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Showing posts from September, 2008

रंगायन : ३ : हबीब तनवीर

( हबीब तनवीर उन जीवित मूर्धन्यों में से एक हैं जिनका होना उस कला-माध्यम को न सिर्फ़ एक अमाप ऊँचाई देता है, बल्कि जिन मूल्यों और प्रतिबद्धताओं से वह विकस रही होती है, उसमें हमारी आस्था भी दृढ़ करता है। रंगायन में इस दफा हबीब तनवीर। )

'' आओ, देखो सत्य क्या है ''
हृषीकेश सुलभअब छियासी के हो चुके हबीब तनवीर को याद करना सिर्फ रंगकर्म से जुड़े एक व्यक्ति को याद करने की तरह नहीं है। दसों दिशाओं से टकराते उस व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जिसके सिर पर टूटने को आसमान आमादा हो, धरती पाँव खींचने को तैयार बैठी हो और कुहनियाँ अन्य दिशाओं से टकराकर छिल रही हों; और वह व्यक्ति सहज भाव से सजगता तथा बेफ़िक्री दोनों को एक साथ साधकर चला जा रहा हो। अब तक कुछ ऐसा ही जीवन रहा है हबीब तनवीर का। भारतेन्दु के बाद भारतीय समाज के सांस्कृतिक संघर्ष को नेतृत्व देनेवाले कुछ गिने-चुने व्यक्तित्वों में हबीब तनवीर भी शामिल हैं। भारतेन्दु का एक भी नाटक अब तक मंचित न करने के बावजूद वे भारतेन्दु के सर्वाधिक निकट हैं। उन्होंने लोक की व्यापक अवधारणा को अपने रंगकर्म का आधार बनाते हुए अभिव्यक्ति के नये कौशल से दर्शकों …

अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : अंतिम किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की यह आखिरी पेशकश है। इस अपेक्षाकृत लंबी पोस्ट को भी रूचि और लगाव से पढ़ा गया है। इसके पीछे जितना काफ़्का और सिताती हैं उससे कतई कम अशोक का उद्यम नहीं है। हम इस पेशकश की समाप्ति पर पुनः उनके सहयोग के लिए अपना आभार प्रकट करते हैं। )
यह रूपान्तरण हमारी आंखों के सामने होता है। शुरू में सास्सा को लगता है कि वह एक ऐसी देह में कैद है जिसे वह उस नैसर्गिकता के साथ काबू या निर्देशित नहीं कर पाता जैसा पहले अपने प्राकृतिक हाथ पैरों के साथ कर पाता था। जब वह बोलने के लिए अपना मुंह खोलता है उसे नीचे कहीं से चिड़िया की सी दर्दनाक आवाज अपने शब्दों के साथ घुलती महसूस होती है और उस प्रतिध्वनि में उसे संदेह होता है कि उसने अपनी आवाज सुनी भी या नहीं। उसे भान होता है कि उसकी देह अकल्पनीय रूप से चौड़ी है। जब वह बिस्तर से उतरना चाहता है उसके पास हाथ पैर नहीं बल्कि कई सारे छोटे छोटे पैर हैं ; अगर वह उन में से एक को मोड़ना चाहता है तो उसे अपने को खींचना होता था और जब वह उसे मोड़ पाता है वह देखता है कि बिना उसके प्रयास किए बा…

अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : जारी ...तीसरी किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की अगली पेशकश। इसमें काफ़्का की कालजयी कहानी मेटामोर्फोसिस के वक्त काफ़्का की मनःस्थिति और पृष्ठभूमि पर अच्छी रोशनी पड़ती है। )
काफ़्का जो इस कदर अध्यात्मिक आदमी था - सारी जिन्दगी अपनी देह को लेकर आब्सेस्ड रहा। उसका शरीर, जो उसे उसके जन्म के साथ किसी ने उसे ऐसे ही या नफरत के साथ दिया था, लगातार उसके बौद्धिक और अध्यात्मिक विकास लिए बाधाएं खड़ी करता रहा : उस शरीर के साथ वह अपने भविष्य में केवल त्रास देख पाता था। वह काफी ज्यादा लम्बा और कोणों से भरा हुआ था। वह उन सुन्दर देहों की तरह एक सीधी रेखा में बड़ा नहीं हुआ जिन्हें वह इस कदर सराहा करता था। उसके शरीर ने उसे झुकने और गिरने पर विवश किया। उसकी सारी नैसर्गिकता उस के साथ समाप्त हो गई। उसका कमजोर दिल लगातार दुखता था और उसकी धमनियों में पर्याप्त खून प्रवाहित नहीं कर पाता था जिस के कारण उस के हाथ पैर ठण्डे रहते थे। उसके भीतर जरा भी अन्दरूनी आग नहीं थी ; न वह न्यूनतम चबीर् जो उसकी आत्मा के लिए भोजन बनती। बहुत जल्दी उसे अपने दुबलेपन का रहस्य समझ आ गया था। उसकी …

