान करती हैं और सड़क की रोशनियों में जो कमरे के फर्श और फनीर्चर पर प्रतिविम्बित होती हैं। कमरे में कोई और रोशनी नहीं है : उसकी अल्मारी मेज और पलंग जिन पर कभी चमकदार रोशनी होती थी फिलहाल गोधूलि जैसे मद्धिम प्रकाश से ढंके हैं और नीचे जहां ग्रेगोर साम्सा है वहां सिर्फ अंधेरा है। चाभी से बंद दरवाजा बमुश्किल कभी खुलता है। वह कमरा एक तरह की कैद है जहां कीड़े में बदल चुका ग्रेगोर साम्सा एकाकी जीवन काट रहा है। यह ठीक वैसा ही जीवन है जिसके बारे में काफ़्का अपने क्लास्ट्रोफोबिया के बीच सोचा करता था।

स्थान सघन हो गया था। समय पूरी तरह खत्म हो गया था। वह अलार्म घड़ी जिसकी गति से वह शुरू में रेलगाड़ी की समयसारिणी और संसार की विशालता से जोड़ कर देखता था भी गायब हो गई थी। उसे कोई वहां से उठा ले गया था। उस अंधेरे कमरे में समय का कोई हिस्सा नहीं थाः घन्टों का मतलब एक स्थाई गोधूलि हो गया था। ग्रेगोर को समय के बीतने की भी स्मृति नहीं रह गई है और कहानी के बीच में आते आते उसे यह भी पता नहीं रहता कि क्रिसमस बीत चुका या अभी आने को है। कुछ हफ्तों के बाद अपने नए शरीर से परिचित हो चुकने के बाद ग्रेगोर दीवारों पर रेंगना और चढ़ना सीख लेता है। छत पर चढ़ कर धरती से ऊपर वह अधिक स्वतंत्रता से सांस ले सकता है ; शारीरिक तन्दुरुस्ती की एक अजीब सनसनी उसके भीतर भर जाती है और प्रसन्न विस्मृति के साथ वह खेलना शुरू करता है और अपने शरीर को फर्श पर गिर जाने देता है। हालांकि वह देखने की शक्ति खो चुका है जो मानवेन्द्रिओं में श्रेष्ठतम होती है ; उसने ऊपर चढ़ पाने की एक मानवेतर स्थिति को भी पा लिया है जो एक तरह का शारीरिक और अध्यात्मिक आनन्द है। ट्रैवलिंग सेल्समैन के तौर पर उसने इतनी प्रसन्नता नहीं जानी थी। अगर पशुओं वाले खेल जारी रहते तो संभवतः ग्रेगोर पूरी तरह रूपान्तरित हो जाता। सारी मानवीय स्मृति से मुक्त अपने कमरे में पूरी तरह एक कीड़ा बनकर वह अकेलेपन शान्ति और हल्केपन का आनन्द महसूस कर सकता था। उसकी बहन रोज उसका खाना लेकर आती और अपनी मूक उपस्थिति से उसे सहलाती। अगर ऐसा होता तो उसकी भयानक त्रासदी एक अतुलनीय आनन्द में बदल जाती और उसे उसकी ईडिपल नियति से बचा लेती। ऐसे में इस कहानी ने विशुद्ध रूप से पशुजीवन के महिमागान के साथ खत्म हो जाना था।

