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Showing posts from August, 2008

बही - खाता : २ : पंकज मित्र

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( पंकज मित्र के यहाँ पात्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जिस कौशल से वे अपने पत्रों के इर्द-गिर्द कथा बुनते हैं उससे उन्हें कहानी कहने की तमाम सहूलियत और शिल्प आप से आप मिलते जाते हैं। अच्छी बात यह है कि अनगढ़ में बहुत गहरी कलात्मक तराश के बावजूद उनकी कथा-भाषा सहज-प्रांजल बनी रहती है। क्विजमास्टर और अन्य कहानियाँ तथा हुडुकलुल्लुनाम से उनके दो संग्रह प्रकाशित हैं। बही-खाता में इस बार पंकज का अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य पढ़िए। )

होता है शबोरोज़ तमाशा मेरे आगे

पंकज मित्र

रचना प्रक्रिया पर कुछ कहने की बात आते ही घबराहट-सी होने लगती है। '' कैसे लिखते हैं '' का एक ही उत्तर दिमाग में आता है कमल से कगज पर ''। अब कौन-सी चीज कब, कैसे, क्यों तीरे-नीमकश की तरह गड़ी रह गई खलिश पैदा करती हुई, कौन-सी रसायनिक प्रक्रिया किस न्यूरोन में कैसे काम कर गई, और क्या घट गया वहाँ पर, बताना मुश्किल है। बहुत सारी चीज़ें जमा थीं न जाने कब से और उसमें एक नया रसायन पड़ते ही कोई कीमियागरी हो गई।

लेकिन एक बात तो तय है कि बचपन से आदत पड़ गई थी तमाशे देखने की। स्कूल से लौटते समय कचहरी के पास साँप को लल…

ज़बां उर्दू : फ़िराक़ गोरखपुरी

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यह पचासवीं पोस्ट है। मैंने सोचा न था कि इतनी गति और निरंतरता से सबद निकाल पाऊंगा। यह लेखकों के सहयोग और पाठकों के समर्थन से ही संभव हो सका। लेखकों को यह समझाने में कि भले ही माध्यम भिन्न है, रचनाएं अनछपी ही भेजें, कुछ वक्त तो लगा, लेकिन उन्होंने मुझ नए छोटे का मान रख नई रचनाएं भेजी। फिर मैंने भी गाँठ नहीं बांधी थी कि पुराना कुछ छापूंगा ही नहीं। इसीलिए 'कोठार से बीज' नामक स्तंभ शुरू किया। इससे इतर पहले से छपी हुई महत्वपूर्ण रचनाओं के समायोजन की भी योजना है। एक जिम्मेदारी उर्दू को लेकर भी अनुभव करता हूँ। हम सब ने उर्दू से बहुत कुछ सीखा है और अभी और बहुत सीखना बाकी है। उस पर हमारा उत्तराधिकार पुष्ट होना चाहिए। सबद में इसीलिए ' ज़बां उर्दू ' नाम से कुछ देर से ही सही यह स्तंभ। बतौर पहली पेशकश फ़िराक़ गोरखपुरी की यह ग़ज़ल उनकी पुस्तक बज़्मे-ज़िन्दगी : रंगे-शायरी से ( साभार )। फ़िराक़ के बारे में क्या लिखूं, ग़ज़ल के बारे में यह है कि इसकी कहन पर बोलियों का प्रभाव आप साफ़ लक्षित करेंगे। खालिस हिन्दोस्तानी बोली-बानी जो फ़िराक़ियत की खास पहचान भी है।


