( बारहा तो यही होता है कि जब अनुभव का खुरदरापन भाषा में उतरता है और कवि सजग न हुआ तो वह एक अनुभव अद्वितीय को लद्धड़ भाषा के हवाले करके ही अपनी कविता हुआ समझता है। सुंदर चन्द ठाकुर और उनकी कविता अपने भोगे-जाने यथार्थ के प्रति गहरी आसक्ति के बावजूद भाषा और अभिव्यक्ति में एक साफ़-सुथरापन लिए है जो प्रकारांतर से इधर की कविता में उन्हें विशिष्ट भी बनाता है। सबद के लिए उनकी दो नई कविताएं और पहले संग्रह, '' किसी रंग की छाया '' से चयनित कविता के अलावा उनका आत्मकथ्य भी इस कथन का साक्षी है। )आत्मकथ्य
मैं पेड़ को पेड़ की तरह व्यक्त करना चाहता हूँ
कोई व्यक्ति कविता क्यों लिखता है, क्यों पढ़ता है, इसका कोई ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता। जब ख़ुद से ऐसे सवाल करता हूँ तो इसकी एक वजह यह दिखती है कि कई वर्षों से कविताएं लिखते-पढ़ते अब मुझे इसकी आदत हो गई है -- ऐसी आदत जो अब शायद मरने पर ही छूटे। लेकिन इस जवाब के साथ दिक्कत यह है कि कविता के लिए आदत जैसा शब्द अनुपयुक्त लगता है, क्योंकि आदत तो हमें सिगरेट-शराब पीने से लेकर सुबह देर से उठने की भी हो सकती है। ऐसी आदतों से भी तो कई बार हम जीवन भर छुटकारा नहीं पा पाते।
फिर यह भी है कि ये आदतें नशे और शरीर को आराम देने का काम करती हैं, जबकि कविता लिखना सृजन-सुख के गहरे नशे के अलावा एक तकलीफ और एक सीमा के बाद जिम्मेदारी का सौदा ज्यादा हो जाता है -- समाज के प्रति, भाषा के प्रति, इस विपुल पृथ्वी, समूचे ब्रह्मांड के प्रति, जीवन और विचारधारा के प्रति जिम्मेदारी का सौदा। कई बार इससे मुश्किलें बढ़ती हैं। बल्कि कहूँगा कि अतीत में जितने प्रतिभाशाली, समर्पित कवि हुए हैं, उनके लिए कविता अंततः सिर्फ़ और सिर्फ़ तकलीफ का सौदा ही बनी। कविओं ने किसी सत्ता पर कब्जा नहीं किया, कविता लिखने कि योग्यता ने उन्हें किसी देश का राजा- महाराजा नहीं बनाया, बल्कि हिंदुस्तान में तो ज्यादातर गरीबी, बीमारी, निराशा और कई बार बुढ़ापे में अकेला छोड़ दिए जाने से त्रस्त होकर मरे - निराला, नागार्जुन, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, पाश से लेकर विदेशों में फर्नान्दो पेसोआ या रूसी कवि मायकोवस्की, ऐसे कई नाम लिए जा सकते हैं।
इन्हीं सब विभूतियों को थोड़ा बहुत जानने-समझने के बाद से कविता मेरे लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है -- मैं अपने सामने खुलने वाले हर दृश्य और जिन लोगों से मिलता हूँ -- अजनबी और परिचित, जिन स्थितियों से गुजरता हूँ -- पहचानी और नई, हर सपने, हर अनुभूति पर उसे ठीक-ठीक व्यक्त करने वाली कविता लिखने के फेर में रहता हूँ। इसे सरल ढंग से कहा जाए तो बहुत घिसीपिटी बात लगेगी कि मैं पेड़ को पेड़, बच्चे को बच्चे या एक दुर्घटना को दुर्घटना की तरह व्यक्त करना चाहता हूँ -- उनके भीतरी रहस्यों को उजागर करने की कोशिश करते हुए।
