Wednesday, August 13, 2008

सबद विशेष : ३ : एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं



( यह पोस्ट हर लिहाज से कवि मंगलेश डबराल की है। सबद का इतना सौभाग्य ज़रूर है कि उन्होंने कार्देनाल सरीखे कवि की कविताओं के अपने अनुवादों को प्रकाशन के लिए इसे उपयुक्त माना। इसके लिए पुराने अनुवादों को उन्होंने न सिर्फ़ पुनरीक्षित किया, हमारे बहुत कहने पर कार्देनाल की कविता पर एकाग्र गद्य भी लिखा। बताते चलें की यह अधूरी पोस्ट है। इसे पूर्णता कार्देनाल की कुछ लंबी और महत्वपूर्ण कविताओं के बिना न मिल सकेगी। अगली दफा आप उनकी 'मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना' सहित कुछ और कविताएं भी पढ़ सकेंगे। )

ओला, पाद्रे !

मंगलेश डबराल

रूबेन दारियो, पाब्लो नेरुदा और सेसर वाय्यखो के बाद १९२५ में निकारागुआ में जन्मे एर्नेस्तो कार्देनाल लातिन अमेरिकी धरती के चौथे बड़े कवि माने जाते हैं। मार्क्सवाद और रोमन कैथलिकवाद दोनों से उनकी प्रतिबद्धता दुनिया भर में चर्चित रही है। शुरू में कार्देनाल की कविता पर दारियो और नेरुदा का गहरा असर था, लेकिन अमेरिका के आधुनिक आध्यात्मिक कवि थॉमस मर्टन के संपर्क में आने के बाद वे एज़रा पाउंड की काव्य-कला से बहुत प्रभावित हुए। अमेरिकी साम्राज्यवाद और लातिन अमेरिकी तानाशाहों के प्रखर विरोधी और लिबरेशन थिओलाजी के समर्थक कार्देनाल की कविता में बाइबल की सूक्तियों जैसी संक्षिप्ति, चीन के थांग काल के महकविओं जैसी शुद्धता और एज़रा पाउंड जैसी वृत्‍तात्‍मकता मिलती है। उन्होंने दो-तीन पंक्तियों के 'वचनों' से लेकर 'ज़ीरो आवर' जैसी लम्बी 'डाक्युमेंट्री' कविताएं भी लिखी हैं जिनमें पूंजीवादी व्यवस्था की घटनाओं, सूचनाओं और आंकड़ों के इस्तेमाल से एक शोषक सभ्यता पर टिप्‍पणियां की गईं हैं।

कार्देनाल ने 'एक्सतीरियरिज्मो' नाम से एक काव्य आंदोलन की शुरुआत भी की थी जिसमें आत्मगत और वैयक्तिक तत्वों को बुहार कर कविता को अधिक से अधिक वस्तुगत स्वरुप देने का प्रयत्न था। कार्देनाल निकारागुआ के तानाशाह सोमोज़ा के विरद्ध भूमिगत संघर्ष करते रहे और कई वर्ष बाद जब निकारागुआ में सांदिनीस्ता क्रांतिकारियों की सरकार बनी तो वे उसमें संस्कृति मंत्री रहे। इससे पहले उन्होंने १९७० में क्यूबा जाकर क्रांति के बाद उस समाज में आए बदलावों पर एक विस्तृत डायरी 'इन क्यूबा' प्रकाशित की थी।

कार्देनाल की इन सूक्तियों/सुभाषितों/वचनों -- 'एपिग्राम्स' -- को १९७६ में सबसे पहले नरेंद्र जैन ने अनुदित किया था। भोपाल की ब्रिटिश लाइब्रेरी में 'लंदन मैगज़ीन' में छपे अंग्रेज़ी अनुवादों से हिन्दी अनुवाद करके उसने अपने सुलेख में एक पोस्टर प्रकाशित किया जो शायद आज भी किसी न किसी कविता-प्रेमी की दीवार पर चिपका हो। कुछ वर्ष बाद मेरे मित्र अमरजीत चंदन ने जब मुझे लंदन से कार्देनाल का संग्रह, 'मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना' भेजा तो मेरे किए हुए कुछ अनुवाद 'तनाव' पत्रिका में प्रकाशित हुए।

