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रंगायन : २ : नेमिचंद्र जैन

( लेखकों को याद करने का हमारा ढंग इस कदर रवायती या देखादेखीपन का शिकार है कि किसी सच्चे-खरे लेखक की उसके अवदान के बिना पर याद हमें अब शायद ही आती है। नेमिचंद्र जैन उन कम लेखकों में से थे जिन्होंने हिन्दी को अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता से न सिर्फ़ समृद्ध किया, उसे अनेक वर्षों तक पोसते भी रहे। उन जैसा जिम्मेदार जतन दुर्लभ है, इसलिए उन्हें याद किया जाना उस जिम्मेदारी को महसूसना भी है। इस बार रंगायन में सुलभजी के मार्फ़त नेमिजी। )

वे सिसृक्षा का बीज रोपते थे

हृषीकेष सुलभ

उनकी कई छवियाँ मेरे मन में अंकित हैं। उनसे हुई मुलाक़ातें स्मृति में जीवित हैं। मुझे यह स्वीकारते हुए रंचमात्र भी संकोच नहीं कि अगर मैं उनसे नहीं मिला होता, तो शायद आज नाटक नहीं लिख रहा होता। यह जानकर कि मैं कहानियाँ लिखता हूँ और रंगकर्म करता हूँ, उन्होंने नाटक लिखने और इसके लिए तैयारी करने की सलाह दी थी। मेरे जैसे न जाने कितने लोगों के भीतर उन्होंने सिसृक्षा के बीज रोपे होंगे! अपने जीवंत सम्पर्क से वह इसे अंकुरित होने के लिए पर्यावरण देते और अपनी अनुभवसिद्ध सजग आँखों से देखरेख भी करते।

मेरे नाटकों (अमली और माटीगाड़ी) का प्रदर्शन देखने के बाद उन्होंने मुझे मैला आँचल को रूपांतरित करने की सलाह दी। मैं साहस नहीं कर पा रहा था, पर उन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि मैं यह कर सकता हूँ और दबाव बनाए रखा। मैला आँचल का फैलाव मेरे विश्वास को डिगाता रहा और मेरे ऊपर उनका भरोसा प्रोत्साहन देता रहा। वे पहले प्रदर्शन के अवसर पर पटना में उपस्थित भी थे। नाट्यालेखों या नाट्य प्रस्तुतियों पर बातचीत करते या लिखते हुए प्रसिद्ध लोगों की कमज़ोरियों की ओर संकेत करने में वे कभी संकोच नहीं करते और नए लोगों के महत्त्वपूर्ण काम और उनकी प्रयोगधर्मिता को हमेशा उदारता के साथ रेखांकित करते।

नेमिजी कवि थे। तारसप्तक के कवि। हिन्दी कविता के विकास में तारसप्तक का योगदान निर्विवाद है। वे आलोचक थे और उन्होंने हिन्दी उपन्यास की आलोचना का स्थापत्य गढ़ा। रंगमंच की दुनिया में अपनी सक्रियता के लिए वह परिस्थितियों को जिम्मेवार मानते थे। इप्टा आंदोलन से अपने गहरे संबंध के बावजूद उनका मानना था कि रंगमंच निजी तौर पर उनका विषय नहीं था। पहले संगीत नाटक अकादमी और फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ने के बाद उन्होने रंगमंच के प्रति जो दयित्व अनुभव किया उसने उन्हें गहन अध्ययन के लिए प्रेरित किया।

उनके अध्ययन और उनकी सक्रियता और कविता तथा आलोचना की दुनिया के अनुशासन ने उन्हें रंगसमीक्षा और रंगचिंतन के क्षेत्र में शिखर पर पहुँचाया। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय रंगजगत को अपनी साधना और चिंतन से उन्होंने समृद्ध किया। नेमिजी का सांस्कृतिक जीवन कम्युनिस्ट आंदोलन के बीच उपजा और उन्होंने अपने लिए यहीं से दृढ़ता अर्जित की। इसी दृढ़ता ने उन्हें कम्युनिस्ट आंदोलन की रूढ़ियों से मुक्त रखा। वे उज्जवल भाव से समाज की समस्त सुगबुगाहटों और हलचलों के प्रति उत्सुक और जिज्ञासु बने रहे तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए अपरिहार्य बनते गए।

