Wednesday, September 24, 2008

अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : जारी ...तीसरी किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की अगली पेशकश। इसमें काफ़्का की कालजयी कहानी मेटामोर्फोसिस के वक्त काफ़्का की मनःस्थिति और पृष्ठभूमि पर अच्छी रोशनी पड़ती है। )

काफ़्का जो इस कदर अध्यात्मिक आदमी था - सारी जिन्दगी अपनी देह को लेकर आब्सेस्ड रहा। उसका शरीर, जो उसे उसके जन्म के साथ किसी ने उसे ऐसे ही या नफरत के साथ दिया था, लगातार उसके बौद्धिक और अध्यात्मिक विकास लिए बाधाएं खड़ी करता रहा : उस शरीर के साथ वह अपने भविष्य में केवल त्रास देख पाता था। वह काफी ज्यादा लम्बा और कोणों से भरा हुआ था। वह उन सुन्दर देहों की तरह एक सीधी रेखा में बड़ा नहीं हुआ जिन्हें वह इस कदर सराहा करता था। उसके शरीर ने उसे झुकने और गिरने पर विवश किया। उसकी सारी नैसर्गिकता उस के साथ समाप्त हो गई। उसका कमजोर दिल लगातार दुखता था और उसकी धमनियों में पर्याप्त खून प्रवाहित नहीं कर पाता था जिस के कारण उस के हाथ पैर ठण्डे रहते थे। उसके भीतर जरा भी अन्दरूनी आग नहीं थी ; न वह न्यूनतम चबीर् जो उसकी आत्मा के लिए भोजन बनती। बहुत जल्दी उसे अपने दुबलेपन का रहस्य समझ आ गया था। उसकी सारी शक्तियां साहित्य में केंद्रित हो गई थीं ; उसने उन सारी ताकतों का दमन किया था जो और लोगों को खाने, पीने, संगीत सुनने और दर्शनशास्त्र के बारे में लिखने के लिए प्रेरित करती हैं ; और उसका शरीर बेतरह दुबला हो गया था।

सबसे गंभीर बात यह थी कि उसका शरीर उस के लिए अजनबी था ; एक अविवाहित के तौर पर उसकी प्रकृति को ढालने वाला सबसे बड़ा कारक। कौन सी आक्रामक शक्ति थी जिसने उसे ऐसे खोल में ढाला था ? "जो भी मेरे पास है वह मेरे खिलाफ है और जो मेरे खिलाफ है वह मेरा नहीं रह गया है। मिसाल के लिए अगर मेरा पेट दुखता है तो वह मेरा पेट नहीं है। वह किसी भी उस बाहरी आदमी जैसा है जो मेरी ठुकाई करना चाहता ह। और सब कुछ ऐसा ही है। मेरा पूरा अस्तित्व कांटेदार बाड़ से बना हुआ है जो मुझे चुभती हैं और अगर मैं ताकत लगाकर उनसे लड़ना चाहूं तो वे और गहरे मेरे भीतर धंस जाती हैं।" उसके शरीर के भीतर क्या था ? शायद धागे का एक गोला था जिसमें अनन्त सिरे थे और जो लगातार खुलता रहता था। और क्या इस बात का खतरा नहीं था कि दुश्मन की फौजें जो दुनिया के अजनबी कोनों से आ रही थीं उसे कुचल दें ? इसलिए बीमारी के वर्षों से पहले काफ़्का ने अपनी देह पर काबू करने का फैसला किया। वह घंटों टहला करता था तैरता था। तमाम शारीरिक अभ्यास करता था, खुली हवा में आधे कपड़ों में रहता था और उम्मीद करता था कि प्रकृति उसे उसके साथ रहने देने में मदद करेगी।

उसे लगता था उसके भीतर कोई पशु है। बार बार अपने अचेतन की आकृतियों में से जो मध्यकाल की पशुओं के चित्रों वाली किसी किताब की तरह विराट थीं वह अपने भीतर किसी सोते हुए गुबरैले को महसूस करता था ; जमीन में सुरंगें खोदते किसी छछूंदर को ; उस चूहे को जो आदमी के आते ही भाग जाता है ; एक फड़फड़ाते चमगादड़ को ; हमारे रक्त पर पलने वाले किसी परजीवी कीट को ; एक भुतहा जानवर को जो हताश किसी गड्ढे में या अपनी मांद में पड़ा होता है ; राख के रंग के कौए को जिसके पंख पूरी तरह विकसित नहीं होते ; एक गुर्राते हुए कुत्ते को जो उसके चैन में खलल डालने वाले हर शख्स को दांत दिखाता है या एक बुत के चारों तरफ परेशान भौंकता दौड़ता रहता है ; कभी दो जानवरों से बने जीव को जिसका शरीर भेड़ का है और सिर और पंजे बिल्ली के और जिसकी आंखों में दोनों की मिलीजुली चमक है ; या उन घृणित दुष्ट और परजीवी आदमियों में से एक को जिन्हें उसने 'अमेरिका' के आखिरी हिस्से में दिखलाया है। वह कई जानवरों से बेतरह डरता था। जब वह ज़ुराउ में था वह चूहों के बीच रहा था। उसे उस शान्त पशु शक्ति से डर लगता था जो कहीं घात लगाए बैठी होती थी। पर साथ ही उसे लगता था कि वे ही पाशविक शक्तियां उसके भीतर भी छिपी बैठी हैं। उसे अपने भीतर के पशुओं से इसलिए डर लगता था कि उसे खौफ था वे कभी भी अपने आप को प्रकट कर सकते थे और उसके हाथ पैर बालों से ढंक सकते थे और उसकी आवाज ने चहचहाहट में बदल जाना था जैसा कि उसने ओविड की 'मैटामारफासिस' में पढ़ा था। उसे पता था कि ऐसा होने पर वह मानवीय स्तर से नीचे उतर जाएगाः उस अंधकार में जो हमारी चेतना के नीचे वास करता है ; लेकिन वह इससे डरता नहीं था क्योंकि ऐसा होने पर उसका स्तर इस मायने में ऊंचा उठ जाना था कि वह अब तक न जीती गई रोशनी और संगीत को जीत सकता था।

