Sunday, September 21, 2008

अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का

( काफ़्का बीसवीं सदी के महानतम लेखकों में से एक थे। जितनी दिलचस्पी लोगों को उनके साहित्य के बारे में रही , उतनी ही जीवन के प्रति भी। काफ़्का के बारे में हालाँकि उनके साहित्य, डायरियों और पत्रों के मार्फ़त अच्छा पता मिलता है, पर अब भी उनके जीवन और लेखन के बारे में बहुत-सा तथ्य अनकहा है। हाल ही में कुछ ऐसे कागज़ात भी मिले हैं, जिसके बिना पर यह पुष्टि होती है कि काफ़्का के आत्मकथात्मक लेखन का एक बड़ा हिस्सा अभी छपना बाकी है। बहरहाल, साहित्य की पत्रिका, ''आधारशिला'' में जब इतालवी आलोचक और जीवनीकार पिएत्रो सिताती का लिखा काफ़्का की जीवनी अशोक पांडे के अनुवाद में पढ़ने को मिली तो यह लोभ स्वाभाविक था कि उसके अगले अध्याय सबद पर हों। अशोकजी ने कृपापूर्वक अब तक अनछ्पा जीवनी का तीसरा अध्याय हमें भेजा। हम उनके शुक्रगुजार हैं। पोस्ट लंबी न हो जाए इसलिए यह पूरा अध्याय टुकड़ों में दिया जा रहा है। इस स्तंभ में इससे पहले आप शेक्सपियर और अर्नेस्ट हेमिंग्वे के बारे में पढ़ चुके हैं। )

पशु की भूमिका में लेखक

अपनी युवावस्था में भी काफ़्का ने काव्यात्मक प्रेरणा को एक प्रवाह की तरह महसूस किया थाः एक ज्वार या तेज हवा की मानिन्द जो उसके दिमाग और शरीर को भर देती थी और उसे समुन्दर के पार ले जा सकते थी जहां महान काव्य की रचनाएं बहा करती थीं। ये हवाएं आम तौर पर रात को बहती थीं जिनके कारण या तो उसे नींद नहीं आती थी या उसे अपने सपनों से युद्ध करना होता था। यह एक तरह की मुक्तिदायक शक्ति होती थी पर साथ ही इससे उसके हाथ पैर टूट जाया करते थे। यह किनारों से उपजने वाला एक विद्रोह होता था, उसकी आत्मा का पाताल, उसकी चेतना का अचेतन अंधेरा। उसके भीतर कुछ था जिसके बारे में वह भी नहीं जानता था जो इस तूफान का सामना करता था। या तो वह उसे अपने में "समो लेता था या उसका दमन कर देता था"। वह कभी भी अपने अचेतन को पूरी तरह मुक्त नहीं करता था और शायद इसी कारण उसे दिशा नहीं दे पाता था। इस तरह काफ़्का को लगता था कि बजाय एक जीवन्त साम्य के उसके भीतर एक चिंघाड़ रहा करती थी।

उसने शब्दों की आक्रामकता को जान लिया था : "मेरा सारा शरीर मुझे शब्दों के खिलाफ पहरे में लगाए रखता है और मेरे द्वारा लिखे जाने से पहले हर शब्द अपने चारों तरफ देखता है "; और उसके दिमाग ने चीजों पर वह निबार्ध प्रवाह अभी लादना बाकी था जिसे उसके उपन्यासों का महान गुण बनना था। हर पंक्ति के साथ उसे फिर से शुरू करना होता था मानो वह किसी बेहद श्रमसाध्य पैटर्न पर काम कर रहा हो। उसकी डेस्क पर उसे हर चीज रूखी, मुड़ीतुड़ी, गतिहीन, हर तरफ से अपमानित, शर्मसार और सब से ऊपर खाली जगहों से भरी नजर आती थी। सिर्फ कटी फटी चीजें सतह पर आ पाती थीं ; हरेक टुकड़ा करीब-करीब बेघर मंडराया करता और अलग अलग दिशाओं में दौड़ जाता "मेरा तकरीबन हर शब्द दूसरे शब्दों से मेल नहीं खाता। मेरे संदेह मेरे शब्दों के चारों तरफ घेरा बनाए खड़े रहते हैं और मैं उन्हें अपने शब्दों से पहले देखता हूं।" मैक्स ब्राड को 'अमेरिका' के पहले ड्राफ्ट के बारे में बताता हुआ वह लिखता है कि बजाय एक दूसरे से जुड़े होने के वह अलग अलग टुकड़ों से बनी है।

