Sunday, September 07, 2008

कवि की संगत कविता के साथ : ५ : लाल्टू

( लाल्टू लंबे अरसे से कवि-कर्म में संलग्न हैं और अपने को हिन्दी की उखाड़-पछाड़ की साहित्यिक गुटबाजी से बिलकुल अलग रखा है। पर ऐसा वे अकेले नहीं कर रहे हैं। कवि नाम धरे ऐसे कई लोग हैं जिन्हें गुटबाजी से मतलब नहीं। पर ज़रूरी नहीं कि इस शुचिता से उन्होंने अच्छी कविता भी संभव कर ली हो। लाल्टू अगर ऐसा संभव कर सके हैं तो उसकी वजह यह है कि जिस हाशिए से कविता की कार्रवाई वे शुरू करते हैं, वहां मुख्यभूमि का बहुत कुछ त्याज्य/वर्जित पड़ा हुआ है। और असल में वह त्याज्य न होकर समाज का ही अभिन्न अनुभव है। इस बार कवि की संगत कविता के साथ में लाल्टू को पढ़िए। )

आत्मकथ्य

अनंत संभावना है कविता के लिए

कविता पर नया कुछ लिखने के लिए सचमुच मेरे पास कुछ नहीं है। पेशेगत रुप से साहित्य से दूर होने की वजह से या अन्य कारणों से इस सवाल पर बहुत सोचने की गुंजाइश भी नहीं रही। बचपन से किशोरावस्था तक कहानियाँ, उपन्यास पढ़ते हुए मन में आगे चलकर कहानीकार बनने कि तीव्र इच्छा पनपी। कहानियाँ लिखीं भीं। गद्य में और भी बहुत कुछ लिखा। शायद वक्त मिले तो अभी और भी बहुत लिखने की छटपटाहट है। सच यह है कि कविता लिखते हैं क्योंकि कविता पर रुक रुक कर काम करने की संभावना बेहतर है। गद्य एकबार में ज्यादा वक्त माँगता है। संगत के अभाव से और समय के अभाव से कविता पर जितना काम करना चाहिए, उतना दे नहीं पाया हूँ, पर फिर भी कोशिश की है।

विकल की कुछ पंक्तियाँ कविता के बारे में बहुत साफ कहती हैं - जैसे कि 'कविता आदमी का निजी मामला नहीं एक-दूसरे तक पहुँचने के लिए एक पुल है।' या यह पीड़ा कि 'मैंने बचपन में ज़िद क्यों की थी/ माँ ने क्यों मुझको झूठा बायस्कोप देखना सिखलाया था?' बायस्कोपी मायावी दुनिया में गोते लगाकर कविता हमें सच्चाई तक ले जाती है। इतने वर्षों बाद दुनिया की तमाम कविताओं में से पता नहीं क्यों विकल की कविताएँ सबसे पहले याद आ रही हैं। बचपन में मुहल्ले में बांग्ला कविता 'आवृत्ति' करते हुए कभी सोचा न था कि नजरुल, सुकांत से आगे भी कुछ होगा। धीरे धीरे न केवल आगे, बल्कि पीछे भी बढ़े या यूँ कहें की पीछे की रचनाओं में आगे की संभावनाएँ दिखने लगीं। रवींद्र से लेकर घर में जबरन पढ़वाई गई गुरबाणी (आदि सच जगादि सच, है भी सच नानक होसी भी सच) तक न जाने क्या क्या बातें असर कर गई हैं। इन दिनों पठाने खान का गाया फरीद सुनता हूँ और लगता है 'क्या हाल सुनावाँ दिल दा...' से बेहतर क्या लिखा क्या गाया जा सकता है। तो हम ठहरे महज लिखने वाले, जो भी पढ़ते सुनते हैं उसी को दुबारा लिख डालते हैं। अपना तो सचमुच कुछ है ही नहीं।

