Wednesday, September 10, 2008

सखा पाठ : २ : गुलजार बजरिए रवींद्र व्यास


( वे
पेंटर हैं, कहनियाँ लिखते हैं, हरा कोना नाम का उनका ब्लॉग है और हिन्दी के इस वर्चुअल वर्ल्ड में उनकी सजग उपस्थिति चहुँ ओर सराही गई है। जब हमने सखा पाठ स्तंभ शुरू किया था तो उसके पीछे किसी रचना से प्रेरित रचना को सामने लाने की अवधारणा थी। सबद में ही रिल्के पर छपे राजी सेठ के लेख के बाद बतौर बढ़त गिरिराज किराडू की कविता दी थी। उसके बाद यह सिलसिला थम सा गया। रवींद्र व्यास के माध्यम से अब फिर से शुरू हुआ है। उन्होंने गुलजार की कविता पर न सिर्फ़ पेंटिंग दी, बल्कि इसरार करने पर गद्य भी भेजा। हम उनके आभारी हैं। )



एक
और रात


गुलजार

चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात खामोश है, रोती नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला-सा गुंबद है, उड़ा जाता है
खाली खाली कोई बजरा-सा बहा जाता है

चांद
की किरनों में वो रोज-सा रेशन भी नहीं
चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है

काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता

****


ये देखो तो क्या होता है

गुलजार
की जमीन और आसमान सरगोशियों से मिलकर बने हैं। ये सरगोशियां खामोशियों की रातें बुनती हैं। इन रातों में कई चांद डूबते-उतरते रहते हैं। कई टंगे रहते हैं, अपने अकेलेपन में जिनकी पेशानी पर कभी-कभी धुआं उठता रहता है। दूज का चांद, चौदहवीं का चांद और कभी एक सौ सोला रातों का चांद। कभी ये चांद किसी चिकनी डली की तरह घुलता रहता है। ये चांद ख्वाब बुनते रहते हैं। ख्वाबों में रिश्ते फूलों की तरह खिलते रहते हैं और उसकी खुशबू पलकों के नीचे महकती रहती है। ये रिश्ते कभी मुरझा कर ओस की बूंदों की तरह खामोश रातों में झरते रहते हैं।

वे किसी गर्भवती स्त्री की तरह गुनगुनी धूप में यादों को गुनगुनाते महीन शब्दों से मन का स्वेटर बुनते हैं। इसमें उनकी खास रंगतें कभी उजली धूप की तरह चमकती रहती है। कभी इसमें सन्नाटों की धूल उड़ती रहती है। इसकी बनावट और बुनावट की धीमी आंच में रिश्तों के रेशे अपने दिलकश अंदाज में आपके मन को आपकी देह को रूहानी अहसास कराते हैं।

कहते हैं किसी की आत्मा पेड़ों में बसती है। किसी आत्मा एक फूल में बसती है। कहते यह भी हैं कि आत्मा एक पिंड में बसती है। और यह भी कि आत्मा एक स्वर्ग में बसती है, एक मुहूर्त में बसती है। क्या कहा जा सकता है कि गुलजार की गीतात्मा चांद में बसती है। और चांद यानी रात भी। और रात यानी तारे भी। और तारे यानी समूची कायनात। और इसके बीच वह भी जिससे हिज्र की रात में कहा जा रहा है कि काश इक बार कभी नींद में उठकर तुम भी ये देखो तो क्या होता है...

यह एक और रात है...

इस नज्म की पहली लाइन में रात के बहाने अपनी स्थिति बताने का एकदम सादगीभरा जलवा है। कोई बनाव नहीं। कोई श्रृगांर नहीं। लुभाने-रिझाने का कोई अंदाज नहीं। अकेलेपन में रात का चुपचाप, एकदम खामोश गुजरनाभर है। यह एक इमेज है। कहने दीजिए गुलजार इमेजेस के ही कवि हैं। दूसरी लाइन में कोई आहट नहीं, कोई गूंज नहीं। न रोना, न हंसना। एक अनकहे को पकड़ने की कोशिश। एक जरूरी दूरी पर खड़े होकर। न डूबकर, न उतरकर। अपने को भरसक थिर रखते हुए। तीसरी लाइन में रात के जादू को आकार में पकड़ने का वही दिलकश अंदाज है। इसमें चार चीजें हैं-कांच है, नीला है, गुंबद है और वह उड़ा जाता है। कांच, जाहिर है यह रात को उसकी नाजुकता में देखने की निगाह है। रात नीला गुंबद है। अहा। क्या बात है। इसमें एक कोई देखी मुगलकालीन भव्य इमारत की झीनी सी याद है।

यह रात को कल्पना से तराशने का सधा काम है। रात को एक आकार देना। उसे देहधारी बनाना। और यह गुंबद है, जो उड़ा जाता है। यानी एक एक मोहक और मारक गति है। एक उड़ती हुई गति। जाहिर है इस गति में रात की लय शामिल है। बीतती लयात्मक रात। यह मोहब्बत का स्पर्श है जो गुंबद के भारीपन को किसी चिड़िया की मानिंद एक उड़ान देता है। विश्व विख्यात मूर्तिकार हेनरी मूर को याद करिए। वे पत्थर में चिड़िया को ऐसे ढालते हैं कि पत्थर अपने भारीपन से मुक्त होकर चिड़िया के रूप में उड़ने-उड़ने को होता है। यह फनकार की ताकत है, अपने मीडियम से मोहब्बत है।