अनकहा कुछ : ३: फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : जारी ...दूसरी किस्त

( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की अगली पेशकश। साथ में दी गई चित्रकृति स्वयं काफ़्का की है। )

'हिस्ट्री आफ द डेविल' में उसने पढ़ा था कि वर्तमान कैरिबियन में रात में काम करने वाले को संसार का सृष्टा माना जाता है। उसके पास संसार की रचना या पुनर्रचना करने की ताकत नहीं थी; लेकिन अगर उसने रातों को जगा रहना था तो वह उस सब को प्रकट कर सकता था जिसे उसके अजाने देवता ने उसे बताया था। सो उसने अपने ऊपर यह अनुशासन लागू किया : वह रात दस बजे अपनी डेस्क पर बैठता था और वहां से तीन या कभी कभी छः बजे उठता था। वह अंधेरे, एकान्त और खामोशी में लिखता था जबकि बाकी सारे सोए होते थे : फेलीसे जिसे वह मिलना नहीं चाहता था ; उसके मां बाप जिनके साथ वह बस बहुत थोड़े शब्द साझा करता था ; और उसके दोस्त - तब भी उसे लगता था कि रात अभी पूरी तरह से रात नहीं होती थी। वह चाहता था कि दिन और गर्मियों, सूर्योदय और सूर्यास्त को खत्म कर समय को एक अंतहीन शरद की रात में बदल देता। उसके चारों तरफ एक धीरगंभीर गतिहीनता होती और ऐसा लगता था मानो संसार उसे भूल गया था।

रात उसके ल…

अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का

( काफ़्का बीसवीं सदी के महानतम लेखकों में से एक थे। जितनी दिलचस्पी लोगों को उनके साहित्य के बारे में रही , उतनी ही जीवन के प्रति भी। काफ़्का के बारे में हालाँकि उनके साहित्य, डायरियों और पत्रों के मार्फ़त अच्छा पता मिलता है, पर अब भी उनके जीवन और लेखन के बारे में बहुत-सा तथ्य अनकहा है। हाल ही में कुछ ऐसे कागज़ात भी मिले हैं, जिसके बिना पर यह पुष्टि होती है कि काफ़्का के आत्मकथात्मक लेखन का एक बड़ा हिस्सा अभी छपना बाकी है। बहरहाल, साहित्य की पत्रिका, ''आधारशिला'' में जब इतालवी आलोचक और जीवनीकार पिएत्रो सिताती का लिखा काफ़्का की जीवनी अशोक पांडेके अनुवाद में पढ़ने को मिली तो यह लोभ स्वाभाविक था कि उसके अगले अध्याय सबद पर हों। अशोकजी ने कृपापूर्वक अब तक अनछ्पा जीवनी का तीसरा अध्याय हमें भेजा। हम उनके शुक्रगुजार हैं। पोस्ट लंबी न हो जाए इसलिए यह पूरा अध्याय टुकड़ों में दिया जा रहा है। इस स्तंभ में इससे पहले आप शेक्सपियर और अर्नेस्ट हेमिंग्वे के बारे में पढ़ चुके हैं। )

पशु की भूमिका में लेखक

अपनी युवावस्था में भी काफ़्का ने काव्यात्मक प्रेरणा को एक प्रवाह की तरह महसूस किया थाः एक ज्…

सबद विशेष : ४ : दिलीप चित्रे

( दिलीप चित्रे मराठी के शीर्षस्थानीय कवि हैं और 1७ सितंबर को जीवन के सत्तर वर्ष पूरे कर रहे हैं। चित्रे की कविताओं का करीब पच्चीस बरस पहले हिन्दी में कवि चंद्रकांत देवतालेने पुस्तकाकार अनुवाद किया था। तब उनकी कविता और उसके कंसर्न से लोग चकित हुए थे क्योंकि चित्रे कविता के भीतर नवाचारी थे पर उसे पोसते नितांत पारंपरिक काव्य-स्रोतों से थे। बदलते वक्त और कविता के प्रतिमानों के तइं भी उन्होंने अपने इस मूल काव्य-गुण को बचाए रखा है। चित्रे ने अंग्रेजी में भी प्रभूत कविताएं लिखी हैं। हालाँकि यह तथ्य है कि छिटपुट अनुवादों के अलावा उन्हें हिन्दी में गृहस्त बनाने का देवताले सरीखा एकनिष्ठ उद्यम किसी ने नहीं किया। अब युवा कवि तुषार धवलने यह पहल की है और चित्रे के सौजन्य, प्रेरणा और अपने पित्तामार मेहनत से वे उनकी अनेक कविताओं का अनुवाद कर गए हैं। हमें उन अनुवादों में से कुछेक को सबद में प्रकाशित करते हुए प्रसन्नता हो रही है। स्वयं चित्रे ने सबद को जो परोक्ष स्नेह, समर्थन और मार्गदर्शन दिया है उसका भी खुला स्वीकार यहाँ ज़रूरी है। हम आने वाले दिनों में अन्य भारतीय भाषाओँ के मूर्धन्य कवि-लेखकों के अन…

सखा पाठ : २ : गुलजार बजरिए रवींद्र व्यास

( वे पेंटर हैं, कहनियाँ लिखते हैं, हरा कोना नाम का उनका ब्लॉग है और हिन्दी के इस वर्चुअल वर्ल्ड में उनकी सजग उपस्थिति चहुँ ओर सराही गई है। जब हमने सखा पाठ स्तंभ शुरू किया था तो उसके पीछे किसी रचना से प्रेरित रचना को सामने लाने की अवधारणा थी। सबद में ही रिल्के पर छपे राजी सेठ के लेख के बाद बतौर बढ़त गिरिराज किराडू की कविता दी थी। उसके बाद यह सिलसिला थम सा गया। रवींद्र व्यास के माध्यम से अब फिर से शुरू हुआ है। उन्होंने गुलजार की कविता पर न सिर्फ़ पेंटिंग दी, बल्कि इसरार करने पर गद्य भी भेजा। हम उनके आभारी हैं। )


एक और रात


गुलजार
चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात खामोश है, रोती नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला-सा गुंबद है, उड़ा जाता है
खाली खाली कोई बजरा-सा बहा जाता है

चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन भी नहीं
चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है

काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता

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ये देखो तो क्या होता है

गुलजार की जमीन और आसमान सरगोशियों से मिलकर बने हैं। ये सरगोशियां खामोशियों की रातें बुनती हैं। इन रातों में कई च…

कवि की संगत कविता के साथ : ५ : लाल्टू

( लाल्टू लंबे अरसे से कवि-कर्म में संलग्न हैं और अपने को हिन्दी की उखाड़-पछाड़ की साहित्यिक गुटबाजी से बिलकुल अलग रखा है। पर ऐसा वे अकेले नहीं कर रहे हैं। कवि नाम धरे ऐसे कई लोग हैं जिन्हें गुटबाजी से मतलब नहीं। पर ज़रूरी नहीं कि इस शुचिता से उन्होंने अच्छी कविता भी संभव कर ली हो। लाल्टू अगर ऐसा संभव कर सके हैं तो उसकी वजह यह है कि जिस हाशिए से कविता की कार्रवाई वे शुरू करते हैं, वहां मुख्यभूमि का बहुत कुछ त्याज्य/वर्जित पड़ा हुआ है। और असल में वह त्याज्य न होकर समाज का ही अभिन्न अनुभव है। इस बार कवि की संगत कविता के साथ में लाल्टू को पढ़िए। )

आत्मकथ्य

अनंत संभावना है कविता के लिए

कविता पर नया कुछ लिखने के लिए सचमुच मेरे पास कुछ नहीं है। पेशेगत रुप से साहित्य से दूर होने की वजह से या अन्य कारणों से इस सवाल पर बहुत सोचने की गुंजाइश भी नहीं रही। बचपन से किशोरावस्था तक कहानियाँ, उपन्यास पढ़ते हुए मन में आगे चलकर कहानीकार बनने कि तीव्र इच्छा पनपी। कहानियाँ लिखीं भीं। गद्य में और भी बहुत कुछ लिखा। शायद वक्त मिले तो अभी और भी बहुत लिखने की छटपटाहट है। सच यह है कि कविता लिखते हैं क्योंकि कविता पर…