मुक्ति आखिरकार आई। इतवार था - 22 सितम्बर 1912 - फेलीसे से उसकी मुलाकात के तकरीबन एक महीने बाद। उसे एक पूरा दिन अपने परिवार के व्यस्त कार्यक्रम के बीच गुजारना पड़ा थाः उसके बहनोई के कुछ रिश्तेदार पहली दफे घर आए थेः उसने अपना मुंह एक बार भी नहीं खोला और वह मारे उकताहट और हताशा के चीख पड़ना चाहता था। रात के खाने के बाद करीब दस बजे वह अपनी डेस्क पर था। उसकी इच्छा थी कि एक युद्ध का वर्णन करे। एक युवक ने एक खिड़की से एक भीड़ को आते देखा; इस पर उसकी कलम ने 'द जजमेन्ट' लिखना शुरू किया - पिताओं और पुत्रों की एक गाथा, क्रूरता और बलिदान की एक कहानी - जिसमें पहली बार उसका ईडिपस काम्प्लेक्स सामने आया। उसे तुरन्त आभास हुआ कि संघर्ष के वर्णन के उस पल अब वह फकत उंगलियों के पोरों स खेलने का मामला नहीं रह गया था। यह कहानी उसकी पूरी ऊर्जा के साथ लिखी गई है : दिल शरीर और आत्मा के साथ। यह एक तरह से "कूड़े और आंव से ढंका हुआ" सच्चा और वास्तविक जन्म था। उसके अचेतन की ताकत जिसे उसने अब तक दबाए रखा था अचानक पूरी तरह प्रकट हो कर सामने आ गई। उसके रास्ते की सारी बाधाएं अचानक टूट गई थीं।

वह रात भर बिना रुके बिना सोए लिखता रहा; उसकी टांगें डेस्क पर बैठे रहने के कारण अकड़ गई थीं। बिना किसी मनोवैज्ञानिक वर्णन के उसने वह सब लिखा जो उसके भीतर घुमड़ रहा था। अगर वह एक पल को भी रुका होता या अगर उसने एक किताब पलटी होती या उसका ध्यान जरा भी बंटा होता वह उस समय तक न कहे न सुने गए सत्यों को उजागर नहीं कर सकता था। लेखन इसी तरह का न रोका जाने वाला ज्वार था ; उसके भीतर जल की अपार अपरिभाषित निबार्ध गति थी और साथ ही उसका सफर भी मानो समुद्र की एकरूपता में एक के बाद एक जलसमूह एक दूसरे के ऊपर चढ़ रहे थे। अपनी डेस्क से चिपका हुआ काफ़्का अपना हाथ कागज से नहीं हटा पा रहा था। अगर ऐसा होता तो वह अपनी भाषा के उस प्रवाह और ऊर्जा को नहीं पा सकता था जिसके लिए उसने लम्बे समय तक साधना की थी। उसकी समझ में आया कि आपको एक ही बार में लिख देना होता है - न सिर्फ कहानियों को बल्कि लम्बे उपन्यासों को भी जैसा उसने 'द सैन्टीमैन्टल एजूकेशन' के साथ किया था और जिसे वह एक ही सिटिंग में अपने श्रोताओं को पढ़कर सुनाना चाहता था। "लेखन केवल इसी तरह संभव है। इसी तरह की एकरूपता के साथ जब शरीर और आत्मा अपने आप को पूरी तरह प्रकट कर देते हैं।"

दो बजे उसने आखिरी बार घड़ी देखी। उसकी थकान गायब हो गई। कुछ घंटों बाद बाहर की हवा नीली होनी शुरू हुई ; एक बग्घी गुजरी; फिर दो आदमियों ने पुल पार किया। दिन का उजाला हो चुका था जब उसने बत्ती बुझाई। छः बजे जब नौकरानी गलियारे से होकर गुजरी वह अपना आखिरी पैराग्राफ लिख रहा था। उसने कुर्सी पीछे खिसकाई और कमरे के बाहर पसर कर नौकरानी से कहाः "मैं अब तक लिख रहा था"। लड़खड़ाते हुए वह अपनी बहन के कमरे में घुसा और उसने वह कहानी पढ़ी ; उसे कहानी का अर्थ नहीं पता था। उसे महसूस हुआ कि उसकी आंखें चमक रही हैं। फिर थकान और प्रसन्नता के साथ वह अपने बिस्तर पर पहुंचा। उसके दिल के आसपास हल्का सा दर्द था और पेट की मांसपेशियों में ऐंठन।