हमसे फ़िराक़ अकसर छुप-छुप कर पहरों-पहरो…

स्मृति - शेष : अहमद फ़राज़

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( उनकी ग़ज़लों-नज़्मों से उस कम उर्दू आदमी की भी पटती है जो पहलेपहल उन तक मुहावरों जैसा मजा पाने जाता है। उनका अंदाजे-बयां सादा पर असरदार है। उसमें ज़ज़्ब दुनिया और लोग पढ़ने वालों को बहुत पास अपने लगते हैं। इसकी शायद एक वजह यह भी रही कि फ़राज़ ने बहुत पहले यह तय कर लिया था : '' अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं / फ़राज़ अब ज़रा लहज़ा बदल के देखते हैं।'' कहना न होगा कि उन्होंने अपने दौर की ग़ज़ल का लहज़ा बारंबार बदला और हर बदलाव से उनकी मकबूलियत बढ़ती ही गई। वे थे पड़ौसी पाकिस्तान के, लेकिन उनकी शायरी का वास्ता उसकी चौहद्दी को पार कर गया था। दो दिन पहले जब उनके निधन की ख़बर आई तो सबकी जुबां पर उनका कहा यह शेर फिर याद हो आया : '' अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें / जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें।'' उनकी एक किताब का नाम भी, ''ख़्वाबफ़रोश'' है जिसमें उन्होंने अपनी चुनी हुई कविताएं दी हैं। यहाँ उसी संग्रह से एक ग़ज़ल पेश है। )

इतने तो मरासिम थे कि आते जाते...

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते
शि…

रंगायन : २ : नेमिचंद्र जैन

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( लेखकों को याद करने का हमारा ढंग इस कदर रवायती या देखादेखीपन का शिकार है कि किसी सच्चे-खरे लेखक की उसके अवदान के बिना पर याद हमें अब शायद ही आती है। नेमिचंद्र जैन उन कम लेखकों में से थे जिन्होंने हिन्दी को अपनी बहुविधात्मक रचनाशीलता से न सिर्फ़ समृद्ध किया, उसे अनेक वर्षों तक पोसते भी रहे। उन जैसा जिम्मेदार जतन दुर्लभ है, इसलिए उन्हें याद किया जाना उस जिम्मेदारी को महसूसना भी है। इस बार रंगायन में सुलभजी के मार्फ़त नेमिजी। )

वे सिसृक्षा का बीज रोपते थे

हृषीकेष सुलभ

उनकी कई छवियाँ मेरे मन में अंकित हैं। उनसे हुई मुलाक़ातें स्मृति में जीवित हैं। मुझे यह स्वीकारते हुए रंचमात्र भी संकोच नहीं कि अगर मैं उनसे नहीं मिला होता, तो शायद आज नाटक नहीं लिख रहा होता। यह जानकर कि मैं कहानियाँ लिखता हूँ और रंगकर्म करता हूँ, उन्होंने नाटक लिखने और इसके लिए तैयारी करने की सलाह दी थी। मेरे जैसे न जाने कितने लोगों के भीतर उन्होंने सिसृक्षा के बीज रोपे होंगे! अपने जीवंत सम्पर्क से वह इसे अंकुरित होने के लिए पर्यावरण देते और अपनी अनुभवसिद्ध सजग आँखों से देखरेख भी करते।

मेरे नाटकों (अमली और माटीगाड़ी) का प्रदर्…

बही - खाता : संजय खाती

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( सबद में कहानी को लेकर कोई बात नहीं हो रही थी। इस बाबत कुछ स्नेही बंधुओं ने उलाहना भी दिया। हमने आश्वस्त किया था कि जल्द ही कथा की बात होगी। कथाकारों से आग्रह किया कि वे अपनी रचना-प्रक्रिया पर एकाग्र गद्य हमारे पाठकों के लिए लिखें ताकि उनकी कथा-कहानी की कुछ और सिम्तें खुलें। 'बही-खाता' नामक यह स्तंभ हम हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार संजय खाती से शुरू कर रहे हैं। इनकी कहानियां बेसब्र प्रतीक्षा के बाद सामने आती हैं और चाव से पढ़ी जाती हैं। 'पिंटी का साबुन' और 'बहार कुछ नहीं था' दो संग्रह प्रकाशित हैं। )

कहानी मन में ही चुक सकती है

संजय खाती


रचना प्रक्रिया पर जितना मैं सोचता हूं, यह पहेली उलझती जाती है। जिस मन से हम रचते हैं, क्या हम उसके स्वामी हैं ? जो हम रचते हैं, क्या वह हमारी कृति है ? जैसा कि हम जानते हैं मानव मस्तिष्क कुदरती विकास की देन है और अब इस बात के ज्यादा से ज्यादा सबूत साइंटिस्ट पेश कर रहे हैं कि दिमाग का जो कोर है, वह लगभग स्वायत्त तरीके से काम करता है। एक मन अपनी प्रतिभाओं के साथ हमें दे दिया गया है, जो माहौल से विकसित होता है और हम ज्यादा से ज्यादा…

कोठार से बीज : ३ : नागार्जुन

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( बरस भर पहले फिल्मकार संजय झासे मुलाकात हुई थी। उन्होंने उस दौरान अपनी नई फ़िल्म, 'स्ट्रिंग्स'भेंट की थी। ज़िक्र किया था कि इसमें हिन्दी के कवि और हमारे दुलारू बाबा नागार्जुन की एक कविता का भी फिल्मांकन किया है। फिर जोड़ा कि इस कविता पर हिंदुत्ववादियों ने बड़ा गुस्सा निकाला और इलाहबाद हाईकोर्ट में कविता को भारतीय जन-मन का विरोधी बताते हुए पीआईएल तक दाखिल कर दिया। संजय को इस बात का अफ़सोस था कि इस पर हिन्दी जगत ने लगभग चुप्पी साध ली और सारा मसला, जैसा कि हर बार होता है, एक महाशोर में गुम गया। सबद के इस स्तंभ के लिए जब शमशेर और त्रिलोचन के बाद बाबा की रचनाओं को खारोल-परोल रहा था तो बरबस इस कविता का ध्यान हो आया। एक आज़ाद देश के रूप में हम अभी-अभी ६१ के हुए हैं। बाबा ने यह कविता करीब ४० बरस पहले लिखी थी। आप ही पढ़कर बताइए कितना कुफ़्र और कितनी तल्ख़ सच्‍चाइयां दर्ज हैं इसमें। बाबा की तस्वीर औए यह कविता, दोनों राजकमल से प्रकाशित उनकी प्रतिनिधि कविताओं की पुस्तक से साभार ली गई है। )

मंत्र कविता

ओं शब्द ही ब्रह्म है
ओं शब्द और शब्द और शब्द और शब्द
ओं प्रणव, ओं नाद, ओं मुद्राएँ
ओं वक्तव्य, …

मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना

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एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं

पिछली पोस्ट से आगेमंगलेश डबरालके अनुवाद में
मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थनाप्रभु
स्वीकार करो इस लड़की को जो सारी दुनिया में
मर्लिन मुनरो कही जाती थी हालांकि उसका नाम यह नहीं था
( लेकिन प्रभु, तुम जानते हो उसका असली नाम,
उस अनाथ का जो नौ साल की उम्र में बलात्कार की शिकार हुई,
दूकान में नौकरी करने वाली वह लड़की जिसने सोलह की होने पर
खुदकुशी की कोशिश की थी )और जो अब जा रही है तुम्हारे हुज़ूर में, बगैर मेक-अप के,
बगैर अपने प्रेस एजेंट के
बगैर अपनी तस्वीरों के, बगैर कोई ऑटोग्राफ दिए हुए
एकाकी, जैसे कोई अंतरिक्ष यात्री
अनंत के अंधकार में जाता है जब वह बच्ची थी उसने सपने में देखा
( 'टाइम' पत्रिका के मुताबिक़ )
कि वह एक चर्च में नग्न खड़ी है
ज़मीन पर लोटती अपार भीड़ के सामने
और लोगों के सर बचाने के लिए
उसे पंजों के बल चलना पड़ रहा है प्रभु, तुम हमारे सपनों को
मनो-चिकित्सकों से ज़्यादा अच्छी तरह जानते हो
चर्च, घर या गुफा : सब कोख की सुरक्षा के प्रतीक हैं
बल्कि इससे भी अधिक कुछ हैं ...
यह तो साफ़ है कि ये प्रशंसकों के सर हैं
( परदे पर पड़ती रोशनी की शहतीर के नीचे अंधेरे में मार-तमाम स…

सबद विशेष : ३ : एर्नेस्तो कार्देनाल की कविताएं

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( यह पोस्ट हर लिहाज से कवि मंगलेश डबराल की है। सबद का इतना सौभाग्य ज़रूर है कि उन्होंने कार्देनाल सरीखे कवि की कविताओं के अपने अनुवादों को प्रकाशन के लिए इसे उपयुक्त माना। इसके लिए पुराने अनुवादों को उन्होंने न सिर्फ़ पुनरीक्षित किया, हमारे बहुत कहने पर कार्देनाल की कविता पर एकाग्र गद्य भी लिखा। बताते चलें की यह अधूरी पोस्ट है। इसे पूर्णता कार्देनाल की कुछ लंबी और महत्वपूर्ण कविताओं के बिना न मिल सकेगी। अगली दफा आप उनकी 'मर्लिन मुनरो के लिए प्रार्थना' सहित कुछ और कविताएं भी पढ़ सकेंगे। )

