सबद
vatsanurag.blogspot.com

बधाई : निशांत

( कविता के लिए वर्ष २००८ का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार युवा कवि निशांत को दिया जाएगा। किसी एक कविता को आधार बना कर दिए जाने वाले इस पुरस्कार के लिए समकालीन भारतीय साहित्य के जुलाई-अगस्त २००७ के अंक में प्रकाशित उनकी कविता, ''अट्ठाइस साल की उम्र में '' को चुना गया है। इस वर्ष के निर्णायक नामवर सिंह थे। निशांत और उनकी कविता के बारे में उनका यह कथन उल्लेखनीय है कि बड़बोलेपन से बचते हुए यह कवि अपने आस-पास के जीवन से सीधे साक्षात्कार करता है। आगे यह कि काव्य-भाषा पर भी कवि का अच्छा अधिकार है। निशांत की कविताएं पत्र -पत्रिकाओं में एक लंबे अरसे से आ रही हैं। पहले वे अपने घरु नाम मिठाईलाल से कविताएं लिखते थे। बाद में इसे कवि-आलोचक अशोक वाजपेई के सुझाव पर बदल दिया और निशांत नाम से कविता करने लगे। वैसे उनका पढू नाम विजय कुमार साव है। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, '' जवान होते हुए लड़के का कुबूलनामा '' भारतीय ज्ञानपीठ की युवा पुरस्कार योजना के तहत शीघ्र प्रकाश्य है। हमें खुशी है कि उन्होंने हमारे आग्रह पर पुरस्कृत कविता के साथ-साथ दो नई कविताएं भी सबद पर प्रकाशन के लिए भेजी। यह अवसर उनकी कविताओं की ओर ध्यानाकर्षण का है। पर फिलहाल तो हम यहाँ उसके मूल्यांकन का लोभ संवरण कर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देकर ही संतोष करते हैं। )

पुरस्कृत कविता

अट्ठाइस साल की उम्र में

सचमुच यही उसके प्रेम करने की सही उम्र है
जहाँ उसके सपनों में लहलहा रहा हो
एक पवित्र सुर्ख लाल गुलाब

इसी उम्र में दिल से निकलती है सच्ची प्रार्थना
जिसे कबूल करने से हिचकिचाता है समाज
इसी उम्र में खुलते हैं डैने जिससे तौलना पड़ता है सारा आकाश
इसी उम्र में पैर में लग जाते हैं चक्के
जिससे नापनी पड़ती है सारी पृथ्वी

यह बहुत ही महत्वपूर्ण उम्र होती है
जहाँ सबसे ज़रूरी होता है एक अनुभवी प्रेमी का अनुभव
पर अफ़सोस अपने अनुभव को सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र बताते हुए
हम ठगे जाते हैं
कभी-कभी हम जीत जाते हैं और जश्न मनाते हुए
रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं अपने अन्दर ही

यहाँ तन हावी नहीं होता मन पर
मन बहुत ही हल्का पारदर्शी और पवित्र होता है इस उम्र में
तन की बात ही नहीं करता मन

ऐसी स्थितियों से गुजर चुका हूँ मैं
जहाँ सिर्फ़ दो आखें और दो बातें ही महत्वपूर्ण होती हैं
इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है
सपने में लहलहा रहे सुर्ख पवित्र गुलाब का लहलहाते रहना
पर क्या करूँ
जब सुबह उठता हूँ रात में भंभोड़ दिए गए
एक जंगली जानवर के पंजों तले अपने क्षत-विक्षत शव के लिए
तब लगता है बिना तुम्हें पाए तुम्हें प्रेम करना एक नाटक करना है

कई बार सोचा तुम्हें कहूँ
प्रेम की अन्तिम परिणति दो रानों के बीच होती है
हर बार बीच में आ गई
तुम्हारी दो आंखों में दिपदिपाती हुई पवित्रता
लहलहाता हुआ सुर्ख गुलाब
और ऐसा क्यूँ लगता कि गंगा से नहाकर माँ के साथ लौट रहा हूँ घर
शायद तुम्हारे अंदर मेरी माँ भी है