तब उसे अपनी सिहरनें समझ में आईं। उसके भीतर रहने वाला पशु उसकी आत्मा और लेखक के उसके शरीर के अलावा कुछ न था जो हर रात अपने को प्रेरणा की आवाज की आज्ञा का पालन करता हुआ कोठरी में बन्द कर लेता था ठकि उसी तरह जैसे कुछ जानवर जाड़े का सारा मौसम खोहों में सोते हुए बिताया करते हैं। 17 नवम्बर 1912 को वह अपने कमरे में बन्द बिस्तर पर लेटा हुआ था। इतवार था। पिछली रात 'अमेरिका' लिखता हुआ वह संतुष्ट नहीं थाः उसे लग रहा था कि उपन्यास बदतर होता जा रहा था; फिर उसने सपना देखा कि एक जादुई डाकिए ने उसे फेलीसे के लिखे दो अन्तहीन पत्र ला कर दिए। अब बिस्तर में बैठा वह फेलीसे के वास्तविक पत्रों की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने पौने बारह तक इन्तजार किया और इन्तजार के उन दो भीषण घन्टों में उस पर बार बार होने वाला नैराश्य का वह आक्रमण हुआ - उसे लगा कि वह कोई ऐसा परजीवी पशु है जिसे दुनिया से बहिष्कृत कर दिया गया है और बाकी लोग जिसे कुचल सकते हैं या लतिया सकते हैं। संपूर्णता के साथ अपना मानवीय आयाम खोए हुए वह पूरी तरह बेहोशी और स्वप्नावस्था से गुजरा होगा और उसने एक कहानी सोची जिसे वह शब्दों में ढालना चाहता होगा। हमेशा की तरह उसने समय बरबाद नहीं किया। 'अमेरिका' को किनारे रख कर उसी शाम उसने उसे लिखना शुरू कियाः कहानी उसके हाथों में विस्तार लेने लगी। यह ऐसी कहानी थी जो हर दिशा में बढ़ रही थी और उसके और बाकी लोगों के जीवन की जटिलता को अपने भीतर समोए हुए थी। वह चाहता था उसके सामने एक न खत्म होने वाली रात होती जिसमें वह इस कहानी को पूरी तरह प्रकट कर पाता। उसने 7 दिसम्बर को उसे पूरा किया। वह "द मैटामारफासिस" थी।

निकलाशश्ट्रासे के छोटे से कमरे में उन दिनों एक दोहरा रूपान्तरण हुआ। रात की अपनी मांद में काफ़्का उन गहराइयों में उतर गया जहां अब तक कोई नहीं गया था। सभी सर्जकों की तरह उसने सभी चीजों में बदल सकने और सारे रूप धर पाने की अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। महीने भर से कम समय में एक ठण्डी बेहोशी के बीच उसने एक नया शरीर धारण किया और बेहद चौकन्नी निगाहों के साथ उसने अपनी कहानी के पात्र के रूपान्तरण का अनुसरण भी किया मानो कागज पर लिखते हुए वह भी एक विशाल परजीवी कीड़े में बदल रहा हो। ताल्सताय भी अपने आप को ब्रहमाण्ड की विराटता में एकरूप करते हुए कीड़े घोड़े या चिड़िया में तब्दील कर सकते थे ; लेकिन काफ़्का ऐसा अपनी गहराइयों को खोजने के लिए कर रहा था। निकलाशश्ट्रासे के उस छोटे से कमरे को जहां वह अपने मां बाप के साथ रहता था उसने ग्रेगोर साम्सा के अपार्टमेन्ट में बदल दिया। हर चीज सही सही थी : कपड़ों से भरी अल्मारियां, डेस्क और पलंग, खिड़की के बाहर अस्पताल, कमरे के ऊपरी हिस्से में प्रतिविम्बित होती गली की रोशनियां, दरवाजे, अपार्टमेन्ट के बाकी कमरों की व्यवस्था। इस तरह एक महीने के लिए उसका कमरा उस त्रासदी का रंगमंच बन गया था जिसने पूरे जाड़ों भर चलते जाना था।