नेमिचंद्र जैन हिन्दी में आधुनिक नाट्यालोचना के जनक माने जाते हैं। उन्होंने साहित्यिक मूल्यों के साथ-साथ रंगमूल्यों के प्रश्न उठाए। नाट्यालेख को रंगमंच से काटकर परखने और विश्लेषित करने की परम्परा को अनुचित बताया। नाटक के पाठ के भीतर छिपे रंगतत्त्वों की खोज के लिए नाट्यालोचना के नए उपकरणों को आविष्कृत किया। हिन्दी के पास रंगप्रस्तुति की समीक्षा की कोई परम्परा नहीं थी। साहित्यिक धारणाओं के आधार पर ही प्रस्तुतियों का मूल्यांकन होता आया था।

नेमिजी ने नाटक रचे जाने की सम्पूर्ण प्रक्रिया के विविध आयामों को अपनी अलोचना-पद्धति में शामिल करते हुए उसके लिखे जाने, मंचित होने और दर्शकों तक पहुँचने के क्रम को एक सूत्र में बाँधा। उन्होंने इसे समग्र प्रक्रिया के रूप में रेखांकित किया। दृश्यकाव्य कहे जाने वाले नाटक की काव्यात्मक संवेदना के साथ-साथ रंगकर्म के व्यवहार-पक्ष को भी हमेशा महत्त्व दिया। नेमिजी की इस दृष्टि ने भारतेन्दु और प्रसाद जैसे नाटककारों तक पहुँचने के लिए रास्तों की खोज की। नाटक की भाषा को लेकर उनकी समझ बिल्कुल साफ़ थी कि ‘‘ उसमें भाव, विचार और चित्र तीनों को वहन करने का सामर्थ्य तो हो, पर फिर भी वह बोलचाल की भाषा से बहुत दूर न हो। ’’

नेमिजी का जन्म 16 अगस्त सन् 1919 को और देहावसान 24 मार्च सन् 2005 को हुआ। अपने दीर्घ जीवनावधि में उन्होंने भरपूर लेखन किया। तारसप्तक की कविताओं के अलावा अचानक हम फिर और एकांत शीर्षक दो काव्य संकलन प्रकाशित हुए। अधूरे साक्षात्कार को उपन्यास की आलोचना के क्षेत्र में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त है। रंग आलोचना पर केंद्रित रंगदर्शन, रंग परम्परा, तीसरा पाठ, दृश्य-अदृश्य, भारतीय नाट्य परम्परा आदि कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं। नाटकों के अनुवाद और मुक्तिबोध रचनावली सहित अन्य कई ग्रंथों का उन्होंने संपादन किया। उनकी रचनाओं का विपुल भंडार हिन्दी की सृजनशील परम्परा की धरोहर हैं।

सृजन की दुनिया में नवाचार के प्रति नेमिजी की उत्सुकता चकित करती थी। परम्परा के प्रति वे बेहद सजग थे। उन्होंने परम्परा को कभी पुनरुत्थानवादी दृष्टि से नहीं देखा और हमेशा परम्परा के प्रति संवेदनशीलता के साथ नवाचार की वकालत की। उनका मानना था कि भारतीय रंगमंच को रचनात्मक तरीके़ से समकालीन जीवन के अनुभवों से अपने को लैस करना चाहिए और यह तभी सम्भव है, जब हम अपने पारम्परिक और शास्त्रीय रंगमंच के प्रति गम्भीर हों और अपने लिए मौलिक मुहावरा विकसित करें। नेमिजी की आलोचना और आस्वाद की समझ में रूढ़िवादिता नहीं थी।

नेमिजी से मिलना हमेशा सुखद होता था। मिलते ही एक आत्मीय मुस्कान तिरती। वे बेहद गम्भीर व्यक्ति थे, पर उनकी संयमित हँसी का कोई सानी नहीं था। जिज्ञासाओं और प्रश्नों का जवाब देते हुए वे कभी अधीर नहीं होते और न ही सामनेवाले को अपने ज्ञान से आतंकित करते। वे विनम्र थे और दृढ़ भी।

Comments

Udan Tashtari said…
आभार, इस प्रस्तुति का!!
anurag bhaee, bilkul sahi kaha aapne aur sulabh jee ka bhi aabhar! yar nemi jee pr kuchh aur chhapo aur thoda hatkar....unki kuchh kavitaen bhi do.
prabhatranjan said…
nemiji par lekh parhkar achha laga. anuragji aapko bhi itna achhe lekh ke liye badhai.

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