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दूर देश में हिन्दी


हालांकि हिन्दी का सृजन-संसार दूसरी भाषाओँ में अनुवादों के जरिए व्यक्त-विन्यस्त होता रहा है, हमारे तईं अक्सर बॉलीवुड फिल्मों के आनंद-महोत्सव के लिए भी जानी जाने वाली डच नगरी एम्सटरडम से जब हिन्दी कविताओं का कोई संचयन आए तो सुखद अचरज होना स्वाभाविक ही है। ik zag de stad ( इक ज़ाग दि स्ताद ) यानी मैंने शहर को देखा नामक इस संचयन में शहर पर केंद्रित आधुनिक हिन्दी कविता के पंद्रह कविओं की अट्ठाईस कविताएं शामिल हैं। संचयन को संभव किया एम्सटरडम स्थित इंडिया इंस्टीट्यूट के हिन्दी प्रेमी-प्राध्यापक डिक प्लुकर और समाजशास्त्री लोदवैक ब्रुंट ने। प्लुकर और ब्रुंट वर्षों से भारत आते रहे हैं और उन्होंने भारतीय कविता और समाज का बहुत गहराई से अध्ययन किया है। उनकी इस अध्ययनशीलता को हिन्दी के वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे का भी संबल मिला जिन्होंने न सिर्फ़ उन्हें अनेकों हिन्दी कविओं की कविताएं उपलब्ध कराई, बल्कि उन कविताओं के जटिल अनुवाद और चयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। त्रिलोचन से लेकर कात्यायनी तक की चयनित कविताओं में गांव और शहर के बीच का जीवन, उसका वैविध्य और तनाव तरह-तरह से व्यक्त हुआ है। शहर का भूगोल, उसमें आदमी की बसावट और बेचैनी को समझने में ये मददगार कविताएं हैं। हम बानगी के तौर पर इनमें से कुछ कविताओं को यहाँ साभार दे रहे हैं। संचयन में ये कविताएं वरीयता क्रम में दी गईं हैं। इस प्रस्तुति में क्रम-भंग से भी कुछ बात बनती है शायद। क्योंकि बकौल कुंवर नारायण, '' सवाल अब आदमी की ही नहीं / शहर की ज़िन्दगी का भी है ''।

कविताएं

आदमी की गंध
त्रिलोचन

आदमी को जब तब आदमी की ज़रूरत होती है। ज़रूरत होती है, यानी, कोई
काम अटकता है। तब वह एक या अनेक आदमियों को बटोरता है।
बिना आदमियों के हाथ लगाये किसी का कोई काम नहीं चलता।

गांव में ही मैंने अपना बचपन बिताया है। जानता हूँ लोग अपना काम
सलटाने के लिए इनको उनको भैया, काका या दादा आदि आदर के
स्वर में बुलाते हैं। कुछ मज़ूर होते हैं कुछ कुछ थोड़ी
देर के लिए सहायक होते हैं। जो सहायक होते हैं उनके यहाँ ऐसे ही
मौकों पर ख़ुद भी सहायक होना पड़ता है; इसमें यदि चूक हुई तो
मन भीतर-ही-भीतर पितराता है। जिसकी ओर चूक हुई उसकी ओर
लोग बहुधा आदत समझ लेते हैं।

गांवों का काम इसी तरह चला करता था और अब भी चलता है। पहले के
गांव अब बहुत बदल गए हैं। कामों का ढंग भी बदला है। खेती
सिंचाई-पाती और घरबार का रूप रंग और ढंग बदला है। गांवों में
अब जिनका पेट नहीं भरता वे शहर धरते हैं। शहरों में बड़े-बड़े
कार-खाने होते हैं। गांवों के लोग इन्हीं में से किसी एक में जैसे-तैसे
काम पता जाते हैं। कोई साइकिल-रिक्शा किराये पर चलते हैं।

शहरों में आदमी को आदमी नहीं चीन्हता। पुरानी पहचान भी बासी होकर
बस्साती है। आदमी को आदमी की गंध बुरी लगती है। इतना ही
विकास, मनुष्यता का, अब हुआ है।
****

शहरबदल
केदारनाथ सिंह

वह
एक छोटा-सा शहर था

जिसे शायद आप नहीं जानते
पर मैं ही कहाँ जानता था वहां जाने से पहले
कि दुनिया के नक्शे में कहाँ है वह।

लेकिन दुनिया शायद उन्हीं छोटे-छोटे शहरों के
ताप से चलती है
जिन्हें हम-आप नहीं जानते।

जाने को तो मैं जा सकता था कहीं भी
क्या बुरा था भैंसालोटन ?
हर्ज़ क्या था गया या गुंटूर जाने में

