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ज़बां उर्दू : फ़िराक़ गोरखपुरी

यह पचासवीं पोस्ट है। मैंने सोचा न था कि इतनी गति और निरंतरता से सबद निकाल पाऊंगा। यह लेखकों के सहयोग और पाठकों के समर्थन से ही संभव हो सका। लेखकों को यह समझाने में कि भले ही माध्यम भिन्न है, रचनाएं अनछपी ही भेजें, कुछ वक्त तो लगा, लेकिन उन्होंने मुझ नए छोटे का मान रख नई रचनाएं भेजी। फिर मैंने भी गाँठ नहीं बांधी थी कि पुराना कुछ छापूंगा ही नहीं। इसीलिए 'कोठार से बीज' नामक स्तंभ शुरू किया। इससे इतर पहले से छपी हुई महत्वपूर्ण रचनाओं के समायोजन की भी योजना है। एक जिम्मेदारी उर्दू को लेकर भी अनुभव करता हूँ। हम सब ने उर्दू से बहुत कुछ सीखा है और अभी और बहुत सीखना बाकी है। उस पर हमारा उत्तराधिकार पुष्ट होना चाहिए। सबद में इसीलिए ' ज़बां उर्दू ' नाम से कुछ देर से ही सही यह स्तंभ। बतौर पहली पेशकश फ़िराक़ गोरखपुरी की यह ग़ज़ल उनकी पुस्तक बज़्मे-ज़िन्दगी : रंगे-शायरी से ( साभार )। फ़िराक़ के बारे में क्या लिखूं, ग़ज़ल के बारे में यह है कि इसकी कहन पर बोलियों का प्रभाव आप साफ़ लक्षित करेंगे। खालिस हिन्दोस्तानी बोली-बानी जो फ़िराक़ियत की खास पहचान भी है।


हमसे फ़िराक़ अकसर छुप-छुप कर पहरों-पहरों रोओ हो

हमसे फ़िराक़ अकसर छुप-छुप कर पहरों-पहरों रोओ हो
वो भी कोई हमीं जैसा है क्या तुम उसमें देखो हो

जिनको इतना याद करो हो चलते-फिरते साये थे
उनको मिटे तो मुद्दत गुज़री नामो-निशाँ क्या पूछो हो

जाने भी दो नाम किसी का आ गया बातों-बातों में
ऐसी भी क्या चुप लग जाना कुछ तो कहो क्या सोचो हो

पहरों-पहरों तक ये दुनिया भूला सपना बन जाए है
मैं तो सरासर खो जाऊं हूँ याद इतना क्यों आओ हो

क्या गमे-दौराँ की परछाईं तुम पर भी पड़ जाए है
क्या याद आ जाए है यकायक क्यों उदास हो जाओ हो

झूठी शिकायत भी जो करूँ हूँ पलक दीप जल जाए हैं
तुमको छेड़े भी क्या तुम तो हँसी-हँसी में रो दो हो

ग़म से खमीरे-इश्क उठा है हुस्न को देवें क्या इलज़ाम
उसके करम पर इतनी उदासी दिलवालो क्या चाहो हो

एक शख्स के मर जाये से क्या हो जाये है लेकिन
हम जैसे कम होये हैं पैदा पछताओगे देखो हो

इतनी वहशत इतनी वहशत सदके अच्छी आँखों के
तुम न हिरन हो मैं न शिकारी दूर इतना क्यों भागो हो

मेरे नग्मे किसके लिए हैं खुद मुझको मालूम नहीं
कभी न पूछो ये शायर से तुम किसका गुण गाओ हो

पलकें बंद अलसाई जुल्फ़ें नर्म सेज पर बिखरी हुई
होटों पर इक मौजे-तबस्सुम सोओ हो या जागो हो

इतने तपाक से मुझसे मिले हो फिर भी ये गैरीयत क्यों
तुम जिसे याद आओ हो बराबर मैं हूँ वही तुम भूलो हो

कभी बना दो हो सपनों को जलवों से रश्के-गुलज़ार
कभी रंगे-रुख बनकर तुम याद ही उड़ जाओ हो

गाह तरस जाये हैं आखें सजल रूप के दर्शन को
गाह नींद बन के रातों को नैन-पटों में आओ हो

इसे दुनिया ही में है सुने हैं इक दुनिया-ए-महब्बत भी
हम भी उसी जानिब जावें हैं बोलो तुम भी आओ हो

बहुत दिनों में याद किया है बात बनाएं क्या उनसे
जीवन-साथी दुःख पूछे हैं किसको हमें तुम सौंपो हो

चुपचुप-सी फ़ज़ा-ए-महब्बत कुछ कुछ न कहे है खलवते-राज़
नर्म इशारों से आँखों के बात कहाँ पहुँचाओ हो

