Saturday, August 16, 2008

कोठार से बीज : ३ : नागार्जुन

( बरस भर पहले फिल्मकार संजय झा से मुलाकात हुई थी। उन्होंने उस दौरान अपनी नई फ़िल्म, 'स्ट्रिंग्स' भेंट की थी। ज़िक्र किया था कि इसमें हिन्दी के कवि और हमारे दुलारू बाबा नागार्जुन की एक कविता का भी फिल्मांकन किया है। फिर जोड़ा कि इस कविता पर हिंदुत्ववादियों ने बड़ा गुस्सा निकाला और इलाहबाद हाईकोर्ट में कविता को भारतीय जन-मन का विरोधी बताते हुए पीआईएल तक दाखिल कर दिया। संजय को इस बात का अफ़सोस था कि इस पर हिन्दी जगत ने लगभग चुप्पी साध ली और सारा मसला, जैसा कि हर बार होता है, एक महाशोर में गुम गया। सबद के इस स्तंभ के लिए जब शमशेर और त्रिलोचन के बाद बाबा की रचनाओं को खारोल-परोल रहा था तो बरबस इस कविता का ध्यान हो आया। एक आज़ाद देश के रूप में हम अभी-अभी ६१ के हुए हैं। बाबा ने यह कविता करीब ४० बरस पहले लिखी थी। आप ही पढ़कर बताइए कितना कुफ़्र और कितनी तल्ख़ सच्‍चाइयां दर्ज हैं इसमें। बाबा की तस्वीर औए यह कविता, दोनों राजकमल से प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कविताओं की पुस्तक से साभार ली गई है। )

मंत्र कविता

ओं शब्द ही ब्रह्म है
ओं शब्द और शब्द और शब्द और शब्द
ओं प्रणव, ओं नाद, ओं मुद्राएँ
ओं वक्तव्य, ओं उदगार, ओं घोषणाएँ
ओं भाषण ...
ओं प्रवचन ...
ओं हुंकार, ओं फटकार , ओं शीत्कार
ओं फुसफुस, ओं फुत्कार, ओं चित्कार
ओं आस्फालन, ओं इंगित, ओं इशारे
ओं नारे और नारे और नारे और नारे
ओं सबकुछ, सबकुछ, सबकुछ
ओं कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं
ओं पत्थर पर की दूब, खरगोश के सींग
ओं नमक-तेल-हल्दी-जीरा-हींग
ओं मूस की लेंड़ी, कनेर के पात
ओं डायन की चीख, औघड़ की अटपट बात
ओं कोयला-इस्पात-पेट्रोल
ओं हमी हम ठोस, बाकी सब फूटे ढोल

ओं इदमन्नं, इमा आप: , इदमाज्यम, इदं हवि
ओं यजमान, ओं पुरोहित, ओं राजा, ओं कवि :
ओं क्रांति : क्रांति : क्रांति : सर्वग्वम क्रांति :
ओं शांति : शांति : शांति : सर्वग्वम शांति :
ओं भ्रांति: भ्रांति : भ्रांति : सर्वग्वम भ्रांति :
ओं बचाओ बचाओ बचाओ बचाओ
ओं हटाओ हटाओ हटाओ हटाओ
ओं घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ
ओं निभाओ निभाओ निभाओ निभाओ

ओं दलों में एक दल अपना दल, ओं
ओं अंगीकरण, शुद्धीकरण, राष्ट्रीकरण
ओं मुष्टीकरण, तुष्टीकरण, पुष्टीकरण
ओं एतराज़, आक्षेप, अनुशासन
ओं गद्दी पर आजन्म वज्रासन
ओं ट्रिब्‍युनल ओं आश्वासन
ओं गुट निरपेक्ष सत्तासापेक्ष जोड़तोड़
ओं छल-छंद, ओं मिथ्या, ओं होड़महोड़
ओं बकवास, ओं उद्घाटन
ओं मारण-मोहन-उच्चाटन

ओं काली काली काली महाकाली महाकाली
ओं मार मार मार, वार न जाए खाली
ओं अपनी खुशहाली
ओं दुश्मनों की पामाली
ओं मार, मार, मार, मार, मार, मार, मार
ओं अपोजिशन के मुंड बनें तेरे गले का हार
ओं ऐं हीं वलीं हूँ ओं
ओं हम चबाएंगे तिलक और गाँधी की टाँग
ओं बूढे की आँख, छोकरी का काजल
ओं तुलसीदल, बिल्वपत्र, चंदन, रोली, अक्षत, गंगाजल
ओं शेर के दाँत, भालू के नाखून, मरकत का फोता
ओं हमेशा हमेशा हमेशा करेगा राज मेरा पोता
ओं छू : छू : फू : फू : फट फिट फुट
ओं शत्रुओं की छाती पर लोहा कुट

ओं भैरो, भैरो, भैरो, ओं बजरंगबली
ओं बन्दूक का टोटा, पिस्तौल की नली
ओं डालर, ओं रूबल, ओं
ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंड

ओम् ओम् ओम्
ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम् व्योम्
ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे
ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे
ओं दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा
ओं इसी पेट के अदंर समा जाए सर्वहारा
हरि : ओं तत्सत् हरि : ओं तत्सत्

7 comments:

Geet Chaturvedi said...

संजय झा की फिल्‍म का साउंडट्रैक यहां कबाड़ के लगाया गया था, जिसमें यह कविता सुन सकते हैं-
'कबाड़ख़ाना पर मंत्र कविता'

Dilip said...

Prakriti ke javan sadhu 'Nagarjun' ki 'Mantra Kavita' apane apani blog par rakhkar auron ke liye kya kiya, mere upak upkar jarur kiya. Sabase pahle apko dhynavad, uske bad apki samajh aur parakh uttarottar badhati rahe ishwar se kamana karata hun.
40 sal pahale ki atma ka avalokan itna sarthak sabit hoga, jhakjhor raha hai.
Chabayenge tilak aur gandhi ki tang
Boodhe ki ankh, Chhokari ke kaja...
Kavita ki panktiyan vartaman dushpravriti ki bhavishyavani hai.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आजादी की वर्षगांठ पर इस से सु्न्दर उपहार हो ही नहीं सकता था। कविता पढ़ी, सुनी और डाउनलोड कर सेव भी की। बाबा को सम्पूर्ण रूप से पाया।
बहुता बहुत आभार।

Tushar Dhawal Singh said...

om isi pet ke andar sama jaye sarvhara. Adbhut!! Baba ne tab Nandigram aur Sez ko nahi dekha tha lekin uski aahat sun li thi. Adbhut shaili, adbhut shilp ki kavita hai. Lal Quile se bole gaye shabdon ka baunapan is kavita ke aagey aur bhi drishyaman ho jata hai. Sach, ek achcha kavi dar asl ek sadhak hota hai jo bina kisi apeksha ke sirf apni abhivyakti ko sadhne ki saadh mein laga rahta hai. Aaj jo kavita ke avsaan ki baaten uchchali ja rahi hain, agar kavi sirf apni sachchi abhivyakti ko nishkaam bhaav se saadhne mein jut jaaye to aise prashn apne aap khamosh ho jayenge. Baba ki yah kavita nayi peedhi ko zaroor prerit karegi.Anurag Ji, aapka bahut shukriya ki swatantrata diwas ke mauke par aapne is kavita ko blog par lagay.
Tushar Dhawal

ravindra vyas said...

ये नागार्जुन का एक खास ढब-ढंग है। अच्छे-अच्छों को तिलमिला देने वाला। कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इस पर विवाद हुए हों। वे एक खास जगह से पाखंडियों को ताड़ते हैं। अचूक।

aalekh said...

aadi mantr ki trah hi agar-amar hai baba ki yh kavita.

Kavya said...

wah