Friday, August 29, 2008

बही - खाता : २ : पंकज मित्र

( पंकज मित्र के यहाँ पात्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जिस कौशल से वे अपने पत्रों के इर्द-गिर्द कथा बुनते हैं उससे उन्हें कहानी कहने की तमाम सहूलियत और शिल्प आप से आप मिलते जाते हैं। अच्छी बात यह है कि अनगढ़ में बहुत गहरी कलात्मक तराश के बावजूद उनकी कथा-भाषा सहज-प्रांजल बनी रहती है। क्विजमास्टर और अन्य कहानियाँ तथा हुडुकलुल्लु नाम से उनके दो संग्रह प्रकाशित हैं। बही-खाता में इस बार पंकज का अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य पढ़िए। )

होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे

पंकज मित्र

रचना प्रक्रिया पर कुछ कहने की बात आते ही घबराहट-सी होने लगती है। '' कैसे लिखते हैं '' का एक ही उत्तर दिमाग में आता है कमल से कगज पर ''। अब कौन-सी चीज कब, कैसे, क्यों तीरे-नीमकश की तरह गड़ी रह गई खलिश पैदा करती हुई, कौन-सी रसायनिक प्रक्रिया किस न्यूरोन में कैसे काम कर गई, और क्या घट गया वहाँ पर, बताना मुश्किल है। बहुत सारी चीज़ें जमा थीं न जाने कब से और उसमें एक नया रसायन पड़ते ही कोई कीमियागरी हो गई।

लेकिन एक बात तो तय है कि बचपन से आदत पड़ गई थी तमाशे देखने की। स्कूल से लौटते समय कचहरी के पास साँप को ललकारता सपेरा कहता, '' ऐ बेट्टा! काटा-काटी मत कर। जड़ी को सूँघ चोट मत कर। '' फिर जोड़ता , '' तो हजूर यह दुधिया खरीश (साँप की एक प्रजाति) काटता है तो निकाल देता है जीरा और गोलमरिच (काली मिर्च)। '' फिर जमूरे से उसकी प्रश्नोत्तरी चलती : '' खेल दिखायेगा ? दिखायेगा। काहे दिखायेगा ? पापी पेट के लिए। '' तो साहब तमाशा देखने का सुख मेरे लिए गूंगे के गुड़ की तरह है। कोई लतीहा तमाशबीन भी इस आंनन्द की पूरी अभिव्यक्ति शायद ही कर पाये।

दुर्गा पूजा में मुंगेर (मेरा शहर) के बांगला क्लब में जात्रा की वह आश्चर्यलोक की सृष्टि करती रातों का तमाशा- जरी गोटे लगे साटन के अंगरखे, टीन की तलवारें, गदाएँ , मुकुट, नकली दाढ़ी मूछ बाल, मुद्राशंख से चमकते चेहरे। तब पता भी कहाँ था कि ये तमाशे सच नहीं हैं। पता रहने पर भी मन कहाँ मानता। शाहजहाँ के चमकदार कपड़े उतार कर मंटू ठाकुर कल सुबह से एक-एक रूपया लेकर इंजेक्शन देने लगेंगे। ये हनुमान से शक्तिशाली पल्टू काका उस मरियल मैनेजर के सामने भीगी बिल्ली बन जायेंगे। अंगदेश की राजधानी मुंगेर - राजा कर्ण की दानशीलता के तमाशाई किस्से - राजा कर्ण नहा-धोकर माँ चंडिके की मूर्ति के सामने खौलते कड़ाह में कूद पड़ते थे और चंडी माता प्रकट होकर सवा मन सोना देती जिसे दान कर देते थे वे। लेकिन मंदिर के आस-पास चार-चार आने के लिए भटकते - चिरौरी करते पुजारियों एवं उनके नाक सुड़कते बच्चों को देखकर यकीन डगमगा जाता क्योंकि इनके पुरखों को ही तो मिला होगा सवा मन सोने का कुछ हिस्सा। तो फिर रोज क्यों इन्हें दुख और अपमान के खौलते कड़ाह में कुदना पड़ रहा है अभी भी।

इन तमाशों का तिलस्म धीरे-धीरे खुलता गया तो इनके पीछे की तकलीफदेह तमाशों की शक्ल साफ होती गई धीरे-धीरे। तमाशे अब सुख नहीं देते -- ठिठुरती ठढ़ में काम करते छोटे बच्चे, उपेक्षा पड़ोसी बूढ़ों की, जबतब अपमान स्त्रीयों का, मनुष्यों से अधिक प्रतिष्ठा चीज़ों की, निर्दोष निमुहें लोग घायल होते विभिन्न कारणों से अनजाने ही -- कड़वाहट भरते थे अब तमाशे और सितमजरीफी ये कि ऐसे ही तमाशे ज्यादा दिखते हैं इस टुच्चे समय में। चारों ओर विज्ञापनी शोर, छोटी-छोटी चीजें पाने के लिए टकराता लहुलुहान होता आदमी, रहबरों के रहजन होते जाने के तमाशे - सिर्फ तमाशे देखन और कुछ न कर पाने का व्यर्थताबोध ही उकसाता रहता है खिलंदडे अंदाज़ में इन तमाशों को देखने और दिखाने को।