पर गया मैं गया नहीं
( वैसे भी संन्यास मैंने नहीं लिया था )
कलकत्ते से मिला नहीं छंद
जयपुर जा सकता था
पर गलता के पत्थरों ने खींचा नहीं मुझे
शहर अनेक थे जिनके नामों का ज़ादू
उन युवा दिनों में
प्याज़ की छौंक की तरह खींचता था मुझे

पर हुआ यों कि उन नामों के बारे में
सोचते-सोचते
जब एक दिन थक गया
तो अटैची उठाई
और चप्पल फटकारते हुए
चल दिया पडरौना -- उसी शहर में
जिसके नाम का उच्चारण
एक लड़की को लगता था ऊँट के कोहान की तरह

अब इतने दिनों बाद
कभी-कभार सोचता हूँ
मैं क्यों गया पडरौना ?
कोई क्यों जाता है कहीं भी
अपने शहर को छोड़कर --
यह एक ऐसा रहस्य है
जिसके सामने एक शाम ठिठक गए थे ग़ालिब
लखनऊ पहुंचकर।

पर जो सच है वह सीधा-सा
सादा-सा सच है कि एक सुबह मैं उठा
बनारस को कहा राम-राम
और चल दिया उधर
जिधर हो सकता था पडरौना --
वह गुमनाम-सा शहर
जहाँ एक दर्ज़ी कि मशीन भी इस तरह चलती थी
जैसे सृष्टि के शुरू से चल रही हो उसी तरह
और एक ही घड़ी थी
जिससे चिड़ियों का भी काम चलता था
और आदमी का भी

और समय था कि आराम से पड़ा रहता था
लोगों के कन्धों पर
एक गमछे की तरह।

पर शहर की तरह
उस छोटे-से शहर का भी अपना एक संगीत था
जो अक्सर एक पिपिहिरी से शुरू होता था
और ट्रकों के ताल पर चलता रहता था दिन भर
जिसमें हवा की मुर्कियाँ थीं
और बैलगाड़ियों की मूर्च्छना
और धूल के उठते हुए लंबे आलाप
और एक विलम्बित-सी तान दोपहरी-पसिंजर की
जो अक्सर सूर्यास्त के देर बाद आती थी

इस तरह एक दुर्लभ वाद्यवृन्द-सा
बजता ही रहता था महाजीवन
उस छोटे-से शहर का
जिसकी लय पर चलते हुए
कभी-कभी बेहद झुंझला उठता था मैं
कि वे जो लोग थे उनके घुटनों में
एक ऐसा विकट और अथाह धीरज था
कि शाम के नमक के लिए
सुबह तक खड़े-खड़े कर सकते थे इंतज़ार

नमस्कार ! नमस्कार !
मैं कहता था उनसे
उत्तर में सिर्फ़ हँसते थे वे
जिसमें गूंजता था सदियों का संचित हाहाकार...
****

गुमशुदा
मंगलेश डबराल

शहर
के पेशाबघरों और अन्य लोकप्रिय जगहों में

उन गुमशुदा लोगों की तलाश के पोस्टर
अब भी चिपके दीखते हैं
जो कई बरस पहले दस-बारह साल की उम्र में
बिना बताये घरों से निकले थे
पोस्टरों के अनुसार उनका कद मंझोला है
रंग गोरा नहीं गेहुंआ या सांवला है
हवाई चप्पल पहने है
चेहरे पर किसी चोट का निशान है

और उनकी माँएं उनके बगैर रोती रहती हैं
पोस्टरों के अंत में यह आश्वासन भी रहता है
कि लापता की ख़बर देनेवाले को मिलेगा
यथासंभव उचित ईनाम

तब भी वे किसी की पहचान में नहीं आते
पोस्टरों में छपी धुंधली तस्वीरों से
उनका हुलिया नहीं मिलता
उनकी शुरूआती उदासी पर
अब तकलीफ़ें झेलने की ताब है
शहर के मौसम के हिसाब से बदलते गए हैं उनके चेहरे
कम खाते कम सोते कम बोलते
सरल और कठिन दिनों को एक जैसा बिताते
अब वे एक दूसरी दुनिया में हैं
कुछ कुतूहल के साथ
अपनी गुमशुदगी के पोस्टर देखते हुए
जिन्हें उनके परेशान माता-पिता जब-तब छपवाते रहते हैं
जिनमें अब भी दस या बारह

लिखी होती है उनकी उम्र
****

संयोग
अरुण कमल

जब सूरत में महामारी फैली
तब जो हज़ारों लोग वहां से लदफद भागे
उनमें हरिनंदन भी था
जो रास्ते भर भगवान् की कृपा पर चकित रहा
कि कैसे छूटते-छूटते उसे यह गाड़ी मिल गई
और वह गाड़ी एक हज़ार सात सौ छप्पन किलोमीटर
चलने के बाद एक मालगाड़ी से टकराई
और एक बार फिर हरिनंदन भगवान् कि असीम कृपा के सम्मुख
नतमस्तक था कि वह बाल बाल बच गया