काफ़्का ने खुद के लिए किसी और भाग्य की कल्पना नहीं की थी। किसी अंधेरी कोठरी में सारी चीजों से दूर रहना जहां सिवा एक मेज दिए और कागजों के कुछ नहीं होना था - बिना किसी से बात करे बिना किसी की बात सुने बस जहां एक बहन - मिस्ट्रेस की अस्पष्ट सुदूर सांस उसे बस छुआ करे। वहां वह भी मनुष्यों की बातों को भूल सकता था। वह बिना बाहरी संसार से संपर्क रखे अपनी देह के अंधेरे से सामग्री जुटाता हुआ महीनों तक लिखता रह सकता था और उसी परामानवीय हल्केपन को महसूस कर सकता था जिसे कमरे की दीवारों पर रेंगता चढ़ता कीड़ा महसूस करता है। ग्रेगोर साम्सा की एक छोटी बहन भी है जिसके लिए उसकी भावनाएं एक ही समय पिता जैसी भी हैं और प्रेमी जैसी भी। ग्रेटे वायलिन बजाती है ; अपने रूपान्तरण से पहले ग्रेगोर ने उसे किसी संगीत विद्यालय भेजने की योजना बनाई थी ताकि वह अपने हुनर को संवार सके। भाई का रूपान्तरण ग्रेटे को तबाह कर देता है ; वह उसकी भीषण पशु गंध और आकृति को सहन नहीं कर पाती और न ही वह उसके खाने के कटोरे को छूने की हिम्मत कर पाती है। इस घृणा के बावजूद भाई बहन अब भी उस पुराने प्रेम संबंध से जुड़े हुए हैं। उनके बीच एक शब्दहीन समझौता स्थापित हो जाता है। जैसे ही वह दरवाजे के ताले में चाभी लगाए जाने की आवाज सुनता है वह अपने को पलंग के नीचे छिपाकर चादर ओढ़ लेता है और उसकी बहन उसे कृतज्ञ निगाहों से धन्यवाद देती है।

ग्रेटे उससे ईष्र्या करती है ; वह चाहती है कि भाई की देखभाल सिर्फ वही करे और जब कभी मां उसका कमरा साफ करती है ग्रेटे को बुरा लगता है और वह रोने लगती है। जहां ग्रेगोर अपने पशुओं वाले खेल खेलता रहता है ग्रेटे उसकी इच्छाओं को समझने लगती है। वह कमरे से अल्मारी और डेस्क को हटाने की सोचती है जो पिछले समय की स्मृतियों से अटे हुए हैं ताकि ग्रेगोर दीवारों पर आजादी से रेंग सके और नीचे गिर सके। उसका सपना यह था कि ग्रेगोर पूरी तरह पशु बन जाए ताकि वह उस खाली खोह में खेलता रहे और उन दोनों के बीच वैसा है मजबूत चुम्बकीय प्रेम हो जैसा कि काफ़्का फेलीसे के साथ चाहता था। इस पर मां राजी नहीं होतीः वह कमरे को एक खोह में तब्दील नहीं करना चाहती ; वह समझती है कि फनीर्चर के वहां रहने से ग्रेगोर मानवीय अस्तित्व कभी नहीं छोड़ेगा।

इस तरह ग्रेगोर चौराहे पर खड़ा होता है। लेकिन तुरन्त ही अपनी खुद की इच्छाओं को नकारते हुए वह अपनी मां के विचारों से सहमत हो जाता है ; उन चीजों और बीते समय की गरमी को वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा ( उसका पुरान कमरा 19वीं सदी के किसी उपन्यास के कमरे की तरह पुराने पारिवारिक फनीर्चर से सजा हुआ था। ) उसके भीतर सब कुछ नकार कर पूरी तरह पशु संसार में चले जाने की ताकत नहीं है। क्या हम यह कहें कि वह कमजोर है ? क्या हम एक ट्रैवलिंग सेल्समैन से वह कर पाने की उम्मीद करें जैसा अब तक कोई मनुष्य नहीं कर सका ? पशु संसार में उतर पाने का काम बस काफ़्का कर सकता था जब अपनी अंधेरी कोठरी में बैठा वह एक पशु की तरह नहीं बल्कि एक मृत व्यक्ति की तरह लिखता रहता था। स्त्रियों ने कपड़े की अल्मारी को पहले ही हटा दिया था। डेस्क अभी कमरे में ही थी और दीवार पर एक स्त्री की तस्वीर थी जिसे ग्रेगोर ने चित्रों वाली एक पत्रिका से काटा था। ट्रैवलिंग सेल्समैन के समय के उदास घण्टों में ग्रेगोर ने उस तस्वीर को लकड़ी के एक सुनहरे कामदार फ्रेम से सजाया था। एक मूक फ्लाबेरियन संकेत की तरह यह चित्र उसकी दमित वासना और असफल प्रेम का सतत बिम्ब है।