पांचवी लाइन बताती है कि यह शायर रातों की जागता है और रोज ही रातों को निहारता है। इसी जागने से यह एक और रात बनी है जिसमें कहा जा रहा है कि चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन नहीं। यह आपकी इंद्रियों का जागना भी है। कलाकार यही करता है। वह सभी इंद्रियों के प्रति आपको सचेत करता है। यह देखना-दिखाना भर नहीं है। छठी पंक्ति में चिकनी डली है। स्पर्श का अहसास है। फिर घुलना है। यह एक और रात कि घुली जा रही है। कि पर गौर फरमाएं। है न कुछ बात। और सातवीं लाइन में इन सबसे घुल-मिल कर एक सन्नाटा रात की तरह ही फैलता जा रहा है। वे इसे उड़ती धूल में पकड़ते हैं। महीन धूल। आठवीं और नौवीं लाइन मारू है। यह रात का जो जादू है, उसकी सुंदरता का जो भव्य स्थापत्य है, अकेलापन है, सन्नाटा है और खामोश गुजरना भर है, इसमें एक ख्वाहिश भी है कि कोई हिज्र की रातों में नींद से उठकर इसे देखे। यह भी कि- ये देखो तो क्या होता है।
***

21 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

रवीन्द्र व्यास जी से कबाडखाने पर मुलाक़ात होती है, सबद पर देखना भी शानदार अनुभव है !

A.D. said...

sundar par sundartar aur us par sundartam ki aarohi badhat. jiyo ravindra!tum par in dino shabab aaya hai.

anil yadav said...

there is one more line, almost invisible in the painting and poetry both- life is beutiful even without you.

प्रभाकर पाण्डेय said...

शबद पर आपकी उपस्थिति शबद के अर्थ को और अधिक चरितार्थ करेगी और इसकी महत्ता को बढ़ाएगी।
आपकी पेंटिग जीवंत और जीवन,समाज, प्रकृति के किसी न किसी पहलु को शानदार तरीके से पेश करती है।
ये पेंटिग भी बहुत ही शानदार है और कविता भी। सुंदरतम।

Parul said...

bahut duffa padhi hai ye nazm...aaj naye rang me mili...khuubsurat....aasha ki aavaaz bhi saath hoti to post puuri ho jaati..

यारा said...

...तो आख़िर
आपने कर ही दिखाया रविन्द्रभई


पेंटिंग वाकई मोहक है


awdhesh p singh
93292 31909

manisha bhalla said...

रवींद्र जी, पेंटिंग बहुत सुंदर है...चंडीगढ़ कब आ रहे हैं पेंटिंग्स के साथ..इंतजार है।

Ashok Pande said...

जेब्बात!

Udan Tashtari said...

पेंटिंग बहुत सुंदर है......और कविता भी--आनन्द आ गया जुगलबंदी में.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

bahut bahut shukriya aapka is post ke liye..

Arun Aditya said...

अद्भुत जुगलबंदी। चित्र और शायरी एक ही भाषा में बात कर रहे हैं। बधाई रवीन्द्र को और अनुराग तुम्हे भी।

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

लाजवाब ! आप की लेखनी, आपकी पेंटिंग, आपकी कलम, आपकी कुची .... और गुलजार के बारे में तो मुझ जैसा कोई क्या कहेगा...... बस समझ लीजिये गूंगे ने गुड़ खाया है.

Anonymous said...

painting khoobsurat hai. kai baar krati apni prerana se aage chali jati hai.
ambuj

संजय पटेल said...

शब्द और चित्र की जुगलबंदी से झरता संगीत सुनाई देता है आपकी पोस्ट में रवीन्द्र भाई.

anita said...

ravindra ji ne gulzar ke nazm ko apne prose aur painting se naye mayene de diye hai.....painting behad khoobsurat hai .....kash ravindra ji ke ghar se chura k le aati..........

Geet Chaturvedi said...

देवा हो देवा गमपत्‍ती देवा...
व्‍यास गद्दी की जय हो.
एक सूत के ताने से पूरी चुनरी बुन ले जाना.

प्रदीप मिश्र said...

रविन्द्र ठीक पसर रहे हैं। हरे का पसरना अच्छा लगता है। बधाई।

bahadur patel said...

ravindra bhai bahut achchhi kavita . painting bhi sundar hai.

डा० अमर कुमार said...



इस पोस्ट को अपने’ ब्लाग पोस्ट सँकलन पर ’ बिना अनुमति सहेज लिया है ।
अतिशय आभार आपका ।

शाहिद समर said...

sabad per aapse mulakat hui achchha laga vaise taaruf purana hai

sarita sharma said...

कविता की व्याख्या उस जितनी ही खूबसूरत है.रवीन्द्र व्यास के काव्यात्मक गद्य ने कविता को जीवंत बना दिया है. रात, चाँद, प्रेम और एकाकीपन से बुना गया अनोखा भावार्थ.