एक बार इसी पवित्रता से डरकर
एक और पवित्रता की खाल ओढे तुम्हें निमंत्रित कर बैठा था
-- '' चलो शादी कर लें। ''
-- " नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद ''
तुम्हारे सामने अंदर का जानवर न जाने क्यों शांत ही रहता है
उस दिन उस समय भी शांत रहा
जबकि रात में बिस्तर पर एक बार और वह हिंसक हो उठा था
मैं मजबूर- लाचार हो 'प्यार' 'पवित्रता' जैसे शब्दों से क्षमा-याचना मांगता रहा
अपने को भंभोड़वाते हुए

तुम क्या जानो
एक अट्ठाइस साल की उम्र के लड़के की ज़रूरत
जो अपनी उम्र चौबीस साल बतला रहा हो
आख़िर तुम्हारी उम्र कम है
और इस उम्र से मैं भी गुजर चुका हूँ

****
दो नई कविताएं

इकतीस की उम्र में

आकाश इतनी बड़ी शुभकामनाएं
और पृथ्वी इतना बड़ा प्यार

मुझे मालूम है दोस्त !
इकतीस की उम्र में
नौकरी पाने का
हताशा और ऊब से ऊपर उठने का आनंद

' इतना पढ़ के क्या किए ! '
जैसे जुमलों से आहात हुए शरीर का घाव
कितनी आसानी से भर जाता है
एक नौकरी के मलहम से

माँ खुश होती है
चौड़ा हो जाता है पिता का सीना
भाई की आखों में आ जाती है चमक
प्रेमिका की आखों में बैठी कोमलता
उद्दाम सांसों में तब्दील हो जाती है
बहन गर्व से बतलाती है सहेलियों के बीच
ये हैं मेरे बड़े भाई साहब
जो ' फलां ' जगह ' फलां ' होकर गए हैं...

एक नौकरी
और कितना-कितना आराम
घर तो घर
मोहल्ले से होकर भगवान तक की आंखों में
आ जाती है दीप्ति
आत्मा में शान्ति
और क्या ... क्या ...

पढ़ाई पर छिड़ी सारी बहस
चली जाती है चूल्हे-भांड में
और कोई कारोबार करने की
धीमी आंच में पकती हुई विचारधारा
तब्दील हो जाती है एक शानदार मुहावरे में
' भगवान के घर देर है अंधेर नहीं '

याद आती है तुम्हारी बहस
नौकरी बेरोजगारी प्रेम सिक्षा आरक्षण जनसंख्या
फ़िल्म पत्रिकाएं कविता कहानी उपन्यास पुरस्कार
और न जाने कितने मुद्दों पर
आंखें लाल किए और मुट्ठी ताने
दुनिया को बदल डालने के स्वप्न के साथ
' जला दोमिटा दो ' की भाव-भंगिमा के साथ
' एक धक्का और देते ' के नारों के साथ
शायद हम एम ए में थे उन दिनों
देश के सबसे उत्तर-आधुनिक विश्वविद्यालय में
' लाल सलाम-लाल सलाम ' और ' हल्ला बोल-हल्ला हल्ला बोल ' कहते हुए

उम्र कम थी
और नहीं जानते थे
इकतीस की उम्र में नौकरी पाने का सुख

आकाश इतनी बड़ी शुभकामनाएं
और पृथ्वी इतना बड़ा प्यार

आज पहली बार दोस्त !
आज पहली बार ...

****
पौने दो घंटे

आधा घंटा
चुरा लिया है मैंने सुबह के समय में
समाचार पात्र पढने के लिए

एक घंटा चुरा लिया है मैंने
दोपहर की कार्यावधि के बीच से
कहानियो को पढने के लिए

पन्द्रह मिनट और चुरा लिए हैं मैंने
अपनी नींद से
कविताओं के लिए

इस तरह
पंखे की तरह दौड़ती हुई ज़िन्दगी में से
प्रतिदिन चुरा लेता हूँ मैं
पौने दो घंटे किताबों के लिए

इन पौने दो घंटे ही
रहता हूँ मैं मनुष्य
बाकी समय पंखा, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कंप्यूटर
और ई-मेल में तब्दील रहता हूँ
एक गंतव्य से दूसरे
और दूसरे से फिर-फिर पहले की तरफ
दौड़ लगाते हुए

****
11 comments:

निशांत जी को बधाई और शुभकामनाएं.


