सबद
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स्वगत : व्योमेश शुक्ल


( व्योमेश शुक्ल ने यह वक्तव्य १३ जुलाई को पांचवें अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार ग्रहण करने के अवसर पर दिया है। यह एक अवसरानुकूल दिया जाने वाला वक्तव्य न होकर कई मायनों में इधर की युवा रचनाशीलता और उस पर पड़नेवाले अनेकानेक परिवेशगत दबावों और चुनौतियों का सैद्धांतिक विवेचन है। उम्मीद है यह उस रचनाशीलता का संबल बनेगा जिसके हम हिमायती और रहबर हैं। व्योमेश ने सबद को पहलेपहल यह वक्तव्य छापने दिया, उनका आभार। वक्तव्य आंशिक संपादनों से गुजरा है। एक बार पुनः हम व्योमेश को उनकी इस आरंभिक पर महत्वपूर्ण उपलब्धि पर बधाई देते हैं।)

इस दौर में स्मृति और अनुभव की सर्वाधिक क्षति हुई है

व्योमेश शुक्ल

मैं जनता हूँ कि यह मेरी ज़िन्दगी का एक बेहद ज़रूरी मौका है, जो थोड़े से आगामी समय में संपन्न होकर मेरी स्मृति में बार-बार और आपकी स्मृति में कभी-कभी इसी शक्ल में, कभी शक्ल बदलकर लौटा करेगा। लेकिन इस अवसर पर कुछ पुराने सवाल, कुछ आदिम संशय फिर से मेरे सामने हैं ; मसलन मैं कौन हूँ -- यह सवाल सुदूर बचपन से मेरा पीछा कर रहा है ; और भी ऐसे कई सवाल हैं -- मसलन कविता क्या होती है, कोई कविता क्यों लिखता है, हम जिस समय और समाज में रह रहे हैं उसमें कविता लिखने का क्या मतलब है, या हमारी कवताएँ कौन पढ़ता है। इन सवालों के जवाब बहुत पहले से अब तक ढूंढें और दिए जाते रहे हैं और अब के बाद भी दिए जाते रहेंगे, इसलिए कोई ज़रूरी नहीं की ये सवाल अभी ही उठाए जाएं और इनके जवाब तुंरत ही मांगे जाएं। लेकिन इतना तय है कि वृहत्तर समाज एक कविताविहीन समाज है और अपनी जीवन-व्यावहारिकताओं में वह कविता के तर्क, कविता की संभावना और कविता के अस्तित्व के दुश्मन की तरह पेश आता है। वह पाठ्यक्रमों के अलावा कहीं भी, कभी भी कविता नहीं पढ़ता। आधुनिकतम कविताओं से वह निहायत अपरिचित है। जबकि कविता की दुनिया के नागरिक, कविता से प्यार करने वाले, उसकी ताक़त से जीवन और कर्म के स्तर पर प्रतिकृत होने वाले लोग बेहद कम हैं, लेकिन अप्रत्याशित हैं।

ऐसे में, यह जानना और भी रोचक है कि वे कौन से लोग हैं जो कविताएं लिखने, पढने और उन पर बात करने के गोपनीय अभियान में शामिल हैं। मशहूर स्पेनी लेखक ख्वान रामोन खिमेनेस ने अपनी एक किताब ऐसे लोगों को समर्पित की है। उनकी किताब में समर्पण के शब्द यों हैं --'' टू दी इमेंस माइनोरिटी'' -- अर्थात, '' अपार अल्पसंख्यकों के लिए''। यानी कविता पढ़ने वाले अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन अपार हैं। उन्हें गिनती में सिमित नहीं किया जा सकता। वे कविता से रिश्ता न रखने वाले बहुसंख्यकों से कम ज़रूर हैं, लेकिन परिमेय नहीं हैं। कविता से ख़ुद को और ख़ुद से कविता को बदलने वाले वे लोग लगातार हैं लेकिन भूमिगत और चुप्पा हैं। वे इस तरह छिपे हुए बिखरे हुए गुमशुदा और सतह के निचे हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती। दरअसल, इस आत्मलिप्त और सतही संसार में कविता की सक्रियताएं एक खास तरह की अंडरग्राउंड एक्टिविटी हैं।

