ऐसे भी मुमकिन हैरॉल्ड पिंटर नाटककार और कवि के रूप में लोकप्रिय हैं। उनके कई नाटकों के पूरी दुनिया में अनगिनत मंचन हुए हैं और उनकी लिखी पटकथाओं पर बनी फिल्में भी ख़ासी कामयाब हैं। पिंटर को नोबेल समेत पश्चिम के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार मिले हैं और उनका नोबेल पुरस्कार व्याख्यान साम्राज्यवाद के प्रतिकार के मॉडल की तरह सुना, पढ़ा और समझा गया है। पिंटर हमारे लिए एक ऐसे सर्जक के तौर पर सामने आते हैं जिसके लिए राजनीति और कला अलग-अलग चीजें नहीं हैं। उन्होंने अमेरिकी ज़्यादतियों की मीमांसा की हरेक संभावना का कला और सच्चाई के हक़ में इस्तेमाल कर अप्रत्याशित संरचनाएँ संभव की हैं। पिंटर के यहां गद्य और कविता, नाटक और व्याख्यान, यात्रावृत्त और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को लिखी गई चिट्ठी में ज़्यादा फ़र्क नहीं है।
शायद मनुष्यता के काम आने वाली रचना हर बार विधागत घेरेबंदी के बाहर चली जाती है। उनकी नीले रंग के कवर वाली गद्यपद्यमय किताब ‘वैरियस वायसेज़: प्रोज, पोएट्री, पॉलिटिक्स 1948-2005’ इस धारणा का अद्वितीय प्रमाण है जिसे पढ़ते हुए रघुवीर सहाय की ऐसी ही पुस्तक ‘सीढ़ियों पर धूप में’ लगातार याद आती है। ज़ाहिर है कि ये दोनों कृतियाँ साहित्य, कला, विचार और संघर्ष के सुविधामूलक, शरारती, प्रवंचक और प्राध्यापकीय द्वैतों का अतिक्रमण करती हुई आती हैं। हैरॉल्ड पिंटर की कविताओं में साम्राज्यवादी उतपात, दमन और फरेब को लेकर गहरी नफरत है जिसे अपने विलक्षण कौशल से वे अलग-अलग शक्लों में ढाल लेते हैं। इराक और दूसरे इस्लामी देशों के साथ हुए जघन्य दुष्कृत्यों का बयान करती उनकी कविताएं किसी अतियथार्थवादी फिल्म की तरह देखी भी जा सकती हैं।
हैरॉल्ड पिंटर की कविताएं
अनुवाद : व्योमेश शुक्ल
मौत
लाश कहाँ मिली ?
लाश किसे मिली ?
क्या मरी हुई थी लाश जब मिली थी ?
लाश कैसे मिली ?
लाश किसकी थी ?
कौन पिता या बेटी या भाई
या चाचा या बहन या माँ या बेटा
था मृत और परित्यक्त शरीर का ?
क्या लाश मरी हुई थी जब फेकी गई ?
क्या लाश को फेका गया था ?
किन्होंने फेका था इसे ?
लाश नंगी थी कि सफर की पोशाक में ?
तुमने कैसे घोषित किया कि लाश मरी हुई है ?
क्या तुम्हीं ने घोषित किया कि लाश मरी हुई है ?
तुम लाश को इतना बेहतर कैसे जानते थे ?
तुम्हें कैसे पता था कि लाश मरी हुई है ?
क्या तुमने लाश को नहलाया ?
क्या तुमने उसकी दोनों आँखे बन्द की ?
क्या तुमने लाश को दफनाया ?
क्या तुमने उसे उपेक्षित छोड़ दिया ?
क्या तुमने लाश को चूमा ?
