Wednesday, September 03, 2008

बही - खाता : ३ : कुमार अंबुज

( उनकी पहचान हालाँकि कवि के रूप में है और जिन लोगों ने क्रूरता और अनंतिम कविता-संग्रहों की कविताएं पढ़ी हैं वे शीघ्रता से अनुमान लगा लेंगे कि वे एक कवि के रूप में अपने साथ लिखने वाले कविओं से कितने अलग हैं। यह बात अब उनकी कहानियो के बारे में भी लोग कह सकेंगे जब उनके हाथ उनका पहला कहानी-संग्रह ( इच्छाएं नाम से ) आएगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य भेजा है। उस अबूझ-अनसुलझी गुत्थी पर इस दफा बही-खाता में कुमार अंबुज को पढ़िए। हम आनेवाले दिनों में उनका कुछ और गद्य भी प्रकाशित करेंगे। )

अव्याख्येय प्रक्रिया

कुमार अंबुज

याद कीजिए, बचपन में आपने एक चट्टान देखी, हिनहिनाते हुए एक ऊंचे-पूरे घोड़े ने आपका मन मोह लिया, खेत पर सिर्फ़ प्याज के साथ रोटी खाते हुए घर के हलवाहे को देखा, घर में ही अशक्त दादी को पेशाब करते समय देखा कि उसका गर्भाशय नीचे लटक आया है, और उस समय ठीक-ठीक इसे समझा नहीं जा सका। मरे हुए बैल को घसीटा जाना, उसका चमड़ा उतरते देखना, छप्पर से आती चांदनी और माघ महीने की सुबह सात बजे की नदी के पानी की ऊष्णता। तब हम भाषा का लिखित रूप भी प्रायः नहीं जानते थे।

बचपन में देखे ऐसे असंख्य दृश्यों, अनुभवों से गुजरते हुए क्या पता था कि ये कभी रचना-प्रक्रिया, रचना-अनुभव, जीवन को समझने के लिए सूत्र, जिज्ञासा के कारक और आनंद और बेचैनी की अनुभूतियों के हिस्सा हो जाएंगे। एक दिन कागज़ पर उतरने को बेताब रहेंगे और अधिकांश रचना का रूप ले ही न सकेंगे अथवा कागज़ पर आकर हास्यास्पद, कुरूप और ठस्स हो जाएंगे। या नई दीप्ति, उत्तेजना, आक्रोश और पीड़ा से भर उठेंगे। फिर जीवन भर जो देखा-सुना-पढ़ा-लिखा और अनुभव किया जाएगा वह पीछा करता ही रहेगा। वह असीम रेगिस्तान में जुड़ता जाएगा जिसमें चलना और चमक के पीछे भागना नियति होगी।

रचनाकार जानता है कि रचना-प्रक्रिया सर्वाधिक अव्याख्येय है। यहाँ किंचित ठहरकर सोचा जा सकता है कि क्या वे ही क्षण इस प्रक्रिया में शामिल हैं जब हम शरीर में घटित किसी रासायनिक प्रक्रिया, उत्तेजना या सांद्रता के चलते अपनी टेबुल से जा लगते हैं, राह चलते सिगरेट के खाली पैकेट को उठा कर उस पर चुपचाप कुछ लिख लेते हैं अथवा पहली फुरसत में विस्तार दे सकने के लिए एक वाक्यांश को लगभग कंठस्थ कर लेते हैं। जबकि चीजें अक्सर अवाक् कर देने वाले ढंग से आपके पास आती हैं। उनके प्रेरणा स्रोत इतने विविध, अप्रत्याशित और अज्ञात हैं कि उन्हें किन्हीं निश्चित बिन्दुओं में ढालना उनकी अवमानना करना है, उनके साथ धोखा करना है।

