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स्मृति - शेष : अहमद फ़राज़

( उनकी ग़ज़लों-नज़्मों से उस कम उर्दू आदमी की भी पटती है जो पहलेपहल उन तक मुहावरों जैसा मजा पाने जाता है। उनका अंदाजे-बयां सादा पर असरदार है। उसमें ज़ज़्ब दुनिया और लोग पढ़ने वालों को बहुत पास अपने लगते हैं। इसकी शायद एक वजह यह भी रही कि फ़राज़ ने बहुत पहले यह तय कर लिया था : '' अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं / फ़राज़ अब ज़रा लहज़ा बदल के देखते हैं।'' कहना न होगा कि उन्होंने अपने दौर की ग़ज़ल का लहज़ा बारंबार बदला और हर बदलाव से उनकी मकबूलियत बढ़ती ही गई। वे थे पड़ौसी पाकिस्तान के, लेकिन उनकी शायरी का वास्ता उसकी चौहद्दी को पार कर गया था। दो दिन पहले जब उनके निधन की ख़बर आई तो सबकी जुबां पर उनका कहा यह शेर फिर याद हो आया : '' अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें / जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।'' उनकी एक किताब का नाम भी, ''ख़्वाबफ़रोश'' है जिसमें उन्होंने अपनी चुनी हुई कविताएं दी हैं। यहाँ उसी संग्रह से एक ग़ज़ल पेश है। )

इतने तो मरासिम थे कि आते जाते...

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते

शिकवा-ए-जुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शम्अ जलाते जाते

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी इक उम्र
लगी जान से जाते-जाते

जश्न-ए-मक़तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पा-ब-जोलाँ ही सही नाचते गाते जाते

उसकी वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम फ़राज़ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते

( शब्दार्थ : शिकवा-ए-जुल्मत-ए-शब = रात के अंधकार की शिकायत, जश्न-ए-मक़तल = वधस्थल का समारोह, पा-ब-जोलाँ = श्रृंखलाबद्ध पाँव )

13 comments:

वो मेरे पसंदीदा शायर हैं, हाँ, हैं क्योंकि वो हैं और हमेशा रहेंगे, जो लोग दिलों में बसते हों वो कभी मरते नही, वो ताकयामत जिंदा रहेंगे...पता नही इन आंसुओं को क्या हो गया है, रुकते ही नही, मेरी बात भी नही समझते, लेकिन समझ जायेंगे धीरे धीरे, खुदा उनकी रूह को सुकून अत फरमाए, वो जन्नत में भी उसी शान से रहें जैसे दुनिया में रहे....


सचमुच वे लहजा बदल के गए हैं।


"with a deep pain for him"

शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदायें मुझे न दो

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो

ऐसा कहीं न हो के पलटकर न आ सकूँ
हर बार दूर जा के सदायें मुझे न दो

कब मुझ को ऐतेराफ़-ए-मुहब्बत न था "फ़राज़"
कब मैं ने ये कहा था सज़ायें मुझे न दो


बहुत अच्छी प्रस्तुति!
फ़राज़ साहब को श्रद्धांजलि ! नमन!!


अनुराग, कल देर रात इस ग़ज़ल को तीन चार बार पोस्‍ट करने की कोशिश की। तकनीकी कारणों से हो न सकी। आज यहां देखा, अच्‍छा लगा। फ़राज़ हममें से बहतों के पसंदीदा हैं शायद इसलिए ऐसा इत्‍तेफ़ाक़ रहा होगा।


mere paas alfaz nahi hai behad takleef hui mujhe ....unke interview k liye meri dost ja rahi thi maine jabran uski tayri karai thi....kash us din uske saath jati ......................


शायर अहमद फ़राज़ साहेब को श्रृद्धांजलि!!


Thanks for putting your thoughts
on the net.I have been and always will be
a genuine admirer of Farazsaheb.He has contributed to our 'Tahejeeb'
I could see this blog because of Shri Dilip Chitre.
- Jayant


aaj subah jab Faraz ke bare mein likh raha tha to samajh nahin aa raha tha ki kaun si ashaar likhoon aur kaun se chhodun.

sach unke jane se shayari ke ek yug ka ant ho gaya.


फ़राज़ का जाना बहुत बड़ा नुकसान है. शहरयार के शब्दों में कहूँ तो अब हमेशा लगेगा कि कहीं कुछ कम है. उनकी बड़ी सुंदर ग़ज़ल आपने पोस्ट की. उन्हें नमन.


khuda Faraz sahab ko jannat bakshe!
main khushkismat hoon ki do baar unse delhi me rubaru hone ka mauka mila. unki yaaden hamesha hamare sath rahengi.


adarniye anurag jee,main 9th class me giridih dav me padhta hun.kavi aur kathakar bipin kumar sharma mere mama jee hain jinhone mujhe yah blog padhne k liye prerit kiya tab se mujhe jab bhi mauka milta hai, main ise padhta hun. is se kafi kuchh sikhne ko milta hai. aaj ahamad faraz saheb ko padhkar maza aa gaya. aapko itni pyari gazal dene k liye badhai.
vivek


'' अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें / जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।''
film "nikah" ke ek pasandeeda geet ki shuruat isi sher se hoti hai, par ye nahi maloom tha ye kiska sher hai.likhne wale apne lekhan me hamesha zinda rahte hai, ek saal baad hi sahi unhe meri shraddhanjali.


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