एक अद्भुत संयोग से कुछ समय बाद २० जनवरी, १९८९ को मेरी कार्देनाल से दिल्ली में एक मुलाकात हुई। वे तब निकारागुआ के संस्कृति मंत्री थे, भोपाल के भारत भवन में हुए अंतरराष्ट्रीय कविता उत्सव से लौटे थे और निकारागुआ के दूतावास में उनका जन्मदिन मनाया जा रहा था। सफेद दाढ़ी, काली टोपी, और किसी तब्लानावाज़ या फकीर जैसे दीखते, वाइन के घूंट लेते हुए कार्देनाल को मैंने अपना अनुवाद दिखाया तो वे बोले, ' मैं इसे भोपाल में देख चुका हूँ।' उन्होंने उस पर हस्ताक्षर किए : ' पारा मंगलेश .... इस किताब के लिए मेरा आभार।' मैंने उनसे पूछा,' फादर, आप मार्क्सवाद और ईसाइयत के बीच किस तरह तालमेल बिठाते हैं ? उन्होंने कहा, ' दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है, दोनों ही मनुष्य की मुक्ति की विचारधाराएं हैं।' मैंने पूछा,' लेकिन आप सक्रिय पादरी हैं' तो वे बोले, ' मुझमें और दूसरों में फर्क यह है कि मैं ईश्वर और लोगों के बीच की कड़ी नहीं हूँ और मेरे और ईश्वर के बीच भी कोई नहीं है।' मैंने उनसे नई कविताओं की मांग की तो उन्होंने मेरी डायरी में अपना पता लिखते हुए कहा, ' तुम मुझे चिट्ठी लिखो, मैं भेज दूँगा।' मैंने पूछा,'कॉपीराइट की समस्या तो नहीं होगी, तो वे बोले : तुम्हें सीधे कवि से कविताएं मिलेंगी।'

उन दिनों मैं 'जनसत्ता' में काम करता था जहां से चलते समय मुझे कवि-कार्टूनकार राजेन्द्र धोड़पकर ने एक कोरा कागज़ थमाते खा था कि इस पर आप मेरे लिए कार्देनाल से हस्ताक्षर करवाकर ले आइएगा। मैंने जेब से वह कागज़ निकालकर फादर से दस्तखत करने के लिए कहा। वे मासूमियत से कलम निकालकर लिखने ही वाले थे कि उनके पीछे खड़ा दूतावास का एक अधिकारी बोला,' ओह नो! डू यू वांट फादर टू साइन ऑन अ ब्लैंक पेपर ?' तब मुझे एहसास हुआ कि कार्देनाल एक विदेशी सरकार के मंत्री हैं और मैं एक बड़ी गलती करने जा रहा था। मैंने घबराकर कागज़ वापस जेब में रख लिया। फिर सब लोग फादर की सेहत और कविता के लिए जाम उठाने में जुट गए। उनसे लम्बी बात करने की बहुत इच्छा थी पर यह संभव नहीं था क्योंकि उन्हें अगले दिन वापस लौटना था। इतन्व वर्ष हुए, मैं उन्हें लिख भी नहीं पाया। लेकिन उस मुलाकात की याद इतनी अमिट है कि मैं अब भी झूमते-मुस्कराते, हर चीज़ को बच्चों जैसे कुतूहल से देखते फादर को अपने सामने देख सकता हूँ और कह सकता हूँ,' ओला, पाद्रे ( हलो, फादर ) !

कार्देनाल की कविता ने लातिन अमेरिकी समाज को रूमानी, राजनैतिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर बहुत गहरे प्रभावित किया है। एक प्रमाण हैं ये सूक्तियां जो लगभग ५५ साल पहले लिखी गईं थीं लेकिन उनका रोमांच आज भी बरकरार है।

कविताएं एर्नेस्तो कार्देनाल की

( मंगलेश डबराल द्वारा अनूदित )

1.

