Friday, July 18, 2008

सबद विशेष : कुंवर और अपूर्व नारायण


यह अपूर्व अंकन

हिन्दी के किसी महत्वपूर्ण कवि की कविताओं का ऐसा द्वैभाषिक चयन पहली बार पुस्तकाकार सामने आया है। यह गौर तलब है कि अंग्रेजी, जिसके माध्यम से विश्व-साहित्य, फिर चाहे वह किसी भी भाषा में क्यों न रचा गया हो, दुनिया भर के साहित्य-प्रेमियों को सुलभ होता रहा है। हिन्दी ने अपने खैरख्वाहों के अहमन्न्य दावों के बावजूद यह दुर्भाग्य ही अर्जित किया है कि उसके हिस्से विश्व-पटल पर ऐसी सहज-उपलब्धता न आने पाए। बहरहाल, इस दुर्भाग्य पर मर्सिया पढ़ने से बेहतर है फिलहाल अपूर्व के इस अपूर्व अंकन की चर्चा की जाए।

अपूर्व नारायण, जो इन १०० कविताओं के अनुवादक और चयनकर्ता भी हैं, ने ''नो अदर वर्ल्ड'' नाम के इस चयन के लिए उन कविताओं को छोड़ने का लोभ-संवरण किया है जिससे कुंवरजी की हिन्दी में परिचित कवि-छवि गढ़ी गई है। ''आत्मजयी'' और ''वाजश्रवा के बहाने'' सरीखे उनकी कीर्ति का आधार माने जाने वाले प्रबंध-काव्य तक को इसमें शामिल नहीं किया गया है। इससे पहले जो प्रातिनिधिक चयन आए वे निश्चय ही इतने सावधान नहीं थे। इस प्रकार से कविताओं का चयन करते हुए अपूर्व ने कुंवरजी की उस सर्वथा अलक्षित कवि-छवि पर रोशनी डाली है जो इन काव्यों की मुग्ध-प्रशंसा और असंगत आलोचना की छाया में कहीं दब-ढँक गई थी। यह सचमुच प्रीतिकर है कि जिस कवि की काव्य-रचना का काल पाँच दशकों से ज़्यादा रहा हो और जिसकी कविता को समझने की परिचित रूढियां निरंतर विकासमान हों, एक पराई भाषा में एक अनुवादक-अध्येता उसे अपनी दृष्टि और मेधा से पुनराविष्कृत करे। यह पुनराविष्कार असल में उस काव्य-चेतना के पुनः संयोजन से संभव हुआ लगता है जिसमें ''तत्वदर्शी देखता है एक मरीचिका की अवधि में/ प्यास को अथाह हो जाते एक बूँद की परिधि में'' और जहाँ उसका काव्य-पुरुष अपने सम्पूर्ण वैविध्य और एकत्व में उपस्थित होता है। अकारण नहीं अपूर्व ने कुछ कविताओं को उसके काव्य-स्वभाव की एकता के कारण एक जगह रखा है और यही काव्य-खंडों की बसावट का भी मूलाधार है।

करीब दस परिश्रमी वर्षों में संभव हुए इन अनुवादों की विशिष्टता यह नहीं है कि ये लक्ष्य भाषा में जाकर उस जैसी ही हो गई हैं। यदि ऐसा होता तो संभवतः यह कविता के साथ अनुवादक का सबसे ख़राब सलूक माना जाता। कुंवरजी के शब्द, वाक्य, कहन और इन सबके मेल-जोल से वो जैसा शब्द-संगीत पैदा करते हैं, वह इन अनुवादों में अपनी स्वाभाविकता में उतर आया है। यही अनुवादक के उद्यम का पता भी देता है। कुंवर-अपूर्व के पिता-पुत्र संबंधों के कारण इन अनुवादों को अंतरंग कहना भी युक्तियुक्त होगा। पुस्तक की भूमिका में अपूर्व ने अपने सर्जक पिता के व्यक्तित्व और कृतित्व का जो निकट आकलन किया है, उसका विशेष महत्व है। ऐसा रचनात्मक साहचर्य और निभाव कम से कम हिन्दी में तो विरल ही है।