ग्रेगोर गुस्से के साथ अपना विरोध जाहिर करता है "वे उसका कमरा खाली कर रहे थे। वे उस हर चीज को बाहर ले जा रहे थे जे उसे प्रिय थीः उसके उपकरणों वाली दराज पहले ही बाहर ले जाई जा चुकी थी ; अब उन्होंने उसकी भारी डेस्क को तोड़ना शुरू किया जिस पर बैठकर उसने अपने विद्यार्थी जीवन का सारा होमवर्क किया था …" एक क्षण के अनिश्चय के बाद वह जल्दी जल्दी उस स्त्री के चित्र के ऊपर चढ़ जाता है। उसका शरीर चित्र को पूरी तरह ढंक लेता है जिससे उस के पेट को आनन्द मिलता है। "कम से कम इस तस्वीर को कोई नहीं ले जाएगा।" ग्रेगोर ने चुनाव कर लिया है। वह उस स्त्री की छवि में अपनी कलात्मक सनकों और भावनात्मक फन्तासियों को देखता है और उस खामोश और अंधेरे जीवन को अस्वीकार कर देता है जो उसकी बहन ने उस के सामने प्रस्तुत किया होता है। पशु के तौर पर रूपान्तरित होने की प्रक्रिया थम जाती है।

पुत्र के रूपान्तरण के पहले ही पिता को थक चुका दिखाया गया है। शाम को जब ग्रेगोर काम से लौटता था वे उसका स्वागत अपनी आरामकुर्सी में बैठे करते हैं ; उन्होंने अपना लबादा पहना होता है और वे उठ नहीं पाते ; साल के दो इतवारों को जब वे साथ टहलने जाया करते थे वे बेहद धीमे धीमे घिसटा करते थे। अब जब उनका पुत्र खामोश अपनी कोठरी में है उन्हें लगता है कि उनकी जीवन्तता को मिलने वाली चुनौती खत्म हो गई है और वे एक तरो ताजा व्यक्ति में बदल जाते हैं : उन्हें जैसे वह रक्त वापस मिल जाता है जो कभी उनके पुत्र ने उनसे लिया था। कुछ ही समय पहले उन्होंने एक बैंक में दुबारा काम करना शुरू किया था। अब वे बढ़िया कपड़े पहने अपना काम फुर्ती के साथ करते हैं। उन दोनों के बीच का संघर्ष जीवित रहने का संघर्ष है। अगर बेटे ने जानबूझ कर पिता को मारना चाहा था तो अब यह काम पिता करना चाहते हैं।

ग्रेगोर का रूपान्तरण एक गलत काम है एक पाप है जिसे कड़ा दण्ड मिलना चाहिए। एक शाम जब पिता घर आते हैं मां बेसुध पड़ी होती है और निराश ग्रेगोर लिविंग रूम में पसरा हुआ होता है। उसे देखते ही पिता अपना बूट उठाकर उस पर चोट करते हैं मानो वह किसी परीकथा का दैत्य हो। पिता अपना जूता लेकर उसे कमरे के बाहर खदेड़ देते हैं जबकि भयभीत साम्सा की आंखें तक बंद हो जाती हैं। यदि वह इस पितृसत्तात्मक हिंसा से बचना चाहता तो वह अपने पशु संसार में पनाह लेता हुआ दीवार पर ऊपर चढ़ सकता था और हमेशा के लिए पुरुषों के उस ईडिपल संसार को छोड़ सकता था जहां पिता अपने बेटों की हत्या करते हैं और बेटों ने अपने पिताओं को मारने पर विवश होना पड़ता है। लेकिन वह एक कीड़ा बनने से मना कर देता है। वह एक मुक्त कीड़े की बजाय बलि दिया हुआ एक पुत्र बनना चाहेगा। सो लिविंगरूम में बचाव के लिए उसकी दर्दभरी दौड़ जारी रहती है। पिता अल्मारी में रखे एक कटोरे से कुछ छोटे लाल सेब निकालकर उस पर उनकी बमबारी शुरू कर देते हैं : पहले सेब फर्श पर लुढ़कते हैं मानो उनमें बिजली बह रही हो ; फिर एक सेब ग्रेगोर हे शरीर को छू कर जाता है फिर एक और जोर से उसकी पीठ पर पड़ता है। उसकी मां के गाउन के बटन खुले हुए हैं और वह पिता से उसे छोड़ देने की याचना कर रही है। ग्रेगोर की इन्द्रियां बुरी तरह थकी हुई हैं और वह फर्श पर पसर जाता है।