ओला, पाद्रे !मंगलेश डबरालरूबेन दारियो, पाब्लो नेरुदा और सेसर वाय्यखो के बाद १९२५ में निकारागुआ में जन्मे एर्नेस्तो कार्देनाललातिन अमेरिकी धरती के चौथे बड़े कवि माने जाते हैं। मार्क्सवाद और रोमन कैथलिकवाद दोनों से उनकी प्रतिबद्धता दुनिया भर में चर्चित रही है। शुरू में कार्देनाल की कविता पर दारियो और नेरुदा का गहरा असर था, लेकिन अमेरिका के आधुनिक आध्यात्मिक कवि थॉमस मर्टन के संपर्क में आने के बाद वे एज़रा पाउंड की काव्य-कला से बहुत प्रभावित हुए। अमेरिकी साम्राज्यवाद और लातिन अमेरिकी तानाशाहों के प…

सोल्झेनित्सिन पर शंकर शरण

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( सोल्झेनित्सिन सिर्फ नोबेल प्राप्त एक साहित्यकार भर नहीं थे। वे उसी रूस से थे जहाँ तोल्स्तोय और गोर्की हुए, क्रांति और कम्युनिज्म का नारा बुलंद हुआ और जिसकी अकल्पनीय परिणति यातना शिविरों के रूप में हुई। सोल्झेनित्सिन रूसी यातना शविरों के त्रासद दौर के लेखक थे। उन्होंने व्यवस्था विरोध की कीमत चुकाई। उन्हें यातनाएं दी गईं। निर्वासित हुए। प्रतिबन्ध झेला। फिर भी लिखते रहे। उनका लिखा दस्तावेजी महत्व रखता है। उनके लेखन को कम्युनिज्म विरोधी मानकर अलक्षित करना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वे हमारे लिए एक ज़रूरी लेखक हैं। इन मायनों में भी कि उनके ज़रिए हम उस अंधी गली में दाखिल होने का जोखिम उठाते हैं जिससे बचने या जी चुराने से हमारे भीतर विचारधारा और उसकी व्यावहारिक परिणति के प्रति आलोचनात्मक रिश्ते के शिथिल पड़ने की गुंजाइश बढ़ जाती है। हम शंकर शरण के आभारी हैं जिन्होंने हमारा आग्रह मान सोल्झेनित्सिन के अवदान पर यह लेख लिखा। उन्होंने सोल्झेनित्सिन की कुछ कृतियों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है। )


सोल्झेनित्सिन की विरासत

शंकर
शरण

सोल्झेनित्सिन का लेखन अपने ढंग की विधा है। उस में कथा, संस्मरण, जीवनी, विवरण,…

रंगायन : कारंथ पर हृषीकेश सुलभ

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( कारंथ वट वृक्ष थे. उनका विरुद सैकडों पन्नों में गाया जा सकता है. गाया गया भी है. सुलभजी ने उनके रंग-व्यक्तित्व के महत्व का बखान यहाँ थोड़े में करने की कोशिश की है. इस क्रम में उनके बारे में बहुत कुछ अनकहा-अलक्षित भी सामने आया है. बहरहाल, हमें खुशी है कि कुछ देर से ही सही उन्होंने सबद के लिए स्तंभ लिखना शुरू कर दिया. वे भारतीय रंगमंच के मूर्धन्यों पर हर बार अपना लेखन एकाग्र करेंगे. अगले रंग-व्यक्तित्व नेमिचंद्र जैन होंगे. )