उम्र के साथ मेरी कविता मध्यवर्गीय जागरुक पर विभाजित व्यक्तित्व से जूझने की चीख बन गई है। मेरी कोशिश है कि कविता में ईमानदार रहूँ। अक्सर हम पाते हैं कि निजी जीवन में हमारी प्रतिबद्धता सीमित है, पर कविता में वह मुखर है। जबकि होना चाहिए कि कविता में उतनी ही बात हो जितनी हम जीते हैं। प्रतिबद्धता स्वयं हमारे शब्दों में आती है। इसी तरह रुप पर ध्यान दिए बिना हम क्या लिख सकते हैं? हर सचेत कवि इन बातों को सोचता है। कविता एक तरह की सेल्फ-थिरेपी भी है। लिख कर सुकून मिलता है। यह सुख उसे भी चाहिए जो दुनिया को बुनियादी तौर पर बदलना चाहता है और इसके लिए संगठित प्रयासों के साथ जुड़ा है। मैंने ऐसे लोगों की ओर से कुछ कहने की कोशिश की है। यह ज़रुर कहना है कि कविता की माँग कितनी ज्यादा है यह कवियों तक को नहीं पता है। मैंने आम तौर से कविता से विमुख माने जाने वालों के साथ ही कविता चर्चा की है और पाया है कि हर कोई कविता के प्रति स्वतः खिंचता है। इसलिए अनंत संभावना है कविता के लिए।

दो नई कविताएं

हाजिरजवाब नहीं हूँ

हाजिरजवाब लोग
जवाब देने के बाद होते हैं निश्चिंत
उनके लिए तैयार होते हैं जवाब
जैसे जादूगर के बालों में छिपे रसगुल्ले

जादूगर बाद में बाल धोता होगा
अगली शो की तैयारी में फिर से रसगुल्ले रखता होगा

मैं हाजिरजवाब नहीं हूँ
इसलिए नहीं कह पाया किसी महानायक को
सही सही, सही वक्त पर कि उसकी महानता में
कहीं से अँधेरे की बू आती है
मैं ताज़िंदगी सोचता रहा
कि बहुत जरुरी थी
सही वक्त पर सही बात कहनी।

कभी
कहा ठीक तो किसी बच्चे से कहा
कि गिरने पर चोट उसे नहीं
उसकी धरती को लगी है
जो उसी के साथ हो रही है धीरे धीरे बड़ी
कभी कहा ठीक तो किसी सपने से कहा
कि माफ कर देना
रख दिया तुम्हें अधूरा
बहुत चाहते हुए भी नहीं हो सका असाधारण

अचरज यह कि प्यार करते हैं मुझे सबसे ज्यादा
बच्चे और सपने।

****
शहर में शहर की गंध है

बारिश में बहती
नक्षत्रों के बीच
यात्राओं पर चली
मानव की गंध।

शहर में शहर की गंध है
मानव की गंध
सड़क पर मशीनें बन दौड़ती

बचते हम सरक आते
टूटे कूड़ेदानों के पास
वहां लेटी वही मानव-गंध

मानव-शिशु लेटा है
पटसन की बोरियों में

गू-मूत के पास सक्रिय उसकी उँगलियाँ
शहर की गंध बटोर रहीं
जश्न-ए-आज़ादी से फिंके राष्ट्रध्वज में

****
पुराना चावल

आजीवन

फिर मिले
फिर किया वादा
फिर मिलेंगे।


बहुत दूर
इतनी दूर से नहीं कह सकते
जो कुछ भी कहना चाहिए

होते करीब तो कहते वह सब

जो नहीं कहना चाहिए

आजीवन ढूंढते रहेंगे
वह दूरी
सही सही जिसमें कही जाएँगी बातें


****

12 comments:

vidya said...

bahut sundar kavita hai hazirjawab nahi hun.

aalekh said...

कविता में उतनी ही बात हो जितनी हम जीते हैं। यह ईमानदारी विरल होती जा रही है. कविताएं पसंद आईं.

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन कवितायें पढ़वाने का आभार.

venus kesari said...

बहुत सुंदर कविता
कविता लिखी गई है ख़ुद के लिए न की छपने के लिए
दिल को छूने वाले भाव

वीनस केसरी

Tushar Dhawal Singh said...