क्या ही विचित्र और हैबतनाक यह दृश्य है जिसमें अब्राहम द्वारा आइजैक की बलि का अनुष्ठान पूरा होता है और जिसमें हम पवित्रता की सिहरन और नियम का एक ही साथ पालन और उल्लंघन देखते हैं। ग्रेगोर का घाव करीब महीने भर तकलीफ देता है। वह अपने कमरे में रहता है - वह मनुष्य नहीं रह गया है न ही जानवर बना है ; वह एक घायल पशु और अपमानित पुरुष है। उसकी देह में धंसा सेब एक लाइलाज घाव है जिसे किसी भी स्त्री का हाथ ठीक नहीं कर सकता : उसके पिता की घृणा की चाक्षुष स्मृति¸ उसके बलिदान का विम्ब। अब वह आजादी से दीवारों पर नहीं चढ़ पाता था ; वह मानवीय संसार में कैद हो गया था ; अब वह बच कर भाग भी नहीं सकता था और करीब करीब पश्चाताप और समझौते के तौर पर उसे वापस परिवार में शामिल कर लिया जाता है। हर शाम लिविंग रूम का दरवाजा खुल जाता था "ताकि औरों की सहमति के साथ वह सारे परिवार को रोशन मेज के गिर्द देख सके और उनकी बातें सुन सके। " हालांकि वह बेआवाज है उसे परिवार की ध्वनियों में शामिल कर लिया जाता है। लेकिन इस संपर्क के कारण परिवार के जीवन का ह्रास होने लगता है और वह अपने पुराने जीवन का क्षुद्रतर रूप बन जाता है। प्रसन्नताभरे समय के बारे में उत्तेजित वार्तालाप अब नहीं होते ; हर रात गंदी दागदार पोशाक पहने उसके पिता मेज पर ही सो जाते हैं अपनी आंखों को तबाह करती उसकी मां सिलाई में लगी रहती है और उसकी बहन स्टेनोग्राफी और फ्रेंच का अध्ययन करती रहती है ; नौकरानी की छुट्टी कर दी जाती है और परिवार के गहने बिकने लगते हैं।

अंधेरे कमरे से देखे गए इस दृश्य से अधिक नैराश्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता था कि स्त्रियां काम करती थीं और पिता सोए रहते थे। फिर एक और पतन होता हैः तीन किराएदार रख लिए जाते हैं ; सारा परिवार अपना भोजन रसोई में करता है। अपनी खोह में से काफ़्का इन किराएदारों की चपचप सुनता था और अपने परिवार के अपमान को महसूस करता था - उसके पिता बैठने की हिम्मत नहीं कर पाते थे और मेज के बगल में अपनी टोपी हाथ में लिए भिखारी की तरह खड़े रहते थे। ग्रेगोर के जीवन में भी पतन आता है। मां और बहन उसके प्रति वही असहिष्णुता महसूस करते हैं जो किसी ऐसे संबंधी के लिए होती है जिस के साथ कुछ दुर्घटना घट गई हो¸ ठीक जैसा बर्ताव इवान इल्यीच के साथ उसकी पत्नी और बच्चे करते हैं। प्रेम पूरी तरह बुझ जाता है। सिर्फ एक महामानवीय दुभार्ग्य को सह पाने की अक्षमता बच जाती है। वही बहन जो कभी प्यार से उसका खाना बनाती थी अब कैसा भी खाना अपने पैरों से उसके कमरे में खिसका देती है बिना इस बात की परवाह किए कि ग्रेगोर उसे छुएगा भी या नहीं। वह सफाई भी नहीं करती और न किसी को करने देती है। कमरे की दीवारों और फर्श पर कूड़े और गंदगी के निशान होते हैं। अवांछित चीजें और तमाम कूड़ा करकट कमरे में धकेल दिए जाते हैं। ग्रेगोर ने उस खाली खोह को नकार दिया था जहां वह अपने खेल खेल सकता था लेकिन अब उसका कमरा मानवता द्वारा अस्वीकृत की गई चीजों की शरणस्थली बन गया था। एक तिलचट्टे की तरह वह घर भर की धूलसनी चीजों से अपने को गंदा करता घिसटा करता था।

कुछ समय और बीतता है। एक शाम किराएदारों से घिरी ग्रेटे वायलिन बजा रही है। किराएदारों की समझ में वह संगीत नहीं आता क्योंकि उन्होंने किसी मनोरंजक संगीत की उम्मीद की थी और वे परेशान से होकर अपने सिगार पीने लगते हैं। ग्रगोर संगीत के कोमल स्वरों को सुनता है ; कूड़े गन्दगी और बालों से सना वह रेंगता हुआ अपने कमरे से निकलता है और लिविंग रूम की चौखट पर अपना सिर ढुलका कर उस क्षण की प्रतीक्षा करता है जब उसकी बहन उसकी तरफ देखती ; चूंकि वह बोल नहीं सकता था संवाद अब उस के लिए केवल दृष्टि के माध्यम से संभव रह गया था। पहले समय में जब वह एक आदमी था उसे संगीत अच्छा नहीं लगता था। अब जब कि वह एक पशु में पतित हो चुका था संगीत उसे भावुक बना देता था और उसे लगता था कि संगीत उसके लिए "वांछित और अनजाने पोषण" की तरह था। हम काफ़्का के लेखन की आत्मा में पहुंच गए हैं - "वांछित और अनजाने पोषण" की धारणा एक महान प्लेटोनिक थीम है ; एक अनजानी पुरातन छवि की तरफ आत्मा की गति ; फ्लाबेरियन पात्रों का असफल और अप्राप्य उम्मीदों की तरफ उत्तेजित सफर।

जब तक वह एक मनुष्य था एक सेल्समैन था एक आज्ञाकारी बेटा था गहरी उम्मीदें उसके भीतर नहीं जागती थीं। पशु बनने के बाद कम से कम उसके कान महामानवीय संगीत के लिए खुल गए हैं। अब जबकि वह गंदगी में लिथड़ा एक घायल पशु है वह जान गया है कि उसकी आत्मा की मंद्र आवाज एक अपरिभाषेय इच्छा है जिसे प्रकट नहीं किया जा सकता और जो उसे उस लक्ष्य की तरफ ले जाती है जहां मनुष्य और पशु के बीच की विभाजनरेखा बेमतलब हो जाती है। बिना इस बात को जाने कि वह क्या कर रहा है ग्रेगोर एक साथ प्राचीन कथाओं की दो मूल चीजों को पुनर्जीवित करता हैः खजाने की पहरेदारी करता ईर्ष्यालू ड्रैगन ; और पशु में बदल गया राजकुमार जो राजकुमारी के बगल में रहता हुआ उम्मीद करता है कि वह उस से शादी कर पाएगा और दुबारा से आदमी बन जाएगा।