शायद दुख को दुख की तरह लिखने से इतना सांद्र हो जायेगा दुख कि ऐहसास ही खत्म हो जाए। इसलिए भाषा की, स्थितियों की खिलंदडेपन की चासनी जरूरी लगती रही है और ये सब भी अपनी कहाँ है ? सब तो उधार ली है अपने आसपास से, देखी-सुनी-जानी है अगल-बगल से ही। भाषा भी तो लोगों की ही है - जीवन ने उन्हें दिया, उन्होंने हमें। साहिर ने जिसे '' तजरबात ओ हवादिस '' की शक्ल में दुनिया से पाया हुआ बताया है। पर यह भी सच है कि जीवन अपने आप में इतना बड़ा और पेचीदा तमाशा है कि किसी के लिए न तो पूरा देखना संभव है और न दिखाना - बस वही थोड़ा कहना ज्यादा समझना। ज्यादातर तमाशे आदमी के विरूद्ध, आदमी के मन के विरूद्ध लेकिन निरीह आदमी सब झेलते जाने और हँसकर रोकर देखते जाने के लिए मजबूर। वही जमूरे के पापी पेट का सवाल है की तरह।

एक तमाशोदार कथारूपक याद आ रहा है - एक गरीब आदमी के पास सिर्फ एक धोती थी और वह मेले में था - शोरोगुल के बीच । पास में धेला नहीं, खाने को कुछ नहीं। धोती थी जो खा नहीं सकता था। चार खूंटों में धोती को बाँधकर एक घेरा बनाया कमरानुमा। सम्पूर्ण उलंग होकर बीच में बैठकर आवाज़ें लगाने लगा - आइए, देखिए, दो रुपये में गजब तमाशा। जो देखे वो पछताये जो न देखे वो भी पछताये। दो रुपये फेंकिये तमाशा देखिए। अब आदमी दो रुपये देकर अंदर जाय और नंगे आदमी को देखकर मारपीट पर उतारू। हाथ जोड़कर पैर पकड़ ले वह - बाबू, पेट का सवाल है। बाहर जाकर बताइएगा नहीं किसी को। तो अब आदमी इस पर हँसे, रोये या सिर धुने। कुछ लोगों के लिए जीवन ही तमाशा है तो कुछ के लिए तमाशा ही जीवन। अब इस अंतर की चट्टान को नाखून से खरोचना ही शायद लेखन है। लिख सकता हूँ थोड़ा बहुत तो लिखता हूँ। एक सिर है अपने पास जिसे धुन सकता हूँ। रचना प्रक्रिया पर बात करना अब भी मेरे लिए मुश्किल है।


9 comments:

Udan Tashtari said...

पंकज मित्र जी को जानना और पढ़ना अच्छा लगा. आभार.

Mrs. Asha Joglekar said...

Ek sade sawal ka itna wistrut jawab, kya bat hai.

prabhatranjan said...

pankajji mere priya kathakaar hain aur unki rachna prakriya ke baare men parhkar achha laga.

शायदा said...

शबोरोज़ के तमाशे में पड़े रचना प्रक्रिया के बीजों की बात को पढ़ना अच्‍छा लगा।

Geet Chaturvedi said...

जीवन और तमाशे के बीच खड़े होकर सिर धुनना वैसे कोई बुरा भी नहीं. सारी रचना प्रक्रियाएं यही तो होती हैं.

Tushar Dhawal Singh said...

पंकज मित्र जी की कहानियो का मुझे इंतज़ार रहता है. इनकी भाषा का खिलंदडपन चुटीले ढंग से अपने भीतर बह रही अवसाद की धारा को उकेरता रहता है. लोक जीवन में आ रहे बदलाव और बिखराव और उसके बर-अक्स राजनीति की आदमी आदमी के मन पर बढती पकड़ को पंकज जी ने अक्सर अपनी कहानियो में तरजीह दिया है. रचना प्रक्रिया पर बिना किसी आडम्बर के आपने बड़ी सहजता और सरलता से अपनी बात कह दी. पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. शुभकामनायें
तुषार धवल

विमलेश त्रिपाठी said...

pnakaj bhai ki kahaniyon me ek ajib kism ki shararat hai....wo mujhe sire se akrshit karti hai.... unki baaten behad achhi lagin....

प्रदीप जिलवाने said...

पंकज मित्र को पढ़ना मुझे भी हमेशा भाता है,उनकी 'क्वीज मास्टर' और 'पप्पु कांट लव सा...' जैसी कहानियां हमेशा स्मृति में बनी रहती है.

आशुतोष said...

पंखज मित्र में विनम्र्ता और खुलापन एकसाथ देखकर मन खिल गया।उनकी बेबाकी बहुत अच्छी लगी।