उस रात दस बजे से सुबह के छः बजे तक काफ़्का ने अपने लिए सदा के लिए साहित्य और काव्यात्मक प्रेरणा का सिद्धान्त स्थापित कर लिया - जैसा प्लेटो और गुइटे बाद कभी नहीं हुआ था। वह इस बात को लेकर निश्चित था कि कहीं न कहीं एक महाशक्ति है जो उसके हाथ का इस्तेमाल करती है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वह कौन थी : चाहे वह कोई जाना अजाना देवता हो चाहे कोई दैत्य या फिर अंधकार का वह समुद्र जिसे वह सदा अपने साथ लिया चलता था और जिसे वह महानतम वस्तुनिष्ठ शक्ति के रूप में पहचानता था। उसे बस उसकी आज्ञा का पालन करना था और उसके संकेतों को पहचानना था और महान साहित्य की रचना करनी थी। यह एक बहुत बड़ा काम था ! इसका मतलब था संदेहों और प्रतीक्षाओं से भरपूर मेहनत। वह सिर्फ आज्ञा का पालन करने से संतुष्ट न था ; उसने अपने भीतर और बाहर बहुत सारी चीजों को तहस नहस करना था। बहुत सी बातों को भुलाया जाना था : परिवार, दोस्त, प्रकृति, स्त्रियां, यात्राएं, फेलीसे, बच्चे, बातचीत, संगीत।

यह एक तरह की कीमियागरी थी : अपने आप को त्याग कर उस महत्तर और पवित्र पदार्थ की रचना करना जिसे साहित्य कहते हैं। अगर वह ऐसा नहीं करता तो साहित्य का देवता उसे जिन्दा नहीं रहने देता। "कल मैं फिर लिखना शुरू करूंगा। मैं चाहता हूं अपनी पूरी ताकत से जुट जाऊं ; अगर मैं लिखूंगा नहीं तो मुझे लगता है वह कठोर हाथ मेरे भीतर से जीवन निकाल लेगा।" अगर वह नहीं लिखता तो वह हल्की से हल्की चीज का गुलाम बन जाता। और अगर वह लिखता तो शायद कोई उम्मीद थी। शायद वह दुनिया को रूबरू देख पाने लायक बन जाता और साहित्य का देवता उसके लिए उपहार के तौर पर फेलीसे को लेकर आता।

वह जानता था कि भले लोग रातों को सोया करते हैं - बच्चों की तरह अपनी नींद में सुरक्षित जहां एक दैवीय हाथ उन्हें दुस्वप्नों से बचाए रखता है। नींद सबसे पवित्र दैवीय वस्तु होती है जो केवल पवित्र लोगों की पलकों पर उतरती है। जिन्हें नींद नहीं आती वे अपराधी लोग होते हैं क्योंकि उन्हें आत्मा की शान्ति के बाबत कुछ पता नहीं होता और वे अपनी सनकों से प्रताड़ित होते रहते हैं। सभी अपराधियों की तरह वह भी अनिद्रा का शिकार था। शाम को उसे नींद आ जाती थी पर एक घंटे में वह फिर जाग जाता था मानो उसने अपना सिर गलत जगह पर रखा हो।

वह पूरी तरह जगा होता था और उसे लगता था कि या तो वह जरा भी नहीं सोया या फिर नींद बस उसकी महीन त्वचा के ऊपर आई थी। अभी उसे और सोने का जतन भी करना होता था। फिर वह दुबारा सो जाता था। उसका शरीर खुद अपनी बगल में सोया होता था जबकि वह अपने सपनों से संघर्ष करता हुआ भटका करता था। पांच बजे के आसपास नींद के आखिरी निशान खत्म होने को होते थे और उसके दुस्वप्न जागृतावस्था से भी अधिक थका देने वाले होते। जब वह पूरी तरह जाग जाता उसके स्वप्न उसके चारों तरफ इकठ्ठा हो कर भयभीत आंखों से उसे देखा करते। लेकिन वह जान गया था कि उसकी अनिद्रा जो उसका पाप थी वही उसकी ताकत भी थी। इस तरह की बेचैन नींद सोने वाला रात और उसके राक्षसों को पहचानने लगता है और अपने अचेतन में छिपे इन दैत्यों को उसने जगाना ही था जैसा कि उसने 'द जजमेण्ट' लिखने की रात फिर कभी न सो पाने की कीमत पर किया।

अगली पोस्ट में जारी ....