लेकिन कथा के इस पशु के बरखिलाफ ग्रेगोर दुबारा आदमी नहीं बनना चाहता ; वह समझता है और जैसा उसकी बहन ने उस से कहा भी था पशु बने रहना ही उस पर पूरी तरह जंचता था। वह सिर्फ इतना चाहता था कि वायलिन बजाती अपनी बहन के उतना पास जा सके जितना वह अनुमति देगी क्योंकि वही उसके संगीत को सबसे अच्छा समझता है। वह उसे अपने कमरे में तालाबन्द कर देगा ठीक जिस तरह ड्रैगन राजकुमारी को कैद रखता है या काफ़्का की तरह जो अपने को कोठरी में बन्द रखता है ताकि वह लिख सकेः क्योंकि खुशी केवल वहीं पाई जा सकती है जहां दीवारें हमें बन्द कर देती हैं : जेल में। अब आखिरकार काफ़्का अपनी बहन के उस प्रेम प्रस्ताव को समझता है जिसे उसने अस्वीकृत कर दिया होता है। पलंग पर बैठी उसकी बहन फर्श पर उसकी तरफ झुकती ताकि वह उसके कान में अपनी योजना बताता कि अगर यह दुर्घटना न घटती तो वह उसे संगीत सिखाने भेजना चाहता था और इस बात को वह पिछले क्रिसमस को सब को बताने वाला था। "इस स्पष्टीकरण के बाद उसकी बहन की रुलाई फूट जाती और ग्रेगोर उसके कन्धे तक अपने को उठाकर उसकी गरदन को चूमता रहता जो अब बिना कालर या स्कार्फ के अनावृत्त होती क्योंकि अब वह काम पर जाती थी।"

लेकिन ठीक इसी क्षण ग्रेगोर समझता है कि वह उस "वांछित और अनजाने पोषण" के नजदीक है जो ग्रेटे अपने भाई को देने से मना करती रही है। वह उस खोह में अपने पशु भाई के साथ रहना चाहती थी और अस्वीकृत कर दी गई थी और अब वह उस स्वप्न को अस्वीकृत कर रही थी जो उसका भाई उसके सामने प्रस्तुत कर रहा था। वह अपना बदला लेती हैः वह जब भी उसे देखती है वह इस बात को मानने से इन्कार कर देती है कि वह दैत्य अब भी उसका भाई है और अपने यौवन की क्रूरता में वह मां बाप के सामने उसे मृत्युदण्ड की घोषणा करती है। "आप लोग शायद उसे नहीं जानतेः मैं जानती हूं। मैं इस दैत्य के सामने अपने भाई का नाम नहीं लेना चाहती। और मैं इतना ही कहती हूं कि हमें इससे छुटकारा पा लेना चाहिए।" सुन्दरी पशु की हत्या कर देती है। ग्रेगोर अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ता है। इस से अधिक श्रमसाध्य कुछ नहीं हो सकताः उसकी देह लगातार भूखा रहने से कमजोर पड़ चुकी है और उसका दिमाग जम गया है; उसे नहीं पता वह उतना बड़ा फासला कैसे तय कर सका। जैसे ही वह अपने कमरे में दाखिल होता है ग्रटे दरवाजे को जोर से भेड़ती है ताला बन्द करती है और चीखकर कहती हैः "आखिरकार।"

उस क्षण अंधेरे कमरे में ग्रगोर के लिए मर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। वह भूख से मर जाता हैः वह बहुत दिनों का भूखा था। लेकिन यह मृत्यु भी एक बलिदान हैः वह अपना सिर झुका कर मौत के फरमान को स्वीकार करता है और बेहद प्यार और संवेदना के साथ अपने परिवार के बारे में सोचता है। जैसा कि वल्टर सोकेल ने लिखा है वह अपने प्रियजनों के पापों की सजा पाने वाली बलि की बकरी है। वह ईसामसीह है जो समूची मानवता को बचाने के लिए मर जाता है। सबसे बड़ा गुण अन्ततः न तो शान्त पशुवत हल्कापन है न "वांछित और अनजाने पोषण" की खोज न अपनी बहन के साथ वह प्रमसंबंध न ही अपनी कोठरी में बिना हाथ उठाए लिखते जाना; सबसे बड़ा गुण बलिदान में है।