जब हम कहानी शुरू करते हैं रूपान्तरण हो चुका होता है। शाम को ग्रेगोर साम्सा एक सामान्य ट्रैवलिंग सेल्समैन होता है ; उस रात उसे खराब सपने आते हैं ; अगली सुबह - जाड़ों की सुबह जो उतनी ही ठण्डी थी जितनी वह रात जब काफ़्का लिख रहा था - वह पाता है कि उसकी पीठ किसी जिरहबख्तर जैसी सख्त हो गई है, उसका पेट मुड़ा हुआ, भूरा और ऊंचा नीचा हो गया है, और उसकी आंखों के सामने असंख्य छोटे छोटे दयनीय पैर दर्दनाक उत्तेजना में हिल रहे होते हैं। उसके चारों तरफ बाकी सारी चीजें वैसी ही हैं : वही छोटा कमरा, मेज पर रखी कपड़े के नमूनों की किताब, तस्वीरों वाली किसी पत्रिका से काटा गया एक स्त्री का फोटो, वही उदास बारिश जो अंधेरे आसमान से गिरती रहती है। जिस तरह से हम इस नए प्राणी की संवेदनाओं को साझा कर पाते हैं वह महान होता हैः ठीक ग्रेगोर की ही तरह हम पाते हैं कि हमारी पीठ जिरहबख्तर जैसी सख्त हो गई है, पेट मुड़ा हुआ, भूरा और ऊंचा नीचा हो गया है और हमारी आंखों के सामने असंख्य छोटे छोटे दयनीय पैर दर्दनाक उत्तेजना में हिल रहे हैं। हमें एक तरफ हल्का दबा दबा दर्द है, पेट में खुजली लग रही है, ठण्ड और नमी है ; हम अचरज से भर जाते हैं जब हम पाते हैं कि हमारी आवाज के साथ चिड़िया की सी एक अजीब दर्दभरी आवाज मिल जाती है और वे असंख्य कांपती टांगें हमें बिस्तर से बाहर नहीं ले जा पातीं। चाहे पहले दान्ते के साथ हुआ हो या ओविड के पशु में रूपान्तरित होने की प्रक्रिया कभी भी इतने विस्तार से नहीं लिखी गई थी जो हमें इस कदर अपने साथ जोड़ लेती है।

लेकिन खुद ग्रेगोर साम्सा हम से कम इस से जुड़ा प्रतीत होता है। वह आश्चर्यचकित नहीं है‚ न उसे कोई सदमा पहुंचा है ; ऐसा लगता है कि यह रूपान्तरण उसके लिए एक सामान्य प्राकृतिक तथ्य भर है जैसे रोज सुबह सात बजे की ट्रेन पकड़ना। जानते हुए या अचेतन में वह अपने साथ घटी हर चीज को संक्षिप्त कर लेता है ; वह उसे कोई महत्व नहीं देता और समझता है कि जो हो चुका वह लौटाया नहीं जा सकता मानो वह अपने भाग्य की इस एब्सर्ड त्रासदी को जी पाने में अक्षम हो। दयनीय भलेपन के साथ वह प्रयास करता है कि जो हो चुका है उसे व्यवस्थित किया जाए ताकि असंभव और भयानक को सामान्य बनाया जा सके। काफ़्का यहां पर अपने प्रिय नरेटिव उपकरण का प्रयोग करता हैः "मैदान को सीमित करना"; जिसके कारण हम ग्रेगोर की चेतना के कुछ हिस्सों से वंचित रह जाते हैं (जैसा बाद में कार्ल, जोसेफ के॰ और के॰ के साथ होता है)। इस तरह काफ़्का एक साफ साधारणता के साथ जीवन की उस त्रासद और दर्दनाक सच्चाई के स्वीकार को अभिव्यक्त कर पाता है जो ग्रेगोर साम्सा को फ्लाबेरियन नायकों में आखिरी और महानतम बनाता है।

अगली पोस्ट में जारी ...

5 comments:

ravindra vyas said...

कमाल का काम। कमाल का अनुवाद। अशोक भाई को सैल्यूट।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

badhiya kaam kar rahe hain. jaree rakhie.

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया-जारी रहिये.

anita said...

kafka ke bare me jankar acha lag raha hai pehli khatm hote he agli ka intzar rehta hai ....jaldi k-jaldi nilkalo varna book khareed leni padege....ashok ji ne anuvad bahut badia kiya hai unhe badhai...

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

अशोक भाई के अनुवाद में भाषा का अद्भुत प्रवाह है. शब्दों का चयन और भावों की तरलता उस कठिन मूल गद्य को बेहद पठनीय बना रही है. अशोक जी की शान में 'धन्यवाद' इस समय औपचारिक शब्द जान पड़ता है. यह श्रृंखला जारी रहे...