10 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग जी अशोक की विलक्षणता का ये एक आयाम है! दूसरे भी कई हैं जिनसे आप धीरे-धीरे परिचित होंगे।
ऐसा कहते हूए मैं व्यक्तिगत नहीं होना चाहता पर कहना ही होगा कि अशोक ने अनुवाद को एक मिशन के तौर पर अंजाम दिया है और दुनिया भर की खिड़कियों के द्वार हमारे आगे खोल दिए हैं।
ये पोस्ट भी ऐसी ही एक खिड़की है!

शायदा said...

बहुत बढि़या अनुवाद। लय में बंधा हुआ, जरा भी अटकाव-भटकाव नहीं। बधाई इतने अच्‍छे काम के लिए और अनुराग का धन्‍यवाद इसे यहां तक लाने के लिए।

katyayani said...

Dil kuch accha chah raha tha aaj......aur tumne de diya........
Haan! Kafka par ye post shaandaar hai....Aanand aa gaya...
Kafka ki shakhsiyat ko kaafi karib se jaana...
Uska aanand uski taqlifein....ya kahun uski taqlifoon mein uska aanand........sab jankar bahut khub laga.....
Is kala ke tukde ko bikherne k liye... Ashok Ji aur Anurag, aap doonon ka SHUKRIYA........

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा अनुवाद..आभार इस प्रस्तुति का.

Kanishtha said...

... वह पूरी तरह जगा होता था और उसे लगता था कि या तो वह जरा भी नहीं सोया या फिर नींद बस उसकी महीन त्वचा के ऊपर आई थी। अभी उसे और सोने का जतन भी करना होता था। फिर वह दुबारा सो जाता था। उसका शरीर खुद अपनी बगल में सोया होता था जबकि वह अपने सपनों से संघर्ष करता हुआ भटका करता था। पांच बजे के आसपास नींद के आखिरी निशान खत्म होने को होते थे और उसके दुस्वप्न जागृतावस्था से भी अधिक थका देने वाले होते। जब वह पूरी तरह जाग जाता उसके स्वप्न उसके चारों तरफ इकठ्ठा हो कर भयभीत आंखों से उसे देखा करते। लेकिन वह जान गया था कि उसकी अनिद्रा जो उसका पाप थी वही उसकी ताकत भी थी। इस तरह की बेचैन नींद सोने वाला रात और उसके राक्षसों को पहचानने लगता है और अपने अचेतन में छिपे इन दैत्यों को उसने जगाना ही था ...

अशोक पाण्डे नाम के आदमी की अपनी कहानी है उस के अनुवाद का यह टुकड़ा. कई सालों से न सोये इस extraordinary इन्सान और मेरे दोस्त के लिए मैं नींद की दुआ भेज रही हूं ... जहां भी हो वह आवारा.

आपको धन्यवाद इस पेशकश के लिए.

ravindra vyas said...

अशोकजी का यह अनुवाद पढ़कर काफ्का का वह देहाती डॉक्टर याद आ गया जो अपने रोगी का उपचार करने से पहले यह कोशिश करता जान पड़ता है कि वह पहले रोगी के दुःख में शामिल हो सके। उसे समझ सके। इस अनुवाद को पढ़ते हुए अनुवादक की उस संवेदना की झीनी गीली परत का अहसास भी होता है जब वह इसे दूसरी भाषा में ला रहा था और ऐसा करते हुए वह उसी यातना या दुःख का गहरा अहसास कर है जिससे काफ्का गुजर चुके थे। इसीलिए यह संभव हो सका कि इस अनुवाद में हम उस महान लेखक के दुःख को अपने अंतरतम में महसूस करते हैं। इस अनुवाद में पढ़ने का आनंद है। मैंने इसे भरपूर लिया। इस बेहतरीन पोस्ट के लिए अशोकजी को ढेर सारी बधाइयां और जाहिर है अनुरागजी को भी। अगली किस्त का इंतजार है...

Ek ziddi dhun said...

ye shandaar series hai..kam likh paa raha hoon...

Anonymous said...

bahut hi shandaar anuvad ! padhna shuru kiya to pataa hi nahi chalaa ki kaba samaapan pe aa gaya ! aise prayaas se parichit karane ke liye dhanyavaad !

mahinder

विपिन बिहारी गोयल said...

मजा आ गया .क्या metamorphosis का हिंदी अनुवाद उपलब्ध है

Krishna Kumar Mishra said...

बहुत खूब !!!