लाल्टू जी मेरे प्रिय कवियों में हैं, इसलिए जब आज उनका लिखा कुछ पढ़ने को मिला तो मन झूम उठा. कविताओं का क्या कहना, वे तो सुदर है ही, अपनी सादगी और सरलता में जीवन के तल्ख़ अनुभव और सत्य को बयां करती हुई, लेकिन उस से भी ज्यादा ध्यान जिस ने खींचा वह उनका वक्तव्य था. उन्होंने जो बात कही है उसमे से दो बातों पर गौर करने से कविता के आज के संकट और उस से मुक्ति की बात भी समझी जा सकती है. पहली तो यह कि , "हर कोई कविता के प्रति स्वतः खिंचता है. इसलिए अनंत सम्भावना है कविता के लिए." और दूसरी, " कविता में उतनी ही बात हो जितनी हम जीते हैं."
कुल मिला कर, हुनर दिखने या चकाचौंध से भर देने के प्रयास के बजाय अपना सच बयां हो, सच सिर्फ़ सच सच. और सच्ची बात किसी के भी दिल तक पहुँचती है.
इधर कविता के पाठकों की संख्या में जो कमी आई है उसकी वजह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का फैलाव तो है ही, साथ ही कविताओं का शुष्क ठंडापन, नीरस दुरुहता और ह्रदय को छू लेने में अक्षमता भी है. कविता में बौद्धिक जुगाली के बजाय संवेदना को ज्यादा अहमियत मिलनी चाहिए. यह तभी सम्भव हो सकेगा जब कोई ईमानदारी से अपने जिए हुवे अनुभव की नज़र से लिखेगा. सच्ची बात दिल से निकलती है और दिल तक पहुँचती है. लाल्टू जी ने इसी बात का जिक्र किया है. यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि राजेंद्र यादव जी समेत अन्य कुछ द्रष्टाओं ने घोषणा की है कि यह सदी कविता के अंत की सदी है. कुछ लोगों ने तो जल्दीबाजी में , नोस्त्रेदेमस बनने की होड़ में समस्त कलाओं के ही अवसान की भविष्यवाणी कर दी है. उन की बुद्धि, वे ही जाने ! बहरहाल, कलाएं तो हमारे बीज में ही हैं. हमारी अभिव्यक्ति भी जब जब बीज की तरफ़ मुडेगी, नई नई कोंपल ले कर उगेगी.
आज जब पूँजी और तकनीक के आतंक ने हमें सम्मोहित कर के सस्ते सुलभ मनोरंजन में हमें उलझा कर हमारे सोचने समझने की शक्ति को ही ख़त्म करना शुरू कर दिया है तो ज़ाहिर है चिंतन को उठाने वाली, सोचने पर मजबूर करने वाली कोई भी रचना आज की नियामक सत्ताओं को पसंद नही आएगी. ऐसे में लेखकों, कवियों, कलाकारों की जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है कि रचना का वह रूप विकसित करें जो इन ताक़तों से लड़े भी और लोगों के चिंतन का परिष्कार भी करे. और ऐसा होगा भी क्योंकि कविता में असीम सम्भावना है.
लाल्टू जी आपको बहुत धन्यवाद .
तुषार धवल

मनीषा said...

अनुराग, सही कहा आपने लाल्टू जी ने अपने को हमेशा गुटबाजी से दूर रखा है। वर्ष 2000-01 में पंजाब विश्व विद्यालय में उनसे खूब मुलाकात हुआ करती थी। उसके बाद तो मैंने चंडीगढ़ छोड़ दिया था। दोनों कविताएं बहुत सुंदर हैं।

Ashok Pande said...

एक अर्से से उनका लिखा खोज खोज के पढ़ा है. आज उनका इतना ईमानदार वक्तव्य और कविताएं. दस में दस नम्बर इस पोस्ट के लिए अनुराग! और एक हज़ार शुक्रिया!

शायदा said...

लाल्‍टू से मिलने के बाद हर बार लगता है जैसे वो अभी फैसला करके आए हैं आग को हर हाल में जलाए रखने का, फिर लगता है जैसे कहना चाहते हों कि आग ही क्‍यों, पानी क्‍यों नहीं...बहरहाल... सुलगने का धुंआ तो हमेशा नज़र आया ही है, हो सकता है मैं ग़लत भी हूं ऐसा सोचने में। कविताएं अच्‍छी लगीं और इस बात से पूरी तरह सहमत कि कविता एक सेल्‍फ थेरेपी की तरह है।

Arun Sinha said...

बहुत अच्छी कविताएँ हैं. पर यह कहना न्यायसंगत नहीं कि लाल्टू किसी गुट में अथवा किसी फेरे में नहीं. मैं जानता हूँ कि वह हिन्दी कविता में हरजिंदर सिंह लाल्टू के नेतृत्व वाले "लाल्टू गुट" के सक्रिय सदस्य हैं.
अरुण

Mrinal said...

आप बड़ा काम कर रहे हैं. इस तरह के बेहद रचनात्मक ब्लॉग नेट की दुनिया को समृद्ध करेंगे.

Ek ziddi dhun said...

चंडीगढ़ नहीं हैदराबाद...लाल्टू चंडीगढ़ से हैदराबाद जा चुके हैं, मुझे मालूम नहीं था

Ratnesh said...

shar me shar ki gandh kavita bhut achhi lagi. Ratnesh