नामवर जी ने बिलकुल सच कहा है। कवि ने अपनी कविता में खुद को नहीं आने दिया है। सच लिखा है। और कविता वही होती है जो सच हो। मैं २६ का ही हूँ लेकिन २८ और ३१ दोनों का सच समझता हूँ। यह सच मेरा भी है-

जब सुबह उठता हूँ रात में भंभोड़ दिए गए
एक जंगली जानवर के पंजों टेल अपने क्षत-विक्षत शव के लिए
तब लगता है बिना तुम्हें पाये तुम्हें प्रेम करना एक नाटक करना है

और ३१ के सच से तो मेरे सारे दोस्त २४ और २५ में ही गुजर चुके हैं-

एक नौकरी
और कितना-कितना आराम
घर तो घर
मोहल्ले से होकर भगवान् तक की आंखों में
आ जाती है दीप्ति
आत्मा में शान्ति
और क्या ... क्या ...


और इस सच को पढ़कर तो किसे अपना सच नहीं लगेगा, कम से कम उसे जो पौने दो घंटे के लिए इंसान बन जाता हो, उसे तो ज़रूर-

इन पौने दो घंटे ही
रहता हूँ मैं मनुष्य
बाकी समय पंखा, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कंप्यूटर
और ई-मेल में तब्दील रहता हूँ
एक गंतव्य से दूसरे
और दूसरे से फिर-फिर पहले की तरफ
दौड़ लगाते हुए

निशांत जी आपको बहुत-बहुत बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। आपका नं॰ होता तो सीधे आपको फोन करता।

खैर अनुराग वत्स ने आपकी बात हम तक पहुँचाकर हमपर कृपा की है। इन्हें भी साधुवाद


निशांत को बधाइयां. और शुभकामनाएं.


निशांत जी को बधाई और शुभकामनाएं.
बहुत ही अच्छी और सच्ची कवितायें लिखते है वो.
आपका आभार.


यह सचमुच अपार खुशी का वक्त है कि हिंदी में इस पुरस्कार के बहाने कुछ अच्छे कवियों को पहचाना जाकर रेखांकित किया जा रहा है। निशांत को बधाई भी और शुभकामनाएं कि उनकी रचनात्मकता नए आयाम छूती हुई, ऊचाइयां भी छुएगी।
रवींद्र व्यास, इंदौर


namvarji ka kavit-vivek kya is darje tk gir chuka hai ki we jis-tis ko bharat bhushan dete chalen!


hamare yuwa muflis dino ki sachhi dastan.nishantji ko badhai.


bahut achhi kavitayen hain nishant ki.khaskar paune do ghante to hmari apni kavita lagti hai.puraskrit hone pr badhai.


yah kavita nahin kisi ki bakwas hai.kuchh likh dene se koi kavi nahin ho jata,kavi kavita likhne se hota hai.behtar hota ki nishant kavita likhne ka nahin puraskar lene ka riyaz karte.


आज तो बस आपने दिन बना दिया सर, आबेहयात पढवाया है... देर से ही सही निशांत को बधाई.


प्रिय भाई, निशांत जी. कविता कोश में आपका नाम निशांत देख कर अचम्भा हुआ, चूँकि ये नाम तो हमारे क्षेत्र के जाने माने कवि और कथाकार निशांत जी का है.वैसे नाम एक सा होना सामान्य बात है..लेकिन आपके नाम के साथ हमारे चिर परिचित निशांत जी की कवितायेँ देख कर अचम्भा होना स्वाभाविक है..पते की जगह हमारे परिचित निशांत जी का पता है.. और फोटो आपकी है..ये दोनों घालमेल ..आप दोनों के लिए नुक्सान दायक है....कृपया आप इसमें सुधार करें..दीनदयाल शर्मा , बाल साहित्यकार , हनुमानगढ़ जं.
09414514666 , 09509542303
deendayalsharma.blogspot.com


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी