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सोल्झेनित्सिन पर शंकर शरण

( सोल्झेनित्सिन सिर्फ नोबेल प्राप्त एक साहित्यकार भर नहीं थे। वे उसी रूस से थे जहाँ तोल्स्तोय और गोर्की हुए, क्रांति और कम्युनिज्म का नारा बुलंद हुआ और जिसकी अकल्पनीय परिणति यातना शिविरों के रूप में हुई। सोल्झेनित्सिन रूसी यातना शविरों के त्रासद दौर के लेखक थे। उन्होंने व्यवस्था विरोध की कीमत चुकाई। उन्हें यातनाएं दी गईं। निर्वासित हुए। प्रतिबन्ध झेला। फिर भी लिखते रहे। उनका लिखा दस्तावेजी महत्व रखता है। उनके लेखन को कम्युनिज्म विरोधी मानकर अलक्षित करना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वे हमारे लिए एक ज़रूरी लेखक हैं। इन मायनों में भी कि उनके ज़रिए हम उस अंधी गली में दाखिल होने का जोखिम उठाते हैं जिससे बचने या जी चुराने से हमारे भीतर विचारधारा और उसकी व्यावहारिक परिणति के प्रति आलोचनात्मक रिश्ते के शिथिल पड़ने की गुंजाइश बढ़ जाती है। हम शंकर शरण के आभारी हैं जिन्होंने हमारा आग्रह मान सोल्झेनित्सिन के अवदान पर यह लेख लिखा। उन्होंने सोल्झेनित्सिन की कुछ कृतियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। )


सोल्झेनित्सिन की विरासत

शंकर
शरण

सोल्झेनित्सिन
का लेखन अपने ढंग की विधा है। उस में कथा, संस्मरण, जीवनी, विवरण, विश्लेषण और इतिहास जीवंत रूप में गुँथे हैं। उस की कलात्मक शक्ति और सौंदर्य पढ़कर स्वयं अनुभव करने की चीज है। कैंसर वार्ड, पहला घेरा, गुलाग, लाल चक्र जैसे उपन्यास ग्रंथ हों अथवा “मैत्र्योना का घर”, “हम कभी गलती नहीं करते” जैसी लंबी कहानियाँ – सोल्झेनित्सिन के लेखन में प्रत्येक कहा-अनकहा शब्द, ध्वनि, रिक्त स्थान, विभिन्न विराम-चिन्ह तक अत्यंत गहरे अर्थों से संपृक्ति हैं। एक पाठ में कई उप-पाठ छिपे हैं, जिन पर संकेत भर कर के छोड़ दिया गया।

यह
उन के लेखन की विशेषता थी। प्रत्येक शब्द, प्रत्येक चिन्ह मस्तिष्क में या कागज पर स्थान और समय लेता है – इसलिए स्थान अनावश्यक न घेरना, उस का और समय का मूल्य पहचानना। अतः वही लिखो, जो नितांत आवश्यक, सार्थक और मूल्यवान हो। इस अर्थ में भी गुलाग आर्किपेलाग (1968) अपने तरह की अकेली रचना है। अपनी किशोरावस्था, युवावस्था, सैनिक सेवा, जेल और यातना शिविरों में – अर्थात कोई तीस-पैंतीस वर्षों तक – सोल्झेनित्सिन ने सोवियत संघ में जो देखा, महसूस किया था उसे, तथा असंख्य अन्य रूसियों की बातों को भी कहने के लिए उन्हें अपने तरह की विधा - ‘लिटररी इन्वेस्टीगेशन’ - बनानी पड़ी। इस में तथ्य-संग्रहण, जीवनी, संस्मरण, पत्र-लेखन, शोध, बयान, टिप्पणियाँ, समाचार-कतरन और विश्लेषण आदि अनेक तत्व हैं।