सच है कि वे क्षण अपने आप में इतने मायावी हैं कि सुख के अनुभव से गुजरते हुए, उद्दीप्त होकर गहरे दुःख की कहानी लिखी हो जाती है और एक ऐतिहासिक इमारत या खंडहर देखने के बाद ' सिम्फनी ' पर कविता लिखी जा सकती है। सारे पदार्थ, सारे अनुभव इस कदर एक-दूसरे के नजदीक हैं कि उनमें कोई न कोई बारीक रिश्ता निकल ही आता है, जबकि सतह पर उनमें साम्यता नज़र नहीं भी आ सकती। बल्कि विभिन्न समय और मानसिक अवस्थाओं में एक तरह की वस्तु और अनुभव अलग-अलग तरह से आपको प्रभावित करते हैं। नई और अजानी जगहों पर ले जाते हैं।

लेकिन उन लंबे अंतराल खंडों को, जो एक महीने से लेकर बीस साल तक के हो सकते हैं, क्या रचना-प्रक्रिया के दायरे से बाहर किया जा सकता है ! जो निष्क्रियता, चुप्पी, आलस्य है और अब कभी न लिख पाने के भाव का बीच-बीच में उठता असमर्थताबोध है, वह भी तो अंततः रचना-प्रक्रिया का हिस्सा है। शायद इसलिए प्रकारांतर से बार-बार कहा जाता रहा है कि दुनिया की सबसे रहस्यमई कोई चीज़ है तो वह रचना-प्रक्रिया ही है। तमाम आविष्कारों और संज्ञान के वावजूद वह अज्ञेय है, अकथनीय है। अभेद्य है। कुछ हद तक वह आवेगपूर्ण तानाशाह है। वह अलौकिक नहीं है लेकिन रहस्य है।

और मैं आज जब एक झरने के सामने अभिभूत खड़ा हूँ, उसे एकटक देख रहा हूँ। आँखें मन और जीवन के वे क्षण पूरी आयु से अलग होकर वहां ठिठके रह गए हैं तब कविता लिखते समय, जानता हूँ कि उसमें पिछले समय में देखे गए तमाम झरने, उनकी कौंध, संपन्नता, एकाकीपन और विशालता भी जुड़ गई। एक अनुभव कभी अकेला नहीं होता। उसमें स्मृतियाँ, बोध, कल्पना, वैचारिकता और सामानांतर रचनाशीलताएँ एक साथ हस्तक्षेप करती हैं। आप एक 'ट्रांस' में होते हैं। किसी जादू के प्रभाव में। अथवा यह ख़ुद एक जादू है लेकिन जादूगर को नहीं पता कि यह कैसे होता है क्योंकि यह सिर्फ़ हाथ की सफाई, अभ्यास या आंखों में धूल झोंकना नहीं है। यह कुछ हद तक शिकार होने जैसा है। आपको पता तब चलता जब आपकी गर्दन पंजों में आ चुकी है या आप किसी के जबड़े में हैं। कई बार आपको पीछा करके, दौड़ा-दौड़ाकर, थकाकर भी कब्जे में ले लिया जाता है। और कई बार आप ख़ुद ही समर्पण कर देते हैं जैसे बचना ही नहीं चाहते।

वह एक भौतिक अनुभव भी है और एक अध्यात्मिक अनुभव भी जिसके जरिये आप अंततः भौतिकता से ही निबटना चाहते हैं। या कहें कि ठीक इसका उलटा। कुल मिलाकर आप रचना कर रहे हैं जिसमें 'शायद' को आप 'निश्चित' करना चाहते हैं और आप 'निश्चित' को कुछ 'कल्पना' देना चाहते हैं क्योंकि इसके बिना कुछ संभव नहीं हो पाता है। इस तरह आप रचना-प्रक्रिया के बारे में एक अमूर्त कहानी या कविता ही कह सकते हैं जो कब और कितनी असंगत हो जायेगी, यह कह पाना मुश्किल है। रचना-प्रक्रिया के बारे में जितना ज्यादा कुछ कहा जाएगा उतना ही चेतन मन का ज्ञान, चातुर्य और सजगता उसमें जुड़ती जायेगी। उसकी व्याख्या करना उसे आग में जलाना है।

9 comments:

ravindra vyas said...

