Tuesday, September 23, 2008

अनकहा कुछ : ३: फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : जारी ...दूसरी किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की अगली पेशकश। साथ में दी गई चित्रकृति स्वयं काफ़्का की है। )

'हिस्ट्री आफ द डेविल' में उसने पढ़ा था कि वर्तमान कैरिबियन में रात में काम करने वाले को संसार का सृष्टा माना जाता है। उसके पास संसार की रचना या पुनर्रचना करने की ताकत नहीं थी; लेकिन अगर उसने रातों को जगा रहना था तो वह उस सब को प्रकट कर सकता था जिसे उसके अजाने देवता ने उसे बताया था। सो उसने अपने ऊपर यह अनुशासन लागू किया : वह रात दस बजे अपनी डेस्क पर बैठता था और वहां से तीन या कभी कभी छः बजे उठता था। वह अंधेरे, एकान्त और खामोशी में लिखता था जबकि बाकी सारे सोए होते थे : फेलीसे जिसे वह मिलना नहीं चाहता था ; उसके मां बाप जिनके साथ वह बस बहुत थोड़े शब्द साझा करता था ; और उसके दोस्त - तब भी उसे लगता था कि रात अभी पूरी तरह से रात नहीं होती थी। वह चाहता था कि दिन और गर्मियों, सूर्योदय और सूर्यास्त को खत्म कर समय को एक अंतहीन शरद की रात में बदल देता। उसके चारों तरफ एक धीरगंभीर गतिहीनता होती और ऐसा लगता था मानो संसार उसे भूल गया था।

रात उसके लिए काफी नहीं होती थी। चूंकि उसकी प्रेरणा ऊपर स्वर्ग से नहीं बल्कि पाताल से आती थी उसे भी नीचे धरती के गर्भ में उतरना होता था और एक बार वहां पहुंच जाने पर अपने आप को ताले में बंद कर लेना होता था। वह सबसे दूर एक कोठरी में रहना चाहता था। पर कोई न कोई आवाज तब भी उसकी कोठरी तक पहुंच सकती थी ; शायद उसका अदृश्य साथी या फेलीसे या कोई दोस्त सारी बाधाओं को पार कर उसके एकान्त में दखल देने आ जाता। उसे इस एकान्त से ज्यादा कुछ चाहिए था : उसे मृत्यु की गहरी नींद चाहिए थी और कब्र की निबार्ध शान्ति जहां किसी भी तरह का मानवीय संपर्क असंभव होता है। तो आखिरकार एकाकी और मृत हो चुकने के बाद काफ़्का के पास लिखने के लिए आदर्श परिस्थितियां थीं। दफ्तर की चिन्ताओं से दूर, मानवीय संपर्क और विवाह जैसे झमेलों से दूर, उसके पास सारा समय अपने लिए था ; समय का एक अनन्त विस्तार क्योंकि समुद्र जैसी सीमाहीन प्रेरणा को बांधा नहीं जा सकता।

रात की गहराई में अकेले लिखते हुए अपने भीतर छिपी हुई और जड़ हो गई हर चीज को मुक्त किया और इस तरह उसे एक ऐसी खुशी मिलती थी जो उसके बर्फ जैसे हाथों और कांपते दिल को गरमा देती थी। शाम को जैसे ही वह अपनी डेस्क पर पहुंचता था फेलीसे को लिखे पत्रों का वह तूफान और हिंसा कहीं दूर चले जाते थे। वहां न कोई आईना था न मनुष्य न ही खुद वह जिसे कोई बात समझाई जानी हो। दिन भर की मानसिक यातना और हिस्टीरिया के बाद वह महामानवीय शान्ति का एक कोना खोज लेता था। उस जगह उसने एक भी टूटी पंक्ति नहीं लिखी : उसकी भीषण शान्ति और वह कोमल स्पर्श तब भी बने रहते हैं जब ग्रेगोर साम्सा और जोसेफ के॰ को उनकी मौत की तरफ ले जाया जाता है। कहानी वह जगह थी जहां हर चीज नियत और सही राह पर रखी जाती थी। इस दौरान रात को उस जगह पर अंधेरे का कायाकल्प हुआ करता था। उसे भली तरह पता था कि अचेतन में इस कदर पूरी तरह डूब जाने में बहुत सारे खतरे हैं : इसमें अपनी खोज से कभी वापस न आ सकने का जोखिम शामिल था या पागलों जैसी विकृत वापसी का।

