वेणु गोपाल ने एक कठिन जीवन जिया। हैदराबाद में ही जीवन का बहुलांश बिताया। कागज़ और जमीन दोनों जगह सक्रीय रहे। क्रन्तिकारी कवि-मन मिला था, सो कहीं टिक कर नौकरी नहीं की। अध्यापकी बड़े चाव से करते थे। पर वह भी छूटती रही। अंत समय में आजीविका के लिए किसी मंदिर में पुजारी का काम करते थे। इसे आप आसानी से उनकी नियति कह देंगे। पर दरअसल यह हमारी, हमारे समाज की विडंबना है। एक ऐसी विडंबना और सरलदिमागी जिसके बारे में जयशंकर प्रसाद ठीक कह गए हैं : '' यह विडंबना ! अरि सरलते, तेरी हँसी उडाऊं मैं ! ''
कुछ कविताएं
अँधेरा मेरे लिए
रहती है रोशनी
लेकिन दिखता है अंधेरा
तो
कसूर
अंधेरे का तो नहीं हुआ न !
और
न रोशनी का !
किसका कसूर ?
जानने के लिए
आईना भी कैसे देखूं
कि अंधेरा जो है
मेरे लिए
रोशनी के बावजूद !
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सिलसिले का चेहरा
बेजोड़ में
झलक रहा है
सिलसिले का चेहरा
जब कि
बेजोड़ खुद क्या है
सिवाय
सिलसिले की एक कड़ी के!
इस तरह होता है स्थापित
महत्व
परम्परा का।
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उजाला ही उजाला
आ गया था ऐसा वक्त
कि भूमिगत होना पड़ा
अंधेरे को
नहीं मिली
कोई
सुरक्षित जगह
उजाले से ज्यादा।
छिप गया वह
उजाले में कुछ यूं
कि शक तक नहीं
हो सकता किसी को
कि अंधेरा छिपा है
उजाले में।
जबकि
फिलहाल
चारों ओर
उजाला ही उजाला है !
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( ये कविताएं कविता-कोश से साभार, वेणुजी की तस्वीर अनिल जनविजय के सौजन्य से। )
5 comments:
हम लोग दसवीं में थे जब इनके बारे में पढ़ा करते थे। हमारी हिंदी की सुदेश मैडम इनके बारे में बहुत कुछ बताती थी हमें...यह जानकर दुख हुआ कि ऐसे कवि को आजीविका के लिए पुजारी का काम करना पड़ा।
वेणुगोपाल के निधन की खबर से सचमुच बड़ा सदमा पहुँचा। मैं उनसे १९९७ में हैदराबाद में मिला था। अब जब से मैं २००६ में यहाँ आया हूँ, सोचता रहा कि उनसे मिलना है, पर अपनी निजी समस्याओं में उलझे होने की वजह से नहीं मिल पाया। अभी पाँच दिन पहले हैदराबाद वि.वि. के उनके सहयोगी सुभाष कुमार से उनके घर का पूछ रहा था - अभी मिल कर पता लेना था।
लाल्टू
हैदराबाद के एक अख़बार में हम साथ काम करते थे. न केवल कवि के रूप में, बल्कि इंसान के रूप में भी वह बड़े थे. उनके संघर्षों को बहुत क़रीब से देखा. (और सच कहूं, उनके संघर्ष देखकर डर भी जाता). अब भी, जब उनसे फोन पर बात होती, तो भी उनकी आवाज़ में थकान नहीं दिखती थी. उनका एक ठहाका आता था, हवा में लहराता हुआ, और कान के परदे पर कोई दोस्ताना धौल मार जाता था.
इस ख़बर ने सदमा पहुंचाया है.
आपने ठीक ही लिखा है कि यह हमारे समाज की विडंबना है। इसे सहते हुए ही कवि चला जाता है। इसे निराला से लेकर मुक्तिबोध की मृ्त्यु तक में देखा जा सकता है।
वेणु जी को श्रद्धा-सुमन !
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