मेरी बात का यह मतलब नहीं लगाया जाना चाहिए कि हम वृहत्तर समाज में कविता के लिए कोई स्पेस या रियायत मांग रहे हैं। हम ऐसी स्थिति से क्षुब्ध ज़रूर हैं, लेकिन मुख्यधारा का हीनतर अनुषंग बन जाने के लिए कभी कोई कोहराम नहीं मचा रहे हैं। हम उस समाज के अधुनातन स्पंदनों की, उसके उत्थान और पतन की, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य की मीमांसा करने वाला गद्य लिखना चाहते हैं, जिसका हम ख़ुद एक बहुत छोटा हिस्सा हैं ; और यह मीमांसा भी कविता का सम्पूर्ण कार्यभार नहीं है, एक तात्कालिक दायित्व है। एक विषम, दारुण और बेतरह विस्तृत यथार्थ हमारे स्नायुतंत्र पर मौजूद है। यह यथार्थ अब इतना विशाल है कि अपने आप में सम्पूर्ण सृष्टि, एक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की तरह पेश आता है। नव्यतम प्रसंग, लोग, तथ्य और दृश्य इस यथार्थ की गति और स्थिति में इजाफा करते जाते हैं। इस विराट वस्तुसत्य को धारण करने योग्य मनःस्थिति का निर्माण करना हमारा सबसे ज़रूरी काम है। मुक्तिबोध ने कहा था कि सच्चा लेखक हमेशा स्वयं के साक्षात्कार-सामर्थ्य की तुलना वस्तुसत्य की विशालता से करता रहेगा, विषय-वस्तु की गहराई और व्यापकता के बरक्स ख़ुद को हीन अनुभव करता रहेगा और मानता रहेगा कि जो कुछ भी उसने वस्तुतः संपन्न किया है, उससे अच्छा किया जा सकता था।

पूँजी और दूसरी बाज़ारू चीज़ों की चंचल
ताएं और व्याप्ति हमारे समय का अनिवार्य और बीहड़ चरित्र-लक्षण हैं। पैसे और प्रसिद्धि का तंत्र कलाओं को हजम कर लेने पर आमादा है। तमाम कलारूप ख़ुद को तबाह करते हुए मुनाफाखोरों के काम आ रहे हैं। कला के नैतिक मूल्य को उसकी बाज़ारू कीमत अपदस्त कर रही है। साहित्य और विचार को सर्वाधिक खतरा इस विचारहीन, आत्महीन और दिशाहीन आर्थिक प्रक्रिया से है। यह प्रक्रिया आदमी नाम की चीज़ को नहीं पहचानती और एक अंधी-बहरी यांत्रिकता के साथ धंधेबाज कृत्य करती रहती है। अच्छाई और बुराई में किसी एक को चुनना उसे नहीं आता और अपने लाभ के अलावा उसके पास कोई पैमाना नहीं है। इसलिए कलाएं और विचार उसके लिए शत्रु से कम नहीं हैं।

ऐसे
वर्तमान में आपादमस्तक लिप्त हमारे इस दौर में स्मृति और अनुभव की सर्वाधिक बर्बादी हुई है। कविता को इस त्रासद दृश्य का प्रतिकार बनना होगा, जो वह पहले से भी है। फिलहाल उसे और समावेशी, और उदात्त, और युयुत्सु, और संश्लिष्ट और कठिन बनते जाना है। बीते दो दशकों में बहुत सी सामाजिक अच्छाइयों को कुचलते हुए मनोरंजन दृश्य के केन्द्र में आ गया है, उसके दवाब की वजह से विचारों, मूल्यों, सचाइयों और कलाओं और सरल होने की अतर्क्य मांग बढ़ती गई है, अर्थात अब हमारा नागरिक ज़िन्दगी की तरह कविता के भी मजे लूटना चाहता है। मज़ा लूटने के इसी वर्तमान माहौल के भीतर सर्जनात्मक्ताओं को रोज़मर्रा के सामानों की तरह हलके-फुल्के ढंग से लेने और उत्कृष्टता के लिए होने वाले कलात्मक समर को क्षीण कर देने वाली प्रवृतियों को पोषण मिलता है। इसी के भीतर से निकलने वाली आवाज़ें बीती लड़ाइयों को भुला देने और योद्धाओं की खिल्ली उडाने की मूर्ख और आत्मघाती कोशिशें करती हैं।