अनुरागजी, इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए सबसे पहले आपको बधाई।
कुमार अंबुज ने अव्याख्येय रचना प्रक्रिया को उतनी ही बेचैनी और रचनात्मक कौशल से अभिव्यक्त करने की कोशिश की है जितनी वे अपनी कविता में करते दिखाई पड़ते हैं। अपने को भरसक भावुकता से बचाते हुए उन्होंने अपनी काव्यात्मक संवेदनशीलता के साथ यह पीस लिखा है। किवाड़. क्रूरता, अनंतिम और अतिक्रमण से वे अपनी कवि-पहचान पुख्ता बना चुके हैं और हाल ही में पहल में आई उनकी कविताएं इस बात की साक्ष्य हैं कि वे कठिनतर रास्ते पर बढ़े हैं और अपने कवि कर्म को फिर से मुड़कर देखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि आगे और बेहतर रचा जा सके। उनकी कहानियां भी ध्यानाकर्षी हैं और उन्होंने गद्य में अपनी रचनाशीलता से जताया है कि वे इस इलाके में भी अपने नए औजारों और नई नजर के साथ पाठकों से मुखातिब हैं।

शिरीष कुमार मौर्य said...

अनुराग जी कुमार अंबुज की कविताएं भी लगाएं ! वे लाजवाब कवि हैं। और हो सके तो देवीप्रसाद मिश्र से भी सम्पर्क कीजिए,वे भी बहुत महत्वपूर्ण हैं - पता नहीं आपको क्या लगता है !

aalekh said...

व्यास जी ने बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया है.अम्बुज जी की कुछ कहानियां पत्रिकाओं में पढ़ी है.कविताएं अरसा बाद पहल में देख रहा हूँ.उनकी कविताएं भी दीजिये.

Ek ziddi dhun said...

मैं कोई रचनाकार नहीं हूँ पर आम पाठक हूँ. जाने क्या है कि रचना प्रक्रिया को लेकर किसी रचनाकार का लिखा पढने की उत्सुकता रहती है. `रचना-प्रक्रिया के बारे में जितना ज्यादा कुछ कहा जाएगा उतना ही चेतन मन का ज्ञान, चातुर्य और सजगता उसमें जुड़ती जायेगी।` ये बात मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या कोंई रचनाकार वाकई अपनी रचना प्रक्रिया को ठीक-ठीक चीह्न कर ठीक वैसा ही लिख पाता होगा. या लिखकर और बेचैन हो जाता होगा,. मैं रचना के खुदा की मेहरबानी से नाजिल होने की बात नहीं कर रहा. कुमार अम्बुज को पढ़कर अच्छा लगा. कुछ लेखकों की इस तरह की चीजें एक साथ क्यों न प्रकाशित हों?

Ratnesh said...

kumar ambuj ki ye rachana bhut achi lagi.......badhai

Geet Chaturvedi said...

अच्‍छा लगा.
एक कवि अंतत: कवि होता है. वह जो करे, उसमें कविता होती ही है.

Arun Aditya said...

अद्भुत गद्य, अम्बुज जी की कविता की ही तरह बेमिसाल। अम्बुज जी के शब्द पढ़कर उनकी बहुचर्चित कविता किवाड़ की ये पंक्तियाँ अक्सर याद आती हैं- 'ये जब खुलते हैं,
एक पूरी दुनिया हमारी तरफ़ खुलती है.'

Vidhu said...

जो निष्क्रियता, चुप्पी, आलस्य है और अब कभी न लिख पाने के भाव का बीच-बीच में उठता असमर्थताबोध है, वह भी तो अंततः रचना-प्रक्रिया का हिस्सा है। rachnaa prakreeyaa main unke ye shabd ..jinhe unhone ek kavi ke najriyee se mahsoos kiyaa ..sundar hain ,mangal kaamna navvarsh ki

PRIYANKA RATHORE said...

bahut accho post...aabhar