ये कविताएं मैं तुम्हें सौंपता हूँ, क्‍लॉदिया, क्योंकि ये तुम्हारी हैं
मैंने इन्हें बहुत सादगी से लिखा है ताकि तुम समझ सको
ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए हैं, पर अगर तुम इनसे ऊब जाओ
तो मुमकिन है एक दिन ये पूरे स्पानी अमेरिका में फैल जाएंगी
और अगर तुम उस प्यार का भी तिरस्कार करोगी --
जिसने इन्हें लिखा
तब उस प्यार का सपना दूसरी स्त्रियाँ देखेंगी --
जो कि उनके लिए नहीं बना था
और क्‍लॉदिया, शायद तुम पाओगी कि ये कविताएं
( जो तुम्हारे प्रेम निवेदन में लिखी गईं थीं )
इन्हें पढ़नेवाले दूसरे प्रेमीजनों में उन चुम्बनों को जगाएंगी
जिन्हें एक कवि तुममें नहीं जगा पाया

2.

यही होगा मेरा प्रतिशोध :
कि एक दिन तुम्हारे हाथों में होगी
एक प्रसिद्द कवि की कविता की किताब
और तुम पढ़ोगी उन पंक्तियों को जो कवि ने
तुम्हारे लिए लिखी थीं
और तुम कभी जान नहीं पाओगी यह बात

3.

उन्होंने मुझे बताया तुम किसी दूसरे से प्यार करती हो
यह सुनकर मैं अपने कमरे में चला गया
और मैंने लिखा सरकार के खिलाफ़ वह लेख
जिसने मुझे खिला दी जेल की हवा

4.

तुम जिसे मेरी कविताओं पर गर्व है
इसलिए नहीं कि उन्हें मैंने लिखा
बल्कि इसलिए कि वे तुम्हारी प्रेरणा से लिखी गईं
हालांकि वे लिखी गईं थीं तुम्हारे विरुद्ध

तुम बेहतर कविता प्रेरित कर सकती थीं
तुम बेहतर कविता प्रेरित कर सकती थीं

5.

मैंने बांटे हैं भूमिगत पर्चे
सड़क के बींचोबीच इंकलाब ज़िन्दाबाद का नारा लगते हुए
बंदूकधारियों सिपाहियों की परवाह न करते हुए
मैंने अप्रैल विद्रोह में शिरकत की
लेकिन जब तुम्हारे घर के सामने से गुजरता हूँ
मैं पीला पड़ जाता हूँ
मुझे हिला देती है तुम्हारी एक ही निगाह

6.

कोस्ता रीका के इन गुलाबों को
स्वीकार करो मरियम, इन प्रेम कविताओं के साथ :
ये कविताएं तुम्हें याद दिलाएंगी
कि गुलाबों के चेहरे तुम्हारे चेहरे की तरह हैं ; ये गुलाब
याद दिलाएंगे कि प्रेम को टूटना ही होगा
और तुम्हारा चेहरा यूनान और रोम की तरह मिट जाएगा
जब न प्रेम होगा और न कोस्ता रीका के गुलाब होंगे
मरियम, तब तुम्हें याद आएगा यह उदास गीत

7.

अब भी मुझे याद है पीली बत्तियों वाली वह गली
बिजली के तारों के बीच पूरा चाँद
और कोने पर वह तारा, कहीं दूर रेडियो की आवाज़
ला मेरसेद के गुंबद पर बजता ग्यारह का गजर :
और तुम्हारे खुले दरवाज़े पर सुनहरा प्रकाश : उसी गली में

8.

भीड़ में अकेली तुम हो
जैसे आसमान में अकेला चाँद
और अकेला सूरज है

कल तुम स्टेडियम में थीं
हज़ारों-हज़ारों लोगों के बीच
और जैसे ही मैं आया मैंने तुम्हें देख लिया
गोया अकेली तुम थीं
खाली स्टेडियम में

9.