लेकिन वक्त गवाह है कि ऐसी चीजें दूर तक नहीं जा पातीं, और ज़ाहिर हो जाती हैं। वैसे अनश्वर तो कुछ भी नहीं है। सत्य और सौन्दर्य भी एक समय के बाद नष्ट हो जाते हैं, लेकिन अपूर्व जगमगाहट के इस दौर में मृत्युबोध की भी हवा निकल गई है। मध्यवर्ग का अनियंत्रित उल्लास देख कर लगता है कि उसे किसी पारलौकिक सत्ता से अजर और अमर होने की गारंटी मिल गई है। कविता को मध्यवर्गीयता के इस झूठे उत्सव का वस्तुपरक विरोध करना है और जीवन के विभिन्न स्तरों पर मध्यवर्गीय संकीर्णताओं और रूढ़ियों की पहचान करनी है। किसी दुःस्वप्न में भी समकालीन हिन्दी कविता को मध्यवर्गीय सौंदर्याभिरूचि और मध्यवर्गीय राजनीतिक सरोकारों का कैदी नहीं बनने दिया जा सकता।

हमने बीते २० वर्षों में अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ढाँचे को प्रतिक्रियावाद की चपेट में आते देखा है। चेतनाएं इस बीच लगातार प्रतिक्रियाओं से भरती गई हैं और बदला लेना एक मूल्य की तरह स्थापित होता जा रहा है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस से शुरू होकर बदले का यह सिलसिला गुजरात नरमेध से होता हुआ अब तक जारी है।। कविता प्रतिक्रिया की इस बर्बर पद्धति को बदल देना चाहती है और इस बदलाव की खातिर उसने ख़ुद को बेहद अप्रत्याशित और सर्वोत्तम रूपों में अभिव्यक्त किया है। समकालीन कविता ने आजाद भारत के प्रमुख मुद्दों और प्रसंगों से जुड़ी हुई उलझनों को अपने आत्मसंघर्ष की शक्ति से हल करने की कोशिश की है और उसका पक्ष निर्भ्रांत ढंग से जनपक्षधरता का अप्रतिम कलात्मक उदाहरण है।

कोई भी काव्येतर सत्ता कभी भी कविता के लिखे जाने के तरीकों और कविता से पैदा होने वाले असर का नियमन नहीं कर सकती। कोई भी किसी भी शर्त पर अपनी रचनात्मकता के बहार पड़ने वाली संस्था या व्यक्ति के प्रत्यक्ष-परोक्ष दवाब में कविता नहीं लिख सकता, कविता के नाम पर कुछ और भले ही लिख ले। रघुवीर सहाय ने अर्सा पहले कहा था कि सच्ची कविता लिखने वाले वहीं से निकलेंगे जहाँ कविता का मूल्यांकन करने वाला तंत्र नहीं होगा। ताक़त की सर्वव्याप्त श्रेणियों और संरचनाओं की साहित्य संसार में खोज, इन संरचनाओं की निर्भीक आलोचना और उनसे हमेशा अलग और दूर रहने के दायित्व का निर्वाह हमारी अपरिहार्य ज़रूरत है।