बही - खाता : ३ : कुमार अंबुज

( उनकी पहचान हालाँकि कवि के रूप में है और जिन लोगों ने क्रूरता और अनंतिम कविता-संग्रहों की कविताएं पढ़ी हैं वे शीघ्रता से अनुमान लगा लेंगे कि वे एक कवि के रूप में अपने साथ लिखने वाले कविओं से कितने अलग हैं। यह बात अब उनकी कहानियो के बारे में भी लोग कह सकेंगे जब उनके हाथ उनका पहला कहानी-संग्रह ( इच्छाएं नाम से ) आएगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य भेजा है। उस अबूझ-अनसुलझी गुत्थी पर इस दफा बही-खाता में कुमार अंबुज को पढ़िए। हम आनेवाले दिनों में उनका कुछ और गद्य भी प्रकाशित करेंगे। )
अव्याख्येय प्रक्रियाकुमार अंबुजयाद कीजिए, बचपन में आपने एक चट्टान देखी, हिनहिनाते हुए एक ऊंचे-पूरे घोड़े ने आपका मन मोह लिया, खेत पर सिर्फ़ प्याज के साथ रोटी खाते हुए घर के हलवाहे को देखा, घर में ही अशक्त दादी को पेशाब करते समय देखा कि उसका गर्भाशय नीचे लटक आया है, और उस समय ठीक-ठीक इसे समझा नहीं जा सका। मरे हुए बैल को घसीटा जाना, उसका चमड़ा उतरते देखना, छप्पर से आती चांदनी और माघ महीने की सुबह सात बजे की नदी के पानी की ऊष्णता। तब हम भाषा का लिखित रूप भी प्रायः नहीं जानते थे। बचपन में…

स्मृति - शेष : वेणु गोपाल

हिन्दी के जाने-माने कवि-लेखक वेणु गोपाल का हैदराबाद में सोमवार रात निधन हो गया। वेणु कैंसर से पीड़ित थे। वेणु उन कविओं में रहे जिनसे उनके दौर का जन आन्दोलन ऊर्जा पाता रहा। नक्सलबाड़ी आन्दोलन के उभार के साथ धूमिल, कुमार विकल, वेणु गोपाल और आलोकधन्वा सरीखे कवि उसके संबल बने। इन कविओं ने कविता में उस हर संभव कार्रवाई को जायज़ ठहराया जिससे सूरतेहाल में बदलाव आए। मलयज के शब्दों में कहें तो इनके यहाँ कविता कुछ करती थी, सुंदर पड़ी नहीं रहती थी।

वेणु गोपाल ने एक कठिन जीवन जिया। हैदराबाद में ही जीवन का बहुलांश बिताया। कागज़ और जमीन दोनों जगह सक्रीय रहे। क्रन्तिकारी कवि-मन मिला था, सो कहीं टिक कर नौकरी नहीं की। अध्यापकी बड़े चाव से करते थे। पर वह भी छूटती रही। अंत समय में आजीविका के लिए किसी मंदिर में पुजारी का काम करते थे। इसे आप आसानी से उनकी नियति कह देंगे। पर दरअसल यह हमारी, हमारे समाज की विडंबना है। एक ऐसी विडंबना और सरलदिमागी जिसके बारे में जयशंकर प्रसाद ठीक कह गए हैं : '' यह विडंबना ! अरि सरलते, तेरी हँसी उडाऊं मैं ! ''

कुछ कविताएं

अँधेरा मेरे लिए

रहती है रोशनी
लेकिन दिखता है अंध…

जब तक यह पृथ्वी रसवती है ...

हालांकि लग तो यह रहा है कि इस बार कोसी सब लील लेगी, लेकिन यह बची हुई पृथ्वी, घर, ये धेनुएँ, वृक्ष और अपने इर्द-गिर्द अथाह जल में भी अदम्य जिजीविषा में मनुष्य का ऊंचा उठा हुआ हाथ, आश्वाशन हैं जीवन के। बाबा त्रिलोचन की मानें तो ....जब तक यह पृथ्वी रसवती है
और
जब तक सूर्य की प्रदक्षिणा में लग्न है,
तब तक आकाश में
उमड़ते रहेंगे बादल मंडल बाँध कर ;
जीवन ही जीवन
बरसा करेगा देशों में, दिशाओं में ;
दौड़ेगा प्रवाह
इस ओर उस ओर चारों ओर ;
नयन देखेंगे
जीवन के अंकुरों को
उठकर अभिवादन करते प्रभात काल का। बाढ़ में
आंखों के आंसू बहा करेंगे,
किंतु जल थिराने पर,
कमल भी खिलेंगे
सहस्त्रदल। ( कवि के संग्रह ताप के ताए हुए दिन से साभार )