लेकिन उसे यह भी मालूम था कि अगर वह अंधकार को तर्क के सामने लाएगा और इसे किसी बौद्धिक खेल में बदलेगा जैसा कि पो ने किया था उसका सारा काम व्यर्थ हो जाएगा। सो उन रातों को वह जादू हुआ करता था जो काफ़्का को आधुनिक लेखकों के बीच अद्वितीय बनाता है। रात अपना गाढ़ा अंधेरापन नहीं खोती थी ; अचेतन का रूपान्तरण होता था पर वह अचेतन बना रहता था; तर्क कभी खुद को चीजों पर नहीं लादता था; तो भी समूचा अजाना द्वीपसमूह रोशन हो कर सामने आता था बिना किसी परछाई या अपरिभाषित के जैसे कि वह दिन की रचना हो। हमें एक अद्वितीय अनुभव होता हैः हम एक साथ अचेतन और रोशनी की लहर में डूब जाते हैं।

उसके महान उपन्यास बेहद जटिल हैं : उनके भीतर हजारों संबंध और अन्दरूनी संपर्क दौड़ा करते हैं ; कोई भी घटना सैकड़ों पन्नों की दूरी के बाद संशोधित की जाती है ; हर आकृति का सिर्फ एक अर्थ होता है जब वह बाकी आकृतियों के रूबरू होती है; हर वाक्य को स्वतंत्र तरीके से समझा जा सकता है चाहे उसे किताब की संपूर्णता से अलग कर के ही क्यों न देखा जाए। ऐसे में हम यह सोच ही सकते हैं कि वह श्रमपूर्वक अपनी किताबों की योजना बनाता था और उन्हें लगातार संशोधित करता चलता था जैसा कि दोस्तोव्स्की और ताल्सताय किया करते थे। यह कतई सच नहीं है। अपनी कोठरी में 'अमेरिका' या ' द कासल' या 'द ट्रायल' लिखते हुए काफ़्का ने कभी किसी किताब का खाका नहीं बनाया। लेखन के वास्तुशिल्प की किसी भी समस्या का अस्तित्व नहीं था। किसी अतिप्रेरित व्यक्ति की तरह वह अपनी असीम लहरदार कल्पना के आगे समर्पित हो जाता था जो उसके भीतर रातों को बहा करती थी। और इस रात्रिकालीन प्रेरणा के लिए सारा संरचनात्मक ज्ञान उसे मिला हुआ था।

उसका लेखन लावा के महान प्रवाह जैसा होता था जिसमें न अध्याय होते थे न पैराग्राफ न विराम चिन्ह - उन्हें बाद में जोड़ा जाता था। वह बहुत कम संशोधन किया करता था। 1912 के पतझड़ के समय के ये दिन काफ़्का के जीवन में निणार्यक बने। 'डेस्कि`प्शन आफ अ स्ट्रगल' और 'मेडिटेशन' के जोकरपन के बाद उसने पाया कि वह वैसा कारीगर लेखक नहीं है जैसा वह सोचा करता था। अचेतन की छायाओं ने उस पर आक्रमण कर दिया था ; 'मेटामारफासिस' 'अमेरिका' और फेलीसे को लिखे पत्रों के दौरान जो अनन्त तक लिखे जा सकते थे काफ़्का को आभास हुआ कि उसके पास कल्पना का उदद्ाम खजाना है। सब कुछ जैसे उसके काबू में था। अगर उसने चाहा होता तो वह दूसरा दोस्तोव्स्की बन सकता थाः ऐसी रचनाओं का लेखक जिनसे केवल प्रकृति ही टक्कर ले सकती है। मुझे यह कहने में मुश्किल हो रही है कि काफ़्का ने कितना जानबूझ कर ऐसा किया होगा। जैसा उसने कहीं लिखा है कि वह अपनी कल्पना के बड़े हिस्सों को संकरे रास्तों और संकरी सीमाओं में भेजा करता था। कैद काफ़्का की महानता का स्रोत थी। उसके बिना वह रह ही नहीं सकता था। लेकिन इस जीवन के लिए उसे एक पाप किए जाने का पछतावा रहा ; उसने अपने अजाने देवता द्वारा प्रस्तुत की गई संभावना को नकार दिया था।