बिना गुलाग पढ़े उस की विराट, लोमहर्षक सच्चाई, किसी तानाशाही द्वारा अपने ही लोगों पर पागलपन भरा और अविश्वसनीय अत्याचार, दशकों तक करोड़ों रूसियों द्वारा झेली गई असह्य वेदना, आदि को समझा ही नहीं जा सकता। पढ़ कर लगता है कि सोल्झेनित्सिन ने सोच-समझ कर यह विधा नहीं बनाई। अपनी अनुभूत बातों को सर्वोत्कृष्ट ढंग से कहने की उत्कट इच्छा और अदम्य प्रयास से लेखन का वह अनोखा रूप आप ही आप रूपायित होता गया जिसकी बदौलत गुलाग आर्किपेलाग बीसवीं शती की संपूर्ण विश्व में सबसे महत्वपूर्ण कथा-इतर (नॉन फिक्शन) पुस्तक मानी गई।

किंतु रोचक तथ्य यह है कि जिस लेखन ने उस समय सर्वशक्तिमान प्रतीत होने वाली सोवियत सत्ता की नींव हिला दी, उस में कम्युनिस्ट अत्याचारियों के लिए कोई कटुता, भड़काऊ शब्द नहीं था। चाहे ईवान डेनिसोविच के जीवन का एक दिन के सौ पृष्ठ हों, अथवा गुलाग आर्किपेलाग के तीन हजार पृष्ठ – सोल्झेनित्सिन का लेखन प्रतिशोध या आंदोलन के आवाहनों से नितांत मुक्त है। तब क्या था जिस ने सोवियत कम्युनिज्म की चूल हिला दी? यहाँ तक कि मिखाइल शोलोखोव जैसे लेखक-नेता ने सार्वजनिक रूप से हाथ मले कि सोल्झेनित्सिन जैसा ‘जिद्दी कीड़ा’ यातना-शिविरों से जीवित क्यों बच कर आ गया! सोल्झेनित्सिन के लेखन की शक्ति इस बात में थी कि उस ने सोवियत व्यवस्था की अमानवीयता और पाखंड को मानो एक विराट् आईने में उतार दिया था। संयत, सधे पर अत्यंत कलात्मक रूप में। आइना इतना जीवंत था कि सोवियत प्रचारतंत्र सोल्झेनित्सिन को ‘विदेशी एजेंट’ जैसी घिसी-पिटी पुरानी कम्युनिस्ट गाली के सिवा कोई उत्तर न दे सका। क्योंकि सोल्झेनित्सिन ने एक शब्द भी अप्रमाणिक नहीं लिखा था, न उन का मूल्यांकन अतिरंजित था। वह कठोर, पर सजीव सत्य से भरा था जिसके समक्ष सर्वशक्तिमान कम्युनिस्ट तानाशाही थरथरा गई थी।

यह सोल्झेनित्सिन की अनमोल विरासत है। उन्होंने एक बार लेखकों से कहा भी थाः कभी ऐसा एक शब्द भी न लिखो जिसे तुम स्वयं सत्य नहीं समझते हो। चाहे किसी उद्देश्य से, दूसरों के दिए विचारों या नारों को न दुहराओ यदि तुमने स्वयं उस की सच्चाई नहीं परख ली। किंतु उन की विरासत केवल इतने तक सीमित नहीं है। लेखन और चिंतन की विराटता, कलात्मक सौष्ठव, गहन दार्शनिक अवलोकन और आध्यात्मिक भाव के कारण ही रूस में लेव टॉल्सटॉय के बाद सोल्झेनित्सिन को ही उस स्तर का लेखक-चिंतक माना गया। यह अनुभव करने के लिए गुलाग आर्किपेलाग के तीन वृहत खंडों, तथा कई खंडों में इतिहासात्मक कृति लाल चक्र को पढ़ना चाहिए।

( सोल्झेनित्सिन का गए चार अगस्त को ८९ साल की उम्र में निधन हो गया। )

2 comments:

सुंदर लेख। अच्‍छा लगा पढ़ना।


shankar sharan ji ka solz par lekh accha laga solz ke bare me kuch aur bhi janane ke chaha the isliye kuch aadurapan mehsoos hua ..kash shankar ji thoda aur vistar se likhte ...khair jo mila wo bhi kuch kam nahi tha..dhanyavad


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