मरने से पहले ग्रेगोर को वह उपहार मिलता है जो शायद मृत्यु से पहले ही मिल सकता है - एक खाली और विचारशील मस्तिष्क। वह आखिरी बात घन्टाघर की घड़ी को तीन बजाते सुनता है। वह खिड़की के बाहर आसमान को चमकदार होता देखता है। फिर उसका सिर ढुलक जाता है और उसके नथुनों से आखिरी कमजोर सांस बाहर आती है।ग्रेगोर के बलिदान की प्रतिध्वनि सारी प्रकृति में गूंजती हैः वह जाड़ों के बीतने और वसन्त के आगमन की घोषणा करती है। अगर ग्रेगोर अपनी जान नहीं देता तो शायद प्रकृति सदा के लिए अपनी मृत ठण्डी आकृतियों में थम जाती - किसी मृत कीड़े की देह की तरह सूखी हुई। नया रक्त अब प्रकृति की नसों में बह सकता था और ब्रह्माण्ड के रूपान्तरण का चक्र फिर से शुरू हो सकता था।

परिवार अपना शीतकालीन पतन फेंक देता हैः उसके पिता अपना खोया स्वाभिमान वापस पाते हैं और किराएदारों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं; उसकी बहन का चेहरा खुशी से लाल हो जाता है और मां उसे गले से लगा लेती है। सारे के सारे मृत व्यक्ति के लिए आंसू बहाते हैं। लेकिन हमने प्रकृति के भलेपन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ग्रेगोर के शरीर को कोई नहीं दफनाताः उसके अंतिम संस्कार का जिम्मा उस रूखी नौकरानी को जैसे तैसे निभाने को सौंप दिया जाता है जिसका "उस बूढ़े तिलचट्टे" के साथ एक वास्तविक सम्बन्ध था। ग्रेगोर का रूपाान्तरण हमें पिछले जाड़ों में घटा दुस्वप्न लगने लगता है। मां बाप और बेटी ट्राम में बैठकर गांवों की तरफ जाते हैं और उत्तेजना के साथ भविष्य की बातें करते हैं। संभावनाएं काफी आकार्षक हैं : तीन नए रोजगार के मौके बढ़िया हैं¸ उन्होंने रहने के लिए नई जगह देखनी चाहिए और ग्रेटे की शादी के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए। ग्रेटे उठती है और सारे दुखों और सारी मौतों की तरफ जीवन की क्रूरता के साथ अपना युवा शरीर तानती है। ग्रेगोर ने अस्तित्व की सदाबहार प्रकृति को बचा लिया है। लेकिन वह ईसामसीह की तरह उसे परिष्कृत नहीं कर पाता। जीवन का कारोबार वैसा ही चलता रहता है उसके सारे खौफनाक चेहरों और अभिमानों के साथ और कोई भी अपनी आत्मा के लिए उस "अजाने पोषण" की लालसा नहीं करता।

4 comments:

अनुरागजी, अशोकजी का यह अनुवाद मुझे लगता है एक धरोहर है।


अनुराग को तो बधाई मिलनी ही चाहिए! अच्छी पोस्ट, उन्होंने बहुत धीरज और अनुवादक के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए लगाई - ये सब मुझे निजी तौर पर भी अच्छा लगा। और रवीन्द्र भाई ये धरोहर जल्द ही हमें किताब के रूप में मिल सके इसके लिए आलोक श्रीवास्तव जी को फोन करना चाहिए हमें! मैं कर रहा हूं और आप सबकी सुविधा के लिए नम्बर दे रहा हूं - 02502462469


सिर्फ़ कह देना कि बढि़या अनुवाद है काफ़ी नहीं है....रवींद्र जी की बात बिल्‍कुल सही है। अनुराग का धन्‍यवाद तो करना ही होगा क्‍योंकि उनके प्रयासों से ही हम इस तरह की सामग्री यहां देख पाते हैं।


काफ्का का जीवन ही नहीं लेखन भी सिताती की कलम से एक भिन्न कोण से सामने आता है. इस पोस्ट को जितना इत्मीनान से पढ़ा, उससे कहीं ज्यादा गति से उद्वेलित हुआ.अशोकजी का अनुवाद उच्च कोटि का है.इसका श्रेय तो तुम्हे दिया ही जाना चाहिए कि यह दुर्लभ सामग्री सबद के लिए जुटा पाए.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी