Tuesday, September 16, 2008

सबद विशेष : ४ : दिलीप चित्रे



( दिलीप चित्रे मराठी के शीर्षस्थानीय कवि हैं और 1७ सितंबर को जीवन के सत्तर वर्ष पूरे कर रहे हैं। चित्रे की कविताओं का करीब पच्चीस बरस पहले हिन्दी में कवि चंद्रकांत देवताले ने पुस्तकाकार अनुवाद किया था। तब उनकी कविता और उसके कंसर्न से लोग चकित हुए थे क्योंकि चित्रे कविता के भीतर नवाचारी थे पर उसे पोसते नितांत पारंपरिक काव्य-स्रोतों से थे। बदलते वक्त और कविता के प्रतिमानों के तइं भी उन्होंने अपने इस मूल काव्य-गुण को बचाए रखा है। चित्रे ने अंग्रेजी में भी प्रभूत कविताएं लिखी हैं। हालाँकि यह तथ्य है कि छिटपुट अनुवादों के अलावा उन्हें हिन्दी में गृहस्त बनाने का देवताले सरीखा एकनिष्ठ उद्यम किसी ने नहीं किया। अब युवा कवि तुषार धवल ने यह पहल की है और चित्रे के सौजन्य, प्रेरणा और अपने पित्तामार मेहनत से वे उनकी अनेक कविताओं का अनुवाद कर गए हैं। हमें उन अनुवादों में से कुछेक को सबद में प्रकाशित करते हुए प्रसन्नता हो रही है। स्वयं चित्रे ने सबद को जो परोक्ष स्नेह, समर्थन और मार्गदर्शन दिया है उसका भी खुला स्वीकार यहाँ ज़रूरी है। हम आने वाले दिनों में अन्य भारतीय भाषाओँ के मूर्धन्य कवि-लेखकों के अनुवाद भी प्रकाशित करेंगे। फिलहाल चित्रे को सबद की ओर से : जीवेत् शरदं शतम्। )

कविताएं तुषार धवल के अनुवाद में

प्रस्तावना

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
हर कोने हर एकांत में
जहाँ रोशनी नहीं पहुँचती तुम्हें खोजने
तुम्हारे एकांत को भयानक भीड़ बनाने

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
मन के हर दरार हर तरेड में
जहाँ विचार रिस कर नहीं आते

पड़े रहो नीचे और गहरे
क्योंकि सतह वाली कोई भी चीज़ तुम्हें सहायता नहीं देगी

छुपा कर रख दो भगोड़े विचारों को
हो जाओ छविहीन और रहो एकाकी
क्योंकि तुम्हें फ़िर भी एक मौका मिल सकता है
मनुष्यों की दुनिया में उग आने का।

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धरती तेजी से अपनी स्मृति खोती जा रही है

धरती तेजी से अपनी स्मृति खोती जा रही है
और इसमें मैं अपनी स्मृतियों को खोता हुआ पाता हूँ
क्योंकि मैं बहुत पहले से जानता हूँ कि
स्मृति केवल आपराधिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है
स्मृतियाँ हैं जो लगातार आती हैं
जड़, तने और टहनियों से
और ज़िन्दा रहती हैं आसन्न भविष्य के बाद भी
स्मृतियाँ पुनर्सृष्‍ट होती उगती हैं
गढ़ती हैं अपना काम, पहचान और रूप
वे उस जीवन से ज्यादा अलग नहीं हैं जिसे हमने जाना है
घाव, उत्सव और
ज्ञान में उठते चक्र और भंवर
शून्यता के प्रति

अब मैं पाता हूँ कि यह धरती छोटी पड़ गई है
अपनी असंख्य और अकबकाई मनुष्यता के लिए
जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जगह हड़प लेना चाहता है
और जगह बचती नहीं है किसी की स्मृतियों के लिए
ख़ुद स्मृति की भी नहीं।

और जब स्मृति खो जाती है
पागल हिंसाओं का युग आता है

भय की कोई स्मृति नहीं होती
घृणा की कोई स्मृति नहीं होती
अज्ञान की कोई स्मृति नहीं होती
एक बेलगाम हिंसक पशु अब संभावित ईश्वर नहीं रहा।


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खून धीरे धीरे निकलता है कलेजे से

खून धीरे धीरे निकलता है कलेजे से
वह धड़कता रहता है ख़त्म हो जाने तक।
लगातार खून बहाते रहना हमारे भाग्य में है
जब तक कि हमारा नामोनिशान मिट न जाए।

मैं वो कागज़ नहीं हूँ, जिस पर मैं लिखता हूँ
न ही वो शब्द जिसे मैं टाइप, प्रिंट या स्याही से उगलता हूँ।
मैं किसी घटना की छाया नहीं हूँ
न ही उसका कोई दाग जो मिट नहीं सकता।

यह
एक तरह का खून है जो न जमता है न थमता है।
यह प्रतीक भी नहीं है
ज्ञान की अमिट लौ और उसकी रोशनी के मिथकों का।

मेरे पंछी बिना आकाश के उड़ते हैं।
मेरी मछलियाँ तैरती हैं शून्य में।
मेरे शब्द पड़े हैं आहटों के जंगल में
उन पेड़ों के बीच जो अभी उगे नहीं हैं, उभरे नहीं हैं।

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२२ दिसंबर, उत्तरी गोलार्ध का सबसे छोटा दिन

मैं तरसता हूँ आदिम गुफा के लिए।
मेरे पशु को नींद चाहिए।
मेरे पोषण को बहुत कम बचा है सिवाय उसके जो मेरे भीतर जमा है।
मैं बहुत धीमी साँस लेना चाहता हूँ, तल को छूते हुए।

काश यह दिन और भी छोटा हो पाता, रोशनी के क्षणांश जितना।
काश यह चक्र और भी धीमा हो पाता, बस एक क्षणिक चमक,
चौबीस घंटों में, बाकी सब एक गहरी रात।

मैं आँखें बंद कर लेना चाहता हूँ हिमपात पर,
मैं अनजान रहना चाहता हूँ बदलाव की निरंतरता की पीड़ा से,
घड़ी की ज़िद से, धरती के घूमने से, नक्षत्रों की चाल से।

सितारों और उपग्रहों से, उस बल से जो हमें देश काल में
मोड़ देता है, चेतना के आंतरिक घुमाव से,
मैं होना चाहता हूँ : न ऊर्जा, न पदार्थ, न जीवित कुण्डलिनी।

सिवाय उस बोध की सबसे छोटी झपक के, जो दबी है त्वचा
और मांस के भीतर, मस्तिष्क की खोह में छुपा, जाड़ों का रहस्य।

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धीरे धीरे

धीरे धीरे आओ, जैसे आता है शोक
या फुर्सत से आओ जैसे आती है दर्द की याद
जो सुन्न हुए दर्द से भी गहरी यातना देती है

ज़िन्दगी ने मुझे पहले भी सुन्न किया है
और मौत ने उसके बाद हमेशा।
आओ मेरे पास, जैसे धीमी ताल में आती है कविता
एक अनकहा अर्थ पाने।

धीमे सधे क़दमों से पास आओ मेरे
जैसे आती है मौत
करो मेरे साथ टैंगो का अंतिम मत्त नर्तन।

बिजली की गति, चौंका दो मुझे
अपनी गणितीय निरंतरता से
अंकित करो मुझे ईश्वरीय धुंध पर
और कृपा दो कि धीमा हो सकूँ
गहरे अतल में समाते हुए।

****

मेरे लिए ये कविताएं अंत हैं

मेरे लिए ये कविताएं अंत हैं
ये एक तरह से मुझे ख़त्म करती हैं
भले ही ये किसी सुइसाइड बॉम्‍बर की तरह
आपके पास पड़ोस में फट जाए

मैं आतंकवादी नहीं हूँ लेकिन आतंक के युग में जीता हूँ
इनमें से कुछ मेरे कोमल मुहावरों में घुस जाते हैं
मैं किसी इलहाम को सच करनेवाला जेहादी भी नहीं हूँ
बस मेरी कविताएं ही मुझे ख़त्म करती हैं

फिर एक बार नए आश्चर्य पाने को
मैं इंतज़ार करता हुआ खालीपन बन जाता हूँ
लेकिन ज्यादातर वे दर्द ही लाते हैं
कुछ कभी लाते हैं अलभ्य प्रकटन
सीमाहीन सुरों सा

इसका कोई अंत नहीं, सिवाय मेरे
दूर मुझसे बल्कि सभी कविता उड़ी जा रही है।

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11 comments:

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

tushar jee,
bahut badhaee! chitre jee kee kavitaon ka to mai murid hoon hi, aapka anuvad bhi lajvab hai...lge rho bhaee.

शिरीष कुमार मौर्य said...

मराठी के इस अनोखे कवि को मैने भी देवताले जी के ज़रिए जाना. उनके साथ रहते हुए दिलीप जी और उनकी कविता के बारे काफी विस्तृत चर्चा हुई. सबद पर उन्हे पा कर अच्छा लगा. तुषार जी को धन्यवाद की वे उन्हे हिन्दी मे लाए और आपको भी !

शायदा said...

शानदार कविताएं।

shraddha said...

smritiya to yon bhi bahut priya hoti hai, us par likhi kavita ke bare me kya kehna.............

Ashok Pande said...

बहुत प्रिय कवि की रचनाएं पढ़वाने का आभार मेरे भाई!

धर्मेंद्र सुशांत said...

dilip chitre mere priya kaviyon men hain. wah behad sajag aur sangharsh-shil hain. unki kavikayen padhkar kafi achha laga. tusharji ko dhanyawad ki unhonne sadha hua anuwad kiya hai.

prabhatranjan said...

anuragji,
sach bataun to dilip chitre ki kavitaon ko is anuvaad se pahle maine angrezi men parha tha. lekin in anuvaadon ko parhte huye laga ki unki kavitayen hindi ke kitne paas hai.bahut achha anuvaad hai.aapko badhai ki aapki prerna par inti achhi rachnayen saamne aa rahi hain.tushar ne bare manoyog se anuvaaad kiya hai.shabad bahut zaroori hastkshhep kar raha hai.
prabhat

P said...

अच्छी कविताओं का सुंदर-स्वाभाविक अनुवाद..

ravindra vyas said...

मुझे खुशी है कि किसी ब्लॉग पर गैर हिंदीभाषी किसी महत्वपूर्ण कवि की एक साथ इतनी कविताएं, इतने बेहतर अनुवाद में पढ़ने को मिलीं। तुषारजी और अनुरागजी को बधाई।

Ratnesh said...

in marathi kavitaon ka anuvad bahut hi sunder hai.

Geet Chaturvedi said...

मेरा प्रिय कवि.
और सुंदर अनुवाद.
तुषार को बधाई. अच्‍छा काम किया है.