आज और हमारे भविष्य की कविता को सामाजिक आस्वाद में एक बड़ा विचलन पैदा करना होगा। उसे काव्यरचना की पारंपरिक सहूलियतों और शैलियों को विखंडित करना होगा। उन्हें नया बनाना होगा। यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि हम एक स्वीकृत और सुपाच्य किस्म की कविता से ग्रस्त हो रहे हैं और अद्वितीयताओं को स्वीकार या अस्वीकार करने की प्रणाली का हमारे बीच प्रायः अभाव है। बीते दिनों में जब भी साहित्यिक यथास्थिति का उल्लंघन करनेवाली कोई बड़ी रचना सामने आई, हिन्दी साहित्य संसार का बड़ा हिस्सा किसी अघोषित नियम का पालन करते हुए चुप हो गया या नाराज़ होकर झूठे आरोप लगाने लगा। इस बिन्दु पर ये क्यों न मान लिया जाए कि ऐसे सर्जनात्मक हस्तक्षेपों की सैद्धांतिकी तैयार करने की इंटेलेक्चुअल सामर्थ्य हमारे भीतर नहीं है। लेकिन ऐसी स्थिति से भयभीत होकर रचनाशीलता सरलीकरणों की शरण में नहीं चली जाएगी, बल्कि वह अपनी जिदों पर और आग्रह के साथ अडी रहेगी।

7 comments:

बहुत स्पष्ट और खरा आलेख है। मैं इस से पूरी तरह सहमत हूँ। लेकिन ब्लाग का फोन्ट साइज बड़ा करें। दूसरे गंभीर आलेख था और लम्बा भी। अन्तरजाल के पाठक इतना लंम्बा नहीं पढ़ते इसे दो भागों मे किया जा सकता था और संक्षिप्त भी।
मैं पिछले आलेख के प्रस्ताव से सहमत हूँ और शरारत पूर्ण सोच और वयस्क मूर्खता की उपज की कड़े शब्दों में निन्दा करता हूँ।


भाई व्योमेश ने बात पते की कह डाली. मैं इसमें इतना और जोड़ना चाहूंगा कि हमें साहित्यिक गुटबाजी से संचालित हुए बिना सार्थक काम करते रहना होगा. अगर आपका लक्ष्य पुरस्कार और नाम कमाना नहीं है तो निभा ले जाना बहुत मुश्किल नहीं है .


"अनश्वर तो कुछ भी नहीं है। सत्य और सौन्दर्य भी एक समय के बाद नष्ट हो जाते हैं, लेकिन अपूर्व जगमगाहट के इस दौर में मृत्युबोध की भी हवा निकल गई है। मध्यवर्ग का अनियंत्रित उल्लास देख कर लगता है कि उसे किसी पारलौकिक सत्ता से अजर और अमर होने की गारंटी मिल गई है। कविता को मध्यवर्गीयता के इस झूठे उत्सव का वस्तुपरक विरोध करना है।"

Vyomesh ne bare kam ki baat kahi hai. Aise drishtivan aur sahasi kavi ko sadhuvaad... Susheel Kumar


bahut suchintit,santulit aur nai rachnashilta ki saidhantiki gadhne wala goodh waktawya hai.main samaroh me to shirkat nhi kr paye,pr sabad pr padhkr kritarth hua.kabilegaur hai : हम एक स्वीकृत और सुपाच्य किस्म की कविता से ग्रस्त हो रहे हैं और अद्वितीयताओं को स्वीकार या अस्वीकार करने की प्रणाली का हमारे बीच प्रायः अभाव है।


भूमिगत और चुप्‍पे पाठकों का धन्‍यवाद भी लें इस लेख के लिए।
शमशेर ने कहा था-

कवि के लिए उसकी कविता एक बार लिखी जाकर, हमेशा प्रकाशित है।


बधाई हो व्‍योमेश को. पुरस्‍कार के लिए भी, और बेहतरीन आत्‍मकथ्‍य के लिए भी.


vyomeshji ki kuch kavitayen aapne hi padhwai thi sabad pr.ab is saargarbhit waktawy ko mujhe kavi aur kavita bahut paas apne lag rhe hain.vyomeshji ko puraskaar pr badhai.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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