उसे और शंकाएं भी थीं। किसी भी बाधा के सामने हार जाना उसके लिए बहुत होता था ¸ और वह दो दिनों के लिए लिखना छोड़ देता था क्योंकि उसे भय होता था कि वह सदा के लिए अपनी प्रतिभा खो चुका है। वह अपनी प्रेरणा पर विश्वास नहीं करता था। उसे लगता था कि वह बिना रुके किसी पहाड़ की चोटी पर पहुंच जाता था पर वहां एक पल को भी नहीं ठहर पाता था। एक तरह से इन संशयों को समझा जा सकता है : वह उन लेखकों में नहीं था जो हर सुबह अपने काम की मेज पर बैठा करते हैं - प्रेरणा आती थी और चली जाती थी। वह शान्त होकर वर्षों तक के लिए उसे छोड़कर जा सकती थी जिसके कारण वह बेहद दुखी हो जाता था। और इसके अलावा अगर हर चीज उसका ख्वाब भर थी तब? मान लिया कोई महाशक्ति अपने मकसद के लिए उसका इस्तेमाल कर रही थी तब? और अन्त में अगर अपने को कोठरी में बंद कर लिखते रहना ही सब से बड़ा पाप होता तब ? क्या फर्क पड़ता है कि उसने सारे नियमों को अस्वीकृत कर दिया? वह साहित्य से प्रेम करता था लेकिन वह सौन्दर्यवादी का विलोम था। उसका मानना था कि मनुष्य के सबसे महान कर्म दानशीलता से प्रेरित होना चाहिए जैसा कि ग्रेगोर अपने परिवार के लिए खुद को जला कर करता है।

अगली पोस्ट में जारी ...

6 comments:

ravindra vyas said...

सो उन रातों को वह जादू हुआ करता था जो काफ़्का को आधुनिक लेखकों के बीच अद्वितीय बनाता है। रात अपना गाढ़ा अंधेरापन नहीं खोती थी ; अचेतन का रूपान्तरण होता था पर वह अचेतन बना रहता था; तर्क कभी खुद को चीजों पर नहीं लादता था; तो भी समूचा अजाना द्वीपसमूह रोशन हो कर सामने आता था बिना किसी परछाई या अपरिभाषित के जैसे कि वह दिन की रचना हो। हमें एक अद्वितीय अनुभव होता हैः हम एक साथ अचेतन और रोशनी की लहर में डूब जाते हैं।
बहुत सुंदर और मार्मिक। बहुत मेहनत और लगन से, वैसे ही जागते हुए...अथाह शांति और रात की गहराती नीरवता के बीच किया अनुवाद लगता है। तभी तो इतना छूता है, धंसता है और कहीं गहरे एक फूल खिलता है खुशबू उड़ती है। यह काफ्का है।
अतृप्त, अतृप्त, अतृप्त...बस गहरे काले बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं, आंखे एकटक निहारती हैं...बरसो...बरसो...झमाझम बरसो...

शायदा said...

अगली पोस्‍ट भी डाल ही दो जल्‍दी....अच्‍छा लग रहा है पढ़ना।

Kanishtha said...

तीसरी किस्त भी जल्दी दें. अच्छा लगेगा. बढ़िया स्तरीय अनुवाद - Excellent Work!

Arun Aditya said...

"मेरा सारा शरीर मुझे शब्दों के खिलाफ पहरे में लगाए रखता है और मेरे द्वारा लिखे जाने से पहले हर शब्द अपने चारों तरफ देखता है ."
पिछली पोस्ट की ये पंक्तियां अभी तक पीछा नहीं छोड़ रही थीं। निस्सार वाचालता के इस दौर में शब्दों पर निगरानी रख पाना जितना जरूरी उतना ही कठिन है। पर आज की पोस्ट में ये वाक्य सुकून की तरह लगे- "रात की गहराई में अकेले लिखते हुए अपने भीतर छिपी हुई और जड़ हो गई हर चीज को मुक्त किया और इस तरह उसे एक ऐसी खुशी मिलती थी जो उसके बर्फ जैसे हाथों और कांपते दिल को गरमा देती थी।"
निगरानी के बाद जो शब्द आते हैं वे इसी तरह सुख देते हैं।
और अशोक पांडे के अनुवाद का क्या कहना।

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा-पढ़ने का आनन्द ले रहे हैं..जारी रहिये.

prabhatranjan said...

bahut achha anuvaad hai. parhne men anand aata hai.
prabhat