कुछ बानगी

ये पंक्तियाँ मेरे निकट

ये पंक्तियाँ मेरे निकट आईं नहीं
मैं ही गया उनके निकट
उनको मनाने,
ढीठ, उच्छृंखल अबाध्य इकाइयों को
पास लाने :
कुछ दूर उड़ते बादलों की बेसंवारी रेख,
या खोते, निकलते, डूबते, तिरते
गगन में पक्षियों की पांत लहराती :
अमा से छलछलाती रूप-मदिरा देख
सरिता की सतह पर नाचती लहरें,
बिखरे फूल अल्हड़ वनश्री गाती...
... कभी भी पास मेरे नहीं आए :
मैं गया उनके निकट उनको बुलाने,
गैर को अपना बनाने :
क्योंकि मुझमें पिण्डवासी
है कहीं कोई अकेली-सी उदासी
जो कि ऐहिक सिलसिलों से
कुछ संबंध रखती उन परायी पंक्तियों से !
और जिस की गांठ भर मैं बांधता हूं
किसी विधि से
विविध छंदों के कलावों से।

THESE LINES CLOSE TO ME

These lines never came close to me
it is I who went close to them
to coax them dear,
to bring their wilful wanton vagaries
a little near :
Tousled outlines of clouds flying far,
or the waving rows of birds in the sky,
which come out, drown in, get lost, float along :
splashing from the moon, drunk on beauty,
tides that dance on the river in glee,
scattered flowers that sing a forest song...
...never came close to me :
I went close to them to call them near,
to make the alien dear :
for somewhere some lonely melancholy
resides in me
that far from the world's affairs
bonds with those alien lines instead !
And whose knot alone i tie
somehow with some method
and varied verse for sacred thread.
****
बाकी कविता

पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ
पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है।
जीवन को पूरी तरह पाने
और पूरी तरह दे जाने के बीच
एक पूरा मृत्यु-चिह्न है।

बाकी कविता
शब्दों से नहीं लिखी जाती,
पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह
कहीं भी छोड़ दी जाती है...

THE REMAINING POEM

The meaning of water falling on leaves
is not the meaning of leaves falling on water.
Between getting life fully
and giving it fully
a full death mark is there.
The remaining poem
is not written with words,
drawing the full existence like a full stop
it is left anywhere...
****
लापता का हुलिया

रंग गेहुआं ढंग खेतिहर
उसके माथे पर चोट का निशान
कद पांच फुट से कम नहीं
ऐसी बात करताकि उसे कोई गम नहीं।
तुतलाता है।
उम्र पूछो तो हजारों साल से कुछ ज्यादा बतलाता है।
देखने में पागल-सा लगता-- है नहीं।
कई बार ऊंचाइयों से गिर कर टूट चुका है
इसलिए देखने पर जुड़ा हुआ लगेगा
हिन्दुस्तान के नक्शे की तरह।

DESCRIPTION OF THE MISSING ONE

Wheatish-complexion, rustic ways,
on his brow the scar of a wound,
height not under five feet,
talks as if he has never known grief.
Stutters.
his age ? Somewhat more than many thousand years, he says.
Looks a bit crazed -- but isn't.
Has often fallen off heights and got all broken up
Hence, when seen, will look pieced together
like the map of India.
****
( ''नो अदर वर्ल्ड'' नामक इस पुस्तक को रूपा, नई दिल्ली ने छापा है। )

12 comments:

Ashok Pande said...

अनुवाद थोड़ा और अच्छे हो सकते थे. पोस्ट अलबत्ता बहुत हिम्मत बढ़ाने वाली है. अच्छा काम!

purnima said...

Th series of peoms are awesome. Since,I'm from a non hindi background, this translation gives me a better understanding of kunwar narain's poem. I especially like the last one "Description of the missing one". Credit goes to Apurv. Good job. Keep going. waitin to read many such poems:) Good luck:)

Dilip said...

Anurag ji,
Bahut-bahut dhanyawad.
Jin vibhootiyon se ap apne blog ke madhyam se mulakat karate rahe hain, unake prati aur apake prati aseem shraddha ho rahi hai. Hindi ki seva ka avsar nahin talash paya, lekin is khoj me apki bhoomika adhyay banati ja rahi hai.
Kshama chahata hun, ek shikayat ki ijajat mang raha hun. Apne ek jagah 'parai bhasha' jikra kiya hai. Lekin jab koi kisi bhasa ki kriti ko andolit kar naya rag chhedata hai to nishchay hi wah itna apna hota jitna ki pahale kabhi nahin. Ant tak ek naveen sambandh ko sanwarane ki lalak bhi hoti hai.
Mudde ki bat karun to, anuvad ke bad bhi Apurva Narayan ji ki kavita ne jin baton ki tarf dhyan dilai hai, usase kavita ka kalevar aur bhi nikhar kar aa raha hai. Meri bhookh badh gayi hai, 100 kavitayen mool kavita ke sath hi padh jaun. Ek bar phir kahana chahunga- Param adarniya Apurva Narayan ji se sakshatkar karakar apne muje meri shraddha ka haran kar liya hai.

Udan Tashtari said...

इसे यहाँ प्रस्तुत करने का आभार. आनन्द आ गया.

aalekh said...

kunwar narayan ki trah anya mahtwpurn hindi kaviyon ka aisa chayan aur anuwad pustakakaar aana chahiye.isse hindi kavita ko wyapak failav aur bada pathak varg milega.apurv narayan ke ye anuvad sarahniy hain.pustak chapi khan se hai,itni suchna bhar to dal dete.

vandana said...

apurv narayan ne bahut achha kaam kiya hai.fir yh kunwarji ki kavita ki transability v hai ki wh dusri bhasha me swabhawikta pati rhi hain.unki kavitaon ke italwi or polish anuwadon ki charcha hmne khoob suni hai.agreji men ekmusht chayan or anuwad se kavitayon ki pahunch badhegi hi.

ओम निश्‍चल said...

कुँवर नारायण जी के इस नये सँग्रह की कवितायेँ पढ कर भाव विभोर हो उठा.
उनके पास कविता की एक विरल आवाज़ है. अपूर्व को साधुवाद्. और कुँवर जी को बधायी.
---ओम निश्चल्, पट्ना, दिल्ली 09955774115

सुभाष नीरव said...

अनुराग जी, आपका सबद निरंतर देखता हूँ। साहित्य और साहित्यकारों से जुड़ीं सार्थक पोस्ट देखने को मिलती है हर बार। कुँवर नारायण जी की कविताएं तो मुझे प्रिय रही हैं। उनकी कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद के लिए अपूर्व जी और कुँवर जी दोनों को बधाई !

jeevesh said...

कुवंर नारायण की कविताएं मुझ जैसे पाठक के लिए सदा उत्सुकता का विषय होती हैं क्योंकि इनमें हमेशा चीजें नए अर्थों में खुलती हैं साथ ही पढ़ने के उत्साह का संचार करती हैं । मूल रचना के साथ अनुवाद का प्रकाशन एक सार्थक पहल है जो रचना की प्रकृति व प्रवृत्ति को बेहतर ढंग से व्यक्त करती है ।

जीवेश प्रभाकर

vidya said...

main apne ko yh nirnay krne me to aksham pata hun ki anuwad kis koti ka hai, pr yh prashanshniy hai ki kisi hindi kavi ka ekmusht anuwad pustak roop me samne aaya. in kavitaon ka bhla kaun moorid na hoga.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

badhaii
kuvnar narain ji ko gyanpeeth puraskaar ki bhee

Harendra Singh said...

We read your translation of 'No Other World'....It just reflect your competence' we are thankful of Mr Alok jain of Jyan peeth who made this book available. will it also possible to u to translate one of our poetic translation, if so we can send you a copy of the book for your final confirmation.

Harendra Singh
harendra.singh@epatrika.com
09829266056