****
मौसम पूर्वानुमान
एक बादली शुरुआत से आएगा दिन
यह खासा सर्द होगा
लेकिन दिन बीतते-न-बीतते
सूरज निकल आएगा
और तीसरा पहर सूखा और गर्म होगा
शाम चमकेगा चाँद
और खासा चमकीला
तब, यह कहा जाना है कि
तेज हवा होगी
लेकिन वह आधी रात तक खत्म हो जाएगी
फिर कुछ नहीं होगा
यह अंतिम पूर्वानुमान है
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लोकतंत्र
कोई उम्मीद नहीं
बड़ी सावधानियाँ ख़त्म
वे दिख रही हर चीज की मार देंगे
अपने पिछवाड़े की निगरानी कीजिए
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बम
और कहने के लिए शब्द बाकी नहीं है
हमने जो कुछ छोड़ा है सब बम हैं
जो हमारे सरो पर फट जाते हैं
हमने जो कुछ छोड़ा है सब बम हैं
जो हमारे खून की आखिरी बूँद तक सोख लेते हैं
जो कुछ छोड़ा है सब बम हैं
जो मृतको की खोपड़ियाँ चमकाया करते हैं
****
गाड ब्लेस अमेरिका
फिर चल पड़े
उनकी सैनिक परेड के झटके
उल्लास के नृत्य में झूमते हुए
जैसे इतने बड़े संसार को फलांगते हुए
अमेरिका के ईश्वर की प्रार्थना करते हुए
गटर मृतकों से मरे हुए हैं
कुछ उनके साथ शामिल न हो सके
बाकियों ने गाने से इन्कार कर दिया
कुछ हैं जो अपनी आवाजें गंवा रहे हैं
कुछ हैं जो धुन भूल गए हैं
सारथियों के पास चाबुक है जो छलनी कर डालता है
तुम्हारा सर बालू में घसीटा जाता है
तुम्हारा सर कीचड़ में एक डबरा है
तुम्हारा सर धूल से बदरंग
तुम्हारे आँखें निकाल ली गई हैं और तुम्हारी तुम्हारी नाक
सिर्फ़ मृत शरीरों की दुर्गन्ध सूँघती है
और समूची मरी हवा जिन्दा है
अमेरिका के ईश्वर की महक में
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ओझल
रोशनी के आशिक, खोपडियां
झुलसी हुई त्वचा, रात की सफ़ेद
चमक
मनुष्यों की मृत्यु का ताप
हैमस्ट्रिंग और हृदय
एक संगीत कक्ष में तार-तार होते हैं
यहाँ रोशनी की संतानें
यह जानती हुई हैं कि उनका राज आ गया है
****
मैं जगह को जानता हूँ
मैं जगह को जानता हूँ
यह सच है कि हमारा किया सब कुछ
फासले को ठीक करता है
जो मृत्यु और मेरे और तुम्हारे दरमियान है
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पत्नी को
मर गया था और जिन्दा हूँ मैं
तुमने पकड़ा मेरा हाथ
अंधाधुंध मर गया था मैं
तुमने पकड़ लिया मेरा हाथ
तुमने मेरा मरना देखा
और मेरा जीवन देख लिया
तुम्ही मेरा जीवन थी
जब मैं मर गया था
तुम्ही मेरा जीवन हो
और इसीलिए मैं जीवित हूँ
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Friday, 01 August, 2008
बहुत अच्छे अनुवाद. निस्संदेह कविताएं भी बहुत अच्छी हैं. अनुवादक तक मेरी बधाई पहुंचे.
सबद का काम बढ़िया चल रहा है भाई. आगे और अच्छा करने हेतु शुभकामनाएं.
Friday, 01 August, 2008
कविता के बाद अब ये अनुवाद!
मैंने अपने ब्लाग पर व्योमेश की कविता लगाते हुए लिखा था कि व्योमेश और गीत ऐसे नौजवान हैं जो निश्चित रूप से मुझे अपने से बहुत आगे-बहुत दूर जाते दिखाई देते हैं। व्योमेश के अनुवाद ने भी यही बात सिद्ध की है और उस्ताद अनुवादक अशोक की पहली टिप्पणी इसकी गवाह है।
बधाई !
Friday, 01 August, 2008
kavitaye bahut achi hain....
Friday, 01 August, 2008
bahut badhiya......
Saturday, 02 August, 2008
pinter ki kavitayen america ko aaena hai.vyomesh ne bahut achha anuwad kiya hai.unka gadya bhi unki samajh ki gawahi deta hai.is visesh prastuti ke liye dhanyawad.
Saturday, 02 August, 2008
sabad ke madhyam se vyomesh se aur vyomesh ke madhyam se pinter se parichay gahraya.
Saturday, 02 August, 2008
maine pinter saab ko unke rajnitik waktawyon se hi jana.natak mila nhi padhne ko,kavitayen ab jakar padh saki.pr aisa lagta hai ki unke yahan ek hi swar pramukh hai,or wh swar hai samrajywadi damankari takton ka virodh.
Saturday, 02 August, 2008
jaroori post
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