बोयण्णा से बाबा तक का सफर


हृषीकेश सुलभ

भारतीय रंगमंच के दुर्लभ व्यक्तित्व ब. व. कारंथ का पूरा नाम बहुत कम लोगों को मालूम है। ब. व. या बी. वी. कारंथ को बाद के दिनों में लोग ‘बाबा’ कहकर बुलाने लगे थे। बाबूकोड़ी व्यंकटरामन कारंथ को बचपन में घर पर सब ‘बोयण्णा’ कहते थे। उन्हें अपनी सही जन्म तिथि नहीं मालूम थी। 19-09-1929 के बारे में उनका कहना था कि अंक 9 की पुनरावृत्ति के कारण इसे याद रखने में सुविधा होती इसलिए इसे हाईस्कूल के फ़ार्म में भर दिया। बाद में उनकी माँ ने उन्हें बताया कि उनका जन्म सन् 1928 में हुआ था।

कारंथ अपने रंगकर्म के लिए जितना जाने जाते हैं, उतना ही अपनी …

कवि की संगत कविता के साथ : 4 : सुंदर चन्द ठाकुर

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( बारहा तो यही होता है कि जब अनुभव का खुरदरापन भाषा में उतरता है और कवि सजग न हुआ तो वह एक अनुभव अद्वितीय को लद्धड़ भाषा के हवाले करके ही अपनी कविता हुआ समझता है। सुंदर चन्द ठाकुर और उनकी कविता अपने भोगे-जाने यथार्थ के प्रति गहरी आसक्ति के बावजूद भाषा और अभिव्यक्ति में एक साफ़-सुथरापन लिए है जो प्रकारांतर से इधर की कविता में उन्हें विशिष्ट भी बनाता है। सबद के लिए उनकी दो नई कविताएं और पहले संग्रह, '' किसी रंग की छाया ''से चयनित कविता के अलावा उनका आत्मकथ्य भी इस कथन का साक्षी है।  )

आत्मकथ्य

मैं पेड़ को पेड़ की तरह व्यक्त करना चाहता हूँ

कोई व्यक्ति कविता क्यों लिखता है, क्यों पढ़ता है, इसका कोई ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता। जब ख़ुद से ऐसे सवाल करता हूँ तो इसकी एक वजह यह दिखती है कि कई वर्षों से कविताएं लिखते-पढ़ते अब मुझे इसकी आदत हो गई है -- ऐसी आदत जो अब शायद मरने पर ही छूटे। लेकिन इस जवाब के साथ दिक्कत यह है कि कविता के लिए आदत जैसा शब्द अनुपयुक्त लगता है, क्योंकि आदत तो हमें सिगरेट-शराब पीने से लेकर सुबह देर से उठने की भी हो सकती है। ऐसी आदतों से भी तो कई बार हम ज…

सबद विशेष : २ : हैरॉल्ड पिंटर की कविताएं

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( इन पन्नों पर हैरॉल्ड पिंटरकी कविताएं आ सकीं इसके लिए युवा कवि-लेखक व्योमेश शुक्लके हम अत्यन्त आभारी हैं। उन्होंने हमारे सतत आग्रह का मान रख न सिर्फ़ एकमुश्त आठ कविताओं का अनुवाद किया, बल्कि इन पर एकाग्र अपना गद्य भी मुहैया कराया। पिंटर को ज़्यादातर उनके नाटकों के लिए जाना-सराहा जाता है। उनकी कविताओं में लक्षित साम्राज्यवाद विरोधी प्रबल स्वर स्वयं कविता और कव्याभिरुचि को एक चुनौती है। इस स्वर को पुनः-पुनः रेखांकित करने की ज़रूरत है। हमने वही किया है। प्रसंगवस यह भी जोड़ दें कि व्योमेश ने इससे पहले पहल के लिए चर्चित अमरीकी कवि-पत्रकार इलियट वाइनबर्गर की पुस्तक , '' व्हाट आई हर्ड अबाउट इराक '' का भी प्रशंसित अनुवाद किया है। )

ऐसे भी मुमकिन
हैरॉल्ड पिंटर नाटककार और कवि के रूप में लोकप्रिय हैं। उनके कई नाटकों के पूरी दुनिया में अनगिनत मंचन हुए हैं और उनकी लिखी पटकथाओं पर बनी फिल्में भी ख़ासी कामयाब हैं। पिंटर को नोबेल समेत पश्चिम के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार मिले हैं और उनका नोबेल पुरस्कार व्याख्यान साम्राज्यवाद के प्रतिकार के मॉडल की तरह सुना, पढ़ा और समझा गया है। पि…