मैं समझता हूँ कि महानगर में जी रहे नौकरीपेशा के रूप में मुझे मिलनेवाली तमाम रियायतों के साथ मैं अगर कभी सृजन के उर्वर क्षणों में एक कभी-कभार हाथ आनेवाली मनःस्थिति पा सका और तत्क्षण अगर मुझ पर सरस्वती मेहरबान हुई तो ही शायद ऐसा कुछ लिख सकूंगा -- पत्थर-पानी से लेकर हत्या-राजनीति और न जाने किस-किस चीज़, किस-किस व्यक्ति और स्थिति के बारे में ठीक वैसा जैसा मैं अपने रोज़मर्रा की व्यस्तताओं के बीच कई बार ठिठककर उन्हें देखते हुए सोचने लगता हूँ।
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दो नई कविताएं
दो प्रेमी
यह न सोचिए कि हमें न था मालूम कि मार दिए जाएंगे
प्यार को राह पर छोटे से सफर में ही हम जान गए थे
अपने प्यार की खातिर उठाया हो किसी ने कितना ही जोखिम
दूसरे के प्रेम में सबको खोट नज़र आया है
दूसरों का प्रेम अपने शरीर से बहार घटता है
आत्मा से तो कोसों दूर
इसलिए जब हमें चारों ओर से घेर लिया गया जैसे किसी आदमखोर बाघ को
उसके सताए गुस्से से भरे लोग घेर लेते हैं आंखों में उन्मादी हिंसा भरे हुए
और हमारे सिरों के ऊपर धारदार कुल्हाड़ी की चमक कौंधी
मृत्यु हमारे लिए दहशत न बन सकी
बल्कि चारों ओर बंद रास्तों के बीच वह बनी अकेली एक खुली राह
जिस पर हमारे साथ चलने पर किसी को कोई एतराज न था
जिस पर हम आगे बढ़े जैसे बढ़ना ही चाहिए सच्चे प्रेमिओं को
उतनी ही बेतकल्लुफी से जैसे डूबते हुए सूरज को देखते हुए
वे बढ़ते हैं समुद्र की गीली रेत पर
मिट जाने को छोड़ते निशान।
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धूप में एक रविवार
धूप मेरी आत्मा में ऊष्मा बनकर उतर रही है
आकाश का नीला मुझे हरा बना रहा है
मैंने आँख मूंदकर पक्षियों की आवाजें सुनीं
गाड़ियों और जीवन के शोर के ऊपर तिरती महीन
और जाना कि किस तरह वे एक पल को भी ख़त्म न होती थीं
चारों ओर से हम पर बरसता रहता है कितना जीवन
मगर हम ही हैं कभी बुद्धिमान कभी मूर्ख बनकर
ज़िन्दगी गंवाने पर तुले रहते हैं
मैं देर तक सोखता रहा धूप
करवट बदल-बदलकर
काम के हर सोच को मुल्तवी करता
अप्रत्याशित इस समय को भरा माँ ने
अपने बचपन के किस्सों और धूप पर एक लोकगीत से
वह जब दिन का भोजन बनाने चली गई
मैंने उड़ते तोतों को देख अपना बचपन याद किया
इस शहर में कितने लोग धूप का आनंद ले पाते हैं
चालीस की रवां उम्र में तो यह नामुमकिन हो चला है
मगर आज धूप में बेफिक्र लेटा अपनी उपलब्धि पर खुश होता रहा मैं
सोचा मैंने लिखूं इस खुशी पर एक कविता
जिसमें धूप हो, आकाश का नीलापन
रविवार की फुर्सत और तोतों की टवां-टवां
मगर लिख न पाया
धूप मेरे विचारों को सोखती रही
मेरे पास थी पेसोआ की कविताओं की किताब
मैंने पढ़ी एक के बाद एक उसकी कविताएं अनेक
अंततः जब मैं छत से उतर लौटा घर के भीतर
धूप और कविताओं से भर चुका था इस कदर
कुछ भी लिखने-सोचने की चिंता से बेज़ार
मैंने माँ के हाथ का खाना खाया
और कंबल ओढ़कर सो गया।
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पुराना चावल