और बचकर अपने गांव के स्टेशन लहलह दुपहरिया उतरा
और रास्ते के धूप और धूल भरे चौर में
लुटेरों से घिर गया
और अब तीसरी बार वह भगवान् की लाख लाख कृपा पर चकित था
कि लुटेरों ने उसकी संदूक तो छीन ली जिसमें कुल सात सौ तेईस
रुपये थे और एक जोड़ी कपड़ा पर लाख रुपये की जान बख्श दी
और यही सोचते सोचते वह कच्चे घर के आँगन में
झोलंग खात पर पड़ा तो तारे ताकता सो गया
और उसी रात एक गोतिया ने पुश्तैनी दुश्मनी में मौका पा
उसका काम तमाम कर दिया।

कुछ दिनों बाद घोषणा हुई कि सूरत में जो महामारी थी
वह वास्तव में महामारी नहीं थी।
****

रात के संतरी की कविता
कात्यायनी

रात को
ठीक ग्यारह बजकर तैंतालीस मिनट पर
दिल्ली में जी. बी. रोड पर
एक स्त्री
ग्राहक पटा रही है।
पलामू के एक कसबे में
नीम उजाले में एक हकीम
एक स्त्री पर गर्भपात की
हर तरकीब अजमा रहा है।
बाड़मेर में
एक शिशु के शव पर
विलाप कर रही है एक स्त्री
बम्बई के एक रेस्तरां में
नीली-गुलाबी रोशनी में थिरकती स्त्री ने
अपना आखिरी कपड़ा उतार दिया है
और किसी घर में
ऐसा करने से पहले
एक दूसरी स्त्री
लगन से रसोईघर में
काम समेट रही है।
महाराजगंज के ईंट भट्टे में
झोंकी जा रही है एक रेजा मजदूरिन
ज़रूरी इस्तेमाल के बाद
और एक दूसरी स्त्री चूल्हे में पत्ते झोंक रही है
बिलासपुर में कहीं।
ठीक उसी रात उसी समय
नेल्सन मंडेला के देश में
विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के लिए
मंच सज रहा है।
एक सुनसान सड़क पर एक युवा स्त्री से
एक युवा पुरूष कह रहा है --
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।

इधर कवि
रात के हल्के भोजन के बाद
सिगरेट के हल्के-हल्के काश लेते हुए
इस पूरी दुनिया की प्रतिनिधि स्त्री को
आग्रहपूर्वक
कविता की दुनिया में आमंत्रित कर रहा है
सोचते हुए कि
इतने प्यार, इतने सम्मान की,
इतनी बराबरी की
आदि नहीं,
शायद इसीलिए नहीं आ रही है।
झिझक रही है।
शरमा रही है।
****

( संचयन के अन्य कवि : कुंवर नारायण, गुलज़ार, कुमार विकल, विष्णु खरे, अशोक वाजपेई, जावेद अख़तर, नीलाभ, अनीता वर्मा, अनामिका और सविता सिंह )

6 comments:

bahut achhi sari kavitayen aur aap ki khoj
saader
rachana


bahut achhi kavitayen,chayan or tipanni.lambe arse bad sabad dekha.mere liye bahut kuch parosa hua hai.dhanyawad.


कविताएं अच्‍छी लगीं। आप इस काम में जितनी मेहनत कर रहे हैं उसके लिए बधाई के पात्र तो हैं ही।


पूजा श्रीवास्तव

स्व त्रिलोचन जी और आदरणीय मंगलेश जी की कविताएँ बहुत ऊँचा स्तर छू लेती हैं। ये इतनी सारी भावनाओं को जगा रही हैं कि स्पष्ट बताना संभव नहींहै। कात्यायनी जी की कविता भी अपनी जगह अच्छी है। आपाका ब्लाग उच्चस्तरीय है। ऐसी ही कविता की भविष्य में आशा रखती हूँ। पूजा श्रीवास्तव


ye kavitayen jitna shahron ke bare men hai,usse khin zyada usme basnewale logon ke bare me.trilochanji ki panktiyan apni jgah durust hain ki शहरों में आदमी को आदमी नहीं चीन्हता। पुरानी पहचान भी बासी होकर
बस्साती है। आदमी को आदमी की गंध बुरी लगती है। इतना ही विकास, मनुष्यता का, अब हुआ है।


kedar jee ki rachana bahut achhi lgi. padrauna ke madhyam se unhone hum se hmari pahchan krai hai.
badhai


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