अभी उसी का इंतज़ार था और कितना ऐ अहले-वफ़ा
चश्मे-करम जब उठने लगी है तो अब तुम शरमाओ हो

ग़म के साज़ से चंचल उंगलियां खेल रही हैं रात गए
जिनका सुकूत, सुकूते-आबाद है वे परदे क्यों छेड़ो हो

कुछ तो बताओ रंग-रूप भी तुम उसका ऐ अहले-नज़र
तुम तो उसको जब देखो हो देखते ही रह जाओ हो

अकसर गहरी सोच में उनको खोया-खोया पावें हैं
अब है फ़िराक़ का कुछ रोज़ो से जो आलम क्या पूछो हो

15 comments:

गाह तरस जाये हैं आखें सजल रूप के दर्शन को
गाह नींद बन के रातों को नैन-पटों में आओ हो
कमाल !!


नमस्कार सर जी,
पिछले कुछ दिनों से मैं ऐसे ही एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था,इरादा था,जितने भी मकबूल गजलगो हैं उनका क्रमवार प्रकाशन और विशेषताएं वगैरह.पर आज यहाँ आकर लगा की मुझे ऐसे किसी कार्य की आवश्यकता ही नहीं क्योंकि आपने पहले ही इतनी अच्छी चीज़ें लानी शुरू कर दी हैं.बहुत बहुत साधुवाद.
भविष्य में किसी तरह की मेरी सेवा के लिए याद जरुर करें
आपका
आलोक सिंह "साहिल"


50wi post ke saath firak saab. bahut hi shaandar. badhai. sabad ki nirantarta ke liye. yeh prawah isi tarah chalta rahe. shubhkamnayen.


mehnat rang la rahi hai, lage raho. meri sari shubhkamnayen tumahre sath hai.


५०वीं पोस्ट की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं. आभार इस प्रस्तुति के लिए.


priya Anurag :: aap dwaara preshit har Post dekh-padh raha hoon. is or dhyaan hee nahi gaya ki aapne Post ka 50-va ank choon liya hain.
aap lagataar barkat mein rahe--yehii prarthna hain.
or haan, swayam ka likhna n choot jaaye, is or lagataar dhayaan rakhe. mujhe ab aapke likhe ka intzaar hain.
piyush


प्रिय अनुराग
सबद अपने मूल रूप में अनश्वर अनंत की बात करता है. यह नाम ही अनंत और निरंतरता का द्योतक है. आपका ब्लॉग इससे अलग नही है. जिस लगन, समर्पण और मेहनत से आपने इस ब्लॉग को संवारा है वह वाकई तारीफ के काबिल है. नए माध्यम के जरिये आप और भी लोगों तक पहुँच पायें और ब्लोगिन्ग की दुनिया में एक मिसाल कायम करें यही कामना है. हमसे जो सहयोग सम्भव है आपको निरंतर मिलता रहेगा.
शुभकामनायें
तुषार धवल


bahut-bahut badhai.50 ki sankhya hi nahi, gunvtta v dhyandene yogya hai.urdu pr samagri niyamit den.


50wi post ke liye badhai ! aapki lagan aur mehnat sabad pr dikhti hai. firaq ki yh gazal adbhut hai.


50vin post tak safar ki badhai. Pahala ardhshatak jarur yadgar rahega, apke jeevan men. Lekin, agar kahin ishwar hai to main prarthana karata hun- he eesh, Anuragji "Shatakon" ki jhadi lagate rahen.Aur Doab se lekar Marudhara tak apani pahunch banakar Gudadi ke Lal ki talash karate rahen.
Inhin shubhkamnaon ke sath,
Dilip.


डिअर, सबद को इन पचास पोस्ट्स तक आते-आते पढना अनिवार्य बना दिया है, यही क्या कम बड़ी बात है. आगे भी उम्मीद है यह सिलसिला बरकरार रखोगे. शुभकामनायें लो.


firak or sabad dono lajawab hain.hm padhnewalon k liye aap bahut manikhez chizen samne la rhe hain.badhai.


पचासे की फिराक में थे क्‍या पहले से.
ये सिलसिला चलता रहे, शुभकामनाएं.


Anurag! tumhari pachasvin post par, pesh hain meri asankhya badhai..............
Ye SABAD, sach mein tumhari khubsurat jeet hai. Ise dekhkar, padkar, samjhkar, mahsuskar kuch aisa lagta hai ki kuch accha kiya..........
Iske jariye mera KALA se parichay badta jaa raha hai..........
Tumhe DHANYAWAAD............
Aur tumhari pachasvin post mein Phiraq ji ka ye rang.........GAZAB!!!!!!!!!!!!!!!!
Aise hi iss duniya ko jeete chalo, yakinan ye duniya tumhe, aur... aur... apnati jayegi .


lajawab,aur khubsoorat gazal .


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