अनुपस्थिति
एक चिड़िया दृश्य से बाहर उड़ी है अभी-अभी
यहाँ सिर्फ़ उसकी अनुपस्थिति रह गई है
जहाँ थी वह अपने दो पंजों पर फुदकती हुई
वहीं उसकी कूक थी दृश्य को भरती हुई
उसके आकार की परछाईं थी
उसी की तरह हिलती-डुलती चोंच रगड़ती
वह चिड़िया दृश्य से उड़कर जा चुकी है बाहर
अब वही किसी दूसरे दृश्य को भर रही होगी
जहाँ उसकी परछाईं थी घास पर
उतना हिस्सा चमक रहा है धूप में
उसकी कूक हवा की जिस पार्ट पर सवार तैरती थी
अब वहां एक चुप्पी उतर रही है
दृश्य से जा चुकी वह चिड़िया
अभी बची हुई है वहां
उसके पंजों के नीचे दबी घास
खुल रही है धीरे-धीरे
वातावरण में
उसकी कूक की अनुपस्थिति मौजूद है।
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Wednesday, 06 August, 2008
सही है-
दूसरों का प्रेम तो शरीर के बाहर ही घटता है, आत्मा से तो कोसों दूर.....
इसी दूरी के बीच
धूप और कविताओं से भर जाने के बाद मां के हाथ का खाना खाकर, कंबल ओढ़कर लेट जाना,
बढि़या है।
एक बात और-
कविता, तकलीफ और जि़म्मेदारी का सौदा है....अच्छा लगा ये भी। क्योंकि ये समझते रहने पर ही संभव है बच्चे को बच्चा, पेड़ को पेड़ और दुर्घटना को दुर्घटना जैसा व्यक्त कर पाना। क्यों हम इन सबको किन्हीं दूसरे अर्थों में देखने सुनने के पीछे पड़े रहते हैं.....।
खैर कवि और अनुराग दोनों को बधाई।
Wednesday, 06 August, 2008
अच्छा चयन. आपको और अपने प्यारे ठाकुर को बहुत बधाइयां.
Thursday, 07 August, 2008
सुंदर चन्द ठाकुर को पढ़वाने का आप को बहुत शुक्रिया.
Thursday, 07 August, 2008
सुंदर अभिव्यक्ति, सुंदर शब्दों का प्रयोग,
"दूसरों का प्रेम अपने शरीर से बहार घटता है
आत्मा से तो कोसों दूर"
बढ़िया रचना।
Thursday, 07 August, 2008
ठाकुर की चन्द कविताएँ अति सुन्दर हैं।
Thursday, 07 August, 2008
अच्छी कविताएं. और आत्मकथ्य भी.
Thursday, 07 August, 2008
dhoop me ravivar is beautiful poem.....aakash ka neela mujhe hara bana raha hai...wonderful thought...thakur ji ke khoobsurat kavta k liye dhnyavad...
Thursday, 07 August, 2008
sundar jee mere priy kvi hain....unkee kavitayen main bar-bar padhta-gunta rahta hoon, pr anurag tunne unki kavita ke sath upar men jo apni kahi hai use yahin kahne ke mayne kya hain, main soch raha hoon aur smjh kuchh bhi nhi pa rha hoon!
Thursday, 07 August, 2008
umda kavitayen hain.yh stambh stariy bna hua hai.bna rahe,yhi kamna hai.
Friday, 08 August, 2008
teeno.n kavitye.n bahut achhi hain. `मैं पेड़ को पेड़, बच्चे को बच्चे या एक दुर्घटना को दुर्घटना की तरह व्यक्त करना चाहता हूँ`
Friday, 08 August, 2008
sunderji ki kavitayen bahut achhi lagi. badhai
Saturday, 09 August, 2008
बहुत सुंदर कवितायें हैं. हम तक पहुंचाने का धन्यवाद!
~अनुराग शर्मा
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