हो सकता है, मेरे प्यार,
इस साल हम कहीं यात्रा पर निकल जाएं
हो सकता है
इस साल हम विवाह कर लें
हो सकता है, मेरे प्यार,
इस साल सोमोज़ा का पतन हो जाए

10.

बारिश की भारी बूंदें
सीढियाँ चढ़ते पैरों की आहट की तरह हैं
और दरवाज़े को थपथपाती हवा
जैसे कोई स्त्री भीतर आने-जाने को हो

11.

तुम आईं सपनों में
लेकिन जो शून्य तुम छोड़ गईं
वह था यथार्थ

( अगली पोस्ट में जारी... )

12 comments:

शायदा said...

शानदार पोस्‍ट। बहुत सुंदर।
लेकिन जब तुम्हारे घर के सामने से गुजरता हूँ
मैं पीला पड़ जाता हूँ
मुझे हिला देती है तुम्हारी एक ही निगाह

ऐसे सुंदर अनुवाद के लिए क्‍या कहते होंगे मुझे पता नहीं, लेकिन कई जगह बहुत मुलायम और कई जगह एक अजीब सी पवित्रता का बोध हुआ मुझे तो।
अगली पोस्‍ट के इंतजार में।

Geet Chaturvedi said...

बहुत सुंदर कविताएं और अनुवाद. बहुत अच्‍छा लगा. कार्देनल हमारे प्रिय कवि हैं. देर तक गूंजती हैं ये कविताएं.

aalekh said...

adwitiy kavitayen.itne bade kavi se milane ka shukriya.mangleshji ke anuwadon ka kya khna.kavita mn me ankit hoti jati hai.gadya bhi unhone sundar likha hai.aur kavitayen padhne milengi cardenal ki,yh khushkhabri hai dost!

गिरिराज किराडू said...

५५ वर्ष पुरानी ये सूक्तियां,पढ़ते हुए लगातार वे कठोर संदेह और अभियोग,सूक्तियों की संगत में ही,कौंधते रहे जो मिलान कुंडेरा कवियों पर,उनके प्रगीतात्मक रूमान और'भोलेपन'पर करते रहे हैं.कैसा संयोग है संदेह और सूक्तियां ऐन समकालीन है.

ravindra vyas said...

...लेकिन उस मुलाकात की याद इतनी अमिट है कि मैं अब भी झूमते-मुस्कराते, हर चीज़ को बच्चों जैसे कुतूहल से देखते फादर को अपने सामने देख सकता हूँ और कह सकता हूँ,' ओला, पाद्रे ( हलो, फादर ) !
हां, सच है कि कार्देनाल की कविता ने लातिन अमेरिकी समाज को रूमानी, राजनैतिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर बहुत गहरे प्रभावित किया है।
अनुरागजी, पता नहीं ये कविताएं अनुवाद हैं या एक कवि द्वारा एक कवि को अपना दिल अपनी हथेली पर रखकर दिखाने की सहज इच्छा कि देखो, ये तुम्हारे लिए, तुम्हारी कविता के लिए कितना धड़कता है।

bhashkar said...

शानदार। बहुत सुंदर कविताएं।
thx for them

Arun Sinha said...

कविताएं और अनुवाद दोनों उच्च कोटि के हैं। एक सुझाव देना चहता हूं। "मेरे प्यार" की जगह "मेरी जान" होना चाहिये।
अरुण

vidya said...

oh, kaisi kavitayen padhwa di!or padhwain v to itni der se.manglesji ko khas taur pr shukriya,badhiya lekh or anuvad ke liye.

ajay said...

itni pyari kavitaon ki sirf sangat ki ja sakti hai.aabhar.

vandana said...

yh uplabdhi hai,kavi ki,anwadak ki,sabad ki aur inhen padh lene ke bad hm pathkon ki bhi.badhai!

Ek ziddi dhun said...

do bade kaviyon kee rachnasheelta ka jaadu

Viren Dangwal said...

Ye kavitayen sachmuch adbhut hain, aur uanke anuwad bhi. Dhanyawad manglesh Ji.